इसराइल-हमास जंग के बीच लेबनान में क्या हो रहा है?

- Author, नफ़ीसेह कोहनावर्ड
- पदनाम, मध्य पूर्व संवाददाता, बीबीसी फारसी सेवा, दक्षिणी लेबनान से
“जैसे ही अलार्म की आवाज़ सुनाई दे, आपको अपने नजदीकी बंकर की ओर दौड़ना चाहिए.”
हमारे कैंप शमरॉक पहुंचते ही वहां मौजूद कैप्टन ऑढन मेक गिनीज़ ने हमारा स्वागत इस हिदायत के साथ किया.
कैप्टन मेक गिनीज़ उस आयरिश सैन्य टुकड़ी के टैक्टिकल ऑपरेशंस डायरेक्टर हैं जो इसराइल-लेबनान सीमा के पास संयुक्त राष्ट्र की पीस-कीपिंग फोर्स का बेस संचालित कर रही है.
हमारे सिर के ऊपर हमें इसराइली ड्रोनों की आवाज़ें सुनाई दे रही हैं. ये आवाज़ें बाल सुखाने वाले हेयर ड्रेसर या इलेक्ट्रिक रेज़र से ज़्यादा अलग नहीं हैं. दक्षिणी लेबनान के कस्बों और गाँवों के आसमान में इन्हें लगभग हर वक़्त देखा जा सकता है.
जब ये सेफ़्टी ब्रीफिंग चल रही थी, तभी हमें कुछ दूरी पर धमाके की आवाज़ सुनाई दी.
इस आवाज़ के साथ ही कैप्टन मेक गिनीज़ कहते हैं, ‘चलिए, आज की शुरुआत हो गयी.”
इस धमाके की आवाज़ इसराइल और हमास के बीच संघर्ष शुरू होने के बाद इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव का ही एक संकेत है.
संयुक्त राष्ट्र के पीसकीपिंग मिशन को यूनिफिल कहा जाता है. इसका काम ब्लू लाइन यानी लेबनान और इसराइल के बीच स्थित अनौपचारिक सीमा की मॉनिटरिंग करना है.
इस क्षेत्र में पिछले चार दशकों में लेबनानी शिया मुस्लिम चरमपंथी गुट हिज़बुल्लाह और इसराइली सेना के बीच रह-रहकर संघर्ष होते देखे गये हैं.
हिज़बुल्लाह को जहां ब्रिटेन और अमेरिका समेत दूसरे देशों की ओर से आतंकी संगठन का दर्जा दिया गया है. वहीं, लेबनान में हिज़बुल्लाह एक मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी है.
यह एक ऐसे राजनीतिक समूह का नेतृत्व कर रहा है जो पिछले साल हुए चुनाव के दौरान बहुमत पाते-पाते रह गया था.
कैसी है इसराइली तैयारी
बॉडी आर्मर और हेलमेट पहनकर हम आधुनिक हथियारों से लैस पीसकीपर्स यानी शांति सुनिश्चित करने के लिए तैनात सैनिकों के दल में शामिल हुए.
इन सैन्य दस्ते के बख़्तरबंद वाहन पर सवार होकर हम ब्लू लाइन से 500 मीटर दूर स्थित एक अन्य सैन्य अड्डे पर गए जिसमें हमें 20 मिनट का वक़्त लगा.
सीमा पर स्पष्ट रूप से नज़र आ रहे इसराइली सैन्य साजो-सामान को देखते हुए इस आउटपोस्ट के कमांडर लेफ़्टिनेंट डिलेन काडोगान कहते हैं कि उन्हें धमाकों के दौरान अक्सर बंकर में शरण लेनी होती है. और कभी-कभी घंटों तक छिपकर रहना होता है.
वह कहते हैं, “हमने घरों को तबाह होते देखा है और दोनों पक्षों के बीच हुई गोलीबारी में आम लोगों को फंसते देखा है जिन्हें हमारी मदद चाहिए थी.”
तटस्थता बनाए रखने की मजबूरी

