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पश्चिम बंगाल कांग्रेस में अधीर रंजन चौधरी की जगह क्या कोई ले पाएगा?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पश्चिम बंगाल की राजनीति में देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल, यानी कांग्रेस अपना अस्तित्व तलाश रहा है.
अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वो किसे प्रदेश कांग्रेस कमिटी का अध्यक्ष नियुक्त करती है.
मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष, अधीर रंजन चौधरी को 29 जुलाई तक ये पता नहीं था कि वो अब पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष नहीं रहे.
ऐसा दावा उन्होंने दिल्ली में पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए किया.
लोकसभा के चुनावों में उम्मीद से कहीं बुरा हाल होने के बाद अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि उन्होंने इसकी ज़िम्मेदारी लेते हुए पद से हट जाने की लिखित पेशकश पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से की थी.
टीएमसी के ख़िलाफ़ सख़्त था अधीर रंजन का रुख़
अधीर रंजन चौधरी इस लोकसभा चुनाव में अपनी बहरामपुर सीट भी हार गए थे जो वो 1999 से लगातार जीतते आ रहे थे.
लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी पर बड़ी ज़िम्मेदारियां थीं.
वह कांग्रेस में एकमात्र ऐसे नेता थे जो पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस से लोहा लेते थे. बावजूद इसके कि तृणमूल कांग्रेस विपक्ष के इंडिया गठबंधन का हिस्सा है.
कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेता जब ममता बनर्जी पर सीधा निशाना साधने से ख़ुद को रोकते रहे, अधीर रंजन चौधरी अपने रुख़ से कभी अलग नहीं हुए और वो प्रदेश में अपनी राजनीति पर अड़े रहे.
उनके इस रुख़ से ये साफ़ हो गया कि कांग्रेस आलाकमान का केंद्र में तृणमूल कांग्रेस को लेकर अलग रवैया ज़रूर रहा लेकिन राज्य के स्तर पर अधीर रंजन चौधरी तृणमूल के ख़िलाफ़ अपनी पार्टी के ‘वन मैन आर्मी’ के रूप में ही जाने जाते रहे.
जिस तरह से उनको हटाया गया, उससे वो ख़ुद भी आक्रोश में हैं और उनका गुस्सा पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पर केंद्रित है.
चौधरी को किस बात का 'दुख' है
अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि उन्होंने 21 जून को ही लिखित रूप से अपने इस्तीफे़ की पेशकश की थी. वो कहते हैं कि चुनाव के ठीक बीच में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने घोषणा कर दी थी कि उन्हें यानी चौधरी को पद से हटाया जा सकता है.
लेकिन उन्हें दुख है कि उन्हें कोई जवाब नहीं मिला और 29 जुलाई को जब पश्चिम बंगाल के बड़े कांग्रेस के नेताओं को पार्टी के आलाकमान ने दिल्ली तलब किया तो प्रदेश के प्रभारी ग़ुलाम अहमद मीर ने उन्हें ‘पूर्व अध्यक्ष’ कहकर संबोधित किया.
इस बैठक में केसी वेणुगोपाल सहित दूसरे केंद्रीय नेता भी मौजूद थे जबकि पश्चिम बंगाल से दीपा दासमुंशी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे अब्दुल मन्नान और प्रदीप भट्टाचार्य के अलावा अमिताभ चक्रवर्ती, नेपाल महतो, मनोज चक्रवर्ती और प्रदेश के कांग्रेस के एकमात्र सांसद ईशा खान चौधरी भी मौजूद थे.
कवायद थी कि प्रदेश का अगला अध्यक्ष कौन होगा? इस पर मंथन चल रहा है.
कैसा रहा अधीर रंजन का कार्यकाल?
लेकिन जानकार मानते हैं कि पार्टी के बड़े नेताओं के सामने दुविधा ये है कि क्या अगला अध्यक्ष भी सत्तारूढ़ दल से वैसे ही लोहा ले पाएगा जैसा अधीर रंजन चौधरी लेते आ रहे थे.
कुछ जानकार ये भी मानते हैं कि बेशक अधीर रंजन चौधरी की छवि ममता विरोधी रही हो लेकिन संगठन के लिए प्रदेश में उनका कोई योगदान नहीं रहा है.
कोलकता से प्रकाशित बंगला अखबार ‘आनंद बज़ार पत्रिका’ के संपादक रह चुके सुमन चट्टोपाध्याय कहते हैं कि ऐसे कम ही मौके़ थे जब अधीर रंजन चौधरी प्रदेश कांग्रेस कार्यालय जाते हों.
बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, “कांग्रेस के आलाकमान ने कुछ सोच समझ कर फैसला लिया होगा क्योंकि चौधरी पर ये भी आरोप लगते रहे थे कि वो प्रदेश कांग्रेस कार्यालय का संचालन दिल्ली स्थित अपने आवास से करने लगे थे.”
सुमन चट्टोपाध्याय का ये भी मानना है कि बतौर प्रदेश अध्यक्ष चौधरी का प्रभाव पूरे प्रदेश में होना चाहिए था और उन्हें प्रदेश भर का सर्वमान्य कांग्रेस का चेहरा होना चाहिए था जो नहीं था.
वो कहते हैं कि चौधरी की राजनीति का केंद्र उनका चुनावी क्षेत्र ही रहा है. उन्होंने अपने आपको वहीं तक सीमित रखा और संगठन के विस्तार या उसे मज़बूत बनाने के लिए कुछ नहीं किया.
जबकि प्रदेश कांग्रेस कमिटी के मौजूदा महासचिव आशुतोष चटर्जी कहते हैं कि कांग्रेस में रहते हुए ही ममता बनर्जी ने पार्टी को तोड़ा और ‘तृणमूल कांग्रेस’ का साम्राज्य बंगाल की राजनीति में स्थापित किया.
वो कहते हैं कि जो ममता की पार्टी के साथ नहीं गया उसे तरह तरह के हथकंडे अपनाकर प्रताड़ित किया गया और पार्टी में आने पर मजबूर किया गया.
उनका कहना है, “पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के पतन का ये सबसे बड़ा कारण रहा है. कई कार्यकर्ताओं को अपनी जान भी गंवानी पड़ी. इसका मतलब ये नहीं है कि कांग्रेस साफ़ हो गई है. अभी भी अधिकांश आम बंगाली मतदाता भाजपा की विचारधारा से सहमत नहीं है.
कांग्रेस प्रदेश में कमज़ोर है सांगठनिक रूप से. इसलिए वो ममता विरोधी जो भावनाएं हैं लोगों के बीच उसको भारतीय जनता पार्टी ने आसानी से भुना लिया है."
वह कहते हैं, "आज भी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर कांग्रेस प्रदेश में किसी भी दल के साथ गठबंधन ना करे और अपने बूते राजनीति करे तो कांग्रेस का पुनरुत्थान हो सकता है.
तृणमूल के लोग भी कांग्रेसी विचारधारा के ही हैं. उन्हें बस एक ऐसा मज़बूत विकल्प चाहिए. संगठन कमज़ोर है मगर सड़क पर तो है. ये बड़ी बात है हमारे लिए. सवाल ये है कि अधीर रंजन के बाद ममता से लोहा कौन लेगा ? ऐसा नेतृव प्रदेश में होना चाहिए.”
चटर्जी कहते हैं कि उन्होंने इस बात को सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भी बताया है. चटर्जी कहते हैं, “यहाँ सबसे मज़ेदार बात ये है कि तृणमूल कांग्रेस भाजपा को चला रही है जबकि भाजपा तृणमूल कांग्रेस को.”
पार्टी के पूर्व विधायक और प्रदेश कमिटी के पूर्व महासचिव शुभंकर सरकार मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में अगर कांग्रेस को अपना 70 के दशक वाला संगठन चाहिए तो फिर उसे शून्य से शुरू करना पड़ेगा जिसमें नए और पुराने चेहरों को लेकर संगठन तैयार करना पड़ेगा.
नहीं तो उन्हें लगता है कांग्रेस का अस्तित्व संकट में ही रहेगा.
आनंद बज़ार पत्रिका के पूर्व सम्पादक सुमन चट्टोपाध्य शुभंकर की बात से सहमत नहीं हैं.
वह कहते हैं कि बंगाल की राजनीति से कांग्रेस पिछले 47 सालों से दूर है. अब उसे संगठन भी चलाना नहीं आता. कांग्रेस जिन्हें प्रदेश का प्रभारी बनाकर समय-समय पर भेजती रहती है वो नेता बंगाल की राजनीति और यहाँ की संस्कृति को ठीक से समझते हैं.
वह कहते हैं, “अगर यही हाल रहा तो 47 के आगे एक शून्य और लगा दीजिये. यानी अगले 470 सालों तक प्रदेश में कांग्रेस का कोई भविष्य अभी तो नज़र नहीं आ रहा है."
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