कुणाल कामरा विवाद: नेताओं पर व्यंग्य करना या उनका मज़ाक़ उड़ाना क्या अपराध है?

एकनाथ शिंदे

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इमेज कैप्शन, एकनाथ शिंदे का कहना है कि वो व्यंग्य समझते हैं, लेकिन इसकी एक सीमा होनी चाहिए
    • Author, विनायक होगाडे
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता

कॉमेडियन कुणाल कामरा राजनेताओं का मज़ाक़ उड़ाने वाले वीडियो को लेकर इस समय सुर्ख़ियों में हैं.

पिछले दिनों 'नया भारत' नाम से यूट्यूब पर आया उनका शो काफ़ी वायरल हुआ. इस वीडियो में उन्होंने गाने, चुटकुलों और व्यंग्य के माध्यम से राजनेताओं पर चुटकी ली थी.

लेकिन महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को लेकर उनका गाना विवाद का विषय बन गया. शिंदे गुट के शिवसैनिकों ने इस पर हिंसक प्रतिक्रिया दी. जिस हैबिटेट कॉमेडी क्लब में ये वीडियो शूट हुआ था, वहाँ तोड़फोड़ की गई.

इस मामले में एक ओर कुछ लोगों ने कुणाल कामरा का पक्ष लिया तो कई अन्य लोगों ने उनके वीडियो को आपत्तिजनक कहा और शिवसैनिकों की हिंसा को 'क्रिया पर प्रतिक्रिया' कहा.

एकनाथ शिंदे ने क्या कहा

बीबीसी

उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने ख़ुद बीबीसी मराठी के कार्यक्रम 'राष्ट्र महाराष्ट्र' में इस पर प्रतिक्रिया दी थी.

उन्होंने कहा था, "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. हम व्यंग्य समझते हैं. लेकिन एक सीमा होनी चाहिए. यह किसी के ख़िलाफ़ बोलने की 'सुपारी' लेने जैसा है. इसी व्यक्ति (कुणाल कामरा) ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय, प्रधानमंत्री, अर्नब गोस्वामी और कुछ उद्योगपतियों पर टिप्पणी की थी. यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है. यह किसी के लिए काम करना है."

हालांकि एकनाथ शिंदे का कहना था कि वो तोड़फोड़ को सही नहीं मानते हैं. वहीं कुणाल कामरा ने बढ़ते विवाद पर कहा कि वो माफ़ी नहीं मांगेंगे.

कुणाल कामरा और एकनाथ शिंदे

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इमेज कैप्शन, एकनाथ शिंदे ने कुणाल कामरा विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक सीमा होनी चाहिए

क्या कॉमेडियन कुणाल कामरा ने अपनी हदें पार कर दीं? क्या उनका हास्य व्यंग्यात्मक नहीं बल्कि अपमानजनक है? क्या राजनीति पर मज़ाक़ करना, व्यंग्य करना या उपहास करना अपराध है?

ये और इसी तरह कुछ सवाल इस समय चर्चा का विषय बने हुए हैं.

हास्य, व्यंग्य या उपहास के माध्यम से समाज में ग़लत कार्यों और प्रवृत्तियों पर टिप्पणी करने की परंपरा नई नहीं है.

व्यंग्यकार कविता, व्यंग्य, कार्टून, मीम्स या स्टैंड-अप कॉमेडी जैसे माध्यमों से राजनीतिक घटनाओं पर टिप्पणी करते नज़र आते हैं.

हमने कुणाल कामरा मामले पर जाने-माने कार्टूनिस्ट मंजुल से बात की.

वो कहते हैं, "यह मेरे लिए चिंता का विषय है, एक कार्टूनिस्ट के तौर पर नहीं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर."

बीबीसी मराठी से बातचीत में उन्होंने जो कुछ हुआ उस पर गहरी चिंता व्यक्त की.

उन्होंने कहा, "वास्तव में, भले ही कुणाल कामरा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई हो, लेकिन सबसे ज़्यादा नुक़सान स्टूडियो मालिक को हुआ.''

