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दुनिया का सबसे महंगा मसाला घर में कैसे उगाया जा सकता है?
- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, श्रीनगर
'एक सीज़न में पाँच लाख रुपये कमाने के लिए... आपको ज़ाफ़रान यानी केसर के बीज, एक ख़ाली कमरा, चंद रैक और कुछ प्लास्टिक कंटेनर की ज़रूरत है.'
यह कहना है जम्मू-कश्मीर में स्थित बड़गाम के पखरपुरा गाँव में रहने वाले कंप्यूटर इंजीनियर राशिद ख़ान का. केसर की खेती राशिद का ख़ानदानी पेशा नहीं है और न ही पखरपुरा की ज़मीन इसके लिए उपयुक्त है.
केसर दूध और क़हवे में इस्तेमाल होता है और इसके अलावा यह कॉस्मेटिक प्रॉडक्ट्स और कई तरह की दवाइयों में भी इस्तेमाल होता है. लेकिन पिछले कई वर्षों से यहाँ केसर की पैदावार में बहुत कमी आई है और कई सारे किसानों के खेत बंजर हो गए हैं.
भारतीय प्रशासित कश्मीर में केसर की खेती पुलवामा के पामपूर कसबे के पठारों पर होती है. दुनिया का सबसे महंगा मसाला कहलाने वाले केसर की खेती में गिरावट को देखते हुए, राशिद ख़ान ने अपने ही घर के एक कमरे में इसकी खेती का कामयाब प्रयोग किया.
राशिद कहते हैं, "मैं रोज़ टीवी पर सुनता था और अख़बारों में पढ़ता था कि केसर का उद्योग ख़त्म हो रहा है. मैंने इस पर ग़ौर किया और यहाँ की एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों से संपर्क किया. हमने बीज ख़रीदे और कमरे में रख दिए, आज आप देख रहे हैं कि केसर की फ़सल तैयार है."
राशिद कहते हैं कि घरों के अंदर केसर की खेती के ज़रिये बेहतरीन अतिरिक्त आय हो सकती है और इसके लिए बड़े खेतों की भी ज़रूरत नहीं है.
वह कहते हैं, "इसमें कोई मेहनत भी नहीं लगती. सिर्फ़ तापमान का ध्यान रखना होता है और अगर नमी कम हो जाए तो दीवार पर पानी का छिड़काव करके नमी को बनाए रखा जा सकता है. इस तरह पैसा भी आता है और यह तसल्ली भी रहती है कि हमारी सबसे अहम फ़सल ख़त्म नहीं होगी."
बड़े पैमाने पर खेती की तैयारी
पामपूर के रहने वाले अब्दुल मजीद का ख़ानदान तीन सदियों से ज़ाफ़रान (केसर) की ही खेती करता रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान मौसम में बदलाव और प्रदूषण की वजह से ज़ाफ़रान के खेतों में पहले जैसी रौनक़ बाक़ी नहीं रही.
अधिकारियों के मुताबिक़ पिछले दो दशकों के दौरान केसर की पैदावार में 60 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है. अब्दुल मजीद अब ख़ुद भी 'इनडोर फार्मिंग' के ज़रिए घर के अंदर ही केसर उगाते हैं और दूसरे किसानों को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं.
उनका कहना है, "मौसम ने परेशान किया तो हमने इनडोर फार्मिंग को आज़माया. लेकिन शुरुआत में इस प्रयोग में कई बार लाखों रुपये के बीज ख़राब हो गए थे."
वह बताते हैं, "फिर हमने एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों से संपर्क किया, उन्होंने हमें ट्रेनिंग दी और मदद भी की. अब कोई भी किसान अपने कमरे में केसर की दो किलो तक की खेती कर सकता है जिसकी क़ीमत छह लाख रुपए तक होगी."
अब्दुल मजीद कहते हैं कि वह कुछ भारतीय कंपनियों के संपर्क में हैं.
मजीद कहते हैं, "हमारी बात हो रही है. हम ज़मीन उपलब्ध कराएँगे और वो बड़े ग्रीन हाउस तैयार करेंगे. फिर मौसम कैसा भी हो, फसल प्रभावित नहीं होगी. इसमें कुछ देर लगेगी, लेकिन तब तक किसान घरों में भी खेती कर सकते हैं."
एक नए प्रयोग की कोशिश
पतझड़ का मौसम शुरू होते ही पामपूर के खेतों में बहार आ जाती थी, हर तरफ लह-लहाते ज़ाफ़रानी फूलों का दिलकश मंज़र होता था. लेकिन अब उन खेतों में पहले जैसी रौनक नहीं रही, क्योंकि मौसमी तब्दीली से बहुत कम फसल होती है.
एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर बशीर अहमद इलाही कहते हैं, "हम खेतों में ज़ाफ़रान की खेती को ख़त्म नहीं कर रहे हैं. बल्कि हमने मौसमी तब्दीली से निपटने का एक रास्ता बताया है, और किसान कामयाबी से इनडोर फार्मिंग कर रहे हैं."
वह कहते हैं कि ज़ाफ़रान का बीज (कॉर्म) कई साल तक फसल देता है, लेकिन ज़ाफ़रान का फूल तोड़ने के बाद उसे दोबारा ज़मीन के अंदर रखना होता है ताकि वह अगले साल दोबारा फसल के क़ाबिल हो जाए.
प्रोफ़ेसर बशीर अहमद इलाही कहते हैं, "अब हम एक और प्रयोग करने वाले हैं, जिसमें इनडोर फार्मिंग के ज़रिये बीज भी उगा सकें और उसे संरक्षित भी कर सकें. अगर यह कामयाब हो गया, तो फिर ज़मीन का रोल ख़त्म हो जाएगा, और कोई भी अपने घर के कमरे में ज़ाफ़रान की खेती कर सकेगा."
प्रोफ़ेसर बशीर कहते हैं कि भारत के कई राज्यों के कृषि वैज्ञानिक यहाँ आकर इनडोर फार्मिंग की संभावना पर शोध कर रहे हैं.
वह कहते हैं, "लेकिन कश्मीर जैसा वातावरण हर जगह मुमकिन नहीं है. मुम्बई या दिल्ली में ऐसा करना हो तो कमरे का तापमान कंट्रोल करने के लिए बहुत से यंत्र लगाने पड़ेंगे."
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