बेस के वॉचटॉवर से वह एक गुलाबी रंग के घर की ओर से इशारा करते हुए कहते हैं, “वहां उस इमारत में एक माँ और बच्चा था.
वे हमसे सिर्फ 200 मीटर दूर थे. उनके घर पर बमबारी हुई तो उन्हें भागकर हमारे यहां शरण लेनी पड़ी. इसके बाद हमने उन्हें उनके इलाज में मदद करने के साथ ही सुरक्षा उपलब्ध कराई.”
यूनिफिल ने इस जंग के दौरान मारे गए लोगों के शव बरामद किए हैं लेकिन वह अपने मिशन की संवेदनशीलता और तटस्थ बने रहने की शर्त की वजह से ये नहीं बता सकती कि मरने वालों में हिज़बुल्लाह के लड़ाके कितने थे.
लेफ़्टीनेंट काडोगान कहते हैं, “इन मामलों पर बयान देना हमारा काम नहीं है. हमें सिर्फ नज़र रखते हुए अपने मुख्यालय को इस सबके बारे में सूचना देनी है.”
हमास की ओर से सात अक्टूबर को किए गए अभूतपूर्व हमले के बाद इसराइल ने ग़ज़ा पर बमबारी शुरू की थी. इसके बाद से ही हिज़बुल्लाह ने लगभग नियमित रूप से दक्षिणी लेबनान से रॉकेट और ड्रोन हमले किए हैं. कभी इन हमलों से सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जाता है. और कभी ये हमले बेतरतीबी से उत्तरी इसराइल में किए जाते हैं.
इसराइली सेना ने इसके जवाब में आर्टिलरी गोलाबारी के साथ-साथ तेज हवाई हमले किए हैं. इस लड़ाई की वजह से सीमा पर लेबनानी क्षेत्र में रहने वाले 60,000 लोग विस्थापित किए गए हैं.
मॉनिटरिंग समूह कहते हैं कि हमास के हमले के बाद पहले हफ़्ते में ब्लू लाइन पर लगभग 70 घटनाओं को दर्ज किया गया था. और नवंबर तक ये संख्या बढ़कर हर हफ़्ते 250 हमलों तक पहुंच गयी.
इस क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की पीस कीपिंग फोर्स साल 1978 में तैनात की गई थी. इसकी वजह इसराइल की ओर से लेबनानी सीमा से पीएलओ के हमले के बाद आक्रमण किया जाना था.
इसके बाद से अब तक 48 आयरिश सैनिक मारे जा चुके हैं. ऐसे में यहां काम करने वाले सैनिकों के परिवारों में ज़हन में ये बात भी है.
लेबनानी कस्बों में कैसा है हाल

कैप्टन टोनी स्मिथ की उम्र 27 साल है और वह अपने दूसरी तैनाती पर हैं. वह दक्षिण पूर्वी आयरलैंड में रहने वाले अपने परिवार को रोज़ ही आश्वस्त करते हैं.
वह कहते हैं, “मेरी माँ चाहती हैं कि मैं घर चला जाऊं और मैं घर जाऊंगा भी. लेकिन वह जानती हैं कि हम यहां क्यों हैं और वह इस बात का समर्थन करती हैं.”
जब हम नजदीकी कस्बे तिबनाइन की ओर बढ़ते हैं तो हिज़बुल्लाह नेता शेख़ हसन नसरल्लाह के साथ-साथ मारे गए हिज़बुल्लाह लड़ाकों के पोस्टर नज़र आते है.
ये जगह ब्लू लाइन से मात्र दस किलोमीटर दूर स्थित है. और पिछले संघर्षों में बुरी तरह तबाह हो गयी है.
दक्षिणी लेबनान के दूसरे तमाम कस्बों और गाँवों की तरह हिज़बुल्लाह यहां भी काफ़ी प्रभावशाली है और सुरक्षा व्यवस्था संभालता है.

