अर्दोआन ने आने से पहले कहा- दिल में पाकिस्तान, भारत के लिए क्या है संदेश

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इमेज कैप्शन, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन पाकिस्तान के दो दिवसीय दौरे पर पहुँचे हैं
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका पहुँच गए हैं तो तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन दो दिवसीय दौरे पर पाकिस्तान पहुँचे हैं.

पीएम मोदी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आमंत्रित किया था और अर्दोआन को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने.

ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद मोदी पहली बार अमेरिका पहुँचे हैं, वहीं अर्दोआन मार्च 2024 में शहबाज़ शरीफ़ के प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार पाकिस्तान आए हैं.

तुर्की और अमेरिका दोनों नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो के सदस्य हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोनों देशों का रुख़ अलग है.

भारत और पाकिस्तान दोनों पड़ोसी हैं लेकिन वैश्विक राजनीति में दोनों देशों का रुख़ बिल्कुल उलट है.

अर्दोआन मलेशिया और इंडोनेशिया के बाद पाकिस्तान पहुँचे हैं. तुर्की सुन्नी मुस्लिम बहुल देश है. इंडोनेशिया, मलेशिया और पाकिस्तान भी सुन्नी मुस्लिम बहुल देश हैं.

अर्दोआन और शहबाज़ शरीफ़ गुरुवार को इस्लामाबाद में पाकिस्तान-तुर्की हाई-लेवल स्ट्रैटिजिक कोऑपरेशन काउंसिल की अध्यक्षता करेंगे.

पाकिस्तान दौरे को लेकर अर्दोआन ने एक्स पर लिखा था, ''तुर्की के दिल में पाकिस्तान की ख़ास जगह है. इस दौरे से हमें उम्मीद है कि पाकिस्तान से दोस्ती और भाईचारे की बुनियाद मज़बूत होगी. हम यहां के बिज़नेस फोरम में हिस्सा लेंगे. इससे दोनों देशों के प्राइवेट सेक्टर के बीच संपर्क बढ़ेगा.''

पाकिस्तान का दौरा क्यों

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान आने से पहले अर्दोेआन इंडोनेशिया के दौरे पर थे (इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोओ सुबिअंतो के साथ अर्दोआन)

हाल के वर्षों में पाकिस्तान और तुर्की के बीच रक्षा संबंध गहरे हुए हैं. हालांकि, दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार अब भी एक अरब डॉलर पर ही अटका है. दोनों देशों का लक्ष्य है कि द्विपक्षीय व्यापार पाँच अरब डॉलर तक बढ़ाया जाए.

दूसरी तरफ़ भारत और तुर्की के संबंधों में भले गर्मजोशी नहीं है लेकिन द्विपक्षीय व्यापार पिछले साल 10 अरब डॉलर का था. 2022 में तो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 14 अरब डॉलर का था.

पिछले महीने ही तुर्की में भारत के राजदूत मुक्तेश परदेशी ने कहा था कि 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार 20 अरब डॉलर तक करने का लक्ष्य है.

तुर्की के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस है. यानी भारत तुर्की में अपना सामान बेचता ज़्यादा है और ख़रीदता कम है.

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पाकिस्तान और तुर्की के बीच संबंधों में रक्षा सहयोग का अहम रोल है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट यानी सिपरी की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की पाकिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता देश है.

दोनों देश साथ मिलकर भी रक्षा उत्पादन कर रहे हैं. पाकिस्तान को तुर्की ड्रोन तकनीक मुहैया करा रहा है.

अर्दोआन पाकिस्तान तब पहुँचे हैं, जब मध्य-पूर्व में फ़लस्तीनियों को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की नीति के कारण काफ़ी उठापटक की स्थिति है.

ऐसे में अर्दोआन के इस दौरे को कैसे देखा जाना चाहिए?

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, ''तुर्की ईयू का सदस्य बन नहीं सका, ऐसे में उसका रुख़ अब इस्लामिक देशों की तरफ़ ज़्यादा रहता है. इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी में पाकिस्तान और तुर्की के बीच अच्छा सहयोग है."

"पाकिस्तान की कोशिश रहती है कि वह गल्फ के देशों से भी फ़ायदा उठाए और तुर्की से भी. इस्लामिक दुनिया में नेतृत्व को लेकर एक किस्म का ख़ालीपन है और अभी तुर्की उसे भरने में सबसे आगे दिख रहा है.''

