क्या छत्रपति शिवाजी के सहारे बीजेपी तेलंगाना जीतना चाह रही है?

- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद से
छत्तीसगढ़, मिज़ोरम, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में होने वाले विधानसभा चुनावों को कई हलकों में अगले साल के संसदीय चुनावों का सेमी फ़ाइनल माना जा रहा है.
इन पाँच राज्यों में से तीन राज्यों में बीजेपी का सीधा मुक़ाबला कांग्रेस से है. मिज़ोरम और तेलंगाना ऐसे दो राज्य हैं, जहाँ स्थानीय पार्टियाँ मुक़ाबले में हैं.
119 विधानसभा सीटों और 17 लोकसभा सीटों वाले तेलंगाना में राष्ट्रीय पार्टियों, बीजेपी और कांग्रेस के लिए सत्तारूढ़ दल भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के खिलाफ़ बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती है. 10 साल पहले ही तेलंगाना का गठन हुआ था.
बीआरएएस को भरोसा है कि किसानों और समाज के कई वर्गों के लिए काम कर रही उसकी सरकारी योजनाओं से उसे चुनावी जीत मिलेगी.
बीजेपी के लिए भी तेलंगाना के नतीजे बेहद महत्वपूर्ण हैं.
कई जानकारों के मुताबिक़, उत्तर भारत में बीजेपी अपने चरम पर पहुँच चुकी है और वहाँ 2024 के संसदीय चुनाव में संभावित सीटों के नुक़सान की भरपाई करने के लिए ज़रूरी है पार्टी अपने गढ़ से बाहर पकड़ मज़बूत करे.
बीजेपी को तेलंगाना से उम्मीदें इसलिए भी हैं, क्योंकि पार्टी ने साल 2019 में क़रीब 20 प्रतिशत वोट के साथ तेलंगाना में चार लोकसभा सीटें जीतकर कई विश्लेषकों को आश्चर्य में डाल दिया था.
साल 2020 में हैदराबाद के स्थानीय चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद बीजेपी की उम्मीदें बहुत बढ़ी थीं.
लेकिन पार्टी ने पाँच साल पहले विधानसभा में टी राजा सिंह के रूप में सिर्फ़ एक सीट जीती और पार्टी का वोट शेयर मात्र 7.1 प्रतिशत था.

कांग्रेस और ओवैसी
कर्नाटक विधानसभा में जीत के बाद कांग्रेस जाति जनगणना, महिलाओं, किसानों और बुज़ुर्गों को फ़ायदा पहुँचाने वाली याजनाओं को छह गारंटियों के वायदे में लपेटकर जीत की उम्मीद लगा रही है.
जानकारों के मुताबिक़ बीजेपी नेता अपने भाषणों से लगातार हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश में हैं और लगातार आरोप लगा रहे हैं कि सत्तारूढ़ बीआरएस और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन साथ-साथ हैं.
बीआरएस और एआईएमआईएम के बीच कोई औपचारिक चुनावी समझौता नहीं है, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी ने बीआरएसस की नीतियों की तारीफ़ करते हुए मुसलमानों को बीआरएस को वोट करने को कहा है.
वजह समझना मुश्किल नहीं. कई हिंदुत्व समर्थक ओवैसी के कटु आलोचक रहे हैं.
चुनाव से पहले रज़ाकार फ़िल्म के टीज़र का रिलीज़ होना और पिछले साल पैग़ंबर मोहम्मद पर कथित विवादित बयान की वजह से सस्पेंड किए गए बीजेपी विधायक राजा सिंह का निलंबन रद्द करने को भी तेलंगाना में बीजेपी के हिंदुत्व को आगे बढ़ाने के चश्मे से देखा जा रहा है.
तेलंगाना में राजा सिंह को हिंदुत्व का पोस्टर ब्वॉय बताया जाता है.
तेलंगाना में बीजेपी के पूर्व प्रमुख और हिंदुत्व का चेहरा माने जाने वाले बंडी संजय कुमार ने मई में एक ट्वीट में कहा था, "हिंदुत्व के बिना ये देश बिखर जाता. ये पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफ़ग़ानिस्तान बन जाता. हिंदुत्व के बिना भारत का अस्तित्व नहीं होता. मक़सद तेलंगाना में राम राज्य लाना है."

