डोनाल्ड ट्रंप को सत्ता के शिखर तक पहुंचने में मदद करने वाले वकील रॉय कोहन की कहानी

डोनाल्ड ट्रंप और रॉय कोहन

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    • Author, कैरिन जेम्स
    • पदनाम, फ़िल्म संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

बीते साल कान फ़िल्म फे़स्टिवल की प्रतियोगिता में सबसे चर्चित रहने वाली फ़िल्म 'द अप्रेन्टिस' का नाम अमेरिका के एक पुराने रियलिटी शो पर आधारित है. 'द अप्रेन्टिस' नाम के रियलिटी शो को इसलिए जाना जाता है क्योंकि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसमें अभिनय किया था.

इस फ़िल्म में अप्रेन्टिस की भूमिका में ट्रंप (सेबास्टियल स्टैन) खुद हैं जो सत्ता के गलियारों में ताक़त का खेल देखते हुए कठोर हुए एक युवा बिज़नेसमैन हैं. ये अप्रेन्टिस रॉय कोहन (ये भूमिका जेरेमी स्ट्रॉन्ग ने निभाई है) नाम के एक ऐसे वकील से बहुत प्रभावित था जो जीत के लिए किसी भी हद तक जा सकता है.

आज कोहन को ट्रंप को दी उनकी सीख के लिए जाना जाता है लेकिन इससे पहले से ये नाम अमेरिकी राजनीति और संस्कृति में बड़ा और बेहद प्रभावशाली माना जाता रहा था.

कोहन एक समलैंगिक व्यक्ति थे जो 1950 के दशक 'लैवेन्डर स्केयर' के दौरान दूसरे समलैंगिकों के सरकारी नौकरियों से निकाले जाने का कारण बने थे. अपनी पूरी ज़िंदगी में उन्होंने कई लोगों को डराया.

1950 के दशक में अमेरिका मे सोच फैलने लगी कि कम्युनिस्ट और समलैंगिकों में मानसिक समस्याएं होती हैं जिस कारण उनका व्यवहार अजीब हो जाता है. इस सोच के कारण वहां कम्युनिस्ट और समलैंगिकों को खोज-खोज कर परेशान किया जाने लगा. इस दौर को लैवेन्डर स्केयर कहते हैं.

रॉय कोहन और डोनाल्ड ट्रंप

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इमेज कैप्शन, 'द अप्रेन्टिस' फ़िल्म के एक दृश्य में रॉय कोहन और डोनाल्ड ट्रंप

1986 में एड्स के कारण रॉय कोहन की मौत हो गई. हालांकि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर हमेशा कहा कि उन्हें लीवर कैंसर है. सार्वजनिक समारोहों में वो अपने प्रेमियों को लेकर जाते थे, बावजूद इसके वो आख़िरी घड़ी तक इस बात से इनकार करते रहे कि वो समलैंगिक हैं.

बीते सालों में टोनी कुशनर के नाटक 'एंजल्स इन अमेरिका' और हाल में प्रसारित हुई मिनी सिरीज़ 'फेलो ट्रैवलर्स' में उन्हें एक गुस्सैल और डरावने व्यक्ति के तौर पर दिखाया गया है.

'द सिम्पसंस' में मिस्टर बर्न्स का बचाव करने वाले नीले बाल वाले अप्रिय और अनाम वकील का कैरेक्टर भी उन्हीं के चरित्र पर आधारित था.

एस्क्वायर पत्रिका ने एक जगह पर उल्लेख किया कि "20वीं सदी के दूसरे हिस्से में वो एक दुष्ट फॉरेस्ट गम्प की तरह तेज़ी से आगे बढ़ते गए."

रॉय कोहन और डोनाल्ड ट्रंप

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'फेलो ट्रैवलर्स' नाम के जिस मिनी सिरीज़ का उल्लेख किया गया है वो 2006 में इसी नाम से लिखी गई थॉमस मेलॉन नाम के एक उपन्यास पर आधारित है.

थॉमस मेलॉन ने बीबीसी को बताया, "आश्चर्य की बात ये है कि ट्रंप के कारण मौत के बाद भी कोहन को अब एक पिशाच का जीवन जीना पड़ेगा (20 साल पहले जब मैंने ये उपन्यास लिखना शुरू किया था उस वक्त मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था)."

