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वर्ल्ड कप: बुमराह, सिराज और शमी, तेज़ गेंदबाज़ों की तिकड़ी क्यों है टीम इंडिया की असल ताक़त
- Author, सुरेश मेनन
- पदनाम, खेल लेखक
भारत ने जब 1983 में पहली बार क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता था, उस समय उसके लगभग सभी गेंदबाज़ ऑलराउंडर थे.
बहुत से खिलाड़ियों को थोड़ा गेंदबाज़ और थोड़ा बल्लेबाज़ कहा जाता था. इनमें से ज़्यादातर खिलाड़ी सिर्फ़ गेंदबाज़ी के दम पर टीम में अपनी जगह नहीं बना सकते थे. हालांकि कुछ खिलाड़ी इसके अपवाद भी थे. उन सबमें सबसे बड़े गेंदबाज़ तो कप्तान कपिल देव थे.
उस समय की टीम में मदन लाल, रोजर बिन्नी, संदीप पाटिल, मोहिंदर अमरनाथ थे. और, केवल दो मध्यम गति के तेज़ गेंदबाज़ थे- बलविंदर संधू और सुनील वालसन. वर्ल्ड कप जीतने वाली उस भारतीय टीम के में स्पिनर कीर्ति आज़ाद और रवि शास्त्री थे. हालांकि, शास्त्री को फाइनल में नहीं खिलाया गया था.
1983 के वर्ल्ड कप के फ़ाइनल मैच में भारत ने छह गेंदबाज़ उतारे थे. संदीप पाटिल से गेंदबाज़ी कराने की ज़रूरत नहीं थी और ओपनर कृष्णमाचारी श्रीकांत से भी गेंदबाज़ी नहीं कराई गई.
बाद के दिनों में श्रीकांत भी एक अच्छे गेंदबाज़ निकले थे और उन्होंने एक मैच में अपनी ऑफ़ स्पिन से न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ एक इनिंग्स में पांच विकेट झटक लिए थे.
मोहिंदर अमरनाथ ने हल्की-फुल्की (लगभग बच्चों जैसी) रफ़्तार वाली गेंदबाज़ी से ऐसा कमाल दिखाया था कि सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल मैचों में वो मैन ऑफ़ द मैच चुने गए थे.
लेकिन, चालीस साल पहले वनडे क्रिकेट को लेकर सोच थोड़ी अलग थी. उस वक़्त विकेट लेने से ज़्यादा ज़ोर विरोधी टीम को रन बनाने से रोकने पर दिया जाता था.
विकेट लेने पर ज़ोर
समय बीतने के साथ-साथ वनडे मैचों में तेज़ी से रन बनाने वाले बल्लेबाज़ों को आउट करने पर ज़ोर दिया जाने लगा. सोच ये थी कि ऐसे बल्लेबाज़ आउट हो जाएंगे तो रन बनने अपने आप रुक जाएंगे. और आज के दौर में रक्षात्मक गेंदबाज़ी करने के बजाय ज़रूरत ऐसे गेंदबाज़ों की है, जो विकेट ले सकें.
जब 2011 में भारत ने अपने घर में वर्ल्ड कप जीता तो उस वक़्त के सारे बड़े बल्लेबाज़ गेंदबाज़ी कर सकते थे. फिर चाहे वो सचिन तेंदुलकर हों, युवराज सिंह हों, वीरेंद्र सहवाग या फिर सुरेश रैना हों.
हालांकि, फ़ाइनल मैच में सिर्फ़ सचिन तेंदुलकर और युवराज सिंह से गेंदबाज़ी कराई गई थी. इसके अलावा विराट कोहली ने भी कुछ ओवर डाले थे.
2023 की टीम 2011 से कितनी अलग
2011 के वर्ल्ड कप के 12 सबसे कामयाब गेंदबाज़ों में से सात, मध्यम गति के तेज़ गेंदबाज़ थे. ज़हीर ख़ान ने सबसे ज़्यादा 21 विकेट लिए थे. इतने ही विकेट पाकिस्तान के लेग स्पिनर शाहिद अफ़रीदी ने भी लिए थे.
2011 का वर्ल्ड कप खेलने वाली भारतीय टीम में ज़हीर ख़ान के अलावा, एस. श्रीशांत, मुनाफ़ पटेल, आशीष नेहरा और प्रवीण कुमार के रूप में दूसरे तेज़ गेंदबाज़ थे.
वहीं, तीन स्पिनर यानी हरभजन सिंह, पीयूष चावला और रविचंद्रन अश्विन भी टीम में शामिल थे. साफ़ है कि उस समय ज़ोर तेज़ गेंदबाज़ी पर था और इस साल भी यही रहने की उम्मीद है.
1983 की भारतीय टीम में जहां हरफनमौला खिलाड़ियों का दबदबा था. वहीं, 2023 की टीम में विशेषज्ञ गेंदबाज़ों को तरज़ीह दी गई है.
टॉप के आधे खिलाड़ी ऐसे हैं, जो गेंदबाज़ी नहीं कर सकते हैं. हालांकि, ये बात निचले पायदान पर बैटिंग के लिए आने वाली बाक़ी की टीम के साथ नाइंसाफ़ी है. क्योंकि, गेंदबाज़ों से थोड़ी बहुत बल्लेबाज़ी की उम्मीद की जाती है.