शिवाजी की मूर्तियाँ और हिंदुत्व
बीजेपी के आलोचक पार्टी पर हिंदुओं को एकजुट करने के मक़सद से शिवाजी महाराज से जुड़े इतिहास का चुनावी फ़ायदा उठाने की कोशिश का आरोप लगाते रहे हैं.
अपने समय के सबसे ताक़तवार मुग़ल साम्राज्य के छठे शासक औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ शिवाजी की जंग छेड़ने की कहानी सर्वविदित है.
बीजेपी और हिंदू संगठनों पर तेलंगाना में ही ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं.
तेलंगाना में स्थानीय लोगों के मुताबिक़, पिछले कुछ महीनों और सालों में छत्रपति शिवाजी की मूर्तियों की संख्या तेज़ी से बढ़ी हैं, हालाँकि इस बारे में आँकड़े नहीं मिलते.
आलोचक बीजेपी नेता बंडी संजय कुमार के फ़रवरी के बयान की ओर ध्यान दिलाते हैं, जब उन्होंने तेलंगाना के सभी गाँवों में मूर्ति स्थापित करने की बात करते हुए कहा था, "हिंदू धर्म को बचाने के लिए हमने शिवाजी की मूर्ति लगाई है. हर गांव में लोगों को ऐसे नेताओं के लिए वोट डालना चाहिए जो हिंदू धर्म के लिए काम करें."

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शिवाजी की विरासत
फूले-आंबेडकर रिसर्च स्कॉलर और हैदराबाद के फूले-आंबेडकर सेंटर फ़ॉर फ़िलॉसाफ़िकल एंड इंग्लिश ट्रेनिंग में राजनीतिशास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर पी मणिकंटा बंडी संजय कुमार के शिवाजी को लेकर बयान को महत्वपूर्ण मानते हैं और कहते हैं, "उन्हें (हिंदू संगठनों को) सारे हिंदुओं को एक साथ मिलाने का शिवाजी में एक सिंबल मिला है."
बीजेपी विधायक राजा सिंह के मुताबिक़ उन्होंने तेलंगाना में शिवाजी की "300 से अधिक प्रतिमाओं का" उद्घाटन किया है.
हैदराबाद के उनके दफ़्तर में शिवाजी की मूर्तियाँ हैं.
राजा सिंह के मुताबिक़, "शिवाजी महाराज हिंदुओं के लिए भगवान हैं. और वो भगवान ही रहेंगे."
वो कहते हैं, "इसकी शुरुआत हमने 2010 में की है और हमारा मक़सद एक ही था कि छत्रपति शिवाजी महाराज जैसा हर नौजवान को बनना है. वो सिर्फ़ हिंदुओं के ही नहीं, मुसलमानों के भी राजा थे."
शिवाजी की कर्मभूमि मुख्य रूप से आधुनिक महाराष्ट्र और कर्नाटक रही है, लेकिन डॉक्टर बीआर अंबेडकर ओपन विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर शिवाजी के गोलकुंडा क़िले से रिश्ते की भी याद दिलाते हैं.
साल 1677 में शिवाजी ने औरंगज़ेब के खिलाफ़ कुतुब शाही राजा अबुल हसन तानाशाह के साथ सैन्य गठबंधन के लिए गोलकुंडा किले का दौरा किया था.

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मूर्ति स्थापना को लेकर विवाद
शिवाजी महाराज के धार्मिक व्यवहार और विचारों के बारे में गोविंद पानसरे अपनी पुस्तक 'हू इज शिवाजी' में लिखा है, "शिवाजी धर्म में विश्वास नहीं करते थे. वे धर्मनिरपेक्ष थे या कहें कि उन्होंने अपने राज्य को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया था."
"लेकिन क्या वह इस्लाम के ख़िलाफ़ थे? क्या वह हिंदू धर्म में विश्वास करते थे, यानी मुस्लिम धर्म से नफ़रत करते थे? क्या वे मुसलमानों का हिंदूकरण करना चाहते थे या यह उनका महाराष्ट्रीकरण करने का प्रयास था?" इन सभी सवालों के जवाब 'नहीं' हैं.
हम महाराष्ट्र से लगे तेलंगाना के निज़ामाबाद ज़िले में बोधन शहर पहुँचे, जहाँ पिछले साल मार्च में छत्रपति शिवाजी की मूर्ति स्थापना को लेकर हिंसा भड़क उठी थी.
उस समय के मोबाइल वीडियो में प्रदर्शनकारी और पुलिस के अलावा शिवसेना शिंदे गुट के गोपीकिशन पसपुलेटी भी नज़र आते हैं.
गोपी किशन ने बताया कि जब शहर के आंबेडकर चौराहे पर शिवाजी की मूर्ति लगवाने की उनकी कोशिशें लंबे समय तक आधिकारिक उलझनों में फँसी रही, तो एक दिन तड़के उन्होंने एक टीम के साथ चौराहे पर मूर्ति को स्थापित कर दिया था.
जल्द ही विरोध प्रदर्शन के बीच मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया.
गोपीकिशन कहते हैं, "आज शिवाजी की वजह से हिंदू लोग इस देश में बचे हैं. इसलिए हम लोग शिवाजी को बहुत आस्था से मानते हैं."

