चीन की ख़राब आर्थिक हालत से क्या दूसरे देशों को परेशान होना चाहिए?

    • Author, निक मार्श
    • पदनाम, एशिया बिज़नेस संवाददाता

एक कहावत है कि जब अमेरिका की छींक आती है तो दुनिया के बाकी के देशों को भी ज़ुकाम पकड़ लेता है. लेकिन जब चीन बीमार पड़ता है तो क्या होता है?

चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. उसकी आबादी एक अरब 40 करोड़ से अधिक है. चीन इन दिनों कई समस्याओं का सामना कर रहा है. इसमें धीमी विकास दर, बेरोज़गारी और प्रॉपर्टी बाज़ार की उथल-पुथल शामिल है.

इसके बाद से भारी कर्ज़ में डूबे रियल एस्टेट डेवलपर एवरग्रांडे के चेयरमैन को पुलिस निगरानी में रखा गया है. इस कंपनी के शेयरों को शेयर बाज़ार में निलंबित कर दिया गया है.

ये मुद्दे चीन के लिए बड़ी समस्या बन गए हैं. लेकिन बाकी की दुनिया के लिए इनका कितना महत्व है.

विश्लेषकों का मानना ​​है कि जिस वैश्विक तबाही की आशंका जताई जा रही है वह अतिरंजित है. लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों, उनके कर्मचारियों और यहां तक ​​​​कि जिन लोगों का चीन से कोई सीधा संबंध नहीं है, उन्हें कम से कम कुछ प्रभावित होने की आशंका है. यह इस पर निर्भर करता है कि आप हैं कौन.

सिंगापुर के एशियन ट्रेड सेंटर के कार्यकारी निदेशक डेबोरा एल्म्स पूछते हैं, "उदाहरण के लिए, अगर चीनी लोग दोपहर का भोजन बाहर खाना कम करना शुरू कर दें, तो क्या इससे अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी?"

इसका उत्तरा होगा, " उतना नहीं है जितना आप सोच सकते हैं, लेकिन यह निश्चित रूप से उन कंपनियों को प्रभावित करेगा जो सीधे चीन के घरेलू खपत पर निर्भर हैं."

क्या चीनी अर्थव्यवस्था धड़ाम होने वाली है ?

ऐप्पल, वॉक्सवैगन और बरबेरी जैसी सैकड़ों बहुराष्ट्रीय कंपनियों के राजस्व का बड़ा हिस्सा चीन के विशाल उपभोक्ता बाज़ार से आता है. अगर वहां के परिवारों ने कम खर्च करना शुरू कर दिया तो, इसका असर उनके राजस्व पर पड़ेगा. इससे दुनिया भर के हज़ारों सप्लायर और मज़दूर प्रभावित होंगे, जो इन कंपनियों पर निर्भर हैं.

दुनिया के एक तिहाई से अधिक विकास के पीछे चीन का हाथ है, ऐसे में किसी भी प्रकार की मंदी उसकी सीमाओं से बाहर भी महसूस की जाएगी.

अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच ने पिछले महीने कहा था कि चीन की मंदी वैश्विक विकास संभावनाओं पर असर डाल रही है. इसके बाद इस एजेंसी ने 2024 में पूरी दुनिया के लिए अपने पूर्वानुमान को कम कर दिया.

वहीं कुछ अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़, चीन को अंतरराष्ट्रीय विकास का इंजन मानना, एक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया विचार है.

यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के चाइना सेंटर के अर्थशास्त्री जॉर्ज मैग्नस कहते हैं कि गणितीय रूप से यह सही है कि वैश्विक विकास में चीन का हिस्सा करीब 40 फीसदी का है.

वो कहते हैं, "लेकिन उस विकास का फायदा किसे हो रहा है? चीन एक विशाल व्यापार सरप्लस चलाता है. वह आयात की तुलना में निर्यात अधिक करता है, इसलिए चीन कितना बढ़ता है या नहीं बढ़ता है, वास्तव में यह दुनिया के बाकी के देशों की तुलना में चीन के बारे में अधिक है."

चीन वस्तुओं और सेवाओं पर या घरों के निर्माण पर बहुत कम खर्च कर रहा है. इसका मतलब है कि कच्चे माल और वस्तुओं की कम मांग है. इस साल अगस्त में चीन ने पिछले साल की समान अवधि की तुलना में लगभग नौ फीसदी कम आयात किया. पिछले साल अगस्त में चीन में शून्य कोविड प्रतिबंध लागू थे.

सिडनी के इंडो-पैसिफिक डेवलपमेंट सेंटर के निदेशक रोलैंड राजह कहते हैं, ''ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और अफ्रीका के कई देशों, जैसे बड़े निर्यातकों पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा.''

चीन में गिरती कीमतें क्यों चिंता वाली बात है?

चीन में कमज़ोर मांग का मतलब यह हुआ कि वहां कीमतें कम रहेंगी. पश्चिमी उपभोक्ता के नज़रिए से यह बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने का एक स्वागत योग्य तरीका होगा. इससे ब्याज दरों में और वृद्धि शामिल नहीं है.

पिछले 10 साल में चीन ने बेल्ट एंड रोड परियोजना में बहुत बड़ा निवेश किया है, यह निवेश एक ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक है.

इसके तहत 150 से अधिक देशों को सड़क, समुद्री बंदरगाह और पुल बनाने के लिए चीन ने पैसा और तकनीकी मदद मुहैया कराई है.

