एकजुट हो रहे हैं बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए लड़ रहे संगठन, पाकिस्तान के लिए कितना ख़तरा?

    • Author, रियाज़ सोहैल
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, कराची

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में सक्रिय बलोच चरमपंथी संगठनों में विलय के लिए वार्ता जारी हैं. उनमें से दो बड़े संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन फ़्रंट और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी में सहमति हो चुकी है. हालांकि नेतृत्व पर निर्णय होना बाक़ी है.

कलात राज्य के पाकिस्तान में विलय के बाद स्वतंत्रता का यह चौथा सशस्त्र आंदोलन है जो एक लंबे समय से जारी है.

हाल में बलोच चरमपंथी आंदोलन की बुनियाद ग्वादर बंदरगाह के निर्माण से शुरू हुई और इसमें तेज़ी उस समय आई जब ‘सूई’ में एक लेडी डॉक्टर से कथित तौर पर बलात्कार का मामला सामने आया.

इस घटना के बाद कद्दावर बलोच नेता नवाब अकबर बुगती ने इंसाफ़ के लिए आवाज़ बुलंद की.

इसके बाद बुगती और परवेज़ मुशर्रफ़ में टकराव हुआ और साल 2006 में एक सैनिक ऑपरेशन में नवाब अकबर बुगती मारे गए.

इस घटना के बाद पाकिस्तान विरोधी भावनाओं में वृद्धि देखी गई और प्रतिक्रिया में बलोच युवाओं की जबरी गुमशुदगी का सिलसिला तेज़ हो गया.

चीन और पाकिस्तान में जब आर्थिक कॉरिडोर का समझौता हुआ और चीन ने ग्वादर बंदरगाह के मामले संभालने के साथ ग्वादर में औद्योगीकिकरण की योजना बनाई तो वह भी बलोच चरमपंथी आंदोलन के निशाने पर आ गया.

विलय की पहले से हो रही कोशिशें

बलूचिस्तान में इस समय चरमपंथी संगठनों में बलोच लिबरेशन फ़्रंट, बलोच लिबरेशन आर्मी, बलोच रिपब्लिकन गार्ड, बलोच लिबरेशन टाइगर्स, बलोच नेशनलिस्ट आर्मी और यूनाइटेड बलोच आर्मी नाम के संगठन सक्रिय हैं.

इन संगठनों में से बीएलए, बीएलएफ़ और बीआरजी का पहले से ही ‘ब्रास’ के नाम से एक संयुक्त संगठन भी है.

चरमपंथी संगठनों को विलय की ज़रूरत क्यों पेश आ रही है?

इस बारे में चरमपंथी संगठन बलोच लिबरेशन आर्मी के कमांडर बशीर ज़ैब ने बीबीसी को बताया, “पाकिस्तान से आज़ादी के लिए बेहद ज़रूरी है कि बलोच राजनीतिक और सैन्य शक्तियों को मज़बूत करके उन्हें दुश्मन के ख़िलाफ़ एक प्रभावी आंदोलन में शामिल किया जाए."

बलोच लिबरेशन फ़्रंट के प्रमुख डॉक्टर अल्लाह नज़र का कहना है कि विलय या एकीकरण की कोशिशें शुरू से रही हैं और इसमें कामयाबी भी मिली है.

उनका कहना है, “सभी दल और संगठन एक ही उद्देश्य के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, आज़ादी सबका बुनियादी मक़सद है.”

विलय का मकसद हमले की क्षमता बढ़ाना है

पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ़ पीस स्टडीज़ के प्रमुख और चरमपंथी संगठनों पर नज़र रखने वाले विश्लेषक आमिर राना कहते हैं कि इस विलय की शायद ज़रूरत इस वजह से भी है ताकि संयुक्त हमले किए जाएं और उनको बढ़ाया जा सके.

आमिर राना कहते हैं, “इसके अलावा उनकी जो ताक़त है और सांगठनिक ढांचा है वह एक जगह पर इकट्ठा हो जाए. इस समय यह नज़र आता है कि जो लोग इन संगठनों में शामिल होना चाहते हैं वह अपने क्षेत्र के हिसाब से देखते हैं और कुछ क़बायली रुझान वाले संगठनों की ओर भी चले जाते हैं.”