वो कहते हैं कि मरने के बाद भी कोहन जैसे बार-बार वापिस लौट रहे हैं. वो कहते हैं, "यह ध्यान में रखते हुए कि उन्होंने ट्रंप की सोच और उनके व्यवहार को निजी तौर पर प्रभावित किया, आपको अहसास होता है कि देश पर क़रीब 70 सालों तक- भले ही टुकड़ों में- कोहन का प्रभाव रहा."

लेकिन कई तरीकों से कोहन प्रतिभाशाली थे. 1951 में जब वो डिप्टी अभियोजक बने उनकी उम्र मात्र 20 साल थी. जूलियस और एथेल रोज़नबर्ग जिन पर सोवियत रूस के लिए जासूसी करने का आरोप था, उनको दोषी साबित करने और मौत की सज़ा दिलाने में रॉय कोहन की भूमिका थी. उन्होंने माना था कि इस मामले में मौत की सज़ा के लिए उन्होंने जज के साथ अवैध बातचीत का इस्तेमाल किया था.

सीनेटर जोसेफ़ मैक्कार्थी के साथ रॉय कोहन

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इसके तुरंत बाद वो सीनेटर जोसेफ़ मैक्कार्थी के नेतृत्व वाली उस कमिटी के वरिष्ठ सलाहकार बने जिसने सरकारी पदों से संदिग्ध कम्युनिस्टों को खोजने और उन्हें निकालने का काम किया.

1970 और 80 के दशक के दौरान वो न्यूयॉर्क के जानेमाने स्टूडियो 54 नाम के नाइटक्लब में पार्टी किया करते थे. उनके साथ दिखने वालों में बारबरा वाल्टर्स, एंडी वॉरहोल और रोनाल्ड और नैन्सी रीगन जैसे प्रभावशाली लोग शामिल थे.

एक वकील के तौर पर उन्होंने माफ़िया के सरगनाओं से लेकर ट्रंप तक का प्रतिनिधित्व किया. हालांकि मौत से कुछ वक्त पहले अपने कुछ क्लाइंट्स को धोखा देने और इसके अलावा कई और अपराधों के लिए उन्हें मुकदमा लड़ने पर रोक लगा दी गई थी.

उन्हें उनकी एक आदत के लिए जाना जाता है उन्हे दूसरों की थाली से खाना चुराने की आदत थी, भले ही वो कितने ही बड़े रेस्तरां में क्यों न हों. (इसे आत्मप्रेम कहें या बुरी आदत या फिर दोनों ही)

रॉय कोहन और डोनाल्ड ट्रंप

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डोनाल्ड जे ट्रंप

1970 के दशक में ट्रंप के साथ उनकी साझेदारी बढ़ने लगी. उस वक्त अमेरिकी सरकार ने ट्रंप और उनके पिता पर काले किराएदारों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया था. ये किराएदार जिस इमारत में रहते थे उसक प्रबंधन ट्रंप और उनके पिता करते थे.

इस मामले में कोहन ने ट्रंप से कहा कि वो न्याय विभाग पर काउन्टरकेस करें.

ये मामला एक समझौते के साथ सुलझाया गया. लेकिन इस मुक़दमेबाज़ी से एक पैटर्न शुरू हुआ जिसने व्यापार में और बाद में राजनीति में ट्रंप के करियर को परिभाषित करने में मदद की.

2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के अभियान के दौरान वॉशिंगटन पोस्ट में कोहन के प्रभाव को लेकर एक लेख छपा था. इसका शीर्षक था "वह व्यक्ति जिसने डोनाल्ड ट्रंपप को ताकत का इस्तेमाल करना और डर पैदा करना सिखाया."

इस लेख के अनुसार वकील कोहन ने ट्रंप को जो सीख दी थी उसका सार कुछ ऐसे लिखा, "आसान फॉर्मूला है, हमला करो, पलटकर हमला करो और कभी माफ़ी मत मांगो."

अपने हिसाब से मीडिया का इस्तेमाल करने में कोहन माहिर थे.

डॉक्यूमेन्ट्री फ़िल्म 'व्हेयर इज़ माई रॉय कोहन?'

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2019 में आई एक डॉक्युमेन्ट्री फ़िल्म 'व्हेयर इज़ माई रॉय कोहन?' (कहां है मेरा रॉय कोहन) में उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण किया गया.

