महुआ मोइत्रा: क्या एथिक्स कमेटी निष्कासन की सिफारिश कर सकती है?

    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

लोकसभा की एथिक्स कमेटी ने पैसे लेकर सवाल पूछने के आरोपों की जांच के बाद अपनी उस ड्राफ्ट रिपोर्ट को अडॉप्ट कर लिया है, जिसमें उन्हें सदन से निष्कासित करने की सिफारिश की गई है.

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने महुआ मोइत्रा के ख़िलाफ़ पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने का आरोप लगाया था.

उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को चिट्ठी लिख महुआ मोइत्रा को सदन से निलंबित करने और उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की थी.

इस आरोप की जांच के बाद एथिक्स कमेटी ने 'अनैतिक आचरण' और 'गंभीर अपराध' के आरोप में उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की सिफारिश कर दी है.

एथिक्स कमेटी ने सरकार को सिफारिश की है कि महुआ मोइत्रा के 'गंभीर आपत्तिजनक', 'अनैतिक' 'जघन्य' और 'आपराधिक आचरण' को देखते हुए उनके ख़िलाफ़ समयबद्ध जांच की जाए.

एथिक्स कमेटी में शामिल विपक्षी सदस्यों ने क्या कहा?

एथिक्स कमेटी की रिपोर्ट सत्ताधारी गठबंधन एनडीए के पांच और कांग्रेस की सदस्य प्रीणित कौर के पांच सदस्यों के समर्थन के बाद अडॉप्ट की गई थी.

प्रीणित तौर कांग्रेस से बीजेपी में आए पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी हैं.

बहुजन समाज पार्टी के दानिश अली, कांग्रेस के वी वैथिलिंगम, सीपीएम के पीआर नटराजन और जनता दल (यूनाइटेड) के गिरधारी यादव ने कार्रवाई की सिफारिश से असहमत हुए असहमति नोट दर्ज कराया.

कांग्रेस के उत्तम रेड्डी विधानसभा चुनाव का पर्चा दाखिल करने तेलंगाना में थे. लिहाजा वो वोटिंग के दौरान हाजिर नहीं हो सके.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ रेड्डी ने कहा कि वोटिंग का दिन जानकर ऐसे वक्त रखा गया,जब वो अपना पर्चा दाखिल करने के लिए तेलंगाना गए थे.

महुआ मोइत्रा के ख़िलाफ़

कांग्रेस सांसद वी वैथिलिंगम ने कहा, "ये प्रस्ताव कमेटी ने बिना किसी चर्चा के पास कर दिया. ये एकतरफा फैसला था. फैसले पर चर्चा होनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं किया गया."

दूसरी ओर एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष बीजेपी के विनोद सोनकर ने कहा कि ड्राफ्ट रिपोर्ट पर सिर्फ सहमति या विरोध जताना था. इस पर वोटिंग के बाद रिपोर्ट को लोकसभा स्पीकर को भेज दिया गया है. वो इस पर फैसला करेंगे.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ एथिक्स कमेटी के विपक्षी सदस्यों का कहना था कि महुआ मोइत्रा के ख़िलाफ़ जिस तरह से जल्दबाजी में आरोप लगाकर मामले को एथिक्स कमेटी के पास भेजा गया वो चौंकाने वाला है.

इससे ये मामला पहले दिन से 'फिक्स मैच' लग रहा था.

इन सांसदों का कहना था संसद में सवाल पूछने के एवज में महुआ मोइत्रा का कैश या रिश्वत लेना साबित नहीं हो पाया है. न ही इसका कोई दस्तावेजी सुबूत है. उनके ख़िलाफ़ इसकी शिकायत करने वाले शख्स ने भी कोई सुबूत नहीं दिया है.

फिर भी एथिक्स कमेटी ने उन्हें लोकसभा से निष्कासित करने की सिफारिश कर दी. ये कैसे हो सकता है?

महुआ की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने तोड़ी चुप्पी

एथिक्स कमेटी की सिफारिश पर महुआ मोइत्रा की पार्टी ने लंबी चुप्पी के बाद पहली बार इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.

उसने भी यही सवाल उठाया है कि बगैर जांच के महुआ को लोकसभा से निष्कासित करने की सिफारिश कैसे की जा सकती है.

पार्टी सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा कि एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष ने खुद कहा है कि मामले की जांच होनी चाहिए. इसलिए जब अभी जांच होनी है तो पहले ही महुआ मोइत्रा को लोकसभा से निष्कासित करने की सिफारिश कैसे की जा सकती है.

