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सोमवार, 29 नवंबर, 2004 को 15:12 GMT तक के समाचार
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आसियान देश मुक्त व्यापार पर आगे बढ़े
आसियान नेता
आसियान बैठक में 10 सदस्य देशों के अलावा चीन और भारत जैसे देशों के नेता भी आए हैं
दक्षिण पूर्व एशिया के छह देशों के बीच मुक्त व्यापार क्षेत्र स्थापित करने की कोशिशों में तेज़ी लाने के बारे में एक सहमति हुई है.

लाओस में दक्षिण पूर्व एशिया देशों के संगठन आसियान के शिखर सम्मेलन में इन देशों ने तय किया कि वे 2007 तक आपसी व्यापार में सभी तरह के करों को समाप्त कर देंगे.

ये तय हुआ कि ये काम पहले की तय समयसीमा से तीन वर्ष पहले ही हो जाएगा.

आसियान के बाक़ी चार देश 2012 में मुक्त व्यापार के लिए ऐसी ही व्यवस्था करेंगे.

लाओस की राजधानी विएंतिएन में आसियान देशों की सालाना बैठक में 10 सदस्य देशों के नेताओं के अलावा भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के नेता भी भाग ले रहे हैं.

29 और 30 नवंबर तक चलनेवाले सम्मेलन में ऐसे देशों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं जिनकी आबादी कुल मिलाकर दुनिया की आधी आबादी है.

चीन के साथ समझौता

वेन जियाबाओ
बैठक में चीन की ओर से प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भाग ले रहे हैं

इस बीच आसियान की बैठक में चीन और दक्षिण पूर्व एशिया के 10 देशों के बीच एक ऐतिहासिक समझौते को भी अंतिम रूप दिया गया है.

व्यापार की दृष्टि से इस समझौते के बाद इन देशों का एकीकृत बाज़ार बन सकेगा जिसकी पहुँच दुनिया की एक चौथाई आबादी तक होगी.

लगभग पौने दो अरब की आबादी वाले इस बाज़ार में हर वर्ष 20 खरब डॉलर का कारोबार होगा.

इस समझौते के तहत वर्ष 2010 तक सदस्य देशों को अपने सीमा शुल्क में कटौती करके उन्हें समान स्तर पर लाना होगा.

लेकिन विश्लेषकों ने आगाह किया है कि अभी बहुत उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह एक शुरूआत भर है, बहुत फ़ासले तय करने हैं.

चिंताएँ

ऐसी सैकड़ों वस्तुएँ हैं जिन्हें व्यापार को लेकर विवाद है और हर देश की अपनी-अपनी चिंताएँ हैं.

एक उदाहरण तो यही है कि खुले बाज़ार में उत्पाद तो होंगे लेकिन सेवाएँ नहीं.

समझौते पर सीमा शुल्क पर विचार तो किया जा रहा है लेकिन खुले व्यापार की दूसरी रूकावटों पर अभी कोई फ़ैसला होना बाक़ी है.

फिर राजनीतिक मामले भी हैं, उदाहरण के लिए बर्मा में लोकतंत्र के सवाल को लेकर पड़ोसी देश चिंतित हैं.

ज़ाहिर है, समस्याएँ तो हैं लेकिन चीन के साथ खुले बाज़ार की स्थापना का सपना है बहुत सुहाना इसीलिए ज्यादातर देशों के प्रतिनिधि उत्साहित और आशावान दिख रहे हैं.

वे लोग दीर्घकालिक लाभ की बात कह रहे हैं, चीन भी खुश है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था को इससे फ़ायदा मिलने की उम्मीद है.

गाड़ी कितनी और कैसे आगे बढ़ती है, वह इस बात पर निर्भर करेगा कि इन 11 देशों के नेता विवादास्पद मुद्दों पर कितना लचीला रूख़ अपनाते हैं.

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