वाशिंगटन में रहने वाले विश्लेषक मलिक सिराज अकबर कहते हैं कि अगर बलोच चरमपंथी संगठनों की कार्रवाइयों को अतीत की तुलना में देखा जाए तो रणनीति और स्तर में बड़ा अंतर नज़र आता है.

सिराज अकबर कहते हैं, “इन संगठनों का ध्यान अब ऐसी कार्रवाइयों पर केंद्रित है जिनका मकसद पाकिस्तान को बड़े पैमाने पर नुक़सान पहुंचाना है. यही वजह है कि पहले की तुलना में इन संगठनों की कार्रवाइयों की संख्या में तो कमी आई है लेकिन जब भी वह कोई कार्रवाई करते हैं तो लगता है कि इसकी योजना में बहुत वक़्त लगाया गया है.”

उनका कहना है की रणनीति और ऑपरेशंस में बदलाव की एक बड़ी वजह इन संगठनों के एक दूसरे के और निकट आना है.

“पूर्व की तुलना में इन संगठनों में अब एक दूसरे को अधिक बर्दाश्त करने और एक दूसरे के साथ मिलकर काम करने का रुझान पाया जाता है क्योंकि अब एक दूसरे का साथ इन संगठनों के लिए केवल एक विकल्प नहीं बल्कि उनके अस्तित्व की एक अनिवार्य शर्त है.”

विश्लेषक हाल की रणनीति को बलोच नेशनल आर्मी के प्रमुख गुलज़ार इमाम की कथित गिरफ़्तारी से भी जोड़ते हैं.

विश्लेषक आमिर राना कहते हैं कि गुलज़ार इमाम जैसी घटनाओं की रोकथाम के लिए भी यह संगठन समझते हैं कि अपनी शक्ति को एक जगह करना चाहिए.

मलिक सिराज अकबर भी इस पहलू से सहमति जताते हुए कहते हैं कि गुलज़ार इमाम की गिरफ़्तारी उन संगठनों के लिए एक बहुत बड़ा धक्का था क्योंकि गुलज़ार इमाम केवल एक लड़ाका नहीं बल्कि एक कमांडर था.

“उसके पास उन संगठनों के बारे में जानकारियों का एक बड़ा भंडार मौजूद है. अब यह संगठन गुलज़ार की गिरफ़्तारी के बाद डैमेज कंट्रोल में लगे हुए हैं कि किस तरह ख़ुद को नए सिरे से संगठित किया जाए ताकि उनके बारे में जो जानकारी सरकार तक पहुंची है वह उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल न हो.”

संगठनों का नेतृत्व कौन करेगा?

बलूचिस्तान के चरमपंथी संगठनों के नेतृत्व को दो भागों में बांटा जा सकता है. एक डॉक्टर अल्लाह नज़र और बशीर ज़ैब समेत लोग हैं जो कार्रवाई के मैदान में मौजूद हैं और दूसरे वह जो विदेशों में रह रहे हैं.

पाकिस्तान सरकार के अनुसार नवाब अकबर बुगटी के पोते बराहमदाग़ बुगटी, नवाब ख़ैर बख़्श मरी के बेटे हरबयार मरी और उनके छोटे भाई मेहरान मरी भी बलूचिस्तान में आंदोलन में शामिल हैं.

डॉक्टर अल्लाह नज़र कहते हैं कि उन्होंने दोस्तों के ज़रिए उन्हें भी संगठन में शामिल होने की दावत दी है क्योंकि उनकी कोशिश है कि सब एक हों और अपने मक़सद के लिए जद्दोजहद करें.

बशीर ज़ैब का कहना है, “स्वतंत्रता के आंदोलन में सोच और कर्म सबसे बढ़कर है, जिसे युवा अपनी सजग भूमिका और बलिदानों से स्पष्ट कर चुके हैं और कर रहे हैं."

