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रविवार, 29 फ़रवरी, 2004 को 18:51 GMT तक के समाचार
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कितना ख़ुशहाल है बेतिया

बीबीसी कारवाँ
बीबीसी कारवाँ
बीबीसी का कारवाँ रविवार को पश्चिमी चंपारण के ज़िला मुख्यालय बेतिया में था.

बीबीसी के पुराने नेत्रहीन श्रोता अश्विनी कुमार 'अशरफ़' ने जब अपने ख़ास अंदाज़ में बीबीसी चौपाल की शुरुआत की, तो उनका तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत हुआ.

और शायद बीबीसी कारवाँ का इससे बेहतर स्वागत नहीं हो सकता था.

विचारमंच में चर्चा का विषय था- कितना ख़ुशहाल है बेतिया. मंच पर मेहमान थे हिंदी की प्रोफ़ेसर ज्योत्सना प्रसाद, बेतिया के पुलिस अधीक्षक पारसनाथ, व्यापारी एजाज़ अहमद और किसान अवधेश मिश्रा.

बेतिया कितना ख़ुशहाल है, इस सवाल का जवाब ज्योत्सना प्रसाद ने कुछ यूँ दिया, "अगर मान लिया जाए कि खाना और सोना ही ज़िंदगी है तो मैं कहूँगी कि बेतिया ख़ुशहाल है. लेकिन क्या वाकई यही ख़ुशहाली का लक्षण है."

बदहाली

बेतिया में लोगों का मानना था कि यहाँ बदहाली का कारण बढ़ता अपराध और बिगड़ती क़ानून-व्यवस्था की स्थिति है.

 अगर मान लिया जाए कि खाना और सोना ही ज़िंदगी है तो मैं कहूँगी कि बेतिया ख़ुशहाल है. लेकिन क्या वाकई यही ख़ुशहाली का लक्षण है
प्रो. ज्योत्सना प्रसाद

अधिवक्ता ठाकुर विजय कुमार सिंह ने कहा, "बेतिया में अपराधी हँस रहे हैं और पूरा समाज रो रहा है."

पर मंच पर बैठे पुलिस अधीक्षक पारसनाथ इससे सहमत नहीं दिखे.

उन्होंने कहा, "मैं आपको साफ़ तौर पर ये बताना चाह रहा हूँ कि बेतिया में ऐसी बात नहीं है."

कृषि प्रधान क्षेत्र में जहाँ गन्ना, धान और गेहूँ सभी उगते हैं, वहीं सरकार के किसानों को नज़रअंदाज़ करने और किसानों की बिगड़ती स्थिति पर कई टिप्पणियाँ आईं.

मंच पर आए किसान अवधेश मिश्रा का कहना था, "गन्ना मूल्य गिर जाने और अधिकांश चीनी मिलों के बंद हो जाने से यहाँ के किसानों की हालत बदतर हो गई है. अगर किसानों को सुविधा दी जाए तो उनकी ज़िंदगी ख़ुशहाल हो सकती है."

कृषि से ही जुड़ी समस्या को उपेंद्र कुमार तिवारी ने भी उठाया.

उन्होंने कहा, "चंपारण में सिंचाई की समस्या है. तिरहुत नहर को छोड़ कर इलाक़े की सभी नहरें 25 सालों से बंद हैं. उस पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है."

अनोखा अंदाज़

पर गाँधी की कर्मभूमि, ध्रुपद गायिकी के लिए पहचाने जाने वाले इस शहर की शान अश्विनी कुमार अशरफ़ ने अपने अनूठे अंदाज़ में कुछ यूँ बयां की.

बेतिया शहर की बहार न पूछ

रौनक़े कूचा बाज़ार न पूछ

इसके ठीक विपरीत केएन झा को बेतिया के बुरे हाल का मलाल था. उनका कहना था, "किस एक को दे इल्ज़ाम की उसने हमको लूटा है सभी है एक से एक क़ातिल सभी ने मिलकर लूटा है."

बेतिया से मुंबई फ़िल्म उद्योग का सफ़र तय कर चुके मशहूर फ़िल्म निर्देशक प्रकाश झा ने इस क्षेत्र के लोगों की सरकारी नौकरी की तलाश पर जहाँ कथा माधोपुर की रचना की.

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वहीं पुलिस अधीक्षक पारसनाथ ने जल्दी सफलता पाने की होड़ को भी परेशानियों का कारण बताया.

लोहिया से जुड़े रहे बीबीसी के एक बुज़ुर्ग श्रोता सत्यनारायण झुनझुनवाला के पास बेतिया को ख़ुशहाल रखने का एक नुस्ख़ा था.

उन्होंने कहा कि अगर सरकार और पुलिस दोनों ईमानदारी से काम करें, तो जनता अपने आप ईमानदार हो जाएगी और उससे ऐसा बनना पड़ेगा.

सभा में नरम-गरम माहौल के बाद बारी आई बीबीसी के बारे में विचारों की. इनमें से एक कूछ यूँ थी...

बेतिया की धरती प्यारी करती है मेहमानों की ख़ातिरदारी

मणिकांत, शिवकांत जी आए बीबीसी की धूम मचाए

सीमा, रूपा, रेणू अगाल ममता जी करती सबका ख़्याल

अचला जी की बारी आती बातों-बातों में बहलाती

नगेंदर शर्मा बड़े होशियार करें सवालों की बौछार

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