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ताइवान चुनाव पर चीन और अमेरिका के साथ क्यों है बाकी दुनिया की नज़र
ताइवान में 13 जनवरी को आम चुनाव होंगे जिसमें नए राष्ट्रपति और नई संसद, (लेजिस्लेटिव युआन) का चुनाव होगा.
चीन और अमेरिका की इस चुनाव पर क़रीबी नज़र है क्योंकि दोनों के लिए यह स्वशासित द्वीप रणनीतिक रूप से अहम है.
आम चुनाव के नतीजे इस द्वीप के साथ चीन के रिश्ते की प्रकृति पर असर डालेंगे. ये इस क्षेत्र में तनाव को बढ़ा सकते हैं और इसका दुनिया अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है.
मौजूदा राष्ट्रपति साई इंग-वेन संवैधानिक रूप से तय सीमा के कारण अपने दो कार्यकाल पूरा करने के बाद पद से हटने वाली हैं. उनकी पार्टी डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) को चीन अलगाववादी मानता है.
हालांकि डीपीपी नीत गठबंधन 113 सदस्यीय उस लेजिस्लेटिव युआन में बहुमत पाने की उम्मीद कर रहा है, जिसके पास क़ानून बनाने, बजट मंजूर करने, जंग का एलान करने और राज्य के अन्य मुद्दों को हल करने का आधिकार है.
चुनाव मैदान में मौजूद उम्मीदवारों पर एक नज़र-
लाई चिंग-ते, डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी)
लाई एक डॉक्टर हैं. वो ताइवान के लगभग हर शीर्ष राजनीतिक पद पर रह चुके हैं. 2020 से वो उप राष्ट्रपति हैं.
वो पैन-ग्रीन गठबंधन के नेता हैं और आम तौर पर ताइवान पहचान के समर्थक हैं और चीन के साथ एकीकरण के मुखर विरोधी हैं.
वो चीन की बजाय अमेरिका से करीबी बढ़ाने के पक्षधर हैं.
चीन उन्हें कट्टर "अलगाववादी" और "साई से भी ज़्यादा ख़राब" मानता है.
लेकिन जैसे जैसे चुनाव क़रीब आ रहा है, वो साई की बात को ही दुहरा रहे हैं, "ताइवान पहले ही स्वतंत्र है, उसे और कोई एलान करने की ज़रूत नहीं. "
हू यू-यी कोमिंतांग (केएमटी)
हू एक पूर्व पुलिसकर्मी हैं. 2002 में न्यू ताइपे सिटी (राजधानी का बाहरी इलाक़ा) के मेयर के चुनाव में उन्होंने आसान जीत हासिल की थी. उनकी छवि उदारवादी और क्षमतावान नेता की है.
वो पैन-ब्लू गठबंधन के नेता हैं, जो चीन के साथ मज़बूत संबंध और यहां तक कि एकीकरण की वकालत करता है.
हाल ही में उन्होंने कहा था कि वो यथास्थिति को तवज्जो देंगे, जिसका मतलब हुआ कि न तो आज़ादी की घोषणा करेंगे और न ही चीन के साथ एकीकरण की बात करेंगे.
को वेन-जे, ताइवान पीपुल्स पार्टी (टीपीपी)
साल 2014 में ताइवान की राजधानी ताइपे के मेयर पद के चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खड़े होने से पहले को वेन जे एक सर्जन थे.
उन्होंने 2019 में ताइवान पीपुल्स पार्टी का गठन किया और डीपीपी और केएमटी से असंतुष्ट वोटरों के लिए तीसरी आवाज़ के रूप में पेश किया.
ताइवान और चीन के संबंधों को लेकर टीपीपी का पक्ष स्पष्ट नहीं है.
संयुक्त उम्मीदवार उतारने को लेकर केएमटी और टीपीपी के बीच बातचीत बीते नवंबर में विफल हो गई थी.
ताइवान के लोग क्या चाहते हैं?
शोध अध्ययनों से पता चलता है कि चीन और ताइवान के बीच तनाव के बावजूद ताइवान की अधिकांश जनता आर्थिक विकास को सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा मानती है.
आधिकारिक नेशनल साइंस एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल ने 2023 में किए गए एक अध्ययन में पाया कि 34.2% लोग अर्थव्यवस्था को सबसे अहम मुद्दा मानते हैं और चाहते हैं कि अगले राष्ट्रपति इस मुद्दे को सबसे पहले हल करें.
चीन और ताइवान के रिश्ते के मुद्दे को बहुत कम 18.1% लोगों ने तवज्जो दी.
ताइवान के लोग, ख़ासकर नौजवान और श्रमिक वर्ग कम मज़दूरी, महंगे होते रहन सहन और आसमान छूती आवास की महंगाई को लेकर भारी निराश हैं.
साल 2015 के चुनावी अभियान के दौरान साई इंग-वेन ने "युवा पीढ़ी के लिए एक बेहतर देश" बनाने का वादा किया था, लेकिन अधिकांश मतदाताओं को लगता है कि वे वादे पर खरी नहीं उतरीं.
2022 के स्थानीय चुनावों में डीपीपी का बहुत ख़राब प्रदर्शन रहा था, जिसके बाद साई ने पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ दिया.
कई लोगों ने डीपीपी के कमज़ोर प्रदर्शन के लिए लोगों की ज़िंदगी में सुधार न होने को ज़िम्मेदार बताया.
इस द्वीप पर लगातार छह महीने रहने वाले 20 साल या इससे अधिक उम्र के ताइवानी नागरिक को वोट देने का अधिकार मिल जाता है.
यहां कुल एक करोड़ 90 लाख मतदाता हैं. पिछले चुनाव में 75% मतदान हुआ था.
