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भेल के 10% शेयर बेचने का निर्णय | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के दस प्रतिशत शेयर बेचने का निर्णय लिया है. गुरुवार को मंत्रिपरिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया. सरकार को समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने इस निर्णय का विरोध करते हुए कहा है यह न्यूनतम साझा कार्यक्रम के ख़िलाफ़ है. उल्लेखनीय है कि भेल देश के लाभ अर्जित करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में से एक है और इसकी गिनती नौरत्नों में होती है. इससे पहले लाभ अर्जित करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विनिवेश को लेकर बहस चलती रही है. मंत्रिपरिषद की बैठक के बाद ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि इस समय भारत सरकार के पास भेल के 67.72 प्रतिशत शेयर हैं और शेष 32.28 प्रतिशत जनता और विभिन्न संस्थानों के पास है. अधिकृत सूचना के अनुसार इस विनिवेश से सरकार को 2200 करोड़ रुपए मिलेंगे. भारी उद्योग मंत्रालय और विनिवेश विभाग के बीच विचार-विमर्श से विनिवेश किया जाएगा और इससे छोटे निवेशकों को लाभ मिलेगा. सरकार की ओर से कहा गया है कि शेयर का कुछ हिस्सा भेल के कर्मचारियों को भी दिया जाएगा. विरोध उधर सरकार का समर्थन कर रहे वामपंथी दलों ने सरकार के इस निर्णय का विरोध करते हुए कहा है कि यह न्यूनतम साझा कार्यक्रम के ख़िलाफ़ है और सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि भेल नवरत्न सार्वजनिक उपक्रमों में से एक है और प्रतिस्पर्धा के बीच भी लाभ अर्जित कर रहा है. बयान में कहा गया है कि जिस राष्ट्रीय न्यूनतम साझा कार्यक्रम (एनसीपीएम) के आधार पर यूपीए सरकार को काम करना है उसमें कहा गया है कि नवरत्नों को मज़बूत बनाया जाएगा ताकि वे विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकें. पोलित ब्यूरो ने कहा है कि एनसीपीएम में यह भी कहा गया है कि लाभ अर्जित करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विनिवेश नहीं किया जाएगा. |
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