पाकिस्तान की हुकूमत से टक्कर लेने वाली बलूचिस्तान की करीमा बलोच

    • Author, फ्लोरा ड्रूरी और बीबीसी उर्दू
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

कनाडा में निर्वासित जीवन जी रहीं पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता करीमा बलोच रविवार को मृत पाई गई थीं.

पुलिस का कहना है कि उनके पास शक़ का कोई कारण नहीं है लेकिन करीमा के परिवार और समर्थकों का कहना है कि उनकी मृत्यु की जाँच होनी चाहिए. बीबीसी ने उनके परिवार से बात की जिनके मुताबिक़ वह 'साहस का पहाड़' थीं.

करीमा मेहराब जिन्हें करीमा बलोच के नाम से जाना जाता है, साल 2008 में वो अपने एक्टिविज़्म से संबंधित आरोप की वजह से पाकिस्तानी कोर्ट में जज के सामने खड़ी थीं. जज ने कहा कि वे उन्हें कम सज़ा देंगे क्योंकि वे एक महिला हैं. लेकिन करीमा ने इसके लिए मना कर दिया.

करीमा के भाई समीर बताते हैं, "उन्होंने कहा कि अगर आप मुझे सज़ा देना चाहते हैं तो बराबरी के आधार पर ही दीजिए, मुझे मेरे जेंडर की वजह से रियायत मत दीजिए. ये तो बस एक मिसाल थी कि वो असाधारण महिला अपने उसूलों की कितनी पक्की थी."

करीमा पाकिस्तानी अथॉरिटी से टकराती रहती थीं. वह उन्हें तबसे ही कांटे की तरह चुभती थीं जबसे वह गुमशुदा लोगों की लिए की गई एक रैली में अपने लापता रिश्तेदार की फोटो पकड़े सबसे आगे खड़ी थीं. तब पाकिस्तानी अथॉरिटी उनका नाम नहीं जानती थी.

'बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए लड़ाई'

लेकिन उसके बाद के सालों में उनकी पहचान बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए लड़ाई करती एक कार्यकर्ता की बन गई. साल 2006 में करीमा बलोच छात्र संगठन बीएसओ की केंद्रीय समिति में शामिल हो गईं और बाद में उसका नेतृत्व करने लगीं.

उनके परिवार को पता था कि इस भूमिका के साथ क्या ख़तरा साथ आएगा. समीर बताते हैं कि जब करीमा बच्ची थी तो उनकी मां बलूचिस्तान के संघर्ष के बारे में बातें करती थीं. उनके मामा और चाचा दोनों ही आंदोलन में शामिल थे. वे दोनों भी जानते थे कि क्या हो सकता है.

पाकिस्तान की सेना पर आंदोलन को बल से दबाने का, कार्यकर्ताओं के लापता होने का आरोप लगा. सेना इन आरोपों को खारिज करती रही है. इन कई सालों में करीमा के कई रिश्तेदार लापता हुए और बाद में मृत पाए गए. समीर ने भी 2006 में पाकिस्तान छोड़ दिया था.

और 2017 से वे कनाडा में करीमा के साथ रहने लगे थे. उन्होंने बताया, "मुझे डर था कि उसे कुछ हो जाएगा. मैं अपने आप को माफ़ नहीं कर पाता अगर कुछ हो जाता लेकिन धीरे-धीरे ये डर गर्व में तब्दील हो गया क्योंकि मैंने देखा है कि उसने क्या किया है."

बीएसओ पर प्रतिबंध

करीमा आगे बढ़कर नेतृत्व करती रहीं, तब भी जब बीएसओ को 2013 में प्रतिबंध कर दिया गया और सरकार ने आरोप लगाया गया कि संगठन पाकिस्तान को अस्थिर करने के लिए विदेशी चंदा ले रहा है.

उनकी छोटी बहन महगंज बलोच कहती हैं, "मैं उनके साथ हर प्रदर्शन और धरने पर जाती थी ताकि कोई समस्या होने पर मैं आसपास ही रहूं. लाठी चार्ज होने या आंसू गैस छोड़े जाने के वक्त मैं पागलों की तरह उन्हें ढूंढने भागती रहती."

बीएसओ के बैन होने के दो साल बाद 2015 में करीमा को इसका नेता चुना गया. सात दशकों में ये पहली बार था कि किसी महिला को संगठन में ये भूमिका मिली थी.

समीर ने कहा, "उन्होंने आंदोलन को ना सिर्फ़ बलूचिस्तान के लिए बदला बल्कि वह महिलाओं के लिए भी बराबरी चाहती थी. उन्हें पता था कि हम अपने समाज को नहीं बदल सकते, कुछ हासिल कर नहीं कर सकते जब तक पितृसत्ता को नहीं बदलेंगे."

