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व्हाइट और ब्लैक पेपर: यूपीए और एनडीए में किसकी आर्थिक नीतियां बेहतर?
- Author, निखिल इनामदार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस और बीजेपी के बीच ताज़ा बयानबाज़ी में अर्थव्यवस्था एक अहम मुद्दा बन गई है.
साल 2004 से 2014 के बीच कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइडेट प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) सरकार के दौरान आर्थिक क्षेत्र में प्रदर्शन पर बीजेपी की नेतृत्व वाली नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) ने एक श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर) जारी किया है.
इसमें उसने 2004 से 2014 तक के वक्त को 'विनाशकाल' कहा है, वहीं इसकी तुलना 2014 से लेकर 2023 के दौर से की है जिसे उसने 'अमृतकाल' कहा है.
वहीं एनडीए के इस फ़ैसले के जवाब में कांग्रेस ने ‘10 साल-अन्याय काल’ के नाम से एक ब्लैक पेपर जारी किया है जिसमें 2014 से लेकर 2024 के बीच की बात की गई है.
दोनों ही दस्तावेज़ 50 से 60 पन्ने के हैं और इनमें आंकड़े, चार्ट, की मदद से आरोप और दावे किए गए हैं. बीजेपी के व्हाइट पेपर को यहां और यूपीए के ब्लैक पेपर को यहां पढ़ सकते हैं.
कांग्रेस के अनुसार उसका दस्तावेज़ सत्ताधारी बीजेपी के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक 'अन्यायों' पर केंद्रित है जबकि सरकार का जारी श्वेत पत्र यूपीए सरकार की आर्थिक ग़लतियों पर रोशनी डालने तक सीमित है.
अर्थव्यवस्था को लेकर कांग्रेस का कहना है कि पीएम मोदी का कार्यकाल भारी बेरोज़गारी, नोटबंदी और आधे-अधूरे तरीक़े से गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) व्यवस्था लागू करने जैसे विनाशकारी आर्थिक फ़ैसलों, अमीरों-ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई और निजी निवेश के कम होने का गवाह रहा है.
दूसरी तरफ़ बीजेपी ने बैड बैंक लोन में उछाल, बजट घाटे से भागना, कोयला से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम तक हर चीज़ के आवंटन में घोटालों की एक श्रृंखला और फै़सला लेने में अक्षमता जैसे कई आरोप कांग्रेस पर लगाए हैं. बीजेपी का कहना है कि इसकी वजह से देश में निवेश की गति धीमी हुई है.
विभिन्न विश्लेषणों से शायद ये पता चले कि दोनों ही पार्टियां एक-दूसरे के बारे में जो दावे कर रही हैं, कुछ हद तक वो सही बातें भी हैं.
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के मिहिर शर्मा कहते हैं, "दोनों ओर के आरोपों में कुछ सच्चाई है. दोनों ने बुरे फ़ैसले लिए, कांग्रेस ने टेलीकॉम और कोयला में और बीजेपी ने नोटबंदी में."
लेकिन यूपीए बनाम एनडीए के 10 वर्षों के तुलनात्मक आर्थिक आंकड़ों पर एक नज़र डालने से दोनों के प्रदर्शन की मिली-जुली तस्वीर सामने आती है.
आर्थिक विकास से शुरू करते हैं
लेकिन सच ये है कि भारत की अर्थव्यवस्था पर वैश्विक आर्थिक संकट के मुक़ाबले कोविड महामारी के कहर का असर अधिक था. इसलिए ताज्जुब नहीं कि एनडीए सरकार के दौरान एक दशक का जीडीपी औसत कम रहा.
स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की पूर्व अर्थशास्त्री बृंदा जागीरदार ने कहा, "कोविड ने अर्थव्यवस्था के सामने जो बाधा पैदा की वो बहुत बड़ी थी. इस महामारी ने इस दशक के दौरान कुछ सालों के लिए अर्थव्यवस्था की गति को धीमा कर दिया."
लेकिन बृंदा जागीरदार ने कहा कि इस सरकार ने बुनियादी ढांचे को मज़बूत करने और अन्य चीज़ों के अलावा अंतिम पायदान तक प्रशासन में सुधार करके आने वाले सालों में "तेज़ी से विकास" की नींव रखी है.
क़ीमतें बढ़ने के मामले में मोदी सरकार का प्रदर्शन बेहतर रहा
लेकिन मिहिर शर्मा का कहना है कि बीजेपी का रिकॉर्ड बेहतर दिखता है क्योंकि इसके अधिकांश कार्यकाल में तेल की क़ीमतें कम रहीं, जबकि कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान इसी वजह से महंगाई और बजट घाटा अधिक था.