'एक नागरिक के रूप में यह चिंता का विषय है'

कुणाल कामरा

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इमेज कैप्शन, कुणाल कामरा ने माफ़ी मांगने से इनकार कर दिया था

कार्टूनिस्ट आलोक भी स्टूडियो को तोड़ने की घटना की निंदा करते हैं.

वो कहते हैं, "आप कुछ कहते हैं और दूसरा व्यक्ति उस पर हिंसक प्रतिक्रिया करता है. यह बहुत गंभीर बात है. ये भी देखा गया कि जब स्टूडियो में तोड़फोड़ की जा रही थी, तो पुलिस वहीं मौजूद थी. यह ऐसी स्थिति है, जहाँ किसी बात का डर नहीं रह जाता. जब क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार पार्टी के लोग ही ऐसी हरकतें करते हैं, तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है."

हालांकि, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि मौजूदा अराजक स्थिति में कुणाल कामरा का हास्य भी अराजक है.

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अपनी बात के तर्क में उन्होंने प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण के एक कथन का ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, "आरके लक्ष्मण हमेशा कहते थे कि राजनीतिक व्यंग्य करते समय 'गरिमापूर्ण अनादर' होना चाहिए. 'अनादर' अवश्य होना चाहिए. हालाँकि, यह 'गरिमापूर्ण' होना चाहिए."

उनका कहना है कि उन्हें कुणाल कामरा के जोक्स पसंद नहीं हैं.

आलोक का कहना है कि एकनाथ शिंदे की आलोचना और राजनीतिक व्यंग्य करने के लिए कई बातें हैं. उनका तर्क है कि इसके लिए उन्हें 'रिक्शा चालक' कहने की कोई ज़रूरत नहीं है.

हालाँकि वो इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि कुणाल कामरा को हास्य और राजनीतिक व्यंग्य करने की स्वतंत्रता है और जो तोड़फोड़ हुई है, उसकी निंदा की जानी चाहिए.

'कुणाल कामरा का हास्य भी थोड़ा गुमराह करने वाला है'

कुणाल कामरा

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इमेज कैप्शन, कुणाल कामरा स्टैंड-अप कॉमेडी करते हैं

प्रसिद्ध मराठी आलोचक रामदास फुटाने का मानना ​​है कि कुणाल कामरा की राजनीतिक आलोचना नफ़रत से प्रेरित थी.

वो तोड़फोड़ को ग़लत बताते हुए व्यंग्यकार की भूमिका विस्तार से बताते हैं, "जिस व्यक्ति के बारे में आप लिख रहे हैं, उसके प्रति आपके दिल में नफ़रत नहीं होनी चाहिए. व्यंग्यकार को विसंगतियां ढूँढनी होती हैं. उसे सही विसंगति को पहचानने में सक्षम होना चाहिए. उसे व्यक्ति के बजाय व्यक्ति की प्रवृत्तियों को खोजने में सक्षम होना चाहिए और अगर उसे प्रवृत्तियों में विसंगतियाँ दिखती हैं, तो उसे उस प्रवृत्ति पर चुटकुले या व्यंग्यात्मक कविताएँ लिखने में सक्षम होना चाहिए."

वो आगे कहते हैं, "दूसरी बात यह है कि कुणाल कामरा ने जो कहा है, वह एकनाथ शिंदे के प्रति अत्यधिक घृणा और किसी के प्रचार के लिए कहा गया लगता है. व्यंग्य किसी राजनीतिक दल के प्रचार के लिए नहीं होना चाहिए."

"वर्तमान में 'व्यंग्य' ख़तरे में है"

आरके लक्ष्मण

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इमेज कैप्शन, जाने-माने कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण राजनीतिक व्यंग्य में 'गरिमापूर्ण अनादर' की वकालत करते थे
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कार्टूनिस्ट मंजुल कहते हैं कि इस मुद्दे को राजनीतिक नज़रिये से देखना एक अलग मामला है. इसे विशुद्ध रूप से नागरिक के नज़रिये से देखें. राजनीतिक व्यंग्य पर हिंसक प्रतिक्रिया निंदनीय है.

