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मणिपुर में छह महीने के लिए बढ़ा आफस्पा लेकिन मैतेई बहुल इलाक़े शामिल नहीं- प्रेस रिव्यू
मणिपुर में आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट यानी आफस्पा अगले छह महीनों के लिए बढ़ा दिया है.
द टेलीग्राफ ने इस ख़बर को प्रमुखता से छापा है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, मणिपुर के 19 पुलिस थानों के तहत आने वाले क्षेत्रों को छोड़कर आफस्पा पूरे राज्य में लगा दिया गया है.
जिन इलाक़ों में आफस्पा नहीं लगाया गया है, वो मैतई बहुल इलाक़े हैं. तीन मई के बाद मणिपुर में मारे गए 175 लोगों में से 80 फ़ीसदी लोगों की मौत इन्हीं इलाक़े में हुई है.
साल 1980 से मणिपुर के ज़्यादातर हिस्सों में आफस्पा लगा हुआ था. इसी साल एक अप्रैल को इन्हीं 19 पुलिस थाना क्षेत्रों को छोड़कर पूरे राज्य से अफस्पा हटाया गया था.
अख़बार लिखता है कि सुरक्षा व्यवस्था के कई सूत्रों ने आरोप लगाया है कि इस फै़सले के कारण राज्य में हिंसा भड़की.
आफस्पा क्या है?
आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट के तहत भारतीय सेना को अशांत क्षेत्रों में कार्रवाई की विशेष शक्तियां मिली होती हैं.
साथ ही ये सुनिश्चित किया जाता है कि इन शक्तियों के इस्तेमाल से होनी वाली घटनाओं के लिए भारतीय सेना के सैनिकों पर केंद्र सरकार की मंज़ूरी के बिना कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती.
इसके तहत बिना वॉरंट के भी कहीं जाकर छानबीन या गिरफ़्तारी की जा सकती है.
सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े एक सूत्र ने टेलीग्राफ अख़बार से कहा, ''मणिपुर में क़ानून व्यवस्था को बेहतर करने के लक्ष्य को तभी हासिल किया जा सकता है, जब पूरे राज्य में अफस्पा लागू किया जाए.''
वो कहते हैं, ''सरकार को ये सलाह पहुंचा दी गई है. पर मणिपुर सरकार के कुछ हिस्सों में आफस्पा ना लगाने और उसे बढ़ाने को लेकर अपने ही तर्क हैं.''
मणिपुर में एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, ''मैतई बहुल इलाक़ों में आफस्पा ना लगाना रणनीतिक से ज़्यादा राजनीतिक फ़ैसला है.''
वो कहते हैं, ''लोकसभा चुनाव क़रीब आ रहे हैं. बीजेपी राज्य में दोनों सीटों पर क़ब्ज़ा बनाए रखना चाहती है. इसलिए बीरेन सिंह सरकार मैतई समुदाय की नज़रों में अच्छी बनी रहना चाहती है. साथ ही आफस्पा हटाए जाने का क्रेडिट भी मिल जाए और क़ानून व्यवस्था को काबू में करने का दावा भी हो जाए. बीजेपी ये करके और लोकसभा सीटें जीतकर दिखाना चाहती है कि राज्य में उसकी अब भी पकड़ है.''
मणिपुर के किन इलाक़ों में आफस्पा नहीं लगा है?
आधिकारिक अधिसूचना में कहा गया है कि क़ानून व्यवस्था की स्थिति का विश्लेषण करने के बाद मणिपुर सरकार की राय थी कि ज़मीन पर विस्तृत मूल्यांकन करना मुश्किल है क्योंकि सुरक्षा एजेंसियों पहले से ही व्यस्त हैं.
अधिसूचना के मुताबिक़, गर्वनर 19 थाना क्षेत्रों को छोड़कर पूरे राज्य को अशांत घोषित करते हुए आफस्पा लगाने का एलान करते हैं. ये फ़ैसला एक अक्टूबर 2023 से अगले छह महीनों के लिए लागू होगा.
जिन इलाक़ों में आफस्पा नहीं लगा है, वो ये हैं:
- इंफाल
- लाम्फेल
- इम्फाल सिटी
- सिंग्जामेई
- सेकमई
- लामसान्ग
- पेस्टल
- वांगोई
- पोरोमट
- हिंगैंग
- लामाई
- इरिबुंग
- लेमाखोंग
- थोबल
- बिष्णुपुर
- नंबोल
- मोइरंग
- काकचीन
- जिरबाम
गृह मंत्रालय को सुरक्षा व्यवस्था ने क्या इनपुट भेजा?