इस डॉक्युमेन्ट्री फ़िल्म का फोकस ट्रंप पर नहीं था लेकिन इस फ़िल्म का शार्षक ट्रंप के एक पॉपुलर कमेन्ट से लिया गया है. 2016 में जब पूर्व अटॉर्नी जनरल जेफ़ सेशंस ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में रूस के कथित हस्तक्षेप की जांच मामले से खुद को अलग कर लिया था (जेफ़ सेशंस के फ़ैसले को ट्रंप ने धोखेबाज़ कहा था) उस वक्त ट्रंप ने कथित तर पर गुस्से से कहा था, 'व्हेयर इज़ माई रॉय कोहन?'

इन दिनों ट्रंप का ये सवाल लेखों में बार-बार दोहराया जा रहा है. ट्रंप के ख़िलाफ़ न्यूयॉर्क में चल रहे मामले में, जिसमें ट्रंप को दोषी करार दिया गया है, उससे जुड़ी ख़बरों में ट्रंप की क़ानूनी टीम को लेकर लिखे जा रहे लेखों में बार-बार ये सवाल उठ रहा है.

इस डॉक्युमेन्ट्री फ़िल्म में 1950 और उसके बाद के दौर की कोहन की कई पुरानी तस्वीरें दिखाई गई हैं.

1970 के दशक में टेलीविज़न पर प्रसारित एक शो में रोंगटे खड़े कर देने वाली शांति के साथ कोहन कहते हैं कि उनके क्लाइंट्स "डर के मूल्य" की वजह से उनसे करार करते हैं क्योंकि उनके विरोधियों को पता है कि उन्हें "सभी प्रकार के भयानक परिणाम" झेलने पड़ सकते हैं.

लोकप्रिय संस्कृति में

टोनी कुशनर के नाटक 'एंजल्स इन अमेरिका' का एक दृश्य

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1991 में टोनी कुशनर के नाटक 'एंजल्स इन अमेरिका' के रिलीज़ होने से पहले तक कोहन को लेकर चर्चा सार्वजनिक चेतना से लगभग ग़ायब हो चुकी थी. अपने नाटक में कुशनर ने कोहन को उनके जीवन के आख़िरी वक्त में दिखाया था.

कुशनर के नाटक पर बनी माइक निकोलस की मिनी सिरीज़ 'एंजल्स इन अमेरिका' में रॉय कोहन की भूमिका अल पचीनो ने दमदार निभाई थी. नाटक में एक कोहन अपने कहे झूठ के प्रति प्रतिबद्ध हैं लेकिन हताश भी दिखते हैं. वो बिस्तर पर पड़े एक मरीज़ हैं जो उनके एड्स संक्रमित होने की बात कहने वाले डॉक्टर पर चिल्लाते हैं. कोहन कहते अगर दोबारा डॉक्टर ने एड्स का नाम भी लिया तो "मैं उन्हें बर्बाद कर दूंगा."

यह वही कोहन थे जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस बात से इनकार किया कि वो समलैंगिक थे और पुरुषों से संबंध बनाने पसंद करते थे क्योंकि वो प्रभावशाली थे. उनका मानना था कि "समलैंगिक वो लेग हैं जिनका कोई प्रभाव नहीं होता."

रॉय कोहन की भूमिका में अल पचीनो

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कोहन के व्यक्तित्व और रणनीति के बारे ट्रम्प सहयोगियों का एक अलग नज़रिया है, हालांकि वो शायद ही कभी उनका नाम लेते हैं.

इनमें ट्रंप के पूर्व सलाहकार स्टीव बैनन एक अपवाद हैं. 2023 में निकोलस वॉन हॉफ़मैन की लिखी कोहन की जीवनी 'सिटिज़न कोहन' के पुन:प्रकाशन के वक्त उन्होंने इसकी प्रस्तावना लिखी थी. उन्होंने कोहन के बारे में लिखा कि वो "20वीं सदी की राजनीति में सबसे असाधारण, राक्षसी और ग़लत समझे जाने वाली शख्सियतों में से एक हैं."

इसके बाद वो ट्रंप पर लगे आरोपों का ज़िक्र करते हैं और कहते हैं जैसा कोहन ने किया होता "राष्ट्रपति लड़ रहे हैं." वो लिखते हैं, "क्या इसमें कोई आश्चर्य की बात है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने 'व्हेयर इज़ माई रॉय कोहन? सवाल किया."

ट्रंप के पूर्व सलाहकार स्टीव बैनन

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