यहां हमारी मुलाक़ात एक 57 वर्षीय स्थानीय नागरिक अली साद से हुए जिन्होंने हमें बताया कि वह आयरिश यूनिफिल सैनिकों को देखते हुए बड़े हुए हैं.
एक ख़ास आयरिश एक्सेंट में बात करते हुए वह कहते हैं कि एक पीसकीपर ने उन्हें बचपन में अंग्रेजी सिखाई थी.
यह सैनिक उस परिवार से जुड़ा था जिसकी तीन पीढ़ियों ने यूनिफिल में काम किया था. इस सैनिक के पिता ने यहां कई दशक पहले काम किया था. और अब उनका बेटा लेबनान में तैनात है.
अली अपनी जान बचाने का श्रेय आयरिश सैनिकों को देते हुए एक याद साझा करते हुए कहते हैं जब एक रोज़ बमबारी के दौरान आयरिश सैनिकों ने उन्हें बंकर में पनाह दी थी.
इसके बाद अली ने यूनिफिल के लिए एक अनुवादक के रूप में काम किया. और आयरिश सैनिकों का एक गुट बसिमा नामक महिला के साथ उनकी शादी में भी शामिल हुआ जो पीसकीपिंग फोर्स को लैंग्वेज़ सेवाएं देती हैं.

इमेज स्रोत, Saad family
अली एक तरफ़ तो इस सैन्य टुकड़ी की मौजूदगी को अहमियत देते हैं. लेकिन वह इस बात से दुखी हैं कि वह जिस संघर्ष पर नज़र रखने के लिए यहां तैनात हैं, वह इतना लंबा खिंच गया है.
वह कहते हैं, “सच कहूं तो हमें कभी नहीं लगता था कि ये सब कुछ 44 साल तक चलता रहेगा.”
बसिमा के लिए इस मौजूदा संघर्ष ने पिछले संघर्षों की दुखभरी यादों को ताज़ा कर दिया है. इनमें साल 2006 का इसराइल हिज़बुल्लाह युद्ध शामिल है.
वह कहती हैं, “मैं अपने छोटे बेटे को एक खाली वॉशिंग मशीन में बिठा रही थी क्योंकि मुझे लगा कि शायद वह उसे बचा लेगा. और अब हमें इन धमाकों की आवाज़ सुनाई देती रहती है. मैं ये सब बर्दाश्त नहीं कर सकती.”
वह मानती हैं कि इस संघर्ष के बीच बड़े होने ने उनके बेटे को काफ़ी प्रभावित किया है. उनका बेटा अब 23 साल का हो गया है. लेकिन अब भी जब यूनिफिल का हेलिकॉप्टर हमारे ऊपर से निकलता है तो वह परेशान हो जाता है.
वह कहती हैं, “हम वापस वहां नहीं जा सकते थे जहां हम थे. हम अपनी ज़िंदगी एक संघर्ष से दूसरे संघर्ष में ख़राब कर रहे हैं. मैं एक और जंग नहीं झेल सकती.”
संघर्ष के बढ़ने की आशंका

वहीं, यूनिफिल के बेस कैंप पर मौजूद लेफ़्टिनेंट कर्नल काथल केओहाने इस क्षेत्र में बढ़ती हुई हिंसा को लेकर चिंतित हैं.
वह कहते हैं, “हमने हिंसा में बढ़त और लेबनान के अंदर भी हमले दर्ज किए हैं. हम देख रहे हैं कि कई तरह के हथियार इस्तेमाल किए जा रहे हैं.”
ये कहते हुए वह चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है.
वह कहते हैं, “चाहें ये एक ओर से शुरू हो या कुछ परिस्थितियां व्यापक युद्ध शुरू कर दें, ये हमारे लिए गंभीर चिंता का विषय है.”
वह उम्मीद करते हैं कि ग़ज़ा में संघर्ष विराम ब्लू लाइन पर भी तनाव कम करने में मददगार साबित होगा.
लेकिन वह कहते हैं कि दोनों ओर से जारी गोलीबारी बंद होने के बाद भी विस्थापित लोगों के अपने घर वापस आने में वक़्त लगेगा.
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