चंपाई सोरेन से झारखंड में क्या बीजेपी को फ़ायदा होगा?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
बीजेपी के साथ जाने की चर्चाओं के बीच झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ नेता चंपाई सोरेन ने कहा है कि वो तीन विकल्पों पर विचार कर रहे हैं- राजनीति से संन्यास, नई पार्टी शुरू करना या किसी भरोसेमंद दल के साथ जाना.
31 जनवरी 2024 को हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद चंपाई सोरेन ने मुख्यमंत्री पद संभाला था.
कोल्हान के टाइगर कहे जाने वाले चंपाई को हेमंत सोरेन को ज़मानत मिलने के बाद पार्टी के कहने पर पद छोड़ना पड़ा था. तीन जुलाई 2024 को उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया था.
पिछले तीन दिनों से कयास लगाए जा रहे थे कि चंपाई सोरेन बीजेपी में शामिल हो सकते हैं.

जेएमएम के साथ नहीं रहेंगे

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वो बीजेपी के साथ जा रहे हैं या नहीं ये अगले कुछ दिनों में साफ़ हो जाएगा लेकिन रविवार को आए उनके इस बयान से ये स्पष्ट हो गया है कि जेएमएम के साथ नहीं रहेंगे.
झारखंड के कोल्हान क्षेत्र से आने वाले संथाल आदिवासी नेता चंपाई सोरेन की छवि बेदाग रही है और उन्हें राज्य के शीर्ष आदिवासी नेताओं में शुमार किया जाता है.
उनके बीजेपी के साथ आने के सवाल पर झारखंड में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अमर कुमार बाउरी कहते हैं, "चंपाई एक बड़े नेता हैं. उन्हें पार्टी में शामिल करने का निर्णय केंद्रीय नेतृत्व को करना है."
अमर कुमार कहते हैं, "उनके आने से बीजेपी को फ़ायदा होगा या नहीं, इस सवाल का जवाब तब ही दिया जा सकेगा जब वो पार्टी में शामिल हो जाएंगे."
वहीं बीजेपी के प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव कहते हैं, "ये चंपाई का स्वतंत्र निर्णय है. बीजेपी का इससे अभी तक कोई लेना देना नहीं है. अगर वो बीजेपी में आना चाहेंगे तो इसकी इच्छा ज़ाहिर करेंगे, अगर वो आना चाहेंगे तो हमारा केंद्रीय और राज्य नेतृत्व इस पर निर्णय लेगा."
"लेकिन उनके इस बयान से जेएमएम की अंदरूनी राजनीति सामने आ गई है, ये स्पष्ट हो गया है कि सोरेन परिवार किसी और को बर्दाश्त नहीं करता है, भले ही वो राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ही क्यों ना हों."
प्रतुल शाहदेव कहते हैं, "जेएमएम बस एक परिवार की पार्टी बनकर रह गई है. हेमंत ज़मानत पर छूटे हैं, उनका भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा बनेगा."
हालांकि, झारखंड मुक्ति मोर्चा चंपाई के जाने को नैतिक नुकसान के रूप में तो देख रही है लेकिन इससे कोई राजनीतिक नुक़सान होगा, इसे ख़ारिज कर रही है.
जेएमएम के विधायक सुदिव्य सोनू कहते हैं, "चंपाई आंदोलनकारियों की अंतिम पीढ़ी के शीर्ष नेता हैं. उनका जाना वैचारिक रूप से जेएमएम को खलेगा लेकिन अगर इसे राजनीतिक रूप से देखें तो कोल्हान क्षेत्र में जेएमएम को कोई नुक़सान नहीं होने जा रहा है."
वह कहते हैं, "कोल्हान के विधायकों का उनके साथ नहीं जाने से ये साफ़ है कि वो राजनीतिक रूप से बहुत प्रभावी नहीं रहेंगे. इतिहास भी इस बात का गवाह है कि जेएमएम से गए लोग, राजनीतिक रूप से बहुत प्रभावी नहीं रहे हैं."
झारखंड के निवर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को कथित ज़मीन घोटाले के आरोप में जेल जाना पड़ा था. जेल जाने से पहले उन्होंने इस्तीफ़ा दिया था और उनकी जगह चंपाई सोरेन मुख्यमंत्री बने थे.
हेमंत सोरेन अब जेल से बाहर हैं और फिर से मुख्यमंत्री हैं. झारखंड विधानसभा चुनाव में अब लंबा समय नहीं है.
विश्लेषक ये मान रहे हैं कि मौजूदा समय में हेमंत सोरेन आदिवासी मतदाताओं को अपने पीछे मज़बूती से खड़ा करने में कामयाब हो रहे हैं.
बीजेपी को चुनौती

