पुतिन और पीएम मोदी के बीच क्यों नहीं हो पा रही है वार्षिक बैठक

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विदेश मंत्री एस. जयशंकर पाँच दिनों के दौरे पर रूस में हैं.
उनके इस दौरे पर चर्चा इसलिए है क्योंकि ये लगातार दूसरा साल है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों देशों के बीच होने वाले सालाना शिखर सम्मेलन में हिस्सा नहीं ले रहे.
भारत और रूस के बीच शीर्ष नेताओं के स्तर पर वार्षिक सम्मेलन होता है. इसमें एक साल रूसी राष्ट्रपति भारत आते हैं और एक साल भारतीय पीएम रूस जाते हैं. अभी तक दोनों देशों के बीच 21 सालाना सम्मेलन हो चुके हैं, जो रूस और भारत में आयोजित किए गए.
हालांकि, आख़िरी सम्मेलन नई दिल्ली में छह दिसंबर 2021 को हुआ था, जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन भारत दौरे पर थे. 2020 में कोविड महामारी के कारण यह वार्षिक बैठक नहीं हो पाई थी.
पिछले साल फ़रवरी में यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ था, जिसके बाद पीएम मोदी 2022 में रूस के दौरे पर नहीं गए. वहीं, इसी साल सितंबर में जी-20 देशों के सम्मेलन में व्लादिमिर पुतिन भी भारत नहीं आए. पीएम मोदी का आख़िरी रूस दौरा सितंबर 2019 में हुआ था.
प्रधानमंत्री मोदी का दौरा क्यों टला?

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वार्षिक सम्मेलन के लिए इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूस जाने की बारी थी. लेकिन वह लगातार दूसरे साल इसका हिस्सा नहीं बने. इस साल के ख़त्म होने में महज़ चार दिन बचे हैं.
हालांकि, इसके लिए कोई ठोस वजह अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है.
लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि बैठक के लिए 'तारीख़' पक्की करना सबसे बड़ी चुनौती है.
रूस से अपने डिप्लोमैटिक करियर की शुरुआत करने वाले एस जयशंकर अब रूसी नेताओं से मिलने मॉस्को पहंँच गए हैं. अपने दौरे पर वह सेंट पीटर्सबर्ग भी जाएंगे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में पीएम मोदी के रूस न जाने और एस जयशंकर के वहाँ पहुंचने के पीछे के संकेतों को समझाते हुए लिखा है, "अमेरिका के प्रतिबंधों को झेल रहे रूस का दौरा न करके पीएम मोदी पश्चिम को संकेत दे रहे हैं, जबकि जयशंकर का दौरा रूस के लिए संकेत है कि दिल्ली ने अपने पुराने रणनीतिक पार्टनर को छोड़ा नहीं है."
पिछले साल जब पीएम मोदी रूस के दौरे पर नहीं गए थे तो कई मीडिया रिपोर्टों में इसे यूक्रेन में रूस के परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की धमकी से जोड़ा गया.
ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि यूक्रेन युद्ध में परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की व्लादिमिर पुतिन की धमकियों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस में होने वाले सम्मलेन कैंसिल कर दिया था.
हालांकि, समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कुछ सूत्रों के हवाले से इस दावे को ख़ारिज किया था.
रॉयटर्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि सम्मेलन में न जाने का फ़ैसला काफ़ी पहले लिया गया था और न्यूक्लियर वाले एंगल का इससे कोई लेना-देना नहीं था.
ब्लूमबर्ग ने इसी साल अपनी एक रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारी के हवाले से ये भी कहा कि जी-20 सम्मेलन में रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के न आने पर पीएम मोदी ने अपनी नाख़ुशी ज़ाहिर की थी.
जी-20 सम्मलेन के दौरान जो बाइडन और पीएम मोदी की मुलाक़ात के बाद व्हाइट हाउस नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के इंडो-पैसिफ़िक कोऑर्डिनेटर कर्ट कैम्पबेल ने कहा था, "हमारे भारतीय साझीदारों के लिए यह काफ़ी निराशा की बात है कि वे यहां नहीं हैं. हम आभारी हैं कि हम यहां हैं."
पुतिन के भारत नहीं आने पर सवाल

