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रविवार, 17 दिसंबर, 2006 को 13:44 GMT तक के समाचार
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एसईजेड के इतिहास पर एक नज़र
एसईजेड
पिछले पाँच वर्षों में एसईजेड प्रस्तावों की बाढ़ सी आ गई है
विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी एसईजेड का इतिहास लगभग 60 वर्ष पुराना है. सबसे पहले वर्ष 1947 में पुएर्तो रिको में इंडस्ट्रीयल पार्क की स्थापना हुई.

इसमें लगभग वो सभी सुविधाएँ दी गईं जो आधुनिक एसईजेड में औद्योगिक घरानों को प्राप्त है. हालाँकि इसे औपचारिक तौर पर एसईजेड का नाम नहीं दिया गया था.

इसके बाद 1960 में आयरलैंड के शैनन हवाई अड्डे के निकट निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र यानी ईपीजेड बनाया गया. बाद में दुनिया भर के देशों ने इन्हीं ईपीजेड का नाम बदल कर एसईजेड कर दिया.

अगर नामाकरण के हिसाब से देखा जाए तो पहला एसईजेड चीन में बना. वर्ष 1980 में चीन ने चार एसईजेड स्थापित किए – शेनझेन, झुआई, शान्ताऊ और झियामेन.

भारत ने इस दिशा में चीन से भी पहेल वर्ष 1965 में शुरुआत की जब कांडला में पहला ईपीजेड बना. इसके बाद वर्ष 1973-74 में सांताक्रूज़ इलेक्ट्रॉनिक एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग ज़ोन बन कर तैयार हुआ. फ़िर कोचीन,सूरत,चेन्नई, विशाखापट्टनम और नोएडा में ईपीजेड बना.

एसईजेड की ओर बढ़े क़दम

वर्ष 1991 में उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने पर ऐसे विशेष ज़ोन बनाने की माँग शुरू हुई जहाँ सभी तरह की बुनियादी सुविधा उपलब्ध हो और वहाँ स्थापित होने वाली कारोबार इकाइयों को करों में छूट मिले.

इसी को ध्यान में रखते हुए लगभग एक दशक बाद एक अप्रैल वर्ष 2000 में केंद्र सरकार ने एसईजेड नीति लागू किया. इसका मूल मकसद निर्यात को बढावा देने के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएँ और मुक्त वातावरण मुहैया कराना है.

इसी वर्ष केंद्र सरकार ने सात ईपीजेड को एसईजेड में तब्दील कर दिया. ये हैं – कांडला, सूरत, कोचीन, सांता क्रूज़, चेन्नई, विशाखापट्टनम और नोएडा. इसके अलावा इंदौर, साल्टलेक (कोलकाता) और जयपुर में नए एसईजेड बनाए गए हैं.

वर्ष 2000 के बाद एसईजेड बनाने के प्रस्तावों की बाढ़ सी आ गई. सरकार ने वर्ष 2005 में बकायदा एसईजेड क़ानून बना दिया. अब तक एसईजेड के 237 प्रस्तावों को औपचारिक मंजूरी मिल चुकी है और लगभग 170 प्रस्तावों को सैद्धांतिक मंजूरी मिली है जबकि सिर्फ़ 14 एसईजेड ही अभी पूरी तरह काम कर रहे हैं.

वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक अलग अलग एसईजेड में मैनुफैक्चरिंग, सेवा और आईटी क्षेत्र की लगभग 900 इकाइयाँ काम कर रही हैं जहाँ से पिछले वर्ष कुल 18 हज़ार 309 करोड़ रुपए का निर्यात हुआ.

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