ऐसा लगता है कि ये बात कम अवधि के मैचों के तर्क के ख़िलाफ़ जाती है. ऐसे मैचों में सैद्धांतिक तौर पर हर खिलाड़ी से ये उम्मीद की जाती है कि वो अपनी ख़ासियत के अलावा खेल के दूसरे मोर्चों में भी कुछ न कुछ तो कर सकेगा. लेकिन, अब उन्हीं खिलाड़ियों से काम चलाना पड़ेगा, जिन्हें वर्ल्ड कप की टीम में जगह दी गई है.
गेंदबाज़ी में हैं अच्छे विकल्प
जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद सिराज, मोहम्मद शमी, शार्दुल ठाकुर और हार्दिक पंड्या जैसे खिलाड़ियों के टीम में होने का मतलब है कि टीम इंडिया की ताक़त तेज़ गेंदबाज़ी है. ख़ास तौर से तब और जब पीठ की चोट से उबरने वाले जसप्रीत बुमराह को टीम में इस उम्मीद में जगह दी गई है कि वो अपना बेहतरीन प्रदर्शन करेंगे.
जसप्रीत बुमराह को बहुत अहम भूमिका निभानी होगी. वहीं, एशिया कप के फ़ाइनल में ज़बर्दस्त प्रदर्शन करने वाले मोहम्मद सिराज को दूसरों पर तरज़ीह दी जा सकती है.
जब टीम में तीसरे तेज़ गेंदबाज़ के लिए मोहम्मद शमी और शार्दुल ठाकुर के बीच चुनाव करना हो, तो ज़ाहिर है कि आपके पास अच्छे गेंदबाज़ों की कमी नहीं है.
इस वक़्त तो ये पता नहीं है कि वर्ल्ड कप के लिए किस तरह की पिच तैयार की जा रही है (2011 का वर्ल्ड कप मार्च अप्रैल में खेला गया था). ऐसे में ये मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि शुरुआत में तेज़ गेंदबाज़ प्रमुख भूमिका निभाएंगे.
स्पिनर भी कर सकते हैं कमाल
शुरुआती मुक़ाबलों के बाद ही पिच स्पिन गेंदबाज़ों की मदद करना शुरू करेगी, जब ज़्यादा मैच खेले जाने हैं. इसके बाद ओस की भी भूमिका अहम होगी. जो टीम बाद में गेंदबाज़ी करती है, उसके स्पिनर्स के लिए ओस एक चुनौती बन जाती है.
मैच भारतीय समय के मुताबिक़ दोपहर दो बजे शुरू होंगे, तो लाइट जलने के बाद तेज़ गेंदबाज़ों को गेंद स्विंग कराने का मौक़ा मिलेगा.
उससे पहले स्पिनर्स के पास अपना कमाल दिखाने का थोड़ा-सा मौक़ा ज़रूर होगा. तो, बात फिर उसी संतुलन पर आ जाती है. आपको हर मौक़े के लिए गेंदबाज़ों की दरकार होगी.
और, भारत के पास ऐसे खिलाड़ी हैं.
कुलदीप यादव, वनडे मैचों के मौजूदा स्वरूप में एक कामयाब स्पिनर बनकर उभरे हैं. चूंकि, अंतिम टीम में चोटिल अक्षर पटेल की जगह रविचंद्रन अश्विन को जगह दी गई है. ऐसे में भारत के पास स्पिनर्स की बेहतरीन जोड़ी होगी. ज़रूरत पड़ने पर रविंद्र जाडेजा को तीसरे स्पिनर के तौर पर टीम में शामिल किया जा सकता है.
इंग्लैंड के पास भी बेहतर गेंदबाज़
मार्क वुड, क्रिस वोक्स, रीस टोपले, डेविड विले और सैम करन के रूप में इंग्लैंड की टीम के पास तेज़ गेंदबाज़ों की ज़बरदस्त टुकड़ी है.
वहीं, ऑस्ट्रेलिया के पास मिशेल स्टार्क, जॉश हैज़लवुड, पैट कमिंस, मार्कस स्टोइनिस और कैमरन ग्रीन हैं.
वहीं, नसीम शाह के चोटिल होने की वजह से पाकिस्तान को अपनी टीम में थोड़ा बदलाव भले करना पड़ा हो. लेकिन, उनके पास भी शाहीन अफ़रीदी, हारिस रऊफ़, हसन अली और मोहम्मद वसीम के रूप में अच्छे गेंदबाज़ हैं.
ऐसे में हमें इस वर्ल्ड कप के दौरान तेज़ गेंदबाज़ों का ज़बरदस्त मुक़ाबला देखने को मिल सकता है.
ऐसा हुआ, तो भारत काफ़ी मज़बूत स्थिति में रहेगा. क्योंकि, पहला वर्ल्ड कप जीतने के बाद से ये अब तक की सबसे सटीक कॉम्बिनेशन वाली टीम इंडिया है.
(स्पोर्ट्स राइटर सुरेश मेनन, सचिन तेंदुलकर और बिशन सिंह बेदी पर किताबें लिख चुके हैं.)
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