You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
चीन के लिए क्यों ख़ास बन गया है पाकिस्तान का बलूचिस्तान
- Author, नॉरबर्टो परेडेस
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
पाकिस्तान का बलूचिस्तान सूबा. एशिया में सोने, तांबे और गैस के सबसे बड़े भंडारों में से एक. चीन की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को अंज़ाम तक पहुँचाने के लिए ख़ास जगह.
लेकिन अहमियत जताने के लिए इतनी सारी ख़ास बात होने के बावजूद बलूचिस्तान अपने मुल्क का एक दूरदराज़ वाला इलाक़ा है और जिसे शायद उसके ही देश के लोगों ने भुला दिया है. ग़रीबी का ये आलम है कि बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा सूबा माना जाता है.
दो दशक पहले पाकिस्तान सरकार ने बलूचिस्तान के रेगिस्तान में ही परमाणु परीक्षण किए थे और पाकिस्तान को दुनिया की सातवीं परमाणु ताक़त का दर्जा दिलाया था.
वो साल 1998 के मई का महीना था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की सरकार ने चगाई ज़िले में ये परीक्षण किए थे. पाकिस्तान उस परीक्षण को चगाई-I कहता है.
पाकिस्तान से पहले भारत ने भी पोकरण में परमाणु परीक्षण किए थे. तब दोनों देशों की अंतरराष्ट्रीय मंचों से आलोचना हुई थी और कुछ देशों ने उन पर प्रतिबंध भी लगाए थे.
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी
लेकिन 22 साल पहले की वो घटना बलूचिस्तान के लिए अब इतिहास है. उसका भूगोल अफ़ग़ानिस्तान और ईरान से जुड़ा हुआ है.
बलूचिस्तान का वर्तमान पाकिस्तान की हुकूमत के ख़िलाफ़ बलोच राष्ट्रवादियों की लंबे समय से चली आ रही बग़ावत के लिए जाना जाता है.
इस लड़ाई में दोनों ही पक्षों की तरफ़ से लोग मारे गए हैं.
बलूचिस्तान में कई सशस्त्र गुट सक्रिय हैं, जिनमें पाकिस्तान तालिबान, सुन्नी मुसलमानों का चरमपंथी गुट लश्कर-ए-झांगवी और अलगाववादी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी जैसे समूह हैं.
वो बीएलए ही थी. जिसने इसी साल जून के आख़िरी हफ़्ते में कराची स्टॉक एक्सचेंज पर हुए हमलों की ज़िम्मेदारी ली थी.
इस हमले में चारों हमलावर समेत कराची शेयर बाज़ार की सुरक्षा के लिए तैनात दो सुरक्षा गार्डों और एक पुलिस अधिकारी की मौत हो गई थी.
चीन के लिए इतना अहम क्यों?
कहा जाता है कि पिछले साल इसी संगठन ने बंदरगाह शहर ग्वादर के ज़ावेर पर्ल कॉन्टिनेंटल होटल पर हमले को अंज़ाम दिया था.
दक्षिणी बलूचिस्तान के इस शहर में किए गए हमले का मक़सद चीन और दूसरे देशों के निवेशकों पर अचानक हमला करना था, जो इस होटल में अक्सर मिला करते थे.
अलगाववादी गुटों को ये मानना था कि इस होटल को अरबों डॉलर की महत्वाकांक्षी चीनी परियोजनाओं के ऑपरेशन सेंटर के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था.
बलूचिस्तान के चरमपंथी गुट चीन के निवेश का ज़बरदस्त विरोध कर रहे हैं. उनकी दलील है कि इससे बलूचिस्तान के स्थानीय लोगों का कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है.
लेकिन इन सबके बीच ये सवाल ज़ेहन में आता है कि पाकिस्तान के इस सूबे में ऐसा क्या ख़ास है, जिसकी वजह से ये चीन के लिए रणनीतिक रूप से इतना महत्वपूर्ण हो गया है.