पाकिस्तान और तुर्की की ऐतिहासिक क़रीबी

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इमेज कैप्शन, अर्दोआन का रुख़ कश्मीर पर पाकिस्तान के पक्ष में रहा है

नरेंद्र मोदी और अर्दोआन को लेकर एके पाशा कहते हैं, ''दोनों नेता धार्मिक बहुसंख्यकवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं. अर्दोआन इस्लामी राजनीति करते हैं और मोदी हिन्दुत्व की राजनीति. ऐसे में तुर्की और पाकिस्तान की क़रीबी बढ़ना लाजिमी है. तुर्की पाकिस्तान को भाई मानता है और भारत को दोस्त.''

अतीत में भी तुर्की का पाकिस्तान परस्त रुख़ रहा है. इसकी शुरुआत 1950 के शुरुआती दशक या फिर शीत युद्ध के दौर में होती है.

इसी दौर में भारत-पाकिस्तान के बीच दो जंग भी हुई थी. तुर्की और भारत के बीच राजनयिक संबंध 1948 में स्थापित हुए थे. तब भारत को आज़ाद हुए मुश्किल से एक साल ही हुआ था.

इन दशकों में भारत और तुर्की के बीच क़रीबी साझेदारी विकसित नहीं हो पाई. तुर्की और भारत के बीच तनाव दो वजहों से रहा है.

पहला कश्मीर के मामले में तुर्की का पाकिस्तान परस्त रुख़ और दूसरा शीत युद्ध में तुर्की अमेरिकी खेमे में था जबकि भारत गुटनिरपेक्षता की वकालत कर रहा था.

नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1949 में बना था. तुर्की इसका सदस्य था. नेटो को सोवियत यूनियन विरोधी संगठन के रूप में देखा जाता था.

इसके अलावा 1955 में तुर्की, इराक़, ब्रिटेन, पाकिस्तान और ईरान ने मिलकर 'बग़दाद पैक्ट' बनाया था. बग़दाद पैक्ट को तब डिफ़ेंसिव ऑर्गेनाइज़ेशन कहा गया था.

इसमें पाँचों देशों ने अपनी साझी राजनीति,सेना और आर्थिक मक़सद हासिल करने की बात कही थी. यह नेटो की तर्ज़ पर ही था.

1959 में बग़दाद पैक्ट से इराक़ बाहर हो गया था. इराक़ के बाहर होने के बाद इसका नाम सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन कर दिया गया था. बग़दाद पैक्ट को भी सोवियत यूनियन के ख़िलाफ़ देखा गया.

दूसरी तरफ़ भारत गुटनिरपेक्षता की बात करते हुए भी सोवियत यूनियन के क़रीब लगता था.

जब शीत युद्ध कमज़ोर पड़ने लगा था, तब तुर्की के 'पश्चिम परस्त' और 'उदार' राष्ट्रपति माने जाने वाले तुरगुत ओज़ाल ने भारत से संबंध पटरी पर लाने की कोशिश की थी.

कश्मीर को लेकर भारत की नाराज़गी

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इमेज कैप्शन, इंडोनेशिया से पहले अर्दोआन मलेशिया गए थे, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ अर्दोआन

1986 में ओज़ाल ने भारत का दौरा किया था. इस दौरे में ओज़ाल ने दोनों देशों के दूतावासों में सेना के प्रतिनिधियों के ऑफिस बनाने का प्रस्ताव रखा था. इसके बाद 1988 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तुर्की का दौरा किया था. राजीव गांधी के दौरे के बाद दोनों देशों के रिश्ते कई मोर्चों पर सुधरे थे.

लेकिन इसके बावजूद कश्मीर के मामले में तुर्की का रुख़ पाकिस्तान के पक्ष में ही रहा इसलिए रिश्तों में नज़दीकियां नहीं आ पाईं.

1991 में इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी और इस बैठक में तुर्की के विदेश मंत्री ने कश्मीर को लेकर भारत की आलोचना की थी.

2003 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तुर्की का दौरा किया था. इस दौरे में दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच संपर्क बनाए रखने को लेकर सहमति बनी थी.

प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, ''बुलांत एजेवेत एकमात्र टर्किश प्रधानमंत्री थे जिन्हें 'भारत-समर्थक' प्रधानमंत्री के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के तख़्तापलट को मंज़ूरी नहीं दी थी."

"एजेवेत ने अप्रैल 2000 में भारत का दौरा किया था. पिछले 14 सालों में किसी टर्किश राष्ट्रपति का यह पहला दौरा था. एजेवेत ने पाकिस्तान के दौरे का निमंत्रण अस्वीकार कर दिया था.''