टेलीग्राफ अखबार लिखता है कि सुरक्षा व्यवस्था ने गृह मंत्रालय को कई इनपुट्स भेजे थे कि कैसे कई प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन हथियार, विस्फोटक और कैडर को जुटा रहे हैं. ये संगठन म्यांमार में अपने आकाओं से ये सब जुटा रहे हैं और मणिपुर में अपनी जड़े मज़बूत कर रहे हैं.
अख़बार लिखता है कि गृह मंत्रालय को पीपल्स लिबरेशन आर्मी, यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट, पीपल्स रिवॉल्यूशनरी पार्टी ऑफ़ कांगलेइपक, कांगलेइपक कम्युनिस्ट पार्टी और कांगगलेई याओल कांबा लप जैसे प्रतिबंधित संगठनों की जानकारी भेजी गई थी. इन संगठनों में ज़्यादातर लोग मैतई समुदाय से हैं.
एक सूत्र ने अख़बार को बताया, ''इन संगठनों के ज़्यादातर लोग घाटी से काम कर रहे हैं. ऐसे में घाटी के क्षेत्रों में आफस्पा ना लगाने का फ़ैसला सही नहीं है. इस प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के म्यांमार की सेना जुंटा से सीधे ताल्लुकात हैं और इनके सिर पर चीन का भी हाथ है. ऐसे में ये राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है.''
अख़बार लिखता है कि मणिपुर के हालात राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है, ये बात बीते हफ़्ते तब साफ हो गई थी जब इंफाल से एनआईए ने मोइरंगेथम आनंद सिह को गिरफ़्तार किया था.
एनआईए ने प्रेस रिलीज़ के ज़रिए 23 सितंबर को बताया था कि आनंद सिंह मणिपुर में जारी संघर्ष का फ़ायदा उठाते हुए भारत के ख़िलाफ़ जंग शुरू करने की म्यांमार से चल रहे आतंकी संगठनों की साज़िशों में शामिल था.
एनआईए ने ये भी कहा था कि ये आतंकी संगठन भारत में भर्तियां कर रहे हैं ताकि सुरक्षाबलों और दूसरे समुदाय से जुड़े लोगों पर हमला किया जा सके.
मणिपुर हिंसा का म्यांमार एंगल
टेलीग्राफ अखबार एक सूत्र के हवाले से लिखता है कि हाल की घटनाओं में म्यांमार एंगल का आना और हथियारबंद मैतई का शामिल होना साफ़ दिखता है.
टेलीग्राफ अख़बार एक सूत्र के बयान को छापते हुए लिखता है, ''प्रतिबंधित मैतई संगठनों ने कुछ कुकी गांवों को तबाह कर दिया है. ये गांव म्यांमार बॉर्डर के पास हैं. ऐसी भी जानकारी मिली है कि गाड़ियां बॉर्डर तक जा रही हैं ताकि हथियार, बम गोले ला सकें.''
सूत्र ने बताया, ''हथियारों और गोला-बारूद की तस्करी के अलावा अब भी चार हज़ार से ज़्यादा अत्याधुनिक हथियार और छह लाख राउंड से ज्यादा गोलियां अब भी लोगों के पास हैं. ज़्यादातर मैतई समुदाय से हैं. ऐसे में इन 19 इलाक़ों में अफस्पा ना लगाने का फ़ैसला पहेली जैसा है.''
हालांकि मणिपुर के घाटी वाले इलाक़ों में ज़्यादातर कुकी ज़ो और नगा समुदाय के लोग रहते हैं और यहां कभी कभार ही हिंसा भड़कती है. 24 जुलाई को ब्राडबैंड इंटरनेट शुरू करने के बाद हालात कुछ बेहतर तो हुए थे.
कुछ दिन पहले मणिपुर में इंटरनेट से प्रतिबंध पूरी तरह हटा दिया गया था. हालांकि इस फ़ैसले को अब वापस ले लिया गया है.
पहचान छिपाए रखने की शर्त पर एक कुकी नेता ने टेलीग्राफ अखबार से कहा, ''3 मई से शुरू हुई हिंसा के बाद शांति लाने की कोशिश फिर पटरी से उतरी हैं. अब हमें अगले छह महीनों तक अशांत क्षेत्र का तमगा बर्दाश्त करना होगा.''