मोदी सरकार ने सड़क निर्माण जैसे पूंजीगत व्यय पर अधिक ख़र्च किया
एनडीए के शासनकाल में जीडीपी में मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर का जो हिस्सा होता है उसमें कमी आई है.
विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार जिन 10 सालों में यूपीए सरकार सत्ता में थी, उन सालों में मैन्यूफ़ैक्चरिंग सेक्टर का औसत 15 से 17 फ़ीसदी के बीच था.
वहीं मोदी सरकार के कार्यकाल में 'मेक इन इंडिया' जैसी मुहिम और उत्पादन से जुड़ी छूट पर अरबों डॉलर खर्च करने के बावजूद, 2022 के लिए उपलब्ध ताज़ा आंकड़ों के अनुसार मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर का जीडीपी में हिस्सा गिरकर 13 फ़ीसदी आ गया.
निर्यात में वृद्धि दर एनडीए के मुक़ाबले यूपीए के दौरान तेज़ थी
ये दोनों ही कई कारकों की वजह से हैं, जैसे भूमि अधिग्रहण और फ़ैक्ट्रियों के लिए पर्यावरण की मंज़ूरी मिलने में मुश्किलें. साथ ही एक सच्चाई ये भी है कि भारत उस तरह वैश्विक व्यापार से नहीं जुड़ा है जैसा उसे होना चाहिए.
लंबे समय से ये कारक देश के मैन्युफ़ैक्चरिंग और निर्यात वृद्धि को कम रखने का कारण रहे हैं.
मानव विकास सूचकांक पर प्रदर्शन
मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के मामले में भी एनडीए का प्रदर्शन यूपीए के मुक़ाबले बुरा रहा है. यह सूचकांक, स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रगति, शिक्षा तक पहुंच और व्यक्ति के जीवन स्तर में प्रगति का मानक है.
2004 से 2013 के बीच भारत के एचडीआई मूल्य में 15 फ़ीसदी का सुधार हुआ.
हालांकि यूएनडीपी के ताज़ा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2014 और 2021 के बीच इसमें केवल 2 फ़ीसदी का सुधार हुआ. अगर कोविड महामारी के दो सालों को छोड़ भी दिया जाए तो भी 2019 तक एचडीआई में, यूपीए के पांच सालों के 7 फ़ीसदी के मुक़ाबले केवल 4 फ़ीसदी का सुधार रहा है.
असल में मानव विकास सूचकांक में भारत की रैंकिंग गिरी है. कुल 191 देशों में 2004 में भारत 131 पायदान पर था, जबकि 2021 में वो 132 पर आ गया है.
हाल ही में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इस मामले में चिंता ज़ाहिर की थी.
उन्होंने कहा कि 'फ़िज़िकल कैपिटल' बनाने में बहुत समय खर्च किया गया लेकिन 'ह्यूमन कैपिटल' बनाने में और स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सुधार पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया.
उन्होंने कहा कि सच्चाई ये है कि भारत में कुपोषण सब-सहारा अफ़्रीका के कुछ हिस्सों से भी अधिक था, यह एक ऐसे देश के लिए ये 'अस्वीकार्य' है जिसकी विकास दर दुनिया के अधिकांश हिस्से को पीछे छोड़ रही है.
ऊपर की गई तुलना देश के आर्थिक विकास के क्षेत्र में बीते दो दशकों में सत्ता में रही दो अलग-अलग सरकारों के प्रदर्शन को लेकर व्यापक तुलनात्मक मूल्यांकन नहीं है.
इस तरह की तुलना करते वक्त शेयर बाज़ार में रिटर्न्स, सब्सिडी पर खर्च, नए रोज़गार पैदा करने और खपत जैसे आर्थिक मानदंडों पर भी नज़र डाली जा सकती है.
इस बात की पूरी संभावना है कि इससे जो तस्वीर उभरेगी वो मिली-जुली होगी, जिसमें एक सरकार किसी एक क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करती दिखेगी तो किसी दूसरे क्षेत्र में पिछड़ती दिखेगी.
आर्थिक नीति निर्धारण भी एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है जो अलग-अलग सरकारों के बीच चलती रहती है, जिसमें सरकार को अपने पूर्ववर्ती से विरासत में अच्छे और बुरे काम मिलते हैं.
कभी-कभी एक सरकार द्वारा की गई पहल या कदम को उसके बाद आने वाली सरकार आगे बढ़ाती है और मज़बूत करती है. उदाहरण के तौर पर यूपीए की सफलता का श्रेय आधार पर आधारित पहचान पत्र व्यवस्था को जाता है जिसे 2009 में यूपीए के कार्यकाल में लाया गया था.
ये सभी कारण आर्थिक मामलों में विश्लेषण को ब्लैक एंड व्हाइट तक सीमित करने की कोशिश को नाकाम साबित करते हैं. और सच यही है कि इस मामले में सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं छिपी है.
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