ह्यूमन सेल एटलस क्या है? इससे मानवता को कैसे मिलेगा फ़ायदा?- दुनिया जहान

कोविड से संक्रमित एक कोशिका.

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मानव सभ्यताओं ने शुरुआत से ही दुनिया को समझने के लिए नक़्शे बनाना शुरू कर दिया था. 

नदियों और पहाड़ों से लेकर ब्रह्मांड की सटीक तस्वीर उतारने के लिए वैज्ञानिक नक़्शे बनाते रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों से वैज्ञानिक, मानव शरीर के बुनियादी ढांचे को समझने के लिए नक़्शे बना रहे हैं.

मानव जीन कैसे काम करते हैं यह समझने के लिए, साल 1990 में छह देशों के वैज्ञानिकों ने मानव जीनोम प्रोजेक्ट शुरू किया था.

लगभग दस साल में ही उन्होंने मानव शरीर में जीन की संरचना और क्रोमोसोम्स का नक़्शा बना लिया.

यह एक क्रांतिकारी उपलब्धि थी, क्योंकि इस जानकारी का इस्तेमाल दुनियाभर के चिकित्सा क्षेत्र में किया जाने लगा.

लेकिन जीनोम प्रोजेक्ट बस एक शुरुआत मात्र था. जैसा कि हम जानते हैं कि शरीर में जो भी होता है वो निर्भर करता है शरीर की सेल यानी कोशिकाओं की संरचना पर.

यह कैसे बनती हैं, कैसे काम करती हैं? विज्ञान के लिए यह एक महत्वपूर्ण पहेली रही है. इस हफ़्ते हम दुनिया जहान में यह जानेंगे कि ह्यूमन सेल एटलस क्या है?

जीवन का सबसे छोटा स्वरूप

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ह्यूमन सेल या मानव कोशिकाओं का नक़्शा बनाने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि ये सेल दरअसल क्या हैं?

हमने बात की अवीव रेगेव से जो ह्यूमन सेल एटलस प्रोजेक्ट की सह अध्यक्ष हैं. यह प्रोजेक्ट 2016 में शुरू किया गया था.

अवीव ने बताया, ''सेल जीवन का सबसे छोटा स्वरूप होती है. इसके भीतर हमारा जेनेटिक कोड होता है. सेल इस डीएनए को सक्रिय करके मोलिक्यूल बनाने में मदद करती हैं.''

हर सेल या कोशिका में अलग किस्म के जीन होते हैं, जो सेल को बताते हैं कि उसे क्या करना है.

अवीव रेगेव

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अगर कोशिकाएं यानी सेल, सही तरीके से काम करें तो हम स्वस्थ रहते हैं, लेकिन अगर जीन इन सेल को ग़लत निर्देश देने लग जाएं तो यह ग़लत तरीके से काम करने लगती हैं और हम बीमार पड़ जाते हैं.

मिसाल के तौर पर एक ऐसी सेल है, जिससे सिस्टिक फ़ायब्रोसिस होता है. यह वंशानुगत बीमारी है जिससे फेफड़े और पाचन तंत्र में समस्या पैदा हो जाती है.

जिस जीन की वजह से यह बीमारी होती है, उसकी पहचान तीस साल पहले कर ली गई थी. मगर यह पता नहीं चल पाया था कि इस जीन के ग़लत निर्देश देने से कौन सी सेल सही तरीके से काम नहीं करतीं.

फिर 2018 में अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी की मदद से अवीव रेगेव सहित कुछ वैज्ञानिकों ने इस ख़ास सेल का पता लगा लिया.

इस सेल के ग़लत तरीके से काम करने से फेफड़ों में पस जमने लगता है, जिससे बैक्टीरिया पनपते हैं और बीमारी फैलती है.

अवीव कहती हैं कि हर कोशिका को विस्तार से समझने से हमारी मानव शरीर के बारे में समझ और गहरी हो जाएगी.

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शरीर के हर अंग में अलग किस्म की सेल होती हैं जिनकी ख़ास भूमिका होती है. ये सभी सेल मिल कर काम करती हैं. हमें यह समझना है कि यह सेल एक दूसरे से अलग कैसे हैं.
अवीव रेगेव
सह अध्यक्ष, ह्यूमन सेल एटलस प्रोजेक्ट
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अवीव रेगेव कहती हैं, ''कल्पना कीजिए आपके घर पर कई किस्म के फल हैं, केले हैं, जामुन हैं, अनार हैं. सारे केले एक जैसे नहीं होते और ना ही सारे जामुन एक जैसे होते हैं. सेल भी ऐसे ही होती हैं."

