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हज़ारीबाग में पसरता जा रहा है एड्स | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"आप लोग ग़लत काम कभी मत कीजिएगा और शराब-नशा करके कभी भी अड्डाबाज़ी में मत जाइएगा." यह कहना है अपने दोस्तों और जानने वालों से हज़ारीबाग शहर के एक एड्स रोगी का. कभी अपने हज़ार बागों, जंगलों की हरियाली और सुहावने मौसम के लिए जाना जाने वाला हज़ारीबाग शहर इन दिनों कुछ दूसरे कारणों से ही मशहूर है. अब हज़ारों बाग और शाल के जंगल तो विकास और ज़रूरत की बलि चढ़ गए हैं पर लेकिन एड्स की बीमारी हज़ारीबाग के कई गाँवों में अपने पंजे फ़ैला रही है. विष्णुगढ़ और उससे लगे इलाक़ों के आसपास के लगभग 50 गाँवों के कोई 30-40 लोग अब तक इस जानलेवा बीमारी से मारे जा चुके हैं लेकिन इस बीमारी के बाद लोगों ने इस बीमारी से पीड़ित लोगों की तरफ़ हमदर्दी का हाथ बढ़ाने के बजाए इनका त्याग किया, इनकी अवहेलना की. इन लोगों को शरण दी हज़ारीबाग की होलीक्रॉस संस्था के आरोग्य सदन, स्नेह दीप ने जहाँ एड्स के रोगियों का इलाज और देखभाल होती है. आम के एक ऐसे ही बाग में बने स्नेहदीप परिसर में बीबीसी की टीम ने तमाम एड्स रोगियों से मुलाक़ात की. हमने इनसे इनके इतिहास और एहसास पर इनसे बातचीत की. इनमें से एक ने बताया, “मैं मुँबई में था. वहाँ ग़लत काम और साथियों-शराब की संगत में ऐसा हो गया. तब से हमको एक साल तो मालूम ही नहीं पड़ा कि ऐसा कुछ हुआ है. पहले बुख़ार आया और फिर दस्त चालू हो गए. इसके बाद राँची में इसकी जाँच कराई तो बीमारी का पता चला.” वो बताते हैं, “अगर मुँबई न जाता तो शायद यह बीमारी न होती पर ग़रीबी के चलते वहाँ गया. माँ-पिता जहाँ तक पढ़ा पाए, पढ़ाया. उसके बाद तो अपनी ज़रूरतों के लिए जाना ही पड़ा.” संस्था की सिस्टर पीटर्स बताती हैं कि इस समय उनके यहाँ एड्स के 12 मरीज़ हैं. वे बताती हैं, “क्षेत्र में ख़ासी ग़रीबी है और इसके चलते 80 प्रतिशत युवा ऑफ़ सीज़न में मुंबई, दिल्ली, गुजरात और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में काम की तलाश में चले जाते हैं. यहीं उनको संक्रमण मिलता है. काम के बाद जब वो घर आते हैं तो यह संक्रमण उनसे उनकी पत्नियों को मिल जाता है.” जब हमने एक एड्स संक्रमित महिला से इस बारे में बात की तो उन्होंने बताया कि उन्हें यह बीमारी उनके पति से मिली. वे बताती हैं, “जब पता चला तब काफ़ी कमज़ोरी और सिरदर्द रहता था. अब तो इस बीमारी से मेरी बेटी को भी ख़तरा है.” जब सिस्टर से पूछा कि महिलाओं को अपने पति को हुई इस बीमारी की जानकारी मिलने पर उनकी क्या प्रतिक्रिया रहती है, तो उन्होंने बताया, “महिलाएँ जानकारी के बाद शुरू में तो काफ़ी गुस्सा होती हैं पर बाद में उन्हें भी महसूस होने लगता है कि अब इसी के साथ जीना है.” “एक ऐसी ही महिला हमारे यहाँ पिछले दिनों आई. उसके रक्त की जाँच की जब रिपोर्ट आई तो वह रोने लगी और बोली कि अब तो मरना ही है.”
जब एक मरीज़ से हमने पूछा कि अपने भविष्य को वो किस रूप में देखते हैं तो उन्होंने बताया, “अच्छी सेहत रहेगी तो बहुत कुछ कर सकता हूँ नहीं तो ऊपर जाने का टिकट तो कट ही चुका है. वैसे में ऑपरेटर हूँ और मशीन चला सकता हूँ.” वो बताते हैं, “जब से मुझे मालूम हुआ है कि मुझे यह बीमारी है, तब से मैं अपने सारे देस्तों और जानने वालों को उपदेश देता हूँ कि इससे बचें.” पर इन मामलों के सामने आने के बाद क्या रोगियों की तादाद में कोई कमी आई है, यह पूछने पर पीटर्स बताती हैं, “बीमारी तो तेज़ी से फैल रही है. लोगों को इसके बारे में पता ही नहीं है. अभी कितने ही लोगों को इस बारे में जागरूक बनाना होगा.” पर यह काम कौन करेगा, पूछने पर वो कहती हैं, “काम तो हमें ही करना है. हम शुरू में कुछ स्कूलों में गए. वहाँ बच्चों और शिक्षकों को इस बारे में बताया और कुछ गाँवों में भी गए. पर अब यहाँ मरीज़ों की तादाद बढ़ती जा रही है जिसके चलते निकलना हो ही नहीं पाता.” क्षेत्र में तेज़ी से फैलती यह बीमारी कुष्ठ जैसे रोगों का पर्याय बन गई है पर यह सौभाग्य की ही बात है कि यहाँ इन मरीज़ों के प्रति लोगों का बर्ताव वैसा नहीं है. फिर भी कुछ अवहेलना तो देखनी ही पड़ती है. |
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