ख़तरों से भरी ज़िम्मेदारी

लेकिन करीमा जिस भूमिका में थी, वह ख़तरों से भरी थी. उनसे पहले आए अध्यक्ष का अपहरण किया गया था और उन्होंने एक सहयोगी के तौर पर उनकी रिहाई के लिए भूख हड़ताल की. अध्यक्ष बनने के कुछ महीनों बाद ही उन पर आतंकवाद के आरोप दर्ज कर दिए गए.

फ़ैसला हुआ कि उन्हें यहां से चले जाना चाहिए. उनकी मां जमीला बलोच याद करती हैं, "मैं 2015 की वो शाम नहीं भूल सकती जब मैंने नमाज़ ख़त्म ही की थी और वह आई, मेरी गोद में अपना सर रखा और कहा कि वह बहुत दूर जा रही है. मैंने पूछा कि क्यों, तुम तो कभी विदेश नहीं जाना चाहती थी."

"अब क्यों जा रही हो. तो उसने कहा कि ये उसके संगठन का फ़ैसला है. कुछ साल पहले उसे किसी पश्चिमी देश ने वीज़ा दिया था लेकिन उसने नहीं जाने का फ़ैसला किया था. उसने कहा था कि वह बलूचिस्तान के अलावा कहीं और रहने का सोच ही नहीं सकती."

"लेकिन इस बार उसे बस कुछ ही दिन लगे तैयारी में और वो चली गई. एयरपोर्ट पर मैंने उससे कहा कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करे और जल्दी लौट आए. मैंने अपने आंसू रोके वरना वो अपना फ़ैसला बदल लेती. अब मुझे लगता है कि काश मैं रो दी होती."

बीबीसी की 100 प्रभावशाली महिलाओं की सूची

करीमा ने कनाडा के टोरोंटो में अपनी नई जिंदगी शुरू की लेकिन उन्होंने मानवाधिकारों के लिए और जबरदस्ती लोगों को लापता करने के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई जारी रखी. विस्थापन के कुछ साल बाद उन्हें बीबीसी की 100 प्रेरणादायक और प्रभावशाली महिलाओं की सूची में शामिल किया गया.

उस वक्त उन्होंने बीबीसी को बताया था, "मुझे पता है कि मेरे सहयोगी के साथ जो हुआ वो मेरे साथ भी हो सकता है. मैं अपने एक्टिविज़म से भाग नहीं रही, उसे फैला रही हूं. मैंने अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए शरण नहीं ली है. मैं यहां पर दुनिया को बताने आयी हूं कि बलूचिस्तान में क्या हो रहा है."

"जब हमने देखा कि दुनिया हमारी तरफ़ नहीं आ रही, तो हमने उसकी ओर जाने का फ़ैसला किया. ये बताने के लिए कि हमारे साथ हमारे घर में क्या हो रहा है. मुझे लगता है कि ये मेरी ज़िम्मेदारी है."

लेकिन इतनी दूर जाने के बाद भी पाकिस्तान से उन्हें मिलने वाली धमकियां ख़त्म नहीं हुई. जब वे कनाडा में थी तो उनके चाचा का अपहरण कर लिया गया. उनकी बहन महगंज ने बताया कि परिवार को कहा गया कि करीमा अपना एक्टिविज़म बंद करे लेकिन करीमा ने इनकार कर दिया.

महगंज ने बताया कि जिस दिन कनाडा में करीमा जज के सामने शरण की अपील के लिए उपस्थित हुईं, उस दिन उनके चाचा का शव परिवार को लौटाया गया.

अनजान लोगों से धमकियां

समीर ने बताया, "जज ने उन्हें कहा कि वह सुनवाई को स्थगित भी कर सकती हैं लेकिन उन्होंने कहा कि नहीं, मैं अपनी कहानी बताने आई हूं."

समीर अब भी सोचते हैं कि शरण के केस ने इतना लंबा वक़्त क्यों लिया. क्या पाकिस्तान पीछे से इसकी मुख़ालफत कर रहा था? जानने का कोई तरीक़ा नहीं. उनके दिमाग़ में कई सवाल हैं. लेकिन उन्हें पता था कि कोई उन पर नज़र रखे हुआ था.

करीमा को एक दिन फ़ोन आया और कहा गया कि वह पाकिस्तान लौट जाए. उस शख़्स ने उस दिन के बारे में भी बताया जब करीमा, समीर के तीन साल के बेटे के साथ टोरोंटो के एक स्थानीय पार्क में घूम रहीं थी. उस शख़्स ने करीमा से कहा कि ऐसा लग रहा है कि वह अपनी ज़िंदगी का लुत्फ़ उठा रही है.

समीर ने कहा, "किसी साधारण इंसान के लिए ये सब काफ़ी डरावना होता. लेकिन मुझे लगा कि वह नहीं डरी. वो डरती ही नहीं थी."

