भारत का पासपोर्ट, बच्चों का पुणे के स्कूल में दाख़िला, भारत में कैसे बस गया पाकिस्तानी जासूसः प्रेस रिव्यू

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द इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने भारत में रह रहे एक ऐसे पाकिस्तानी जासूस की कहानी प्रकाशित की है जो जेल से भागने के बाद फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों के आधार पर नया जीवन जी रहा था.

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस जासूस ने किराये पर घर लिया, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया, राशन कार्ड और यहां तक की एक नए नाम के साथ भारत का पासपोर्ट भी ले लिया.

यही नहीं इस जासूस ने अपने बेटे का दाख़िला एक प्रमुख स्कूल में करा लिया और बेटी के लिए जन्म प्रमाण पत्र भी बनवा लिया.

14 जून 1999 तक सैयद अहमद मोहम्मद देसाई की ज़िंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा था. फिर किसी ने पुलिस को गुप्त सूचना दी कि ‘कोई संदिग्ध व्यक्ति पाकिस्तान को ख़ुफ़िया सूचनायें भेज रहा है.’

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ पुणे सिटी पुलिस के इंस्पेक्टर सुरेंद्र बापू पाटिल को ये गुप्त सूचना मिली थी जिसके बाद देसाई को कटराज कोंधवा रोड स्थित कंचन प्लाज़ा से गिरफ़्तार कर लिया गया.

तब देसाई की उम्र 38 साल थी.

पुलिस को पता चला था कि देसाई मूल रूप से कराची के रहने वाले हैं और वो पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के एजेंट के रूप में काम कर रहे थे.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ पुलिस को देसाई के घर से ख़ुफ़िया दस्तावेज़ मिले थे जो भारतीय सेना के जवानों के प्रशिक्षण और हथियारों से जुड़े थे.

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शंकरनगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एफ़आईआर के बाद देसाई को जेल भेज दिया गया था. लेकिन ये कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई.

आठ साल जेल में रहने के बाद सैयद देसाई उस पुलिस थाने से भाग गए थे, जिसमें उन्हें निगरानी में रखा गया था. फ़रार होने के तीन सप्ताह बाद उन्हें कोलकाता से गिरफ़्तार किया गया और फिर वाघा बार्डर के रास्ते पाकिस्तान भेज दिया गया.

फ़रवरी 1960 में कराची में पैदा हुए देसाई ने 1984 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में बीबी ज़ोहरा से शादी की. रिकॉर्ड के मुताबिक़ ये दंपती अगस्त 1996 में 45 दिन के वीज़ा पर अटारी के रास्ते भारत आया.

पुलिस के मुताबिक़ देसाई कराची की एक कैंटीन में काम करते थे और उन्होंने वीज़ा लेकर कई बार भारत की यात्रा की थी. वो कपड़े और मेवे बेचने भारत आते-जाते रहे थे.

अक्तूबर 1996 में इस दंपती ने पुणे सिटी पुलिस की विदेश शाखा में अर्ज़ी दी और अस्थायी निवास परमिट हासिल कर लिया. ये परमिट 11 अक्तूबर 1996 तक वैध था. लेकिन सैयद देसाई पुणे में ठिकाने बदलते रहे और एक रिश्तेदार की मदद से घर किराये पर ले लिया.

इसके बाद फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों के आधार पर उन्होंने राशन कार्ड से लेकर पासपोर्ट तक बनवा लिया.

आगरा के एक स्कूल की फ़र्ज़ी टीसी के आधार पर सैयद देसाई ने अपने बेटे का दाख़िला शहर के एक प्रमुख स्कूल में करवा लिया.

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देसाई ने एक फ़र्ज़ी नाम पर पासपोर्ट भी हासिल कर लिया था, जिसका इस्तेमाल उन्होंने दो बार पाकिस्तान जाने के लिए किया.

देसाई की गिरफ़्तारी के बाद पुलिस ने उनकी पत्नी को भी वीज़ा नियमों के उल्लंघन में गिरफ़्तार कर लिया था. घर की जांच के दौरान भारतीय सेना से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज़ पुलिस को मिले थे.

ज़ोहरा को वापस पाकिस्तान भेज दिया गया था. पुलिस जांच में देसाई के आईएसआई का एजेंट होने की बात की पुष्टि हो गई थी.

जासूसी के इस मामले की जांच के दौरान पुलिस ने देसाई के कई संपर्कों को भी पकड़ा था. इस मामले में बाद में सीबीआई ने जांच की थी और कुल दस लोगों को अभियुक्त बनाया गया था. इनमें मुंबई में रहने वाले देसाई के कुछ संपर्क भी शामिल थे.

हालांकि बाद में अक्तूबर 2007 में देसाई ने अपना जुर्म क़बूल कर लिया था. अदालत ने उन्हें सात साल की सज़ा दी थी लेकिन वो तब तक आठ साल जेल में बिता चुके थे.

चार अभियुक्तों को सबूत पर्याप्त न होने की वजह से चार पर आरोप तय नहीं किये गए थे जबकि बाक़ी पांच को सात साल की सज़ा हुई थी. एक अभियुक्त को बरी कर दिया गया था.

जेल से रिहा होने के बाद देसाई पुलिस की निगरानी में थे. लेकिन जनवरी 2008 में वो फ़रार हो गए. बाद में उन्हें कोलकाता से हिरासत में लिया गया. जांच के दौरान पता चला कि वो सतारा में अपने साथ जेल में रहे एक पूर्व क़ैदी शैलेश जाधव के घर पर रहे, जो भारतीय सेना में क्लर्क थे और धांधली के आरोप में उनका कोर्ट मार्शल हो गया था.