उस दिन विरोध करने वालों में एआईएमआईएम के मोहम्मद अब्दुल एजाज़ ख़ान भी थे.
एजाज़ खान के मुताबिक़, "शिवाजी एक सेक्युलर आदमी थे. हम हमेशा ही उन्हें सेक्युलर समझेंगे. हिंदू संगठन उनको क्या मानता है, उससे हमें लेना-देना नहीं है."
वो कहते हैं, "हमको शिवाजी की प्रतिमा बिठाने से कोई ऐतराज़ नहीं था, लेकिन (मूर्ति को) बिना अनुमति बैठाने की वजह से हमने ऐतराज़ किया, प्रदर्शन किया."
बोधन शहर के कलदुर्की गाँव में क़रीब दो साल पहले शिवाजी की मूर्ति की स्थापना हुई थी.
वहाँ के निवासी अशोक ने बताया कि पहले लोगों को छत्रपति शिवाजी के बारे में पता नहीं था, लेकिन अब युवा उनके बारे में पढ़ रहे हैं.
वो कहते हैं, "कलदुर्की ही नहीं, हर गाँव में भविष्य में छत्रपति की मूर्ति हम बनाएँगे. ये छत्रपति की मूर्ति नहीं है, वो हिंदुओं की एक शक्ति है."
हर एक देश के इतिहास में काले पन्ने होते हैं. लेकिन उन काले पन्नों से आप क्या सीखते हैं, आप आज के समाज को किस तरह की दिशा देते हैं, वो लीडर के तौर पर आपकी पर्सनॉलिटी दिखाती है.
नज़दीक के एक और गाँव रानमपल्ली में कुछ महीने पहले ही शिवाजी की मूर्ति स्थापित हुई है.
गोपी किशन के मुताबिक़ हिंदू संगठनों के लिए शिवाजी आस्था का विषय है न कि राजनीतिक, लेकिन आलोचक इससे सहमत नहीं.
बीजेपी के हिंदुत्व के जवाब में केसीआर अपने हिंदुत्व को "असली" बताते हैं.
बीबीसी से बातचीत में बीआरएस नेता के कविता ने कहा, "मैं भी बहुत ही ज़्यादा धार्मिक हूँ, लेकिन मेरी पूजा पाठ मेरे घर में है."
वो कहती हैं, "शिवाजी महाराज को हम भी मानते हैं, क्योंकि वो आए और उन्होंने लोगों को उम्मीद दी. इतिहास में महत्वपूर्ण लोगों को लेकर ग़लत चीज़ें बताकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश करना बीजेपी की रणनीति है."