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हालांकि, हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी 14 में से 8 सीटें जीतने में कामयाब रही है. 2019 में बीजेपी ने 12 सीटें जीतीं थीं. पिछले चुनाव की तुलना में बीजेपी का प्रदर्शन भले ख़राब रहा हो लेकिन इस बार भी बीजेपी ने सर्वाधिक सीटें जीतीं हैं.
यानी बीजेपी लोकसभा में अब भी झारखंड की सबसे बड़ी पार्टी है.
हेमंत सोरेन ने बार-बार ये कहा है कि भारतीय जनता पार्टी को झारखंड में आदिवासी नेतृत्व बर्दाश्त नहीं हुआ और एक आदिवासी नेता को फंसाकर जेल भेजा गया.
राजनीतिक विश्लेषक ये मान रहे हैं कि हेमंत आगामी चुनावों में जनभावना का फ़ायदा उठा सकते हैं और ऐसे में चंपाई सोरेन के जाने का पार्टी पर बहुत असर नहीं होगा.
नेशनल इलेक्शन वॉच के झारखंड कोऑर्डिनेटर और राजनीतिक विश्लेषक सुधीर पाल कहते हैं, "मौजूदा स्थिति में चंपाई के जाने से जेएमएम को बहुत अधिक नुक़सान होता नहीं दिख रहा है. हेमंत सोरेन आदिवासी मतदाताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ने में कामयाब रहे हैं."
झारखंड में 81 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 28 सीटें आदिवासियों के लिए सुरक्षित हैं. पिछले चुनाव में इन 28 में से 26 सीटों पर जेएमएम और कांग्रेस के गठबंधन ने जीत हासिल की थी.
चंपाई सोरेन का आठ विधानसभा सीटों वाले इस इलाक़े पर गहरा प्रभाव रहा है. ये माना जा रहा है कि चंपाई सोरेन कोल्हान और उसके आसपास की सीटों को प्रभावित कर पाएंगे.
चंपाई सोरेन के आने से बीजेपी की अंदरूनी राजनीति भी प्रभावित हो सकती है. बीजेपी से जुड़े लोग जहाँ अभी इस सवाल से बच रहे हैं, वहीं विश्लेषक मान रहे हैं कि चंपाई सोरेन के आने से बीजेपी में भी मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार हो जाएंगे.
सुधीर पाल कहते हैं, "चंपई दा के आने से बीजेपी में मुख्यमंत्री के दावेदार हो जाएंगे जबकि पहले से कई दावेदार हैं. राज्य में बीजेपी के कई नेता उनकी मौजूदगी से असहज हो सकते हैं."
चंपाई को क्या मिलेगा

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हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि चंपाई बीजेपी में जाएंगे ही लेकिन इसके संकेत ज़रूर मिल रहे हैं.
सवाल ये है बीजेपी में जाते हैं तो चंपाई को क्या मिलेगा. विश्लेषक मान रहे हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी बनाया जा सकता है.
सुधीर पाल कहते हैं, "चंपाई सोरेन बीजेपी में जा रहे हैं या नहीं ये एक दो दिन में यह साफ़ हो जाएगा. उनके और बीजेपी के बीच क्या डील होती है, वो महत्वपूर्ण है. हो सकता है उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में लाया जाए या उन्हें किसी राज्य के गवर्नर पद का प्रस्ताव भी दिया जा सकता है. उनके बेटे को टिकट भी दिया जा सकता है. अभी ये संकेत मिल रहे हैं कि चंपाई और बीजेपी के बीच ऐसा ही कोई समझौता हुआ होगा."
चंपाई सोरेन ने अपने बयान में कहा है कि जब उनसे सीएम पद से हटने के लिए कहा गया तो वो ज़हर का घूंट पीकर रह गए.
सुधीर पाल कहते हैं, "निश्चित तौर पर उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंची. हालांकि राजनीति में नेताओं की अंतरआत्मा को ठेस तब पहुँचती है, जब कुछ विकल्प खुल जाते हैं. चंपाई के लिए विकल्प खुले तब ही उन्होंने इस तरह का बयान दिया है."
संथाल जनजाति के बड़े नेता