चीन-पाकिस्तान इकॉनमिक कॉरिडोर
पिछले साल मई महीने की 11 तारीख़ को ग्वादर के जिस ज़ावेर पर्ल कॉन्टिनेंटल होटल पर हमला हुआ था, वो एक टीले पर बना हुआ है.
उसकी लोकेशन कुछ ऐसी है कि होटल से पूरे ग्वादर बंदरगाह का नज़ारा देखा जा सकता है.
अरब सागर के किनारे बन रहे इस बंदरगाह को चीन अपनी सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर) परियोजना के एक हिस्से के तौर पर विकसित कर रहा है.
चीन ने इस मेगा प्रोजेक्ट (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर) की घोषणा अप्रैल, 2015 में की थी. इस प्रोजेक्ट में चीन ने 62 अरब डॉलर की रक़म के निवेश का फ़ैसला किया है.
इस रक़म की अहमियत का अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि सेंट्रल अमरीका के देश निकारागुआ का सकल घरेलू उत्पाद इससे कम ही है.
चीन-पाकिस्तान इकॉनमिक कॉरिडोर प्रोजेक्ट के तहत पाकिस्तान और चीन को जोड़ने वाली सड़कें, रेल लाइनें और गैस पाइप लाइंस बिछाई जा रही हैं.
ये कॉरिडोर चीन के शिनजियांग उइघुर स्वायत्त क्षेत्र से बलूचिस्तान के ग्वादर तक तकरीबन तीन हज़ार किलोमीटर की दूरी तय करता है.
ये कॉरीडोर चीन को हिंद महासागर में सीधी पहुँच देता है.
चीन की राजनीति का हिस्सा
बलूचिस्तान में चीन की दिलचस्पी नई नहीं है. उसकी नज़र शीत युद्ध के ज़माने से भी पहले से इस इलाक़े पर है.
बीबीसी उर्दू के संवाददाता सक़लेन इमाम कहते हैं, "चीन ने हमेशा से अपनी पश्चिमी सीमाओं पर रणीनितक नज़र रखी है. यूरोप, ईरान और मध्य एशिया के दूसरे देशों तक पहुँचने के लिए ये अहम रहा है. ये नई बात नहीं है. चीन ने कारोबारी और अन्य रणनीतिक कारणों से हमेशा ही पश्चिमी सीमाओं के पार देखा है."
"लंबे समय से अमरीका ने दक्षिण पूर्वी चीन में अपना नौसैनिक बेड़ा तैनात कर रखा है. चीन के लिए ये एक अहम कारोबारी रूट है. कुछ लोगों को लगता है कि मलक्का जलडमरूमध्य में अमरीका की इस मौजूदगी से चीन के व्यापारिक हितों पर असर पड़ता है."
चीन की पूर्वी समुद्री सीमा की तरफ़ जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देश हैं तो पश्चिम में पाकिस्तान जैसा ऐतिहासिक साझीदार देश है.
अगर चीन समंदर के रास्ते अपना माल बाहर भेजने के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता चाहता है तो बलूचिस्तान उसके लिए सबसे बेहतर और शायद सबसे आख़िरी दांव है.
पाकिस्तान की दिलचस्पी
लेकिन ऐसा नहीं है कि इस प्रोजेक्ट से केवल चीन को ही फ़ायदा होने वाला है. पाकिस्तान भी इस प्रोजेक्ट के लिए उतना ही बेकरार है.
सकलेन इमाम कहते हैं, "पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क है जिसके पास न तो अच्छी रेल सुविधाएँ हैं, न ही अच्छे अस्पताल, स्कूल और हेल्थ सेंटर. पिछले 40 सालों में पाकिस्तान में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बहुत कम निवेश हुआ है. पाकिस्तान के पास केवल एक बंदरगाह है. कराची का बंदरगाह. वो भी सौ साल से भी ज़्यादा अरसे पहले औपनिवेशिक दौर में बना था."
चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर में जिन परियोजनाओं पर काम चल रहा है, इस्लामाबाद में बैठी सरकार के पास उतने आर्थिक संसाधन नहीं हैं कि वो अपने बूते इन्हें पूरा कर सके.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़ पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिस पर उसके सकल घरेलू उत्पाद के 80 फ़ीसदी से ज़्यादा का क़र्ज़ है और प्रति व्यक्ति जीडीपी 1500 डॉलर के क़रीब है.