बनर्जी ने कहा कि बीजेपी के कई सांसद हैं जिनके खिलाफ अभियोग प्रस्ताव लाए गए. लेकिन इन मामलों पर अभी सुनवाई भी नहीं हुई है.

उन्होंने कहा कि बीएसपी सांसद दानिश अली के खिलाफ सांप्रदायिक टिप्पणी के बावजूद बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी के ख़िलाफ़ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

उन्होंने कहा, "महुआ मोइत्रा सरकार के ख़िलाफ़ लड़ी रही हैं. वो सरकार की भूमिका पर सवाल उठा रही हैं. वो अदानियों पर सवाल कर रही हैं इसलिए उनकी संसद सदस्यता छीनने की कोशिश हो रही है."

पार्टी की ओर से इस मामले में लंबी चुप्पी के बाद इतने दिनों बाद प्रतिक्रिया देने के सवाल पर बनर्जी ने कहा कि महुआ इतनी सक्षम हैं कि वो अपनी लड़ाई खुद लड़ सकती हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी ने महुआ मोइत्रा के ख़िलाफ़ एथिक्स रिपोर्ट की सिफारिश पर बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा, "एक सांसद को बड़ी आबादी चुन कर भेजती है. ऐसे में बिना जांच के उसे लोकसभा से निष्कासित करने की सिफारिश की बात चौंकाती है."

महुआ मोइत्रा का कहना है, "अगर वो उन्हें मौजूदा लोकसभा से बर्खास्त भी कर देते हैं तो भी वो दोगुने वोट से जीत कर दोबारा अगले अगली लोकसभा में आ जाएंगी."

उन्होंने एथिक्स कमेटी की सिफारिश को 'कंगारू कोर्ट' का 'फिक्स मैच' करार दिया और कहा कि सबको पता था कि फैसला क्या होगा.

क्या एथिक्स कमेटी निष्कासन की सिफारिश कर सकती है?

बिजनेसमैन दर्शन हीरानंदानी ने एक शपथ पत्र दाखिल कर रहा है कि महुआ मोइत्रा ने संसद का अपना लॉग-इन पासवर्ड महुआ मोइत्रा को दिया है. हालांकि उन्होंने इसके लिए बदले कैश या गिफ़्ट देने का दावा नहीं किया है.

मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि इस मामले की भी जांच नहीं हुई है कि क्या हीरानंदानी को लॉग-इन पासवर्ड देने से देश की सुरक्षा समझौता हुआ है.

इसके बावजूद एथिक्स कमेटी ने महुआ मोइत्रा को लोकसभा से निष्कासित करने की सिफारिश स्पीकर को भेज दी.

लोकसभा के सेक्रेट्री जनरल पीडीटी आचारी का मानना है कि एथिक्स कमेटी के पास किसी संसद सदस्य को सदन से निष्कासित करने का अधिकार नहीं है. ये अधिकार विशेषाधिकार कमेटी के पास होता है.

उन्होंने एक न्यूज़ चैनल से कहा, "इस मामले में मुख्य आरोप ये है कि महुआ मोइत्रा पैसे लेकर बिजनेसमैन दर्शन हीरानंदानी के हितों को बढ़ावा दे रही थीं. दरअसल ये मिलीभगत का आरोप है. इसलिए ये मामला लोकसभा के विशेषाधिकार कमेटी के पास जाना चाहिए क्योंकि संसद के किसी सदस्य की ओर से रिश्वत लेना उसके विशेषाधिकार का गंभीर उल्लंघन और सदन की अवमानना है."

उन्होंने कहा, "इस तरह के विशेषाधिकार उल्लंघन के मामले की जांच विशेषाधिकार कमेटी के पास जाना चाहिए. मुझे नहीं मालूम के ये मामला एथिक्स कमेटी को क्यों भेजा गया."

क्या महुआ फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती हैं?

लोकसभा एथिक्स कमेटी की 479 पेज की रिपोर्ट में महुआ मोइत्रा को सदन से निष्कासित करने की सिफारिश की गई है. नियमों के मुताबिक़ एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष संसद के अगले सत्र के दौरान इस रिपोर्ट को सदन में पेश करेंगे.

फिर लोकसभा में इस पर बहस होगी. इसके बाद सरकार निष्कासन पर प्रस्ताव ला सकती है. अगर इसके पक्ष में वोट पड़े तो संसद सदस्य को निष्कासित किया जा सकता है.

