इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ थी सेना फिर भी क्यों नहीं जीत पाई नवाज़ शरीफ़ की पार्टी

पीएमएल-एन का चुनाव प्रचार

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    • Author, शुमाइला जाफरी
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ इस्लामाबाद

पाकिस्तान में नेशनल और प्रांतीय असेंबली के चुनाव के नतीजे घोषित कर दिए गए हैं.

अब सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) के बीच बातचीत शुरू हो गई है.

गठबंधन बनाने के लिए ये दोनों दल छोटे दलों और निर्दलीय जीते उम्मीदवारों से भी संपर्क साध रहे हैं.

जब किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला है, वैसे में नई सरकार के गठन से पहले तगड़ी सौदेबाजी होने की उम्मीद है.

विडंबना यह है कि नेशनल असेंबली के साथ-साथ खैबर पख्तूनख्वा और पंजाब प्रांत में सबसे अधिक सीटें जीतने के बाद भी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) समर्थित उम्मीदवार सरकार बनाने के इस खेल में शामिल नहीं हैं.

इमरान ख़ान की पार्टी की चुनौतियां क्या हैं?

इमरान ख़ान

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पीटीआई के सामने कई चुनौतिया हैं. पहली और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती जीते उम्मीदवारों को वफ़ादार और एकजुट बनाए रखना है.

पीटीआई के जीते उम्मीदवारों के सामने बिना किसी क़ानूनी बाधा के किसी दूसरे राजनीतिक दल में शामिल होने का विकल्प खुला है.

पीटीआई समर्थित उम्मीदवारों ने निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा है, ऐसे में संसद में एक सांसद के रूप में मान्यता लेकर आरक्षित सीटों में हिस्सेदारी पाने के लिए उन्हें एक पार्टी में शामिल होने की ज़रूरत है.

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आरक्षित सीटों का कोटा आम चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा जीती गई सीटों के अनुपात में होता है. आरक्षित सीटें न मिलने की स्थिति में राष्ट्रीय और प्रांतीय असेंबलियों में उनकी ताक़त कम हो जाएगी.

पीएमएल-एन और पीपीपी चुनाव नतीजों में दूसरे और तीसरे नंबर की पार्टी हैं. दोनों ने गठबंधन कर प्रांतों के साथ-साथ केंद्र में सरकार बनाने के लिए बातचीत शुरू कर दी है.

वहीं इमरान ख़ान की पीटीआई अब भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है.

उन्हें एक ऐसी पार्टी की तलाश है, जिसके साथ वे तब तक के लिए गठबंधन कर सकें या उसमें अपना विलय कर सकें, जब तक कि एक पार्टी के रूप में पीटीआई का दर्जा क़ानूनी तौर पर बहाल नहीं हो जाता.

छह निर्दलीय उम्मीदवारों ने पहले ही पीएमएल-एन का दामन थाम लिया है. इसमें लाहौर से जीते पीटीआई समर्थक उम्मीदवार शामिल हैं.

हालांकि पीटीआई नेता गौहर ख़ान ने पीएमएल-एन और पीपीपी के साथ किसी गठबंधन की संभावना से इनकार किया है. उन्होंने विपक्ष में बैठने के संकेत दिए हैं.

उन्होंने कहा, ''सरकार बनाने (उनके साथ) सरकार बनाने से बेहतर है विपक्ष में बैठना, लेकिन हमें लगता है कि हमारे पास बहुमत है.''

वोटरों को क्यों नहीं लुभा पाई पीएमएल-एन

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यह सबको पता है कि चुनाव में किस तरह से इमरान ख़ान की पार्टी को परेशान किया गया. वहीं पीएमएल-एन को चुनाव प्रचार की खुली छूट मिली.

चुनाव से ठीक पहले इमरान ख़ान को तीन मामलों में 31 साल के जेल की सजा सुनाई गई और नवाज़ शरीफ़ का वापस पाकिस्तान लाया गया और पहले जिस मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया था, उसमें उन्हें बरी किया गया.