राजह के मुताबिक अगर चीन के घर में आर्थिक समस्या बनी रही तो ये परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं.

चीन और बाकी की दुनिया

अगर विदेश में चीनी निवेश में कमी एक संभावना है तो, यह साफ नहीं है कि चीन की घरेलू आर्थिक स्थिति उसकी विदेश नीति को कैसे प्रभावित करेगी.

कुछ लोगों का मानना है कि असुरक्षित चीन, अमेरिका के साथ उसके खराब होते संबंधों को सुधारने की दिशा में काम कर सकते हैं. अमेरिका की ओर से लगाए गए व्यापार प्रतिबंधों की वजह से इस साल की पहली छमाही में अमेरिका को चीनी निर्यात में 25 फीसदी की गिरावट आई है.

इस बात का कोई सबूत नहीं है कि चीन का रुख नरम हो रहा है. वह अक्सर पश्चिमी देशों की शीत युद्ध दौर की मानसिकता को लेकर आलोचना करता रहता है. वो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सीरिया के बशर अल-असद जैसे नेताओं के साथ अच्छे संबंध बनाए रखता है.

ठीक इसी समय अमेरिका और यूरोपीय संघ के अधिकारी द्विपक्षीय व्यापार पर बातचीत के लिए हर महीने चीन की यात्रा करते रहते हैं. सच्चाई तो यह है कि चीनी बयानबाज़ी और चीनी नीति के बीच का अंतर बहुत कम लोगों को ही पता है.

इस अनिश्चितता का एक और आकलन अमेरिकी पर्यवेक्षक यह करते हैं कि चीनी अर्थव्यवस्था में मंदी का असर ताइवान के साथ उसके व्यवहार पर पड़ सकता है. ताइवान एक स्व-शासित द्वीपीय देश है, उसे चीन अपना क्षेत्र बताता है.

क्या जलवायु संकट पर कार्रवाई के लिए अमेरिका और चीन अपनी प्रतिद्वंद्विता को अलग रख सकते हैं?

ऐसे बहुत से लोग हैं जो इस धारणा को खारिज करते हैं. इनमें अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन भी शामिल हैं. इस संभावना के बारे में पूछे जाने पर बाइडन ने कहा कि शी जिनपिंग इस समय अपने देश की आर्थिक समस्याओं से निपटने में पूरी तरह सक्षम हैं.

बाइडन ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि इससे चीन ताइवान पर हमला करेगा, दरअसल मामला इसके उलट है. उन्होंने कहा कि अब शायद चीन के पास उतनी क्षमता नहीं है, जितनी पहले थी."

अर्थव्यवस्था से क्या हैं उम्मीदें

हालांकि, अगर इतिहास से कोई एक सबक सीख सकते हैं तो, वह है अप्रत्याशित की उम्मीद करना. जैसा कि एल्म्स बताती हैं कि 2008 से पहले कुछ लोगों को लगता था कि लास वेगास में सबप्राइम मार्गरेज से अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा.

2008 की आर्थिक मंदी की गूंज ने कुछ विश्लेषकों को उस चीज़ के बारे में चिंतित कर दिया है जिसे 'वित्तीय छूट' के रूप में जानते हैं. इसमें चीन के प्रॉपर्टी संकट का दुखद सपना शामिल है, जिसमें चीनी अर्थव्यवस्था के पूरी तरह ढह जाने और दुनिया भर में वित्तीय मंदी आने की आशंका जताई गई है.

सबप्राइम मार्गरेज संकट से इसकी क्या समानता है, जिसकी वजह से वॉल स्ट्रीट के इनवेस्टमेंट दिग्गज लेहमैन ब्रदर्स दिवालिया हो गया था और दुनिया ने आर्थिक मंदी देखी, मैग्नस के मुताबिक यह पूरी तरह सटीक नहीं हैं.

वो कहती हैं, ''यह लेहमैन जैसा झटका नहीं होने जा रहा है. चीन के अपने बड़े बैंकों को डूबने देगा, इसकी संभावना नहीं है. उनके पास अमेरिका में डूबे हज़ारों क्षेत्रीय और सामुदायिक बैंकों की तुलना में तगड़ी बैलेंस शीट है."

वहीं एल्मस इस बात पर सहमत हैं कि चीन का प्रॉपर्टी बाज़ार उसके वित्तीय बुनियादी ढांचे से उस तरह से नहीं जुड़ा है, जैसा अमेरिका में सबप्राइम मार्गरेज जुड़े हुए थे. इसके अलावा चीन की वित्तीय प्रणाली इतनी प्रभावी नहीं है कि उसका सीधा प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव पड़ता हो जैसा कि हमने 2008 में अमेरिका में देखा था.

वो कहती हैं, ''हम वैश्विर स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. जब आपके विकास के बड़े इंजनों में से एक काम नहीं कर रहा है, तो यह बाकी लोगों को प्रभावित करता है. यह अक्सर बाकी के लोगों को उस तरह से प्रभावित करता है, जिसकी हमें उम्मीद नहीं थी."

वो कहती हैं कि इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे लगता है कि हम 2008 को दोहराने की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन बात यह है कि जो कभी-कभी हमें स्थानीय और घरेलू चिंताएं लगती हैं, उनका हम सभी पर प्रभाव पड़ सकता है. वह भी इस तरीके से, जिसकी हमनें कल्पना नहीं की होगी.

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