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रविवार, 20 अगस्त, 2006 को 09:09 GMT तक के समाचार
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इन्फ़ोसिस से सेवानिवृत्त हुए नारायण मूर्ति
नारायणमूर्ति
नारायण मूर्ति को पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है.
भारत की बड़ी सॉफ़्टवेयर कंपनियों में से एक इन्फ़ोसिस के संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति कंपनी के चेयरमैन पद से सेवानिवृत्त हो गए हैं.

हालांकि वो कंपनी से जुड़े रहेंगे और अपनी महत्वपूर्ण राय देते रहेंगे लेकिन कंपनी के दैनिक कार्यों में उनका दख़ल कम हो जाएगा.

रविवार को मूर्ति का जन्मदिन भी है. वो 60 वर्ष के हो चले हैं और उन्होंने सेवानिवृत्ति के लिए यही दिन चुना.

नारायण मूर्ति ने 1981 में इस कंपनी की शुरुआत की थी और पिछले महीने ही इन्फ़ोसिस ने अपने 25 साल भी पूरे किए हैं.

नारायण मूर्ति ने सिर्फ कुछ लोगों के साथ मिलकर मात्र 250 डॉलर की राशि से यह कंपनी शुरू की थी जिसकी लागत आज दो अरब डॉलर से अधिक है.

इस समय कंपनी के कर्मचारियों की संख्या पचास हज़ार से अधिक है और 12 देशों में कंपनी की शाखाएँ हैं.

व्यक्तित्व

20 अगस्त 1946 को कर्नाटक के एक ब्राहाण परिवार में जन्मे नारायण मूर्ति ने वर्ष 1967 में मैसूर यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री ली जिसके बाद उन्होंने आईआईटी कानपुर से एम-टेक पूरा किया.

पुणे में पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स के साथ अपना करियर शुरु करने वाले मूर्ति ने कुछ वर्षों बाद दोस्तों के साथ मिलकर अपनी कंपनी शुरू की.

सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारत के बढ़ते क़दमों का नेतृत्व करने वाले मूर्ति को सरकार की तरफ से पद्मश्री से सम्मानित किया गया है और वो कई युवा सॉफ़्टवेयर विशेषज्ञों के आदर्श भी बन चुके हैं.

भारतीय प्रबंधन संस्थान और अमरीका के कई जाने-माने विश्वविद्यालयों के बोर्ड के सदस्य की भूमिका अदा कर रहे मूर्ति को 'फ़ॉरच्यून' पत्रिका ने वर्ष 2003 में एशिया के बेहतरीन व्यवसायी का अवार्ड दिया था.

इसी साल 'अर्नस्ट एंड यंग' ने उन्हें विश्व का सबसे बेहतरीन उद्यमी क़रार दिया है.

'भारत के बिल गेट्स'

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि मूर्ति भारत के बिल गेट्स साबित हुए हैं.

उन्होंने न केवल भारत को एक विश्वस्तरीय कंपनी दी है बल्कि दुनिया भर में भारत की प्रतिभा का लोहा भी मनवाया है.

विश्लेषकों का मानना है कि इन्फ़ोसिस की सफलता में नारायण मूर्ति की व्यापार को लेकर अलग धारणा का बड़ा योगदान था.

जहाँ ज़्यादातर उद्योगपति अपने कर्मचारियों से कम पैसे में ज़्यादा काम कराने के सिद्धांत पर चलते हैं, वहीं नारायण मूर्ती इसके विपरित बेहतर वेतन के ज़रिए बेहतर काम निकलवाने में विश्वास रखते थे.

बिज़नेस स्टैंडर्ड की अदीति फ़डनिस का कहना है कि नारायण मूर्ती एक निम्न मध्यवर्ग के परिवार से थे और आठ भाई बहनों के साथ पले बड़े थे तो बाँट कर खाना उनकी संस्कृति का हिस्सा था.

यही वजह है कि कंपनी का मुनाफ़ा कर्मचारियों के साथ बांटना नारायण मूर्ती की सोच का हिस्सा था. इसी के तहत इन्फ़ोसिस ने पहली बार भारत में अपने कर्मचारियों को स्टॉक ऑप्शन यानी मुनाफ़े में हिस्सेदारी के विकल्प दिए.

पश्चिमी और शास्त्रीय संगीत के शौकीन मूर्ति सादा जीवन बिताते हैं और उन्हें शायद ही कभी बड़ी पार्टियाँ देते देखा गया है.

मूर्ति आज भले ही इन्फ़ोसिस से रिटायर हो रहे हों लेकिन ये स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में भी ग़ैर कार्यकारी चैयरमैन की हैसियत से इन्फ़ोसिस के बड़े फ़ैसलों में उनकी राय की अहमियत बहुत होगी.

इतना ही नहीं उनकी प्रतिभा का फ़ायदा भारत का सूचना प्रौद्योगिकी और प्रबंधन जगत आने वाले दिनों में उठाता रहेगा.

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