इसके बाद भी तीन बार के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और उनकी पार्टी वोटरों को लुभाकर बहुमत हासिल करने में नाकाम क्यों रही.

गुंजरावाला की एक सीट से हारे पीएमएल-एन के उम्मीदवार खुर्रम दस्तगीर के मुताबिक़ पार्टी युवाओं का दिल जीतने में नाकाम रही. इस वजह से उसे मध्य पंजाब के उन इलाक़ों में भी उसे हार का सामना करना पड़ा, जहां पहले उसका मजबूत जनाधार था.

वो कहते हैं, ''यह सोशल मीडिया और टिक-टॉक का जमाना है. मेरा मानना है कि हम अपना संदेश पहुंचाने में असमर्थ हैं और अपने बारे में युवाओं को बताने में नाकाम रहे. पीएमएल-एन की राजनीति ज़मीनी स्तर की है, वहीं हमारे प्रतिद्वंद्वी इमरान ख़ान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ़ सोशल मीडिया पर सक्रिय है. यह सबसे बड़ा अंतर रहा. यह साफतौर पर चुनाव परिणामों में भी नज़र आता है.''

खुर्रम दस्तगीर ने कहा कि पार्टी को आत्मविश्लेषण करने की ज़रूरत है और यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है.

पीएमएल-एन के एक और वरिष्ठ नेता और पीडीएम सरकार में गृह मंत्री रहे राणा सनाउल्लाह को भी फ़ैसलाबाद में हार का सामना करना पड़ा है.

उनका मानना है कि आकाश छूती महंगाई और ईंधन की क़ीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी ने वोटरों को नाराज़ कर दिया. हालांकि पीडीएम सरकार में फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए लेकिन लोगों की आर्थिक कठिनाइयों की ज़िम्मेदारी पीएमएल-एन ने ही ली.

वो कहते हैं, '' फ़ैसलाबाद मज़दूरों का शहर है. लोग परेशान थे और अपनी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे थे. इसलिए उन्होंने मतदान के ज़रिए अपने ग़ुस्से का इज़हार किया. यह हमारी ग़लती नहीं थी...यह इमरान ख़ान का काम था. उन्होंने अर्थव्यवस्था चौपट कर दी थी.''

''हमारे पास केवल 18 महीने थे. इस दौरान उन्होंने अपने आंदोलन से सरकार को परेशान रखा. पीडीएम गठबंधन में 10 और पार्टियां शामिल थीं. लेकिन जब उनके कामों की ज़िम्मेदारी लेने की बात आई तो हमारे पास कोई और विकल्प नहीं था. उसे पीएमएल-एन के दरवाजे पर छोड़ दिया गया.''

वोटरों को रिझाने में इमरान ख़ान कामयाब कैसे हुए

पीटीआई का एक समर्थक

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सनाउल्लाह ख़ान का यह भी मानना था कि इमरान खान को सहानुभूति के वोट भी मिले.

वो कहते हैं, ''जब आप किसी को किसी व्यक्ति को जेल में डाल देते हैं और एक मामले में उन्हें सज़ा सुनाते हैं तो वह जेल में ही रहेगा, ऐसे में आपने एक हफ्ते में उन्हें तीन मामलों में सज़ा क्यों सुनाई. चुनाव से ठीक पहले उन्हें तीन मामलों में सुनाई गई सज़ा ने इमरान ख़ान के प्रति सहानुभूति की लहर पैदा कर दी. आठ फरवरी को यह लहर वोटों में बदल गई. लेकिन इसमें हम क्या कर सकते हैं, यह हमारे हाथ में नहीं था. यह तो अदालतों के ऊपर था, जिन्होंने इतनी तेजी से उन्हें सजा सुनाई.''

राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर (डॉक्टर) आदिल नजम के मुताबिक़ पाकिस्तान का राजनीतिक भविष्य अब 18 से 29 साल के युवाओं के हाथ में है. उनकी आबादी 60 फीसदी से अधिक है.

