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मणिपुर: वो पुराना विवाद जिसे लेकर भड़की हिंसा
- Author, सर्वप्रिया सांगवान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मणिपुर पिछले कुछ दिनों की हिंसा के बाद उबरने की कोशिश कर रहा है. स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं है. लेकिन मणिपुर के बाहर के लोगों के लिए इस हिंसा की वजहों को समझना भी आसान नहीं है.
इसलिए हम आपको मोटे तौर पर मणिपुर की इस हिंसा की वजह के बारे में बताते हैं.
इसके लिए पहले समझना पड़ेगा कि मणिपुर की सामाजिक स्थिति क्या है. मणिपुर की जनसंख्या लगभग 30-35 लाख है. यहां तीन मुख्य समुदाय हैं..मैतई, नगा और कुकी. मैतई ज़्यादातर हिंदू हैं. मैतई मुसलमान भी हैं. जनसंख्या में भी मैतई ज़्यादा हैं.
नगा और कुकी ज़्यादातर ईसाई हैं. नगा और कुकी को जनजाति में आते हैं.
राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात करें तो मणिपुर के कुल 60 विधायकों में 40 विधायक मैतई समुदाय से हैं. बाकी 20 नगा और कुकी जनजाति से आते हैं. अब तक हुए 12 मुख्यमंत्रियों में से दो ही जनजाति से थे.
मणिपुर की भौगोलिक संरचना विशिष्ट है. मणिपुर एक फ़ुटबॉल स्टेडियम की तरह है. इसमें इंफ़ाल वैली बिल्कुल सेंटर में प्लेफ़ील्ड है और बाक़ी चारों तरफ़ के पहाड़ी इलाक़े गैलरी की तरह हैं.
मणिपुर के 10 प्रतिशत भूभाग पर मैतेई समुदाय का दबदबा है. ये समुदाय इम्फाल वैली में बसा है. बाकी 90 प्रतिशत पहाड़ी इलाक़े में प्रदेश की मान्यता प्राप्त जनजातियां रहती हैं.
इन पहाड़ी और घाटी के लोगों के बीच विवाद काफ़ी पुराना और संवेदनशील है.
जनजाति दर्जे की मांग का विरोध क्यों?
मैतई समुदाय की मांग है कि उन्हें भी जनजाति का दर्जा दिया जाए. समुदाय ने इसके लिए मणिपुर हाई कोर्ट में याचिका भी डाली हुई है. मैतई समुदाय की दलील है कि 1949 में मणिपुर का भारत में विलय हुआ था और उससे पहले मैतेई को यहाँ जनजाति का दर्जा मिला हुआ था.
इनकी दलील है कि इस समुदाय, उनके पूर्वजों की ज़मीन, परंपरा, संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए मैतेई को जनजाति का दर्जा ज़रूरी है.
समुदाय ने 2012 में अपनी एक कमेटी भी बनाई थी जिसका नाम है शिड्यूल ट्राइब डिमांड कमिटी ऑफ़ मणिपुर यानी एसटीडीसीएम.
इनका कहना है कि मैतेई समुदाय को बाहरी लोगों के अतिक्रमण से बचाने के लिए एक संवैधानिक कवच की ज़रूरत है.
वे कहते हैं कि मैतेई को पहाड़ों से अलग किया जा रहा है जबकि जिन्हें जनजाति का दर्जा मिला हुआ है, वे पहले से ही सिकुड़ते हुए इंफ़ाल वैली में ज़मीन ख़रीद सकते हैं.
लेकिन जो जनजातियां हैं, वे मैतई समुदाय को जनजाति का दर्जा देने का विरोध कर रही हैं.
इन जनजातियों का कहना है कि मैतई जनसंख्या में भी ज़्यादा हैं और राजनीति में भी उनका दबदबा है. जनजातियों का कहना है कि मैतेई समुदाय आदिवासी नहीं हैं.
उनको पहले से ही एससी और ओबीसी आरक्षण के साथ-साथ आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग का आरक्षण मिला हुआ है और उसके फ़ायदे भी मिल रहे हैं. उनकी भाषा भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है और संरक्षित है.
ऐसे में मैतेई समुदाय को सब कुछ तो नहीं मिल जाना चाहिए. अगर उन्हें और आरक्षण मिला तो फिर बाकी जनजातियों के लिए नौकरी और कॉलेजों में दाखिला मिलने के मौके कम हो जाएंगे.
फिर मैतई समुदाय को भी पहाड़ों पर भी ज़मीन ख़रीदने की इजाज़त मिल जाएगी और इससे उनकी जनजातियां और हाशिये पर चली जाएंगी.