"जांच के दौरान हमने सेल इकठ्ठा करके परीक्षण शुरू किया तो तस्वीर कुछ ख़ास साफ़ नहीं थी, क्योंकि हमारे शरीर में लाखों, अरबों सेल होती हैं.''

इसे ऐसे समझें की सारे फलों को ब्लेंडर में डालकर पीस दे तो क्या होगा. कोई फल अलग से दिखाई नहीं देगा, लेकिन अब मॉडर्न टेक्नॉलजी की मदद से हम हर सेल को अलग से देख पाएंगे.

हमने बात की कि जीन म्यूटेशन एक वजह है जिस कारण सेल ठीक से काम नहीं करतीं. दूसरा कारण है वायरस.

सेल के ग़लत तरीके से काम करने से क्या होता है?

अवीव रेगेव कहती हैं कि इससे बीमारी होती है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सी सेल ग़लत तरीके से काम कर रही है.

मिसाल के तौर पर सेल अनियंत्रित तरीके से बंटने लग जाएं तो कैंसर हो जाता है. इसी वजह से फोड़े हो जाते हैं.

कौन सी बीमारी हो सकती है यह इस पर निर्भर है कि कौन सी सेल ग़लत काम कर रही है. इसलिए हमारे लिए हर प्रकार की सेल को समझना बहुत ज़रूरी है ताकि बीमारी का इलाज किया जा सके.

यही मक़सद है, विश्व के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ह्यूमन सेल एटलस का.

ह्यूमन सेल एटलस

कोरोना से संक्रमित एक कोशिका

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सैरा टाइकमन ह्यूमन सेल एटलस प्रोजेक्ट की दूसरी सह संस्थापक हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि ह्यूमन सेल एटलस प्रोजेक्ट क्यों शुरू किया गया.

वे कहती हैं, "हमें मानव शरीर में मौजूद सभी सेल का एक नक़्शा बनाने की ज़रूरत है ताकि हम शरीर को बेहतर तरीके से समझ पाएं."

"इससे हमें बीमारियों के कारण समझने और उनका इलाज करने में मदद मिलेगी. यह हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी साबित होगा.''

यह भी कहा जा सकता है कि ह्यूमन सेल एटलस एक तरह से शरीर का गूगल मैप होगा.

सैरा टाइकमन

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सैरा टाइकमन कहती हैं कि यह समझने से हम टिश्यू या ऊतकों को समझ पाएंगे जिनसे हमारे शरीर के अवयव बनते हैं.

यानी सेल को समझने से हमारी जीव विज्ञान की समझ पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. इससे बीमारियों के इलाज की नई तकनीक और दवाइयां बनाने में मदद मिलेगी.

अब आधुनिक टेक्नोलॉजी की मदद से शक्तिशाली माइक्रोस्कोप बन चुके हैं जिनके ज़रिए इन सेल और मॉलिक्यूल को देखा जा सकता है. इस जानकारी को शक्तिशाली कंप्यूटरों को ज़रिए प्रोसेस किया जा सकता है.

ह्यूमन एटलस के जरिए अब तक किए गए काम का कोविड महामारी को नियंत्रित करने में पहले ही इस्तेमाल किया जा चुका है.

इसी काम के ज़रिए वैज्ञानिकों ने पता लगाया था कि वायरस हमारी आंख, नाक और मुंह के ज़रिए शरीर में प्रवेश करते हैं.

इस जानकारी से सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियां प्रभावित हुईं और इसी के आधार पर मास्क पहनने के निर्देश जारी हुए.

यह रिसर्च एक झलक मात्र है. अगर हमारे पास मानव शरीर की सभी कोशिकाओं का नक़्शा आ जाए तो वो बहुत लाभदायक होगा.

सैरा

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शक्तिशाली माइक्रोस्कोप के ज़रिए हम देख समझ पाएंगे कि हमारा शरीर किन तत्वों से बना है. यही ह्यूमन सेल एटलस प्रोजेक्ट का मक़सद है.''

यह प्रोजेक्ट अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित है. इस दौरान बेहिसाब जानकारी इकठ्ठा की जा रही है जिसका आकलन करना एक छोटी टीम के लिए मुश्किल है.

