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खीरे की तरह बिकते हैं हीरे | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हीरे जवाहरात के बड़े-बड़े प्रतिष्ठानों के लिए मशहूर जयपुर में एक स्थान ऐसा भी है जहाँ मूल्यवान हीरे-पन्नों की मंडी लगती है और खुले में नगीनों का कारोबार होता है. जयपुर का जौहरी बाज़ार परंपरा और आधुनिकता का मिश्रण है. यहाँ गुलाबी रंग में रंगी कलात्मक हवेलियां हैं तो जौहरियों के वातानुकूलित व्यापारिक प्रतिष्ठान भी. इन्हीं के बीच वह खुला व्यापारिक स्थल भी है, जहाँ प्रतिदिन हीरे-जवाहरात के कारोबारी नगीनों की ख़रीद-फ़रोख्त करने जमा होते हैं. बेशक, व्यापार नगीनों का है, लेकिन हाल किसी सब्ज़ी मंडी से कम नहीं. इस खुले बाज़ार के पूर्व अध्यक्ष कुशलचंद करड़िया कहते हैं, “इस बाज़ार की खूबी यही है कि यहाँ अमीर ग़रीब सभी व्यापार करते हैं. कोई यहाँ पाँच रुपए लेकर आता है तो कोई पाँच हज़ार. हालाँकि मुनाफ़ा बहुत ज़्यादा नहीं होता, लेकिन सब गुजर-बसर कर सकते हैं.” नगीनों के व्यापारी कहते हैं कि यहाँ कांच से लेकर हीरे-पन्ने, रत्न और माणक सब कुछ बिकने आता है. जयपुर चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के सचिव अजय काला बताते हैं कि जयपुर में हर साल हीरे-जवाहरात का दो हज़ार करोड़ रुपए का कारोबार होता है. इसमें खुले बाज़ार असंगठित बाज़ार का कितना हिस्सा है, कहना मुश्किल है. ख़ास भाषा नगीनों की इस व्यापारिक मंडी में कोई सौदागर है तो कोई दलाल. हर हाथ में काग़ज़ की पुड़िया होती है, जिसमें हीरे-पन्ने लिपटे रहते हैं. मोलभाव की अपनी भाषा और संकेत हैं. व्यापारी मोहम्मद सलीम कहते हैं, “यहां एक-दूसरे का हाथ हाथ थामकर सौदा पक्का होता है. संकेत और भाषा बाहर का आदमी नहीं समझ सकता.” नगीनों की यह मंडी जौहरी बाज़ार स्थित एक मंदिर प्रांगण में लगती है. मोहम्मद मुश्ताक कहते हैं, “यह प्रशिक्षण केंद्र भी है. यहाँ युवक नगीनों की पहचान करना सीखते हैं. बड़े जौहरियों की अपनी दुकान गद्दी कहलाती है. यहाँ वे लोग आते हैं, जो गद्दी का इंतज़ाम नहीं कर सकते.” हुनर अख़्तर बेग जैसे व्यापारी हैं जो व्यापार का हुनर सीखने यहाँ बचपन से ही आते रहे हैं. बेग कहते हैं, “जयपुर में दो और स्थानों पर ऐसी ही मंडी सजती है, लेकिन सबसे बेहतर बाज़ार यही है. कारोबार रोज लाखों रुपए का होता है, लेकिन आधिकारिक तौर पर आंकड़ा बताने को कोई तैयार नहीं है.” कहते हैं कभी-कभी यहाँ चोरी का माल भी आता है. कारोबारी जुबान में इसे मुरली कहा जाता है. हाजी अबरार कहते हैं, “इस जगह ने व्यापारियों का वैभव देखा है तो कुछ का पराभव भी. कोई करोड़पति हो गया तो कोई ख़ाक. सब किस्मत की बात है.” | इससे जुड़ी ख़बरें हीरे चर गई गाय, तलाशी गोबर की20 जनवरी, 2004 | भारत और पड़ोस हीरा तराशी के कारोबार में तेज़ी16 अक्तूबर, 2006 | कारोबार कूड़ेदान में हीरों की तलाश23 दिसंबर, 2003 | कारोबार बिक नहीं पाया सबसे बड़ा हीरा22 नवंबर, 2003 | कारोबार कोहिनूर हीरे को भारत लाने की मांग09 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस राजस्थान में ऊँट पर चलता है बैंक05 फ़रवरी, 2007 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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