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वर्ल्ड कप 2023: भारतीय क्रिकेट टीम के साथ क्यों जुड़ गया है 'चोकर्स' का टैग
- Author, अयाज़ मेमन
- पदनाम, खेल लेखक
भारतीय क्रिकेट टीम अपने घरेलू मैदानों पर निस्संदेह वर्ल्ड कप जीतने की प्रबल दावेदार है. लेकिन उनके साथ चोकर्स का टैग भी जुड़ा हुआ है.
क्रिकेट की दुनिया में चोकर्स का टैग अपने ज़माने में बेहद प्रतिभाशाली टीम साउथ अफ्रीका को भी मिला था. 1995 और 2015 के बीच में यह टीम, लगातार हर बड़ी ट्रॉफ़ी के दौरान आख़िरी मौकों पर चूकती रही थी.
2013 में चैंपियंस ट्रॉफ़ी जीतने के बाद, भारतीय टीम सभी प्रमुख आईसीसी ट्रॉफ़ियों में लगातार विफल होती रही और यही वजह है कि चोकर्स का टैग इस टीम के साथ भी जुड़ गया.
2013 से ठीक दो साल पहले, भारतीय क्रिकेट ने वर्ल्ड कप का ख़िताब जीता था. इस कामयाबी से चार साल पहले 2007 में कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के पहले असाइनमेंट और टीम के वरिष्ठ खिलाड़ियों की गैर मौजूदगी में टीम ने ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप का ख़िताब जीता था.
2007 में ही आईसीसी ने ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप के आयोजन की शुरुआत की थी और भारत इसका पहला चैंपियन बना था.
महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में कामयाबी की इस हैट्रिक ने ना केवल धोनी को एक बड़ा मुकाम दिलाया बल्कि भारतीय क्रिकेट में पैसे और प्रतिभाओं की मौजूदगी को रेखांकित किया.
2007 के एक साल बाद 2008 में इंडियन प्रीमियर लीग की शुरुआत हुई और लोकप्रियता और कमाई के मामले में लीग पहले साल ही लगातार बढ़ती रही.
इसके चलते देश के कोने-कोने से क्रिकेट सितारों का आगमन हुआ और क्रिकेट की दुनिया में भारत का दबदबा लगातार बढ़ता दिखा. ऐसा लगने लगा था कि इस टीम को रोकना अब मुश्किल होगा.
कड़ी प्रतिस्पर्धा
भारत क्रिकेट की दुनिया में ना केवल एक बड़ी ताक़त है बल्कि वैश्विक स्तर पर खेल से जुड़ी आमदनी का 70 प्रतिशत हिस्सा भी इस देश से आता है, क्योंकि क्रिकेट देखने वाले लोगों की 70 प्रतिशत आबादी भी इसी देश में रहती है.
लंबे समय तक टीम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट टीम के तौर पर आंकी जाती रही और तीनों फॉर्मेट में लंबे समय तक टीम आईसीसी की रैंकिंग में शीर्ष पर रही.
दिलचस्प संयोग है कि 2023 के वर्ल्ड कप से ठीक पहले भारतीय क्रिकेट टीम टेस्ट, वनडे और ट्वेंटी-20 क्रिकेट में एक बार फिर से आईसीसी की रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंच गई है.
भारतीय क्रिकेट अपनी खामियों के बावजूद सभी उम्र वर्ग के खिलाड़ियों को विश्व स्तरीय सुविधाएं, पैसा और अवसर प्रदान करने में सक्षम है.
दुनिया भर में सबसे ज़्यादा क्रिकेट प्रतिभाएं भारत में ही मौजूद हैं और टीम में जगह बनाने के लिए खिलाड़ियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा है.
यही वजह है कि खिलाड़ियों को जगह पक्की करने के लिए कड़ी मेहनत और लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के लि मजबूर होना पड़ता है.
भारत में क्रिकेट लगातार मज़बूत होता दिखा है लेकिन बीते एक दशक से किसी बड़े टूर्नामेंट में टीम को कामयाबी नहीं मिली है और यह टीम के प्रशंसकों के लिए निराशा का सबब बना हुआ है.
अजीब संयोग है कि 2013 के बाद से हर बड़े टूर्नामेंट में भारतीय टीम को फेवरिट माना जाता रहा है लेकिन फ़ाइनल या उससे पहले ही टीम इंडिया लड़खड़ा कर बाहर हो गई है.
इस परेशान करने वाले प्रवृति को कैसे समझाया जा सकता है?
कहां है समस्या?
क्या यह खिलाड़ियों के चयन को लेकर ख़राब नीति का परिणाम है या फिर ख़राब टीम योजना का नतीजा है?
क्या बार-बार कप्तान या कोच बदलना इसकी वजह है या फिर खिलाड़ियों पर ज़्यादा मैच खेलने को बोझ है? या केवल टीम इंडिया का दुर्भाग्य है?
वास्तविकता यही है कि इन सभी कारकों ने किसी ने किसी रूप में भारतीय टीम के प्रदर्शन को प्रभावित किया है.
लेकिन सच्चाई यह भी है कि भारतीय टीम अधिकांश टूर्नामेंट के नॉकआउट राउंड तक पहुंची है, इसलिए यह कहना सही होगा कि समस्या की जड़ कहीं और है.