इसलिए इस प्रोजेक्ट के लिए दुनिया के कई देशों के वैज्ञानिकों को शामिल करना ज़रूरी है.

वैश्विक स्तर का प्रोजेक्ट

दिल्ली में जीनोम सिक्वेंसिंग लैब

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कोशिकाओं यानी ह्यूमन सेल का नक़्शा तो तैयार किया जा रहा है, मगर सेल, डीएनए द्वारा नियंत्रित होती हैं और सबका डीएनए अलग होता है.

यह प्रक्रिया कितनी पेचीदा है, इसके बारे में हमने बात की पियेरो कारनिंची से, जो जापान स्थित रीकेन सेंटर में जेनेटिक्स हैं.

वो कहते हैं, ''सबके डीएनए अलग होने की वजह से हर किसी में जब कोई बीमारी फैलती है तो उनके सेल की प्रतिक्रिया अलग होती है. मिसाल के तौर पर भिन्न आबादियों में डायबिटीज की बीमारी का स्वरूप थोड़ा अलग होता है. इस पर पर्यावरण और खानपान का असर भी पड़ता है.''

यानी स्वास्थ्य पर पर्यावरण और किस प्रकार की खाद्य सामग्री का सेवन होता है, इसका भी असर पड़ता है.

ऐसे में अगर एक छोटे समुदाय से जानकारी जुटाई जाए तो वो ख़ास काम की नहीं होगी. इसके लिए समग्र अध्ययन की जरूरत है.

पियेरो कारनिंची कहते हैं कि हम ऐसी दवा नहीं बनाना चाहते जो विश्व की आबादी के एक छोटे तबके पर ही असरदार साबित हो. इसलिए हम एक बड़ी आबादी से स्वस्थ और बीमार लोगों के सैंपल इकठ्ठा करना चाहते हैं.

इसके साथ स्वास्थ्य सेवाओं के लोकतांत्रिकरण का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है. अगर ग़रीब देशों के डॉक्टर और वैज्ञानिकों के साथ यह डाटा साझा किया जाए तो वो अधिकाधिक लोगों का बेहतर इलाज कर पाएंगे.

इसे ध्यान में रखते हुए दुनिया भर के वैज्ञानिकों को एक साथ लाना कितना मुश्किल था?

पियेरो कारनिंची ने इस बारे में कहा, ''दुनिया भर के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को इस प्रोजेक्ट के बारे में समझाना और सैंपल इकठ्ठा करना, उसके विश्लेषण में मदद के लिए राज़ी करना और उनके साथ समन्वय क़ायम करना चुनौतीपूर्ण था. इसमें भाषा की दिक्कत भी थी.''

इस काम में कई भाषाई, सांस्कृतिक और सरकारी समस्याएं हैं. साथ ही लोगों के स्वास्थ्य की जानकारी या डाटा को किस प्रकार सुरक्षित रखा जाएगा इसे लेकर भी चिंताएं हैं. कई चुनौतियों के बावजूद यह एक अत्यंत महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है.

समस्याओं के बावजूद वैज्ञानिकों के लिए यह इतना आकर्षक है कि 94 देशों से तीन हज़ार से ज्यादा शोधकर्ता इसमें शामिल हो चुके हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह कैसे काम करेगा और मरीज़ों पर इसका क्या असर पड़ेगा?

ह्यूमन सेल एटलस से फ़ायदा क्या होगा

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ह्यूमन सेल एटलस प्रोजेक्ट का मक़सद है मानव शरीर में मौजूद सभी कोशिकाओं का नक़्शा बनाना ताकि दुनिया के किसी भी कोने में डॉक्टरों को पता चल जाएगा कि एक स्वस्थ कोशिका कैसी दिखाई देती है.

स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी में पैथोलॉजी और इम्यूनोलॉजी के प्रोफ़ेसर शॉन रैंडल बताते हैं कि ह्यूमन सेल एटलस कैसा दिखेगा.

वे बताते हैं, ''इस एटलस पर मानव शरीर के सभी अंग चित्रित होंगे उसमें से किसी पर भी क्लिक करके आप उसके और भीतर जा सकते हैं."

"इसमें आप टिश्यू की तस्वीर देख सकते हैं. उसमें उस टिश्यू की ऐसी तस्वीरें होगी जिससे पता चलेगा कि वो स्वस्थ होने पर कैसा दिखता है और बीमार होने पर कैसा दिखाई देता है.''