"यह बात किसी भी समझदार बलोच से ढंकी- छिपी नहीं है, बस अगर ज़रूरत है तो वह यह है कि हर एक व्यक्ति, संस्था और समूहा सच्ची नीयत और ईमानदारी से ख़ुद फ़ैसला करके आगे बढ़े ताकि एक काग़ज़ी बात और केवल दावेदारी से हटकर व्यावहारिक अनुशासन और सजग आधार पर सामुदायिक शक्ति का निर्माण हो सके.”

इस एकीकृत संगठन का नेतृत्व किसके पास होगा, अभी इस बारे में संगठन के लोगों में बातचीत जारी है.

बलोच लिबरेशन फ़्रंट के कमांडर डॉक्टर अल्लाह नज़र कहते हैं, “हमारा नेतृत्व हमेशा संगठन ही ने किया है, आगे भी नेतृत्व संगठन और उसकी संस्थाएं करेंगी.”

संभावित एकीकृत संगठन के नाम के बारे में डॉक्टर अल्लाह नज़र कहते हैं कि ‘ब्रास’ समेत कोई भी नाम हो सकता है जिसे दोस्तों और संगठन की संस्थानों की राय के बाद तय किया जा सकता है.

बशीर ज़ैब का कहना है कि स्वतंत्रता के लिए बलोच जातीय आंदोलन की जद्दोजहद को अमली जामा पहनाने और एक आज़ाद और ख़ुशहाल बलूचिस्तान के लिए संयुक्त तौर पर आंदोलन करने वाले संगठन या दल का नाम जो भी हो, वह बलोच समुदाय स्वीकार करेगा.

आत्मघाती हमले

बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी की मजीद ब्रिगेड ने फ़िदाईन हमले भी किए जिसमें पिछले साल कराची यूनिवर्सिटी में कन्फ्यूशियस सेंटर के शिक्षकों पर हमला भी शामिल है.

उस हमले में महिला आत्मघाती बमबार ने हिस्सा लिया था और जिसकी पहचान शारी बलोच के नाम से की गई थी.

बलोच लिबरेशन फ़्रंट इन आत्मघाती हमलों की विरोधी रहा है, विलय की स्थिति में क्या इस रणनीति में बदलाव आएगा?

बीएलएफ़ के कमांडर डॉक्टर अल्लाह नज़र कहते हैं कि हर संगठन में विभिन्न राय के लोग होते हैं, उनके संगठन में हर एक को राय देने का अधिकार प्राप्त है, तानाशाही सोच या नेतृत्व नहीं है. पार्टी अनुशासन, संस्थाओं की प्रगति और महत्व के कारण पाकिस्तान के साथ एक लंबी लड़ाई जारी है.

बीएलए के कमांडर बशीर ज़ैब कहते हैं कि फ़िदाईन बलोच जाति के महान हीरो और पूंजी हैं. उनके मुताबिक आज एक बड़ी संख्या में बलोच मर्द और औरत व्यावहारिक रूप से मजीद ब्रिगेड का हिस्सा बन चुके हैं.

बशीर जैब कहते हैं, “फ़िदाईन हमले बलूचिस्तान की मुकम्मल आज़ादी तक और ज़ोर-शोर से जारी रहेंगे.”

विलय से एक बड़ी ताक़त उभरेगी

विश्लेषक मानते हैं कि अगर बीएएलएफ़ और बीएलए समेत ‘ब्रास’ में शामिल दलों का भी विलय होता है तो यह एक बड़ी बात होगी.

पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ़ पीस स्टडीज़ के प्रमुख आमिर राना कहते हैं की बीएलए इस समय ब्रांड नेम बन गया है. “अगर देखा जाए तो सबसे प्रतिनिधि दल बीएलएफ़ है जबकि बीआरए और बलोच रिपब्लिकन गार्ड की पृष्ठभूमि क़बायली है.”

“बीएलए और बीएलएफ़ की जितनी भी ट्रेनिंग और लिटरेचर है, उसकी पृष्ठभूमि में शिक्षित वर्ग है. अगर यह इकट्ठे होते हैं तो इसका असर भी पड़ेगा. इस समय तो बीएलए और बीएलएफ़ एक सिक्के के दो पहलू हैं.”