हमें यह समझना होगा बड़े टूर्नामेंट केवल प्रतिभाओं के दम पर नहीं जीते जाते. यह इस बात पर निर्भर करते हैं कि टीम के खिलाड़ी विभिन्न परिस्थितियों और पिच पर खेलने के लिए खुद को कितनी जल्दी तैयार कर लेते हैं.
सबसे अहम पहलू यह है कि टीम के खिलाड़ी व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर मैदान के अंदर और बाहर की कठिन परिस्थितियों से कैसे निपटते हैं? अगर एक वाक्य में समझें तो सवाल यह है कि भारतीय टीम दबाव का सामना कैसे करती है?
हमें यह भी देखना होगा कि भारतीय खिलाड़ियों पर करीब 140 करोड़ों लोगों की उम्मीदों का दबाव है.
इतनी बड़ी संख्या में प्रशंसकों की मौजूदगी और केवल जीत देखने की उम्मीद का दबाव, सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को भी प्रभावित कर सकता है और अहम मौकों पर उन्हें कमजोर कर सकता है.
भारत के पूर्व कप्तान और पूर्व मुख्य कोच रहे रवि शास्त्री का कहना है कि व्यक्तिगत खेलों में दबाव अकेले खिलाड़ी पर होता है, लेकिन टीम गेम में मामला जटिल हो जाता है.
क्योंकि ऐसे में हर खिलाड़ी को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होता है, कुछ खिलाड़ियों को उन खिलाड़ियों के हिस्से का प्रदर्शन भी करना होता है, जिनका दिन ख़राब बीतता है.
चुनौतियों से पार पाएगी टीम इंडिया?
शास्त्री कहते हैं, "एक ख़राब प्रदर्शन का स्पैल या फिर एक ख़राब चयन, सारी मेहनत पर पानी फेर सकता है."
एक ख़राब प्रदर्शन के स्पैल ने 2019 के वर्ल्ड कप सेमीफ़ाइनल में भारतीय टीम को बाहर का रास्ता दिखा दिया था.
न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ शुरुआती कुछ ओवरों के अंदर ही रोहित शर्मा और विराट कोहली सहित तीन विकेट गिर गए और टीम इससे उबर नहीं सकी.
इसी तरह वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फ़ाइनल में भारतीय टीम प्रबंधन ने आईसीसी रैंकिंग के शीर्ष टेस्ट गेंदबाज़ आर अश्विन को नहीं खिलाया और भारतीय टीम 209 रनों से हार गई. यह ख़राब चयन का उदाहरण था.
ये दोनों उदाहरण रवि शास्त्री की राय की पुष्टि करते हैं.
उन्होंने कहा, "खिलाड़ियों को मानसिक तौर पर मज़बूत होने की ज़रूरत है. इस स्तर पर एक छोटी सी चूक भी आपका खेल ख़त्म कर सकती है."
ऐसे में क्या भारतीय टीम मानसिक तौर पर इतनी मज़बूत है कि वह वर्ल्ड कप जीत ले? प्रतिभा, अनुभव और टीम में संतुलन को देखते हुए लगता है कि भारतीय टीम बेशक यह वर्ल्ड कप जीत सकती है. एशिया कप से पहले तक टीम पूरी तरह तैयार नहीं दिख रही थी. टीम को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे थे.
पहला सवाल तो यही था कि चोट के चलते लंबे समय तक टीम से बाहर रहे जसप्रीत बुमराह, केएल राहुल और श्रेयस अय्यर की ज़ोरदार वापसी कर पाएंगे?
रविंद्र जडेजा और अक्षर पटेल के रूप में दो-दो बाएं हाथ के गेंदबाज़ के होते हुए कुलदीप यादव को वापस बुलाने का फ़ैसला सही है? विकेटकीपर के तौर पर केएल राहुल और ईशान किशन के बीच में आपसी होड़ से दोनों पर अनावश्यक दबाव पड़ रहा है?
लेकिन एशिया कप की कामयाबी से इन सारे सवालों पर विराम लग गया. घरेलू मैदान पर खेलने से मेजबान भारत को भी फ़ायदा होगा जैसा कि पिछले तीन विश्व कप के दौरान देखा गया है लेकिन यह जीत की गारंटी नहीं देता है.
क्योंकि मेजबान टीम होने के बाद भी, 1992 में ऑस्ट्रेलिया नॉकआउट स्टेज़ तक भी नहीं पहुंच पाई थी, जबकि 1987 और 1996 में वर्ल्ड कप भारत में होने के बावजूद दोनों बार टीम सेमीफ़ाइनल में हारकर बाहर हो गई थी.
सीधे शब्दों में कहें तो खिलाड़ियों के एक समूह को एक अपराजेय टीम बनाने का कोई सरल नुस्खा नहीं है. खिलाड़ियों की क्षमता के अलावा, सही टीम चयन, खिलाड़ियों की आपसी केमिस्ट्री और फिर दबाव झेलने की क्षमता महत्वपूर्ण है.
अगले सात से आठ हफ्तों में भारतीय टीम इन कई चुनौतियों का सामना कैसे करती है, यह देखना बाक़ी है और यह निर्धारित करेगा कि भारतीय टीम इस बार चैंपियन बनेगी या फिर 'चोकर्स' बनकर उभरेगी.
(अयाज़ मेमन आठ वर्ल्ड कप क्रिकेट टूर्नामेंट कवर कर चुके हैं.)
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