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राजनीति में उलझा विनिवेश का अर्थशास्त्र | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
स्टॉक मार्केट का अर्थशास्त्र बताता है कि यह विनिवेश करने के लिए बहुत उपयुक्त समय है. और राजनीति बताती है कि वामपंथी दलों के दबाव के चलते विनिवेश करने के लिए यह बहुत अनुपयुक्त समय है. एक अध्ययन के मुताबिक फिलहाल शेयर बाजार जिस तेजी से गुजर रहा है, उसमें 14 सार्वजनिक कंपनियों में सरकार की जो शेयरहोल्डिंग है, उसकी बाज़ार में कीमत 11 अगस्त को 3,16,981 करोड़ रूपए थी. इनका दस प्रतिशत भी अगर शेयरों की बिक्री से उगाह लिया जाता, तो करीब 31,000 करोड़ की वसूली हो सकती थी. ये कंपनियां हैं-भारतीय हेवी इलेक्ट्रिकल्स, इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड, नालको, शिपिंग कारपोरेशन आफ इंडिया, ओएनजीसी, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम, एनटीपीसी, इंडियन आयल, गैस अथारिटी आफ इंडिया, सेल, एमटीएनएल, कारपोरेशन बैंक और पंजाब नेशनल बैंक. वामपंथी दलों के दबाव में हाल में सार्वजनिक क्षेत्र की 13 कंपनियों के विनिवेश का फैसला टलने से साफ़ हो गया है कि विनिवेश का मामला और गहरे राजनीतिक विवाद में उलझ गया है. ग़ौरतलब है कि हाल में नालको, शिपिंग कारपोरेशन, नेशनल फर्टिलाइजर्स, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, इंजीनियर्स इंडिया, बामर लॉरी, हिंदुस्तान पेपर कारपोरेशन, स्टेट ट्रेडिंग कारपोरेशन, नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन,, इंजीनियर्स प्रोजेक्ट्स इंडिया, स्पांज आइरन इंडिया, मैगनीज ओर इंडिया, राष्ट्रीय केमिकल ऐंड फर्टिलाइजर्स में विनिवेश को सरकार ने टाल दिया है. कुल मिलाकर विनिवेश का मामला बुरी तरह उलझ गया है. विनिवेश की शुरुआत भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के साथ हुई थी. ग़ौरतलब कि भारतीय अर्थव्यवस्था में लंबे अरसे तक सार्वजनिक क्षेत्र की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है. एक दौर में सार्वजनिक क्षेत्र को अर्थव्यवस्था की सर्वोच्च ऊंचाइयों पर रखने की बात कही जाती थी. दबाव उदारीकरण की विचारधारा के तहत नीति निर्धारकों ने तय किया कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं है, सो सरकार को कारोबारों से अपने हाथ खींचने चाहिए. शुरुआत में तय किया गया था कि सरकार घाटे में चल रही सार्वजनिक कंपनियों का विनिवेश करेगी, पर बाद में मुनाफ़े में चल रही कंपनियों के विनिवेश के प्रस्ताव भी सामने आए. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस का रुख विनिवेश के मसले पर कमोबेश एक सा रहा है, दोनों ही पार्टियों ने विनिवेश की वकालत की है. उसके स्वरुप या उसकी औपचारिकताओँ के लेकर इनके बीच भले ही अंतर रहे हों. पर वामपंथी दलों का रवैया एकदम भिन्न है. वामपंथी दल विनिवेश का विरोध करते हैं पर अब चूंकि वामपंथी दल सरकार के चलने या न चलने के मामले में एक महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं, इसलिए वामपंथी दलों की राय को दरकिनार नहीं किया जा सकता. वामपंथी दलों के लिए यह मुद्दा गहरे राजनीतिक महत्व का इसलिए है कि सार्वजनिक क्षेत्र की तमाम ट्रेड यूनियनें विनिवेश का विरोध करती रही हैं. ट्रेड यूनियनें वामपंथी राजनीति के केंद्र में हैं. कुल मिलाकर साफ यही होता है कि इस सरकार के लिए विनिवेश कार्यक्रम को चला पाना आसान नहीं होगा. वैसे हाल में वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि विनिवेश कार्यक्रम को पिछवाड़े नहीं फेंक दिया गया है. पर सच यही है कि वामपंथी दलों के दबाव में यह आगे भी नहीं आ पाएगा. |
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