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यूक्रेन में रूसी हमले के बाद से पुतिन ने कई देशों का दौरा किया लेकिन वह भारत नहीं आए. पुतिन ने चीन, सऊदी अरब, यूएई और मध्य एशिया के कई देशों का दौरा किया लेकिन भारत नहीं आए. ऐसे में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.
थिंक टैंक कार्नेगी मॉस्को के निदेशक रहे दिमित्री त्रेनिन ने द डिप्लोमैट को दिए इंटरव्यू में कहा था चीन और रूस की बढ़ती क़रीबी का असर भारत पर ज़रूर पड़ेगा.
दिमित्री त्रेनिन ने इसी इंटरव्यू में कहा था, ''रूस का भारत सैद्धांतिक रूप से चीन की तरह एक रणनीतिक साझेदार है. लेकिन रूस और भारत का ट्रेड चीन और रूस के तुलना में दसवां हिस्सा है. भारत अमेरिका के ज़्यादा क़रीब हो रहा है और यह रूस के लिए कोई मुद्दा नहीं होना चाहिए. भारत अपने विदेशी संबंध को किसी एक देश तक सीमित नहीं रखना चाहता है.''
दिमित्री ने कहा था, ''रूस से भारत में हथियारों की आपूर्ति के क्षेत्र में अमेरिका का दखल बढ़ता दिख रहा है. भारत और रूस के संबंध में दो दिक़्क़तें हैं. पहला यह कि दोनों देशों के संबंधों में पर्याप्त भरोसे के बावजूद सहयोग सरकार के स्तर पर ज़्यादा है. इसका विस्तार निजी क्षेत्र में नहीं हुआ तो यह संबंध बहुत व्यापक नहीं होगा.''
''भारत की अर्थव्यवस्था पर अब सरकार का उतना नियंत्रण नहीं है, जितना प्राइवेट सेक्टर का है. ऐसे में दोनों देशों का संबंध सरकारी दायरे से बाहर निकलना होगा. दूसरी दिक़्क़त यह है कि चीन और भारत के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ रही है. दोनों देश रूस के क़रीबी साझेदार हैं लेकिन रूस मध्यस्थता करने की स्थिति में नहीं है.''
चीन अपनी विदेश नीति को 'तीन ना' से पारिभाषित करता है. ये तीन ना हैं- (नो अलायंस) कोई गुट नहीं, (नो कॉन्फ्रंटेशन) कोई टकराव नहीं और (नो टार्गेटिंग थर्ड पार्टीज़) किसी तीसरे पक्ष पर निशाना नहीं. ये तीन ना डेंग श्याओपिंग के ज़माने से ही हैं. लेकिन चीन का भारत के साथ टकराव है और रूस इसमें किसी का भी पक्ष लेने से बचता है.
भारत और रूस के बीच अप्रैल 2022 से द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर 27 अरब डॉलर का हो गया है लेकिन यह पूरी तरह से एकतरफ़ा है. इस बात को रूस में भारत के राजदूत पवन कपूर ने भी स्वीकार किया है.
पवन कपूर ने रूस-इंडिया बिज़नेस डायलॉग फोरम में कहा था कि 27 अरब डॉलर में भारत का निर्यात महज़ दो अरब डॉलर का था. वित्तीय वर्ष 2021-22 में भारत और रूस का द्विपक्षीय व्यापार 13 अरब डॉलर था.
13 अरब से 27 अरब डॉलर होने में सबसे बड़ा योगदान भारत के तेल और उर्वरक आयात का है. पिछले साल फ़रवरी में यूक्रेन पर रूस ने हमला किया तब से भारत को रूस से सस्ता तेल मिलना शुरू हुआ था.
भारत और रूस के रिश्ते

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रूस के दौरे पर जयशंकर ने एक ख़ास ट्वीट किया. उन्होंने अपनी बचपन की एक याद शेयर की. ये 1962 में रूस में अंतरिक्षयात्रियों के सम्मान में आयोजित एक कार्यक्रम का एंट्री पास था. उस समय जयशंकर सिर्फ़ सात साल के एक बच्चे थे.
इसके साथ ही जयशंकर ने अपने मौजूदा दौरे की एक तस्वीर भी ट्वीट की और साथ में लिखा, "कैसे ये शुरू हुआ और अब ये कैसा जा रहा है."
राजनयिक के तौर पर साल 1978 में जयशंकर को पहली पोस्टिंग मॉस्को में भारतीय दूतावास में ही मिली थी.
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इस दौरे पर जयशंकर रूस के उप प्रधानमंत्री और उद्योग-कारोबार मंत्री डेनिस मांतुरोव से मिलेंगे.
साल 2000 से 2021 के बीच रूस और भारत के नेताओं ने एक भी वार्षिक सम्मेलन को नहीं टाला.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दो सालों में कई देशों का दौरा किया है. ऐसे में उनका रूस न जाना और अहम हो जाता है.
भारत का रूस के साथ रक्षा क्षेत्र में पुराना और व्यापक सहयोग रहा है. भारत की रूस के रक्षा उपकरणों पर निर्भरता भी छिपी नहीं है. अभी भी भारत रक्षा क्षेत्र में 60 से 70 फ़ीसदी सामान के लिए रूस पर निर्भर है. हालांकि, भारत इस स्थिति को बदलने की कोशिश कर रहा है.
रूस-यूक्रेन युद्ध के छिड़ने के बाद से भारत रियायती दरों पर रूस से कच्चा तेल भी खरीद रहा है और इससे देश में बढ़ते तेल के दामों को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है.
द हिंदू की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि मुलाकात के दौरान रुपया-रूबल पेमेंट मकैनिज़म में गड़बड़ियों को लेकर चर्चा होगी. साथ ही दोनों देशों के बीच कारोबार, ऊर्जा, रक्षा और कनेक्टिविटी के संबंध में द्विपक्षीय वार्ता होंगी.
भारत ने अभी तक खुलकर यूक्रेन पर आक्रमण के लिए रूस का विरोध नहीं किया है.
हालांकि, उसने बूचा में हुए नरसंहार की निंदा की थी और साथ ही रूसी नेताओं की ओर से दी जा रही परमाणु हमलों की धमकियों को लेकर भी चिंता ज़ाहिर की थी.
दूसरी तरफ़ पुतिन ने भारत के रुख़ की कई बार सराहना की है. उन्होंने कई मौक़ों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक तौर पर तारीफ़ की है.
भारत ने कई बार ये कहा है कि इस संकट को कूटनीति और वार्ता के ज़रिए हल करने की ज़रूरत है. पीएम मोदी ने पिछले साल सितंबर में पुतिन से कहा था कि 'ये युद्ध का दौर नहीं है.'
परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के क्षेत्र में भी रूस भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है.
कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (केकेएनपी) इस क्षेत्र में भारत और रूस के बीच एक प्रमुख परियोजना है. केएनपीपी की पहली और दूसरी यूनिट चालू हो चुकी हैं. वहीं, यूनिट 3,4,5 और 6 का काम चल रहा है. अंतरिक्ष क्षेत्र में भी भारत और रूस के बीच सहयोग वर्षों पुराना है.
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