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भारत में निवेश कोष की स्थापना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्रीय कैबिनेट की आर्थिक समिति में राष्ट्रीय निवेश कोष बनाने का फैसला किया है. समिति की बैठक में मारुति और भारत हेवी इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड के विनिवेश पर चर्चा होने की ख़बरें थी लेकिन बताया गया कि बैठक में इस मुद्दे पर बात ही नहीं हुई. समिति ने फैसला किया कि एक अप्रैल से एक राष्ट्रीय निवेश कोष की स्थापना की जाएगी. इस कोष में वो पैसा डाला जाएगा जो विनिवेश से जुटाया जाएगा. इस पैसे को फिर सामाजिक विकास के क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में नयी जान डालने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. इस कोष का प्रबंधन जीवन बीमा निगम म्युचुअल फंड, यूटीआई म्युचुअल फंड और एसबीआई म्युचुअल फंड मिलकर करेंगे. इस बारे में और जानकारी देते हुए वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा "जैसा कि आप जानते है कि जब यूपीए विपक्ष में था तो विनिवेश से मिले पैसे का इस्तेमाल रोजमर्रा के सरकार के खर्चे पूरे करने के लिए किए जाने का विरोध करता था." "अब हम नया कोष बना रहे है ताकि विनिवेश से आने वाले पैसे का इस्तेमाल रोजगार के अवसर पैदा करने और विकास के कामों में लगाया जाएगा. " कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री संतोष मोहन देव ने मारुति और भेल में विनिवेश की बात की थी लेकिन अपेक्षा के विपरीत कैबिनेट ने इस फैसले को फिलहाल टाल दिया. वित्त मंत्री ने कहा कि कोष के बारे में बातचीत इतनी लंबी हो गई कि विनिवेश पर बात करने का समय ही नहीं मिला. यूपीए के कई घटक दल और बाहर से समर्थन दे रहे वाम दल विनिवेश की नीति का लगातार विरोध करते रहे हैं. जानकारों का मानना है कि सरकार तीन राज्यों में चुनावों के मद्देनज़र ऐसा कोई फैसला नहीं करना चाहती जो कहीं से भी जनविरोधी लगे. वैसे विनिवेश के बारे में आम जनता की राय मिलीजुली रही है. अनुमान यह भी लगाया जा रहा है कि इस समय केंद्र सरकार कई मोर्चे एक साथ खोलने के हक़ में नहीं है. इसी कारण विनिवेश पर चर्चा ही नहीं की गई. |
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