प्रोफेसर नजम के कुछ साल पहले किए गए एक शोध के मुताबिक 2045 तक होने वाले पाकिस्तान के चुनावों में नए मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे.

डॉक्टर नजम कहते हैं कि दुनिया भर में युवाओं के लिए राजनीति में रुचि पैदा करना और उन्हें किसी को वोट देने के लिए मनाना बहुत कठिन काम माना जाता है, हालांकि, अगर हम पीटीआई को देखें - तो वह युवाओं को अपने पक्ष में करने में सफल रही.

हालांकि अपने साढ़े तीन साल के शासन में इमरान ख़ान ने युवाओं के लिए बहुत अवसर नहीं पैदा कर पाए और न ही वो उन्हें नौकरियां दे पाएं, जिसका उन्होंने वादा किया था. इसके बाद भी युवाओं का झुकाव क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान की तरफ क्यों है.

डॉक्टर नजम कहते हैं, युवा निष्पक्षता के उनके विचार से प्रभावित हैं. उनका कहना है, ''विद्रोह का नैरेटिव युवाओं के लिए अधिक आकर्षक है. इसने वोटरों को पीटीआई की तरफ खींचा.''

वो कहते हैं, ''सोशल मीडिया और युवा वोटरों ने पूरी दुनिया की राजनीति की गति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है. पाकिस्तान के नज़रिए से परिवार ने हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है- लोग अपने में परिवार में से से ही किसी एक को वोट देंगे. अब टेक्नोलॉजी ने सोशल मीडिया पर नई बिरदारी बना दी है. अब फेसबुक, टिकटॉक, ट्विटर और वाट्सऐप पर समुदाय वही भूमिका निभा रहे हैं. यहीं पर पीटीआई अपने प्रतिद्वंद्वियों से बहुत आगे है.

किस बात से निराश हुए पीएमएल-एन के समर्थक

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वहीं राजनीतिक विश्लेषक नजम सेठी को लगता है कि इमरान ख़ान के सत्ता से बेदखल होने के बाद पीएमएल-एन को पीडीएम सरकार का नेतृत्व नहीं करना चाहिए था.

वो कहते हैं, ''मेरे विचार से, उन्हें असेंबलियों का कार्यकाल ख़त्म होने तक सत्ता में बने रहने की जगह तुरंत चुनाव में जाना चाहिए था. मैंने तब उन्हें यही सलाह दी थी. मैंने उनसे कहा कि आईएमएफ का कार्यक्रम उनकी राजनीति के लिए घातक होगा और वोटर इमरान सरकार की अक्षमताओं को भूल जाएंगे. वे पीएमएल-एन को माफ नहीं करेंगे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.''

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इमरान खान के सत्ता से बेदखल होने के बाद पीएमएल-एन को पीडीएम सरकार का नेतृत्व नहीं करना चाहिए था.
नजम सेठी
राजनीतिक टिप्पणीकार

वो कहते हैं, ''पीएमएल-एन के समर्थक निराश थे जबकि पीटीआई अपने वोटरों को प्रेरित रखने में सक्षम थी. इससे पीएमएल-एन के वोटरों को निराशा हुई और वे अपनी पार्टी के लिए वोट डालने नहीं निकले. उसके कम कट्टर समर्थक इमरान ख़ान के साथ चले गए होंगे.''

नजम सेठी कहते हैं कि नवाज़ शरीफ़ की वापसी से पीएमएल-एन समर्थकों में कुछ उम्मीद जगी. ऐसी चर्चा थी कि नवाज़ शरीफ़ को सत्ता प्रतिष्ठान का समर्थन हासिल था. सत्ता प्रतिष्ठान ने अपना होमवर्क किया होगा, इसलिए वे बेपरवाह बने रहे.

लेकिन तथ्य यह है कि पीएमएल-एन उबर नहीं सकी और वोटरों ने उसे माफ नहीं किया. पीटीआई ने सेना की नाराजगी और समान अवसर की कमी के बाद भी किसी के भी आकलन से अधिक सीटें जीत ली हैं.

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