लेकिन चीन के इस निवेश को लेकर पाकिस्तान में एक किस्म के तनाव का माहौल भी है. अलग-अलग तबके इसका विरोध कर रहे हैं.
कुछ को लगता है कि उन्हें किनारे कर दिया गया है और विरोध कर रहे कुछ लोगों के पास विचारधारा से जुड़ी वजहें भी हैं.
'वे हमारा इलाक़ा चीन को बेच रहे हैं'
सकलेन इमाम कहते हैं, "बलूचिस्तान में अलग-अलग तरह का राष्ट्रवाद है. कुछ पाकिस्तान के हर क़दम का विरोध करते हैं. क्योंकि वे एक स्वतंत्र देश होना चाहते हैं. कुछ लोगों का लगता है कि इस्लामाबाद से हुकूमत करने वाली सरकारों पर पंजाब सूबे का दबदबा रहता है."
"पंजाब मुल्क की सबसे बड़ी आबादी और क्षेत्रफल के मामले में बलूचिस्तान के बाद दूसरे सबसे बड़ा सूबा है. इन लोगों को लगता है कि इन परियोजनाओं को लागू करने में बलोच लोगों की आवाज़ सुनी नहीं गई और उनके हितों का ख्याल नहीं रखा गया."
पाकिस्तान के अलावा बलोच लोग ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, बहरीन और भारत के पंजाब प्रांत में रहते हैं.
हस्सास कोसा एक ग़ैर सरकारी संगठन बलोच ह्यूमन राइट्स काउंसिल (बीएचआरसी) के वाइस प्रेसीडेंट हैं. उनका संगठन बलोचों के मुद्दों का बचाव करता है. हस्सास कोसा चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर के समर्थन में नहीं हैं. वे मूलतः बलूचिस्तान के रहने वाले हैं और अब लंदन में रहते हैं.
वे कहते हैं, "पाकिस्तान आर्थिक कठिनाइयों से गुज़र रहा है. उसे पैसे की ज़रूरत है और वो इस मुश्किल को हल करने के लिए हमारा इलाक़ा चीन को बेचने की कोशिश कर रहे हैं."
मानवाधिकार हनन और उल्लंघन के आरोप
हस्सास कोसा बताते हैं, "चीन और पाकिस्तान की इस साझीदारी से बलोच लोगों को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है. हम लोग ये बात पहले से जानते हैं क्योंकि इतिहास इसका गवाह है. उदाहरण के लिए पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के गैस भंडार के दोहन के लिए कई परियोजनाएँ शुरू कीं. ये गैस हर जगह पहुँचता है बस बलोच लोगों को नहीं मिलता है."
पाकिस्तान के कुल गैस उत्पादन का आधा हिस्सा इसी सूबे से निकाला जाता है.
29 जून को कराची स्टॉक एक्सचेंज पर हमले को अंजाम देने वाली बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी इस इलाक़े के छह अलगाववादी गुटों में से एक हैं. ये गुट पाकिस्तान में चरमपंथी हमलों को अंजाम देते रहे हैं.
अमरीका और ब्रिटेन इन गुटों को 'आतंकवादी संगठनों' का दर्जा देते हैं.
पत्रकारों और मानवाधिकार समूहों के लिए बलूचिस्तान एक मुश्किल इलाक़ा रहा है. हाल के सालों में पाकिस्तानी सेना पर इस इलाक़े में बड़े पैमाने पर दमनात्मक कार्रवाई और मानवाधिकार हनन और उल्लंघन के आरोप लगे हैं. हालाँकि पाकिस्तान की सरकार कई मौक़ों पर इन आरोपों से इनकार कर चुकी है.
जानकारों का कहना है कि इस्लामाबाद और बलोच अलगाववादियों के बीच जब तक कोई समझौता न हो जाए, तनाव और हिंसा का माहौल इस इलाक़े में बना रहेगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)