करीमा के एक क़रीबी दोस्त और सहयोगी कार्यकर्ता लतीफ़ जोहर बलोच भी टोरोंटो में ही रहते हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि करीमा को हाल ही में अनजान लोगों से धमकियां मिल रही थी कि कोई उन्हें 'क्रिसमस को तोहफ़ा' भेजेगा और उन्हें 'सबक' सिखाएगा.

पुलिस की रिपोर्ट

करीमा के पति और बीएसओ के पूर्व सदस्य हमल बलोच बताते हैं, "मुझे याद नहीं आता कि मैंने कब उसे चिंता में या डरे हुए देखा था. मुझे मालूम था कि बलूचिस्तान में एक बार उनके घर पर भी हमला हुआ था और कैसे उनकी गिरफ़्तारी के लिए बार-बार छापे मारे जा रहे थे..."

"जब वह बीएसओ के लिए अंडरग्राउंड होकर अपना काम कर रही थी. उनके ख़िलाफ़ केस दर्ज किये गए. इनमें से किसी भी बात का असर उन पर नहीं पड़ा. वह साहस का पर्वत थी."

परिवार नहीं जानता कि रविवार को क्या हुआ. उन्हें बस इतना पता है कि वह घर से सैर के लिए निकली. जब वह वापस नहीं लौटी तो परिवार ने पुलिस से संपर्क किया. अगली सुबह उनका शव बरामद हुआ. पुलिस के मुताबिक़ उनका शव ओंटेरियो झील के पास मिला लेकिन इसके अलावा कोई जानकारी नहीं दी गई. पुलिस ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि किसी संदिग्ध परिस्थिति में मौत हुई है.

पुलिस ने अपने बयान में कहा, "टोरोंटो पुलिस जानती है कि इस केस को लेकर समुदाय और मीडिया में काफ़ी दिलचस्पी है. इस केस की परिस्थितियों को जांचा गया है और पुलिस अफसरों ने मुताबिक़ ये ग़ैर-अपराधिक मौत है और किसी गड़बड़ी की आशंका नहीं जताई गई है."

'जो रास्ता उसने चुना था...'

करीमा की मां उनकी मौत की ख़बर सुनकर रोई नहीं. उन्होंने कहा, "करीमा एक मज़बूत शख़्स थी और मेरा रोना उसे अच्छा नहीं लगता. जब मैंने ख़बर सुनी तो लगा कि सातों आसमान मेरे ऊपर गिर पड़े लेकिन कोई आंसू नहीं आया. जो रास्ता उसने चुना था वो उसका सोचा-समझा फ़ैसला था. वह अपने लिए नहीं जी रही थी बल्कि बलोच गुमशुदा युवाओं के लिए लड़ रही थी."

समीर नहीं मानते कि उनकी बहन की मौत के पीछे कोई असामान्य बात नहीं. उन्होंने बताया कि इस साल की शुरुआत में स्वीडन पुलिस ने शरण में रह रहे उनके दोस्त और बलोच कार्यकर्ता साजिद हुसैन की मौत को लेकर यही कहा था कि इसके पीछे कोई गड़बड़ नहीं है.

साजिद भी दो मार्च को उपसाला शहर में लापता हो गए थे और 23 मार्च को उनका शव फाइरिस नदी में मिला. बताया गया था कि उनकी मौत डूबने से हुई है.

रिफ्यूजी स्टेटस

समीर कहते हैं, "पुलिस अफसर हमें जल्द से जल्द मनवाने की कोशिश कर रहे हैं (पुलिस का निष्कर्ष है कि उनकी मौत आत्महत्या से हुई है). वह तो पूरी ज़िंदगी ही डिप्रेशन में रही है. लेकिन अब तो उन्हें यहां परमानेंट रेज़ीडेंसी मिल गई थी. उन्हें रिफ्यूजी स्टेटस दे दिया गया था, चीज़ें बेहतर हो रही थी."

"मुझे नहीं पता कि उस दिन क्या हुआ, लेकिन उनके अतीत तो देखते हुए मुझे लगता है कि हमें इस मामले में शक़ करने का अधिकार है."

समीर कहते हैं कि उन्होंने अपने बचपन का दोस्त खो दिया और बलोच अधिकारों के आंदोलन ने पुरूषों से भी बेहतर एक नेता खो दिया.

चार साल पहले बीबीसी से बात करते हुए करीमा ने कहा था कि उन्होंने कभी अपनी मातृभूमि नहीं छोड़ी. उन्होंने कहा था, "वो मेरे साथ है. कभी भी बलूचिस्तान वापस जाने का फ़ैसला मेरा है. मैं ये फ़ैसला पाकिस्तान को नहीं लेने दूंगी."

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