वे कहते हैं, "टीवी चैनलों या मीडिया पर चर्चा हो रही है कि जब कंगना रनौत का घर तोड़ा जा रहा था, तब ये प्रदर्शनकारी क्या कर रहे थे? उनका रुख़ यह है कि आप किसी व्यक्ति की आलोचना नहीं कर सकते, जब वह संवैधानिक पद पर हो. क्या यह राजतंत्र है? अगर यह ऐसे ही चलता रहा, तो क़ानून के शासन पर कौन विश्वास करेगा?"

कार्टूनिस्ट गौरव सरजेराव का मानना ​​है कि कुणाल कामरा के मज़ाक़ और गाने में कोई अपमान नहीं था.

वो साप्ताहिक पत्रिका 'मार्मिक' के लिए कार्टून बनाते हैं.

शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे इस साप्ताहिक पत्रिका के संस्थापक थे.

वर्तमान में शिवसेना के दोनों गुट बालासाहेब ठाकरे के उत्तराधिकारी होने का दावा करते हैं.

गौरव सरजेराव कहते हैं, "जिस पार्टी की विरासत की वे बात कर रहे हैं, उसके संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ख़ुद एक कार्टूनिस्ट थे और यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि वे व्यंग्य के डर से ऐसा क़दम उठा रहे हैं."

बीबीसी मराठी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "कुणाल कामरा ने कहीं भी किसी नेता का नाम नहीं लिया. उन्होंने कहीं भी किसी को गाली नहीं दी. इसलिए, अपमान का कोई सवाल ही नहीं है. यह उस पर टिप्पणी है, जो चारों ओर हो रहा है. 'गद्दार' या 'रिक्शा चालक' शब्द कुणाल कामरा के गढ़े गए नए शब्द नहीं हैं. इन सभी शब्दों का इस्तेमाल पहले भी कई लोगों ने आलोचना में किया है."

वे कहते हैं, "व्यंग्य इस समय ख़तरे में है."

बीबीसी

कार्टूनिस्ट मंजुल भी ऐसा ही मानते हैं. उन्होंने कहा कि कुणाल कामरा का माफ़ी न मांगने वाला रुख़ बहुत ज़रूरी था.

वे कहते हैं, "मुझे भी इस तरह के नोटिस मिले हैं कि 'आप सत्ता में किसी ख़ास व्यक्ति का कार्टून नहीं बना सकते.' हालांकि, यह स्पष्ट है कि अगर हम इसका शिकार हो गए तो वे हम पर और अधिक प्रतिबंध लगाने की कोशिश करते रहेंगे."

वे कहते हैं, "2017 में मुझे भी ऐसे निर्देश मिले थे कि आप नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर कार्टून नहीं बना सकते. और अब तो यह नौबत आ गई है कि आप देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे पर राजनीतिक व्यंग्य भी नहीं कर सकते. संक्षेप में कहें तो यह सूची बढ़ती जा रही है और अगर हम दबाव में आ गए, तो यह सूची बढ़ती ही रहेगी."

व्यंग्य और अनादर के बीच की रेखा को कैसे पहचानें?

एकनाथ शिंदे
इमेज कैप्शन, कुणाल कामरा के वीडियो पर एकनाथ शिंदे का कहना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है, यह किसी के लिए काम करना है.

गौरव सरजेराव कहते हैं कि जब ऐसी घटनाएँ होती हैं तो 'सेल्फ सेंसरशिप' और बढ़ जाती है.

वह कहते हैं, "भले ही मैं निर्भीक होकर कार्टून बनाऊँ, लेकिन मुझे इसके नतीजों के बारे में दो बार सोचना पड़ता है. जब मुझे ऐसा नहीं करना पड़ेगा, तभी हम सही मायने में एक लोकतांत्रिक देश में होंगे."