चीन और अमेरिका क्या चाहते हैं
ताइवान द्वीप दक्षिण पूर्वी चीन के तट से 161 किलोमीटर दूर है.
1949 में गृह युद्ध के दौरान जब चीन में राष्ट्रवादी पार्टी कोमिंतांग (केएमटी) चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से हार गई तो पीछे हटकर ताइवान द्वीप पर शरण ली और यहां सरकार का गठन किया. तबसे ही यह द्वीप स्व-शासित है.
दशकों बाद ताइवान ने अधिनायकवाद से हटकर नए संविधान के साथ लोकतंत्र को अपनाया.
आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस द्वीप को चीनी मेनलैंड से अलग मानता है.
लेकिन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी, ताइवान पर नियंत्रण को राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला मानती है.
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कई बार कहा है कि "एकीकरण" होकर रहेगा और इसके लिए ताक़त के इस्तेमाल की संभावना से इनकार नहीं किया.
अमेरिका ने खुद को लगातार इस तरह पेश किया कि वो इस तरह की किसी सैन्य कार्रवाई को रोकने के लिए तैयार बैठा है.
ताइवान उन द्वीपीय देशों की शृंखला का पहला द्वीप है जिसमें जापान, दक्षिण कोरिया और फिलीपींस जैसे अमेरिका के सहयोगी देश हैं और इसीलिए यह अमेरिकी विदेश नीति के लिए अहम है.
कुछ पश्चिमी एक्सपर्ट की राय है कि अगर चीन ताइवान पर कब्ज़ा करता है तो पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में वो अपनी ताक़त आजमाने के लिए आज़ाद हो सकता है और गुआम और हवाई जैसे सुदूर अमेरिकी सैन्य ठिकानों के लिए ख़तरा पैदा कर सकता है.
लेकिन चीन का कहना है कि उसकी मंशा पूरी तरह शांतिपूर्ण है.
ताज़ा ओपिनयन पोल्स के अनुसार, डीपीपी उम्मीदवार लाई चींग-ते केएमटी के हू यू से थोड़ा ही आगे हैं और टीपीपी के को वेन-जे तीसरे नंबर पर बहुत पीछे हैं.
चीन लगातार दबाव बढ़ा रहा है. पिछले साल उसने ताइवान की ओर अपने युद्ध पोत और लड़ाकू विमानों को लगभग हर रोज़ भेजा और कई बार मीडिया लाइन को पार किया जोकि दोनों के बीच सीमा है.
ताइवान की सैन्य ताक़त
चीन की बहुत सारी सैन्य ताक़त अन्य जगहों पर लगी हुई है, लेकिन सक्रिय सैनिकों के लिहाज से दोनों के बीच बहुत बड़ी खाई है और किसी भी सैन्य टकराव में चीन की सेना ताइवान को धूल चटा सकती है.
लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि ताइवान की तैयारी नहीं है या वो अकेला है.
1979 में अमेरिका ने ताइवान से हटकर चीन को राजनयिक मान्यता भले दे दी थी, लेकिन उसने ताइवान रिलेशन एक्ट की शर्तों के तहत उसे हथियार बेचना जारी रखा.
जुलाई 2023 में अमेरिका ने ताइवान को हथियार की मदद देने के लिए 34.5 करोड़ डॉलर के पैकेज की घोषणा की.
साल समाप्त होने के ठीक पहले अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने ताइवान के टैक्टिकल इन्फ़ॉर्मेशन सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए 30 करोड़ डॉलर के उपकरण की बिक्री को मंज़ूरी दी.
मई 2022 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से पूछा गया था कि क्या अमेरिका ताइवान की सैन्य रक्षा कर पाएगा, उनका जवाब था, "हां".
बाद में व्हाइट हाउस ने सफ़ाई दी कि 'वन चाइना पॉलिसी' को लेकर वॉशिंगटन की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है.
हालांकि अमेरिका के बाद दुनिया में सेना पर सबसे अधिक खर्च चीन करता है और उसके पास कई तरह की क्षमताएं हैं, नेवी से लेकर मिसाइल टेक्नोलॉजी तक, लड़ाकू विमानों से लेकर साइबर हमले तक.
दुनिया के लिए ताइवान क्यों अहम है?
संयुक्त राष्ट्र ताइवान को अलग देश की मान्यता नहीं देता है और दुनिया में इस तरह के केवल 12 देश हैं (मुख्य तौर पर दक्षिणी अमेरिका, कैरिबियन और ओशिनिया में).
दुनिया में हर रोज़ इस्तेमाल किए जाने वाले इलेक्ट्रोनिक उपकरण, चाहे फ़ोन हो, लैपटॉप हो, घड़ियां हों या गेम्स कंसोल, इन सबमें ताइवान निर्मित कम्प्यूटर चिप लगी होती है.
उदाहरण के लिए ताइवान की एक अकेली कंपनी- ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफ़ैक्चरिंग कंपनी या टीएसएमसी की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आधे की हिस्सेदारी है.
टीएसएमसी कथित रूप से फ़ाउंड्री है- एक ऐसी कंपनी जो ग्राहकों और सैन्य क्रेताओं की ओर से डिज़ाइन किए हुए चिप बनाती है. यह एक विशाल उद्योग है, जिसका मूल्य 2021 में 100 अरब डॉलर के करीब था.
वॉशिंगटन ने हाल के सालों में इस टेक्नोलॉजी तक चीन की पहुंच को रोकने के लिए चीन पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए ताकि वो इस क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगियों, जिसमें ताइवान भी शामिल है, की बराबरी न कर पाए.
अगर चीन ताइवान को अधिग्रहित कर लेता है तो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण उद्योग पर चीन का पुख़्ता नियंत्रण हो जाएगा.
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