''सबसे अहम यह है कि एजेवेत ने कश्मीर पर तुर्की के पारंपरिक रुख़ को संशोधित किया था. तुर्की का कश्मीर पर रुख़ रहा है कि इसका समाधान संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में होना चाहिए."

"लेकिन एजेवेत ने इसका द्विपक्षीय समाधान तलाशने की वकालत की थी. तुर्की के इस रुख़ के कारण भारत से संबंधों को बल मिला था.''

भारत के साथ कारोबार

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इमेज कैप्शन, अर्दोआन ने पिछले साल यूएनजीए को संबोधित करते हुए वर्षों बाद कश्मीर का ज़िक्र नहीं किया था

प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, ''तुर्की में जब जस्टिस एंड डिवेलपमेंट पार्टी (एकेपी) सत्ता में आई तो दोनों देशों में संबंध गहराने की संभावनाएं और बनीं. एकेपी ईयू के साथ चलने की बात करती थी और ट्रेड रिलेशन को मध्य-पूर्व से बाहर ले जाना चाहती थी."

"भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था थी और पाकिस्तान के साथ ट्रेड के मामले में बहुत संभावना नहीं थी. एकेपी ने भारत से संबंध बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन पाकिस्तान से रिश्ते ख़राब होने की शर्त पर नहीं.''

2008 में रेचेप तैय्यप अर्दोआन भारत के दौरे पर आए. इस दौरे में उन्होंने भारत के साथ फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट की बात रखी.

अगले साल तुर्की का पहला नैनो सैटेलाइट भारत ने पीएसएलवी सी-14 से अंतरिक्ष में भेजा.

इसके बाद 2010 में तुर्की के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल्लाह गुल ने भारत का दौरा किया और अंतरिक्ष रिसर्च में सहयोग बढ़ाने के लिए बात की थी. दोनों देशों के बीच कारोबार में भी तेज़ी आने लगी.

साल 2000 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 50.5 करोड़ डॉलर का था जो 2018 में 8.7 अरब डॉलर हो गया.

पूर्वी एशिया में चीन के बाद भारत तुर्की का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर बन गया. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान का तुर्की से व्यापार एक अरब डॉलर भी नहीं पहुँच पाया है.

2017 में अर्दोआन राष्ट्रपति के रूप में भारत आए. अर्दोआन के साथ 100 सदस्यों वाला एक बिज़नेस प्रतिनिधिमंडल था. लेकिन नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद तुर्की का एक भी दौरा नहीं किया है.

मोदी के तुर्की नहीं जाने के पीछे भी पाकिस्तान एक अहम कारक माना जाता है. कश्मीर पर अर्दोआन का रुख़ भी पाकिस्तान की लाइन पर ही रहा है.

2010 में अफ़ग़ानिस्तान पर तुर्की के नेतृत्व वाली वार्ता से भारत को हटा दिया गया था.

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इमेज कैप्शन, मलेशिया दौरे पर एक कार्यक्रम में अर्दोआन

इसके अलावा तुर्की ने न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप यानी एनएसजी में भारत की सदस्यता का विरोध किया था. कहा जाता है कि तुर्की का यह रुख़ पाकिस्तान के दबाव में था.

फ़रवरी 2020 में जब तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन पाकिस्तान आए थे, तब वहाँ के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने साझा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बड़े गर्व से कहा कि तुर्कों ने हिन्दुस्तान पर 600 सालों तक शासन किया.

इमरान ख़ान ने कहा था, ''आपके आने से हम सबको इसलिए भी ख़ुशी हुई कि कौम समझती है कि तुर्की से हमारे रिश्ते सदियों से हैं. तुर्कों ने तो 600 साल तक हिन्दुस्तान पर हुकूमत की थी.''

जेएनयू में पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर अश्विनी महापात्रा कहते हैं कि अर्दोआन इस्लामिक दुनिया के नेता बनना चाहते हैं.

प्रोफ़ेसर महापात्रा कहते हैं, ''तुर्की के पास इस्लामिक दुनिया के नेता बनने की क्षमता है. उसके पास ऑटोमन साम्राज्य की समृद्ध विरासत है. लोकतंत्र है और तकनीक के मामले में भी बाक़ी इस्लामिक देशों से आगे है."

वो कहते हैं, "अभी ईरान और सऊदी उस पोजिशन में हैं नहीं. पाकिस्तान भी तुर्की के नेतृत्व का समर्थन करता है.''

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