हालांकि कार्टूनिस्ट आलोक का मानना ​​है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ राजनीतिक व्यंग्य में भी विवेक बरकरार रहना चाहिए. वे कहते हैं कि राजनीतिक व्यंग्य करते समय वे आरके लक्ष्मण की 'गरिमापूर्ण अनादर' वाली बात को हमेशा ध्यान में रखते हैं.

वे कहते हैं, "यह सच है कि मौजूदा स्थिति बहुत भयावह हो गई है. फिर भी, एक हास्य कलाकार, स्टैंड-अप कॉमेडियन या कार्टूनिस्ट के तौर पर या किसी भी 'व्यंग्य-संबंधी' पेशे में, आपकी ज़िम्मेदारी है कि अगर सबका दिमाग़ नियंत्रण से बाहर है, तो कम से कम आपका तो नहीं होना चाहिए. आप अपना दिमाग़ शांत रख सकते हैं और एक अच्छा मज़ाक़ बना सकते हैं."

दूसरी ओर, कार्टूनिस्ट मंजुल की राय अलग है.

वे कहते हैं, "व्यंग्य और अनादर के बीच की रेखा एक निश्चित समय पर खींची जाती है. यह रेखा तब खींची जा सकती है, जब स्थिति सामान्य हो. मौजूदा स्थिति सामान्य नहीं है, यह भीड़तंत्र से भरी हुई है. ऐसे समय में यह कहना ग़लत होगा कि केवल निहत्थे तरीक़े से अपनी बात कहने वालों को ही सावधान रहना चाहिए और शिष्टाचार का पालन करना चाहिए."

क्या राजनीतिक व्यंग्य क़ानूनन अपराध है?

कुणाल कामरा

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इमेज कैप्शन, विश्लेषक मानते हैं कि किसी भी लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है

बीबीसी मराठी ने क़ानूनी विशेषज्ञ उल्हास बापट से बात की और ये पता लगाने की कोशिश की कि क़ानून के तहत किस तरह की आलोचना दंडनीय है.

उनका कहना है कि किसी भी लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता. उनका कहना है कि राजनीतिक व्यंग्य या आलोचना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है और बहुत महत्वपूर्ण है.

वे कहते हैं, "अनुच्छेद 19 के अनुसार हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. अगर कोई व्यंग्य कविता लिखता है या अपनी बात स्पष्ट रूप से कहता है तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. बेशक, कोई भी अधिकार असीमित नहीं है. इसी तरह इन 19 अनुच्छेदों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 10 प्रतिबंध लगाए गए हैं."

इन प्रतिबंधों के बारे में जानकारी देते हुए वे कहते हैं, "संक्षेप में, अगर भारत की संप्रभुता, एकता, राज्य की सुरक्षा, विदेशों से संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, मानहानि या अपराध के लिए उकसावे की बात हो तो सरकार उस पर उचित प्रतिबंध लगा सकती है.''

वो कहते हैं, ''मैंने वह गाना ठीक से नहीं सुना है, लेकिन अगर किसी नेता के बारे में ऐसा व्यंग्यात्मक गाना गाया जाता है, तो वह क़ानून के अनुसार अपराध नहीं है. लेकिन एक पार्टी के लोगों ने जाकर स्टूडियो में तोड़फोड़ की, ये निश्चित रूप से अपराध है, इसमें कोई संदेह नहीं है."

वे कहते हैं, "अगर आपको कुछ पसंद नहीं है, तो पुलिस या अदालत के पास जाएँ. आप जाकर तोड़फोड़ नहीं कर सकते. भले ही मैंने गाना न सुना हो, लेकिन इस तरह का व्यंग्यात्मक गाना बनाने में कुछ भी ग़लत नहीं है. पहली नज़र में मुझे नहीं लगता कि यह गाना इसका उल्लंघन करता है. लेकिन डर पैदा करने के लिए इस तरह की तोड़फोड़ करना लोकतंत्र के लिए हानिकारक है."