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रविवार, 26 फ़रवरी, 2006 को 10:52 GMT तक के समाचार
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उड़ीसा में स्टील फ़ैक्ट्रियों पर बवाल

इसी इलाक़े में दक्षिण कोरियाई कंपनी ने भी संयंत्र लगाने का वादा किया है
बीस साल पहले भारत के पूर्वी राज्य उड़ीसा का कलिंग नगर शांत इलाक़ा था. यहाँ गेहूँ के खेत और जंगल ही दिखते थे. यहाँ के गाँव भारत की मुख्यधारा से कटे हुए लगते थे.

लेकिन अगले 20 वर्षों में कलिंग नगर का क्या होगा. चलिए इसके लिए सरकारी योजना का सहारा लेते हैं. सरकारी योजना के मुताबिक़ अगले 20 वर्षों में कलिंग नगर 13 हज़ार एकड़ में फैला औद्योगिक केंद्र होगा.

यहाँ बड़ी संख्या में फ़ैक्ट्रियाँ होंगी और यहाँ प्रति वर्ष ढाई करोड़ टन स्टील का उत्पादन होगा. यहाँ हवाई अड्डा होगा, अस्पताल होगा, स्कूल होंगे और बिजली-पानी की सुविधाओं वाले घर भी होंगे.

यह सरकार की उन महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है जिसके तहत देश के कम विकसित इलाक़ों को आर्थिक रूप से संपन्न बनाने की कोशिश होगी.

उड़ीसा के कलिंग नगर की ख़ासियत यहाँ बड़ी मात्रा में मिलने वाले खनिज पदार्थों के कारण भी है. कई इलाकों में तो खनिज पदार्थों की खुदाई भी नहीं हुई है.

हाल के वर्षों में बाहरी दुनिया से इस इलाक़े का संपर्क भी बड़ा है और आवागमन के साधनों में बढ़ोत्तरी हुई है. एक सरकारी अधिकारी ने तो यहाँ तक कह डाला कि स्टील के उत्पादन के लिए यह इस धरती की सबसे अच्छी जगह है.

वादा

पिछले साल दक्षिण कोरियाई कंपनी पॉस्को ने कलिंग नगर के निकट ही 12 अरब डॉलर की लागत से एक स्टील संयंत्र स्थापित करने का वादा किया था.

किसान नागेंद्र सरकार से नाराज़ हैं

लेकिन समस्या ये है कि जाजपुर के निकट कलिंग नगर में रहने वाले लोग नहीं चाहते कि इस इलाक़े में नई फ़ैक्ट्रियाँ बनें.

उनका कहना है कि सरकार उन्हें उचित मुआवज़ा नहीं दे रही और न ही नौकरी और पुनर्वास की सरकारी गारंटी पर उन्हें भरोसा है.

इस इलाक़े के एक किसान नागेंद्र चक्रधर का कहना है कि कई तरह के वादे किए गए हैं लेकिन ऐसी फ़ैक्टरियों के कारण मुसीबत ही बढ़ेगी.

उन्होंने कहा, "अगर सरकार वाकई हमारी सहायता करना चाहती है तो उसे पानी की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि हम अपने खेतों की सिंचाई कर सकें. उसे औद्योगीकरण के पीछे नहीं भागना चाहिए."

नागेंद्र के खेत के नज़दीक ही घाटी की दूसरी तरफ तीन बड़े संयंत्र पहले से ही काम कर रहे हैं. इनकी चिमनियों से लगातार धुएँ निकल रहे हैं और ट्रकों की आवाजाही से भी वातावरण में धूल और धुआँ देखा जा सकता है.

हिंसा

इसी साल जनवरी के शुरू में ही जब टाटा स्टील ने अपनी ख़रीदी ज़मीन पर काम करना शुरू किया, तो नाराज़ तीर-कमान और कुल्हाड़ी से लैस गाँववालों ने इसे रोकने की कोशिश की.

इसके बाद क्या हुआ- इस बारे में कई तरह की बातें की जाती हैं. लेकिन ये तो सच है कि दिन ख़त्म होते-होते वहाँ 12 प्रदर्शनकारी मारे गए. एक पुलिसवाले की भी मौत हो गई.

ख़ून के धब्बे अभी भी वहाँ देखे जा सकते हैं. अब उस जगह पर कोई काम नहीं हो रहा है. इलाक़े के एक बच्चे अजय देवरी ने इशारा करते हुए बताया कि यहाँ एक व्यक्ति को पैर में गोली मारी गई थी जिसके बाद पुलिस आई और उसे पीट-पीट कर मार डाला.

उस घटना के बाद से स्थानीय पुलिस प्रमुख का तबादला कर दिया गया है. सरकार की ओर से घटना की जाँच भी की जा रही है और मुआवज़े का वादा भी किया गया है.

हिंसा में 12 लोगों की मौत हो गई थी

कलिंग नगर के ग्राम प्रमुख चक्रधर हेब्रू की शिकायत है कि सरकार ने औने-पौने दाम देकर इस ज़मीन से बड़ा लाभ कमाया है. उन्होंने आरोप लगाया कि ज़मीन के लिए गाँव वालों को एक दशक पहले की क़ीमत दी गई.

हेब्रू ने ये भी आरोप लगाया कि कई लोगों को ज़मीन की क़ीमत भी नहीं की गई क्योंकि ज़मीन पर उनके परंपरागत अधिकारों को मान्यता नहीं दी गई.

लेकिन सरकार का कहना है कि घटना दुर्भाग्यपूर्ण थी. लेकिन अब वह गाँव वालों की बात पर ध्यान दे रही है. लेकिन इलाक़े के नेताओं का कहना है कि जब तक सरकार सब कुछ ठीक नहीं कर देती, प्रदर्शन जारी रहेगा.

खनिज संपदा से भरपूर उड़ीसा के लिए बड़ी-बड़ी औद्योगिक योजनाएँ बनीं हैं. लेकिन स्थानीय लोगों की नाराज़गी के अलावा नक्सलवादियों की ओर से भी दबाव है.

दूसरी ओर सरकार का कहना है कि अगर इस इलाक़े का विकास करना है तो इन योजनाओं पर आगे काम करना होगा.

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