शॉन कहते हैं यह एटलस मानव शरीर का गूगल मैप होगा या एक तरह की विशाल डिक्शनरी होगा जिसमें हर सेल के बारे में जानकारी पाई जा सकती है.

शॉन रैंडल ने कहा कि इसमें अलग अलग जगहों, पृष्ठभूमि और भिन्न आयु के लोगों की कोशिकाओं के सैंपल और जानकारी शामिल की जाएगी. इसमें स्वस्थ और बीमार लोगों के सैंपल भी होंगे. इस एटलस की सहायता से हम भिन्न कोशिकाओं के सैंपल की तुलना कर पाएंगे.

इस दृष्टि से देखा जाए तो इस जानकारी की मदद से डॉक्टर बहुत जल्द बीमारी का पता लगा पाएंगे. यानी डॉक्टर ब्लड टेस्ट के ज़रिए सेल की स्थिति का विश्लेषण करते हैं जिससे उन्हें पता चलता है कि कौन सी सेल सामान्य से अलग है और फिर वो तय करते हैं कि इसका इलाज कैसे किया जाए.

इस एटलस में उपलब्ध विशाल डाटाबेस का सबसे बड़ा फ़ायदा यह होगा कि इससे बीमारी का ग़लत अनुमान या ग़लत डाइग्नोसिस नहीं होगा.

शॉन रैंडल कहते हैं कि मिसाल के तौर पर हेपेटाइटिस की बीमारी. यह लिवर यानी यकृत की बीमारी है. हम जानते हैं यह अधिक शराब पीने से हो सकती है या जेनेटिक कारणों से भी हो सकती है.

वे कहते हैं कि इसके अलग स्वरूप और कारण होते हैं. वैसे ही इलाज भी अलग होते हैं. मगर इन सभी बीमारियों के लक्षण एक जैसे होते हैं. इस प्रोजेक्ट में इकठ्ठा की गई जानकारी के आधार पर हम इस प्रकार की भिन्न बीमारियों में फ़र्क कर पाएंगे.

यानि इस एटलस की मदद से एक तो बीमारी की जांच सटीक होगी और उसके चलते सही इलाज भी हो पाएगा. एक फ़ायदा यह भी होगा कि डॉक्टरों को कोई ख़ास परीक्षण नहीं करना पड़ेगा बल्कि सामान्य टेस्ट से ही बीमारी का पता चल जाएगा.

शॉन कहते हैं कि सामान्य टेस्ट के दौरान अगर डॉक्टर किसी सेल में कोई असमान्य बात पाते हैं तो वो उसकी तुलना एटलस में मौजूद सेल डेटाबेस से करके बीमारी का पता लगा सकते हैं.

अब हम लौटते हैं अपने प्रमुख प्रश्न की ओर... ह्यूमन सेल एटलस क्या है?

हमने अपने एक्सपर्ट से सुना कि ह्यूमन सेल एटलस या मानव कोशिकाओं का नक़्शा दरअसल हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं का अध्ययन और उसकी जानकारी है.

चूंकि यह एक वैश्विक सहयोग से चलने वाला प्रोजेक्ट है. इससे हमें पता चलेगा कि भिन्न आबादियों में पाई जानी वाली सेल में क्या फ़र्क होता है. यह एक रेफ़रेंस मैप होगा, जिसकी मदद से डॉक्टर बीमारी का जल्द पता लगा पाएंगे.

इसके फ़ायदे हाल ही में दिखाई दिए, जब कोविड महामारी के दौरान ह्यूमन सेल एटलस की जानकारी से हमें यह समझने में मदद मिली कि फेफड़े कैसे काम करते हैं और बीमारी का उन पर क्या असर पड़ता है.

सौ से अधिक देशों के वैज्ञानिक और शोधकर्ता इस प्रोजेक्ट में शामिल हैं, इसकी वजह से सबके बीच समन्वय रखना चुनौतिपूर्ण है. मगर यह चिकित्सा जगत के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकता है.

इसके साथ ही विश्व में चिकित्सा सेवाओं को लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में यह एक आवश्यक कदम है. इसके पूरा होने के बाद ग़रीब और धनी सभी देशों के पास बीमारी का पता लगाने के लिए एक ही जानकारी या कुंजी होगी.

इस दृष्टि से देखा जाए तो ह्यूमन सेल एटलस चिकित्सा जगत ही नहीं बल्की पूरी दुनिया में बदलाव ला सकता है.

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