कोर्ट के एक ऑब्ज़र्वेशन से उठा विवाद
हाल ही में मणिपुर हाई कोर्ट ने मैतेई ट्राइब यूनियन की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से कहा कि 'वो मैतई समुदाय को जनजाति का दर्जा दिए जाने को लेकर विचार करे. 10 सालों से ये डिमांड पेंडिंग है..इस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं आता है..तो आप अगले 4 हफ्ते में बताएं.'
कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओपिनियन भी मांगी थी. कोर्ट ने अभी मैतई समुदाय को जनजाति का दर्जा देने का आदेश नहीं दिया है, सिर्फ़ एक ऑब्ज़र्वेशन दी है. लेकिन ये बात सामने आ रही है कि कोर्ट के इस ऑब्ज़र्वेशन को ग़लत समझा गया.
अगले दिन मणिपुर विधानसभा की हिल एरियाज़ कमेटी ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया और कहा कि कोर्ट के इस आदेश से वे दुखी हैं.
उनका कहना था कि कमेटी एक संवैधानिक संस्था है और उनसे भी सलाह मशविरा नहीं लिया गया. आपको बता देते हैं कि पहाड़ी इलाके से चुने गए सभी विधायक इस कमेटी के सदस्य होते हैं, चाहे वे किसी भी पार्टी से हों. फ़िलहाल बीजेपी के विधायक डी गेंगमे इसके चेयरमैन हैं.
फिर 3 मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर ने एक रैली आयोजित की. 'आदिवासी एकजुटता रैली...राजधानी इंफ़ाल से क़रीब 65 किलोमीटर दूर चुराचांदपुर ज़िले के तोरबंग इलाक़े में हुई. इसमें हज़ारों की संख्या में लोग शामिल हुए थे.
पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया है कि इसी दौरान जनजातीय समूहों और दूसरे समूहों के बीच झड़पें शुरू हो गईं. फिर ये हिंसा दूसरी जगहों पर भी फैली.
जनजातियों को ज़मीन से हटाने के ख़िलाफ़ असंतोष
लेकिन हिंसा के पीछे कुछ और कारण होने की बात भी कही जा रही है. जैसे मणिपुर में सरकार के समर्थकों का कहना है कि जनजाति समूह अपने हितों को साधने के लिए मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को सत्ता से हटाना चाहते हैं क्योंकि उन्होंने ड्रग्स के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है.
प्रदेश में बीरेन सिंह की सरकार अफ़ीम की खेती को नष्ट कर रही है और कहा जा रहा है कि इसकी मार म्यांमार के अवैध प्रवासियों पर भी पड़ रही है. जिन्हें म्यांमार से जुड़ा अवैध प्रवासी बताया जा रहा है, वे मणिपुर के कुकी और ज़ोमी जनजाति से ताल्लुक रखते हैं.
दो मई को सीएम एन बीरेन सिंह ने एक ट्वीट किया था. चुराचंदपुर में पुलिस ने दो लोगों के पास से 16 किलो अफ़ीम बरामद की थी. उसी पर मुख्यमंत्री ने लिखा था कि 'ये लोग हमारे वनों को बर्बाद कर रहे हैं और सांप्रदायिक मुद्दे को अपने ड्रग्स बिज़नेस के लिए भड़का रहे हैं. तो यानी ये भी एक साम्प्रदायिक मुद्दा है जिसका ज़िक्र मुख्यमंत्री कर रहे हैं.'
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप फंजोबम कहते हैं, "प्रदेश में यह हिंसा एक दिन में नहीं भड़की है. बल्कि पहले से कई मुद्दों को लेकर जनजातियों में नाराज़गी पनप रही थी. जनजातियों के क़ब्ज़े वाली ज़मीन ख़ाली करवाई जा रही है. इसमें सबसे ज़्यादा कुकी समूह के लोग प्रभावित हो रहे थे. जिस जगह हाल ही में हिंसा भड़की है, वो है चुराचंदपुर इलाक़ा... वहां भी कुकी समुदाय के लोग ज़्यादा हैं. इन सब बातों को लेकर भी वहां तनाव पैदा हो गया है."
हिंसा की वजह से लगभग 9000 लोगों विस्थापित हुए हैं. मणिपुर के कई लोग राज्य छोड़कर असम की सीमा में दाखिल हो गए हैं. फ़िलहाल, हालात काबू करने के लिए सेना और पुलिस दोनों तैनात हैं.
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