पीडीटी आचारी का कहना है कि अगर महुआ मोइत्रा को लोकसभा से बर्खास्त कर दिया जाता है और ये पता चलता है कि इस प्रक्रिया में एथिक्स कमेटी ने कोई गैर कानूनी कदम या गैर संवैधानिक प्रक्रिया अपनाई है या फिर सदस्य को प्राकृतिक न्याय से वंचित किया गया है तो अदालत में इसे चुनौती दी जा सकती है. वरना नहीं.

इस तरह के मामले में कोर्ट जाने की संभावना काफी कम रह जाती है. अगर कानून या संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया और प्राकृतिक न्याय नहीं हुआ है तो इनके आधार पर अदालत में फैसले को चुनौती दी जा सकती है.

नीरजा चौधरी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "महुआ ने निष्कासित होने की स्थिति में दोबारा लोकसभा चुनाव में जीत कर आने की बात कही है. इससे ऐसा लगता है अगर फैसला उनके ख़िलाफ़ जाता है तो भी वो अदालत में इसे चुनौती नहीं देंगी. क्योंकि उन्हें मालूम है कि लोकसभा चुनाव नजदीक है और अदालत में मामला काफी लंबा खिंच सकता है."

क्या है पूरा मामला?

महुआ मोइत्रा पर आरोप है कि उन्होंने अपना पार्लियामेंट का पासवर्ड लॉगइन बिजनेसमैन दर्शन हीरानंदानी से शेयर किया ताकि वो उनकी ओर जब भी जरूरत पड़े संसद में 'सीधे सवाल' कर सकें.

'इंडियन एक्सप्रेस' को दिए एक इंटरव्यू ने महुआ ने माना था कि उन्होंने उन्होंने दर्शन हीरानंदानी से लॉगइन और पासवर्ड शेयर किया है. लेकिन उन्होंने इसके एवज में कैश लेने की बात से इनकार किया. जबकि वकील जय अनंत देहाद्राई ने अपनी शिकायत में कहा था कि महुआ ने पैसे लेकर हीरानंदानी ग्रुप की ओर से सवाल पूछे हैं.

हीरानंदानी ग्रुप अदानी ग्रुप का प्रतिस्पर्द्धी है. इसने कई बिजनेस सौदों में अदानी ग्रुप की प्रतिस्पर्द्धा में बोली लगाई है.

देहाद्राई की इस शिकायत के बाद बीजेपी सांसद ने लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला को चिट्ठी लिख महुआ मोइत्रा को सदन से निलंबित करने और उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की थी.

क्या था 2005 का पैसे लेकर सवाल पूछने का मामला ?

ये पहली बार नहीं है जब किसी सांसद पर पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने का आरोप लगाया गया है. 2005 में भी ऐसे आरोप लगे थे लेकिन तब ये आरोप किसी सांसद ने अपने साथी सांसद पर नहीं लगाए थे.

दरअसल 2005 में न्यूज वेबसाइट कोबरा पोस्ट और एक निजी न्यूज़ चैनल ने एक स्टिंग ऑपरेशन कर संसद में पैसे लेकर सवाल करने का भंडाफोड़ किया था.

12 दिसंबर 2005 को स्टिंग का प्रसारण किया गया था. इसमें दिखाया कि 11 सांसद संसद में सवाल करने का वादा कर पैसे ले रहे हैं. इन 11 सांसदों में छह बीजेपी के थे. तीन बहुजन समाज पार्टी के एक-एक राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के थे.

लोकसभा ने सवाल करने के लिए पैसे ले रहे अपने दस सांसदों को बर्खास्त कर दिया था. इन सांसदों में एक सांसद राज्यसभा के थे. उन्हें भी बर्खास्त किया गया.

जिस समय ये मामला सामने आया उस समय सभी पार्टियों ने सांसदों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की थी. लेकिन जब कार्रवाई हुई तो बीजेपी ने वोटिंग का ये कह कर बहिष्कार किया था को ये ‘कंगारू कोर्ट’ का फैसला है.

क्या विश्लेषकों का मानना है कि महुआ मोइत्रा के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों में कोई सुबूत पेश नहीं किया गया है. इसलिए उनका निष्कासन संभव नहीं है. वहीं 2015 के इस मामले को स्टिंग ऑपरेशन के जरिये फिल्माया गया था. और यही इसका सुबूत बना.

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