वह कहते हैं कि उन्हें ‘नेतृत्व किसके पास रहने’ की चुनौती का सामना होगा और यह चुनौती पहले भी बलोच संगठनों को रही है.

विश्लेषक मलिक सिराज अकबर कहते हैं कि सदस्यों की संख्या के हिसाब से अब बीएलए और बीएलएफ़ लगभग पूरी तरह ग़ैर क़बायलियों नेतृत्व के हाथों में हैं.

मलिक अकबर कहते हैं, “बीएलए और बीएलएफ़ में मूल अंतर यह था कि वह विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों (क्वेटा बनाम मकरान) में कार्रवाइयां करती थीं लेकिन अब आंदोलन का केंद्र मरी बुगटी इलाक़े से निकलकर आवारान और मकरान बन गए हैं.”

तालिबान की सफलता बनी नज़ीर

कुछ विश्लेषक बलोच चरमपंथी संगठनों के विलय की तुलना अवैध घोषित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान से करते हैं.

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का औपचारिक गठन दिसंबर 2007 में हुआ था.

इससे पहले ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के क्षेत्र सवात, दक्षिणी वज़ीरिस्तान, महमंद, बाजौड़, औरकज़ई, दर्रा आदम ख़ेल और दूसरे क्षेत्रों में कई तालिबान समूह स्वतंत्र रूप से सक्रिय थे.

मगर बाद में अलक़ायदा के स्थानीय नेताओं की कोशिशें की बदौलत यह सारे समूह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान नाम के एक समूह बनाने और एक व्यवस्था के अंदर काम करने पर सहमत हुए.

टीटीपी बनने के बाद देश भर में बड़ी सतह के हमले हुए, जिनमें आत्मघाती हमले भी थे.

यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ पीस के वरिष्ठ विश्लेषक असफ़ंदयार मीर कहते हैं कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की ख़ुद को एकीकृत करने की हाल की कामयाब कोशिश को एक मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है.

वे कहते हैं, “पिछले दो सालों में बलोच आंदोलन की शिद्दत में वृद्धि हुई है और उसकी भी टीटीपी की तरह तालिबान की अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षित शरणस्थलियां हैं. इस तरह एक अधिक एकताबद्ध आंदोलन पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकता है.”

पाकिस्तान के लिए कितनी चुनौती?

बलोच चरमपंथी कराची में स्टॉक एक्सचेंज, चीनी दूतावास, कराची यूनिवर्सिटी, ग्वादर पीसी होटल, पंचगौर और नोशकी की छावनियों समेत ओड़माड़ा और पसनी में सुरक्षा बलों पर बड़े हमले में शामिल रहे हैं.

आमिर राना कहते हैं, “हाल के जो बड़े हमले हुए हैं वह बीएलएफ़ और बीएलए ने किए हैं. उनमें सहयोग तो किसी न किसी स्तर पर मौजूद है, बस अब वह इसको एक ढांचे में ढाल रहे हैं. यह पाकिस्तान के लिए चुनौती होगी.”

अतीत में संगठन अकेले कार्रवाइयां करते थे जो इतने प्रभावी नहीं थीं लेकिन ‘ब्रास’ की स्थापना के बाद उनके कामों में अधिक समन्वय नज़र आता है.

इस गठजोड़ का उद्देश्य बुनियादी तौर पर संसाधनों का संयुक्त इस्तेमाल करना था, राजनीतिक तौर पर समन्वय नहीं, जिसने इसके प्रभाव को सीमित किया.

वह कहते हैं कि पाकिस्तान सरकार को बलोच अलगाववादी समूहों को एकीकृत करने की जारी कोशिशों पर गहरी नज़र रखनी चाहिए.

यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ पीस के वरिष्ठ विश्लेषक असफ़ंदयार मीर कहते हैं कि अगर बलोच संगठनों की कोशिश सफल रही तो तोपाकिस्तान पर दबाव बढ़ेगा.

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