3 मई से मणिपुर में जारी हिंसा में हज़ारों लोगों को बेघर होना पड़ा है. ये मुद्दा संसद के मॉनसून सत्र में भी उठा था और विपक्ष को सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाना पड़ा था.
जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मिले, कनाडा पर बात हुई?
हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के बीच गुरुवार को मुलाक़ात होनी है.
ये मुलाक़ात ऐसे वक़्त में हो रही है जब भारत और कनाडा के रिश्तों में दरारें काफी बढ़ गई हैं.
इन दोनों नेताओं की मुलाक़ात क्वाड के विदेश मंत्रियों के साथ हुई बैठक के दौरान भी हुई थी. इस बैठक में जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री भी मौजूद थे.
हिंदुस्तान टाइम्स लिखता है कि जब जयशंकर और एंटनी ब्लिंकन मिले तो दोनों के बीच कनाडा पर कोई बात नहीं हुई है. इस बारे में विदेश मंत्रालय के मंत्रालय मैथ्यू मिलर ने जानकारी दी. मिलर ने कहा कि दोनों नेताओं के बीच कनाडा पर कोई बात नहीं हुई.
संभव है कि ब्लिंकन और जयशंकर के बीच आज होने वाली मुलाक़ात में कनाडा का मुद्दा उठे. हालांकि मिलर ने इस बारे में कोई पुष्टि नहीं की है.
मिलर ने कहा, ''हमने ये साफ़ किया है कि हम ये मुद्दा उठा चुके हैं. हम भारत से इस बारे में बात कर रहे हैं. हम कनाडा की जांच में भारत के सहयोग किए जाने की उम्मीद करते हैं.''
हरदीप सिंह निज्जर: कनाडा की एजेंसियों को अब तक क्या मिला?
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, कनाडा की एजेंसियों को हरदीप सिंह निज्जर की हत्या केस में अब तक किसी भारतीय के शामिल होने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर पता नहीं चला है.
अखबार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि सरे में जांच में जुटी एजेंसियां भारत से संबंध तलाशने की पूरी कोशिश कर रही है. मगर अब तक उनके हाथ कुछ नहीं लगा है.
अखबार लिखता है कि पुलिस को अब तक कुछ पता नहीं चला है, ऐसे में शक इस बात का है कि कहीं हत्यारे देश से बाहर ना चले गए हों.
हरदीप सिंह निज्जर की 18 जून को कनाडा में हत्या कर दी गई थी.
इसके बाद 18 सितंबर को कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो ने निज्जर की हत्या के पीछे भारत के होने के सबूत मिलने की बात कही थी.
ट्रूडो के इस आरोप के बाद भारत और कनाडा के रिश्तों में दूरी आई है.
भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने मंगलवार को न्यूयॉर्क में कनाडा के आरोपों पर कहा- ऐसे काम करना सरकार की नीति नहीं है. अगर कनाडा सरकार के पास कोई विशिष्ट जानकारी है तो मुहैया करवाएं, हम इसे देखेंगे.
भारत में बूढ़े तेज़ी से बढ़ रहे हैं- यूएनपीएफ
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में बुजुर्गों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है.
यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड, इंडिया यानी यूएनपीएफ की 2023 रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बुजुर्गों की आबादी 41 फ़ीसदी की दर से बढ़ रही है.
साल 2050 तक भारत की आबादी में बुजुर्गों की संख्या मौजूदा 10 फ़ीसदी से बढ़कर क़रीब 20 फ़ीसदी होने का अनुमान है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2046 तक 15 साल तक के बच्चों की आबादी से ज़्यादा बुजुर्गों की आबादी होगी.
रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में बुजुर्ग आबादी के 40 फ़ीसदी लोग ग़रीब हैं और इनमें से 18 फीसदी के पास आय का कोई ज़रिया नहीं है. ऐसे में इसका असर इन बुजुर्गों की सेहत पर भी पड़ेगा.
बुधवार को इस रिपोर्ट को जारी करते हुए अनुमान लगाया गया कि 2022 से 2050 के बीच 80 साल से ज़्यादा उम्र के बुजुर्गों की आबादी क़रीब 279 फ़ीसदी की दर से बढ़ेगी.
रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि महिलाओं की जीवन प्रत्याशा पुरुषों की तुलना में ज़्यादा है.
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