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चंपाई सोरेन झारखंड में राजनीतिक रूप से असरदार संथाल जनजाति के बड़े नेता हैं.
विश्लेषक मान रहे हैं कि बीजेपी चंपई के ज़रिए आदिवासियों में पकड़ मज़बूत करना चाहती है.
सुधीर पाल कहते हैं, "संथाल जनजाति का कोई बड़ा लीडर बीजेपी के पास नहीं था. इनके जाने से संथाल नेता लोबिन हेम्ब्रम भी इनके साथ जाएंगे. ऐसे में दो बड़े नेता बीजेपी के पास होंगे."
वे कहते हैं, "बीजेपी को लग रहा होगा कि संथाल राज्य की राजनीती में काफ़ी प्रभावी हैं और आदिवासी रिज़र्व सीटों में 10 से 12 सीटों पर संथाल समुदाय के आदिवासी विधायक ही रहते हैं. जेएमएम का स्टेक सबसे बड़ा संथालों के बीच ही हैं."
सुधीर पाल कहते हैं, “बीजेपी के पास बाबूलाल मरांडी ज़रूर हैं लेकिन आज की तारीख़ में वो ना तो आदिवासी और ना ही ग़ैर आदिवासी इलाक़ों में प्रभावी हैं. लोगों को लग रहा होगा कि चंपाई के आने से ज़मीन थोड़ी मज़बूत हो जाए."
जेएमएम छोड़कर जाने वालों क्या हुआ

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कई नेताओं ने झारखंड मुक्ति मोर्चा से अलग रास्ता अपनाया लेकिन कोई भी बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर सका.
जेएमएम विधायक सुदिव्य सोनू सवाल करते हैं, "जितने भी नेता हमारी पार्टी छोड़कर गए, क्या उनमें से कोई भी अपनी अलग जगह बना पाया?"
वहीं सुधीर पाल कहते हैं, "जितने लोग जेएमएम छोडकर गए हैं, उनका भविष्य बहुत अच्छा नहीं रहा है. जैसे हेमलाल मुर्मू को देखिए या सीता सोरेन को देखिए, या जेपी पटेल एक समय जेएमएम में थे, वे बीजेपी में गए फिर कांग्रेस में आ गए. सूरज मंडल जेएमएम छोड़कर गए, उनकी हालात ख़राब है."
हालांकि, अर्जुन मुंडा इसमें अपवाद हैं. जेएमएम छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए मुंडा झारखंड के मुख्यमंत्री बने. अर्जुन मुंडा मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे लेकिन इस बार चुनाव हार गए थे.
सवाल ये भी है कि क्या कुछ और विधायक भी चंपाई सोरेन के साथ जा सकते हैं. जेएमएम भले ही ऐसे दावों को ख़ारिज कर रही हो लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि कुछ विधायक तो ज़रूर उनके साथ होंगे.
सुधीर पाल कहते हैं, "चंपाई सोरेन के बाद कई और विधायक जाएंगे. जेएमएम में वन मैन शो है. कहा ये जाता है कि जब तक हेमंत के आसपास रहने वाले लोग इजाजत ना दें तो विधायक भी उनसे नहीं मिल पाते हैं. ये विचित्र स्थिति बनी हुई है कि सीएम से उन्हीं की पार्टी के विधायकों को मिलने के लिए भागदौड़ करनी पड़ती है."
क्या अलग पार्टी भी बना सकते हैं चंपाई सोरेन?

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चंपाई सोरेन ने जिन तीन विकल्पों की बात की है, उनमें से एक अपना अलग नया दल बनाना भी है.
रांची के स्थानीय पत्रकार आनंद दत्त मानते हैं कि चंपाई सोरेन अपनी अलग पार्टी भी बना सकते हैं.
आनंद कहते हैं, "ऐसा भी संभव है कि चंपाई बीजेपी में शामिल ना हों बल्कि अपनी अलग पार्टी खड़ी करके चुनाव के मैदान में आएं. लेकिन ये सवाल रहेगा कि पार्टी चलाने के लिए उनके पास फंड कहां से आएगा."
ये भी माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी उन्हें अपनी अलग पार्टी खड़ी करने में मदद कर सकती है क्योंकि चंपाई के मैदान में उतरने से बीजेपी को फ़ायदा पहुँचने की संभावना है.
आनंद दत्त कहते हैं, "चंपाई सोरेन अगर अपनी पार्टी बनाते हैं और बीजेपी के साथ चुनाव लड़ते हैं तो इसका थोड़ा बहुत फ़ायदा बीजेपी को हो सकता है. अगर ऐसा होता है, चंपाई एसटी आरक्षित सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे, भले ही वो उम्मीदवार जीते या न जीते, लेकिन उन सीटों पर जेएमएम को एसटी वोट का नुकसान ज़रूर होगा. चार से पांच सीट भी अगर जेएमएम के हाथ से निकलती है, तो यही स्थिति बीजेपी के लिए मुफ़ीद होगी."
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