देसाई और जाधव के ख़िलाफ़ एक नई एफ़आईआर दर्ज की गई थी. पुलिस ने दावा किया था कि जाधव के पास से सेना से संबंधित दस्तावेज़ बरामद हुए थे.

पुलिस के मुताबिक़ जाधव देसाई को दस्तावेज़ देना चाहते थे जो भारत से पश्चिम बंगाल के रास्ते बांग्लादेश जाना चाहते थे.

हालांकि पुणे की एक अदालत ने दोनों ही अभियुक्तों को इस मामले में पर्याप्त सबूत ना होने के कारण बरी कर दिया था. आख़िरकार अप्रैल 2011 में सैयद देसाई को पाकिस्तान भेज दिया गया.

‘चेतन सिंह राइफल लेकर खड़े हुए कसाब जैसे लग रहे थे’

चेतन सिंह

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने आरपीएफ़ जवान के हमले का शिकार हुए जयपुर-मंबई एक्सप्रेस के एक कर्मचारी के हवाले से रिपोर्ट प्रकाशित की है.

अख़बार से बात करते हुए एसी कोच के अटेंडेंट कृष्णा कुमार शुक्ला ने अख़बार से बात करते हुए कहा, “जिस तरह से वो राइफ़ल लेकर खड़ा था, मुझे कसाब की याद आ गई.”

शुक्ला बी5 कोच में तैनात थे लेकिन सोने के लिए बी6 कोच में चले गे थे. गोलियों की आवाज़ से उनकी आंख खुली थी. उन्होंने सिर्फ़ पंद्रह फुट की दूरी से आरपीएफ़ के सहायक इंस्पेक्टर टीकाराम मीणा के शव को कोच के फ़र्श पर पड़े हुए और उसके पास आरपीएफ़ जवान चेतन सिंह को राइफ़ल लेकर खड़े हुए देखा था.

कृष्ण कुमार शुक्ला ने ही सबसे पहले गोलीबारी के बारे में आरपीएफ़ को जानकारी दी थी.

शुक्ला की मारे गए एक अन्य यात्री 62 वर्षीय कादर भानपुरवाला से जान-पहचान भी हो गई थी.

कृष्णा बताते हैं, “कादर भानपुरवाला यात्राएं करते रहते थे और शानदार व्यक्ति थे. वो राजस्थान के भवानी मंडी स्टेशन से सवार हुए थे. एक सहयात्री और टिकट चेकर के बीच बहस हो रही थी तो उन्होंने सुलह कराई थी. कुछ स्टेशन बाद मैंने उन्हें चाय दी थी.”

सोमवार सुबह आरपीएफ़ के जवान चेतन सिंह ने ट्रेन के भीतर अलग-अलग कोच में चार लोगों की हत्या कर दी थी. इनमें से तीन मुसलमान थे. सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो प्रसारित हुए हैं जिनमें चेतन सिंह के राजनीतिक टिप्पणी करने का दावा किया जा रहा है.

अभी तक पुलिस ने हमले का कारण स्पष्ट नहीं किया है.

चेतन सिंह ने यात्री को बंदूक की नोक पर पैदल चलाया

चेतन सिंह

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वहीं इसी हमले से जुड़ी एक ख़बर हिंदुस्तान टाइम्स ने प्रकाशित की है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़ चार लोगों की हत्या करने वाले चेतन सिंह ने गोली मारने से पहले एक यात्री को बंदूक की नोक पर ट्रेन के भीतर पैदल चलाया था.

जीआरपी के एक अधिकारी ने जांच का हवाला से ये जानकारी हिंदुस्तान टाइम्स को दी है.

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ चेतन सिंह ने अपनी ऑटोमैटिक राइफ़ल से पहले एएसआई टीका राम मीणा को मारा और उसके बाद तीन अन्य यात्रियों की हत्या की. ये घटनाक्रम महाराष्ट्र के पालघर रेलवे स्टेशन के पास हुआ.

एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया है, “चेतन सिंह ने ट्रेन के बी2 कोच में यात्रा कर रहे सैयद एस नाम के एक यात्री को बंदूक की नोक पर पेंट्री कार तक चलाया और फिर वहां उसे गोली मार दी. पेंट्री कार तक पहुंचने से पहले वो बी1 और बी2 कोच से गुज़रे.”

मणिपुर में अधिकतर लावारिस शव घुसपैठियों के हैंः सरकार

मणिपुर के लिए प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, मणिपुर में मई में हिंसा शुरू हुई थी और अभी तक हालात सामान्य नहीं हो सके हैं

दि हंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि मणिपुर में जिन शवों पर अभी तक किसी ने दावा नहीं किया है उनमें से अधिकतर अवैध घुसपैठियों के हैं.

महाधिवक्ता ने अदालत से कहा, “अधिकतर शव, जिन पर किसी ने दावा नहीं किया है, घुसपैठियों के हैं जो किसी ख़ास मक़सद से आये थे और मारे गए.”

वहीं आदिवासी समुदाय के अधिवक्ता ने कहा है कि इंफ़ाल के शवगृहों में ‘118 आदिवासी शव’ हैं.

चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता की बैंच मणिपुर हिंसा पर सुनवाई कर रही है.

एक पक्ष ने पुलिस अधिकारियों की बीच संचार का हवाला देते हुए कहा है कि ‘म्यांमार से घुसपैठिये’ आये और अब इनमें से अधिकतर लापता हैं.

महाधिवक्ता तुषार मेहता ने अदालत में कहा, “अधिकतर लावारिस शव घुसपैठियों के हैं… वो ख़ासि डिज़ाइन के तहत आये थे और मारे गए… मैं इससे अधिक कुछ और नहीं कहूंगा और चीज़ों को दूषित नहीं करूंगा. ”

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