'रज़ाकार' फ़िल्म पर विवाद
एक भाषण में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सिर्फ़ बीजेपी तेलंगाना को आधुनिक 'रज़ाकारों' से बचा सकती है.
रज़ाकार यानी वॉलिंटियर या स्वयंसेवक. साल 1947 में भारत की आज़ादी के वक़्त हैदराबाद के मुस्लिम शासक निज़ाम मीर उस्मान अली पाशा ने भारत से विलय न करके आज़ाद रहने पर ज़ोर दिया था.
एक आँकड़े के मुताबिक़, तेलंगाना की जनसंख्या में 13-14 प्रतिशत मुसलमान हैं.
चुनाव से कुछ वक़्त पहले ही रिलीज़ हुई 'रज़ाकार' फिल्म के टीज़र पर भी तेलंगाना में राजनीति तेज़ हुई है और आलोचक इसे भी भाजपा हिंदू वोट के ध्रुवीकरण की कथित कोशिशों से जोड़ रहे हैं.
फ़िल्म प्रोड्यूसर और बीजेपी नेता गुडूर नारायण रेड्डी के मुताबिक़, वो बचपन से ही रज़ाकारों के बारे में कहानी सुन रहे थे और फ़िल्म का राजनीति से कोई ताल्लुक नहीं.
गुडूर नारायण रेड्डी के मुताबिक़, फ़िल्म की कहानी "न आज के मुसलमानों के बारे में नहीं. न और किसी के बारे में."
फ़िल्म के टीज़र में रज़ाकार हिंदू जनता पर ज़ुल्म करते हुए दिखाए गए हैं. 45 करोड़ के बजट से बनी इस फ़िल्म को पाँच भाषाओं में जल्द ही रिलीज़ करने की योजना है.
राज्य में वोटिंग से ठीक पहले फ़िल्म के टीज़र रिलीज़ पर भड़के सत्ताधारी बीआरएस नेता केटीआर ने एक ट्वीट में बीजेपी पर राजनीतिक प्रोपेगैंडा के मक़सद से सांप्रदायिक हिंसा भड़काने और ध्रुवीकरण की कोशिश बताया.
कौन थे 'रज़ाकार'

हम जब हैदराबाद के रामोजी फ़िल्म सिटी पहुँचे, तो फ़िल्म की शूटिंग आख़िरी चरण में थी.
फ़िल्म सेट पर रज़ाकार और गाँव वालों की ड्रेस पहने कलाकारों पर एक सीन फ़िल्माया जा रहा था.
एक्टर बॉबी सिम्हा के मुताबिक़ फ़िल्म के "पीछे कोई राजनीति नहीं है. मक़सद एक ही है (बताना) कि तेलंगाना का इतिहास कैसा है."
निर्देशक याटा सत्यनारायण ने बताया कि उन्होंने फ़िल्म के रिसर्च के लिए कई किताबें पढ़ीं और फ़िल्म को बनाने का मक़सद ये है कि इस पीढ़ी को इतिहास से अवगत कराया जाए.
डॉक्टर बीआर आंबेडकर ओपेन यूनिवर्सिटी में सीनियर प्रोफ़ेसर घंटा चक्रपाणी के मुताबिक़, फ़िल्म टीज़र का मक़सद चुनावी है. उनके मुताबिक़ रज़ाकारों में कुछ हिंदू और उनकी हिंसा के शिकार होने वालों में मुसलमान भी शामिल थे.
वो कहते हैं, "ये वालिंटियर्स सभी मुस्लिम नहीं थे. कुछ हिंदू भी थे. हिंदू में कुछ ओबीसी थे, दलित थे, कुछ रेड्डी भी थे, उच्च जाति के थे. सब लोग थे. ये एक छोटा ग्रुप था. ये रज़ाकार गाँवों में गए, उन्हें बड़े ज़मींदारों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया गया. कौन हैं ये ज़मींदार. वो लोकल हिंदू ज़मींदार हैं. इन हिंदू ज़मींदारों ने कम्युनिस्टों को दबाने के लिए रज़ाकारों का इस्तेमाल किया."

प्रोफ़ेसर चक्रपाणि के मुताबिक़, राज्य के कम्युनिस्टों की लड़ाई बांडेड लेबर के ख़िलाफ़ थी और वो इस व्यवस्था में दबे लोगों की आज़ादी चाहते थे. ये पूरा मामला हिंदू-मुसलमान जैसा नहीं था जैसा इसे पेश किया गया.
उनके मुताबिक़, इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि रज़ाकारों को निज़ाम ने आर्थिक संरक्षण दिया.
फिल्म रज़ाकार को लेकर विवाद पर भारत राष्ट्र समिति की नेता के कविता के मुताबिक़, "हर एक राष्ट्र, हर एक देश के इतिहास में काले पन्ने होते हैं. लेकिन उन काले पन्नों से आप क्या सीखते हैं, आप आज के समाज को किस तरह की दिशा देते हैं, वो पार्टी के तौर पर, लीडर के तौर पर आपका व्यक्तित्व दिखाती है."
वो कहती हैं, "बीजेपी का आदमी एक मूवी बनाता है, जो बिल्कुल इलेक्शन के वक़्त रिलीज़ होती है. तो ज़ाहिर है उनका बिलीफ़ सिस्टम है उसको पापुलराइज़ करने वाले इमोशंस इसमें भरे हैं. लेकिन हमारे तेलंगाना का बिलीफ़ सिस्टम वो नहीं है.."
'रज़ाकार' फिल्म आज के मुसलमानों के बारे में नहीं है.

बीजेपी नेता का निलंबन रद्द करना भी इशारा
पिछले साल पैग़ंबर मोहम्मद पर कथित विवादित बयान की वजह से बीजेपी विधायक राजा सिंह को सस्पेंड कर दिया गया था.
तेलंगाना में उन्हें हिंदुत्व का पोस्टर ब्वॉय बताया जाता है.
पार्टी का उनका निलंबन रद्द किए जाने को जानकार संभावित चुनावी फ़ायदे से जोड़कर देख रहे हैं.
टी राजा सिंह ने बताया कि उन पर 80 से ज़्यादा दर्ज पुलिस मामलों में कई हेट स्पीच के मामले हैं. उनके मुताबिक़ ये सभी मामले राजनीतिक हैं.
अपने विवादित बयान पर उन्होंने कहा, "मुझे कोई अफ़सोस है नहीं और कभी जीवन में मैंने कोई ग़लत (काम) नहीं किया. मेरा एजेंडा यही है कि हिंदू होने के नाते हिंदुत्व की बात करो."
टी राजा सिंह के मुताबिक़, "भारत में अगर कोई देशभक्त पार्टी है तो वो भारतीय जनता पार्टी है. पूरे भारत में अगर हिंदुओं के बारे में भला सोचने वाली अगर कोई पार्टी है तो भारतीय जनता पार्टी है. अभी जो 2023 का जो चुनाव है हमारा केवल एक ही मुद्दा है, केसीआर की सरकार को ख़त्म करना, जो हेवी करप्शन की सरकार है. तेलंगाना को उसने कर्ज़े में डुबो दिया है. केसीआर मुक्त तेलंगाना और डबल इंजन की सरकार यहाँ बनाना है और विकास का ही हमारा सबसे बड़ा मुद्दा तेलंगाना के इस चुनाव में है."
एक बीजेपी नेता के मुताबिक़, जब तक बंडी संजय कुमार राज्य में पार्टी प्रमुख थे, हिंदुत्व पर उनके ज़ोर से पार्टी राज्य में तेज़ी से आगे बढ़ रही थी, लेकिन उन्हें पद से हटा दिए जाने से राज्य में पार्टी को झटका लगा है.
उन्हें पद से क्यों हटाया गया, ये स्पष्ट नहीं लेकिन इसे पार्टी का आंतरिक राजनीति से जोड़ कर देखा जा रहा है.
कोशिशों के बावजूद हमारी बंडी संजय कुमार से बात नहीं हो पाई.
उनकी जगह जी किशन रेड्डी को राज्य में पार्टी प्रमुख बनाया गया.

बीजेपी और तेलंगाना
तेलंगाना के गठन के बाद बीजेपी ने राज्य में 2014 का विधानसभा चुनाव तेलुगूदेसम पार्टी के साथ मिलकर लड़ा था. इस विधानसभा चुनाव में पार्टी को पाँच सीटें मिली थी.
इस विधानसभा चुनाव में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को बहुमत मिला और के चंद्रशेखर राव राज्य के मुख्यमंत्री बने.
2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सिकंदराबाद संसदीय सीट पर जीत हासिल की थी.
वर्ष 2018 में राज्य विधानसभा को समय से पहले भंग कर दिया गया और चुनाव हुए.
लेकिन बीजेपी को इस साल विधानसभा चुनाव में सिर्फ़ एक सीट पर जीत हासिल हुई.
इस बार भी टीआरएस को बहुमत मिला और के चंद्रशेखर राव दोबारा सीएम बने.
हालाँकि 2019 के संसदीय चुनाव में बीजेपी ने 17 में से चार सीटों पर जीत हासिल की.
इस जीत के बाद ही प्रदेश बीजेपी के कैंप में उम्मीद की किरण दिखने लगी और प्रदेश के नेता ये दावा करने लगे कि उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करके सरकार बनाएगी.
पार्टी को लोकसभा चुनाव में 19.45 फ़ीसदी वोट भी हासिल हुआ.
बीजेपी को उम्मीद है 10 साल की एंटी इनकंबेंसी और डबल इंजन की सरकार का नारा सत्ताधारी बीआरएस के ख़िलाफ़ जाएगा.
लेकिन ये लड़ाई इतनी आसान भी नहीं.
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