हरियाणा विधानसभा चुनाव: कांग्रेस की हार के बाद ‘जाट राजनीति’ का भविष्य क्या होगा?

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- Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी ने जीत की हैट्रिक लगाते हुए राज्य में सत्ता बरकरार रखी है.
इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हरियाणा से बड़ी उम्मीद थी लेकिन इस चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए एक झटका साबित हुए.
बीजेपी ने हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था.
नायब सैनी ने सभी राजनीतिक भविष्यवाणियों और एग्ज़िट पोल को ग़लत साबित किया है और बीजेपी के लिए बड़ी जीत हासिल की है.
इस चुनाव में बीजेपी को 48 सीट पर और कांग्रेस को 37 सीट पर जीत मिली है.
पिछले चुनाव के मुकाबले दोनों दलों की सीटों में इज़ाफा हुआ है, लेकिन जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) और आम आदमी पार्टी (आप) अपना खाता नहीं खोल पाई हैं.

साल 2019 में बीजेपी को 37 फ़ीसदी वोट के साथ 40 सीटें मिली थीं, वहीं कांग्रेस को 28 फ़ीसदी वोट के साथ 31 सीटें मिली थीं.
यह जीत बीजेपी के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव था, जिसमें बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर थी.
इस चुनाव में हार से पार्टी के पिछले दो दशक से नेता रहे भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के राजनीतिक भविष्य पर भी संशय बना हुआ है.
क्योंकि हरियाणा में बीजेपी ने कुछ जाट बहुल सीटों पर भी जीत हासिल की है, जिसकी वजह पार्टी की सफल रणनीति मानी जा रही है.
हालांकि बीजेपी के कई जाट नेता इस चुनाव में जीत से महरूम रहे. जानकारों की माने तो पार्टी को गैर-जाट सोशल इंजीनियरिंग की वजह से बहुमत मिल गया है.
कांग्रेस अब अपनी हार की वजह पर मंथन कर रही है. पार्टी के नेता कह रहे हैं कि जाट वोटों का बिखराव और ग़ैर-जाट वोटों का ध्रुवीकरण एक बड़ी वजह है.
जाट वोटों में बिखराव-गैर जाट बीजेपी के साथ लामबंद

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राजनीति के जानकारों का मानना है कि कांग्रेस ने जाट राजनीति के जरिए राज्य में सरकार बनाने की रणनीति बनाई.
यह कुछ हद तक कामयाब रही लेकिन उतनी नहीं जितने में कांग्रेस सत्ता तक पहुंच पाए. हालांकि, पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस की सीट ज़्यादा हो गई हैं.
यहां एक बात बताना ज़रूरी है कि पिछले विधानसभा चुनाव के मुक़ाबले राज्य में क्षेत्रीय पार्टियों और निर्दलीय प्रत्याशियों की सीटों और वोट शेयर में भी कमी देखी गई है.
कांग्रेस ने पूरा चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के हिसाब से लड़ा और सबसे ज़्यादा उम्मीदवार हुड्डा कैंप के उतारे गए, लेकिन इसके बावजूद जाट बहुल सीटों पर भी बीजेपी कई सीट जीत गई.
जाट बहुल विधानसभा- उचाना कलां, सफीदों और गुहाना में बीजेपी के ग़ैर-जाट उम्मीदवारों ने कांग्रेस के उम्मीदवारों को मात दे दी. जाट बहुल सीट पर ग़ैर-जाट उम्मीदवार को मैदान में उतारने की जो रणनीति बीजेपी ने अपनाई, उसमें पार्टी को सफलता मिली.
पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, जो जाटलैंड में पार्टी की कमान संभाले हुए थे, उन्होंने बीबीसी को बताया कि व्यक्तिगत संपर्क और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वजह से जाट समाज का एक तबका बीजेपी के साथ रहा है, जिसकी वजह बीजेपी की राष्ट्रवाद की विचारधारा रही है.
संजीव बालियान कहते हैं, "सेना की पृष्ठभूमि वाले और जाट में जो तबका ज्यादा पढ़ा-लिखा है, वह बीजेपी के साथ आया है. वहीं लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी के खिलाफ जो एक नकारात्मक माहौल था, वह भी कमजोर हुआ है और इसका फायदा बीजेपी को मिला है."
हालांकि, दैनिक हरिभूमि के पूर्व संपादक ओमकार चौधरी का कहना है कि "जितना जाट का वोट बीजेपी को 2014 और 2019 में मिला था, उतना ही वोट 2024 के चुनाव में मिला है. लेकिन यह ज़रूर रहा कि कांग्रेस की जाट राजनीति से इसके विरुद्ध ध्रुवीकरण हुआ है."
ओमकार चौधरी के मुताबिक़, "गैर जाट का लामबंद होना कांग्रेस के लिए ज्यादा नुकसानदायक साबित हुआ है. ओबीसी समाज से आने वाले नायब सिंह सैनी को सीएम बनाकर बीजेपी एक बड़ा संदेश देने में कामयाब रही है."
वे कहते हैं, "जो वोट संविधान और आरक्षण के नाम पर लोकसभा चुनाव में बीजेपी से दूर हो गया था, उसे बीजेपी वापस पाने में कामयाब रही है."
बीजेपी के एक नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को हटाना बीजेपी के लिए फ़ायदेमंद रहा है क्योंकि जाटों की नाराज़गी खट्टर से ज्यादा थी.
जाट लैंड में कांग्रेस की हार

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चौधरी छोटूराम की विरासत पर दावा करने वाले चौधरी बीरेन्द्र सिंह के बेटे बृजेंद्र सिंह को जाट बहुल सीट उचाना कलां पर हार का सामना करना पड़ा.
बीजेपी के उम्मीदवार ने उन्हें 32 वोट से हरा दिया.
इस सीट पर दूसरे जाट नेताओं में वोट बंटे, जिसके कारण इस तरह का नतीजा आया है.
हालांकि बीजेपी के जाट नेता कैप्टन अभिमन्यु और ओम प्रकाश धनखड़ जैसे दिग्गज भी चुनाव जीतने में असफल रहे हैं.
बीजेपी के प्रदेश प्रभारी सतीश पुनिया ने मीडिया से कहा है कि "जाट बीजेपी के साथ नहीं हैं, यह कांग्रेस का कुप्रचार था. बीजेपी जात-पात की राजनीति नहीं करती और पार्टी के कुशल प्रबंधन और मोदी जी के नेतृत्व की वजह से जनता ने पार्टी के पक्ष में जनादेश दिया है."

नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीजेपी के एक नेता ने बताया कि मूलत: जाट व्यक्तिवादी होता है और पार्टी विचारधारा की जगह नेता को तरजीह देता है.
बीजेपी के नेता ने दावा किया कि पार्टी को जाटों का तक़रीबन बीस फीसदी वोट मिला है. हालांकि चुनाव आयोग की तरफ़ से जाति और धर्म आधारित वोटिंग के आंकड़े जारी नहीं किए जाते हैं.
‘हुड्डा की जाट राजनीति असफल’

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2004 में जब कांग्रेस की सरकार हरियाणा में बनी थी तब हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष भजनलाल थे और विधायक दल के नेता अजय सिंह यादव, लेकिन पार्टी ने कमान जाट नेता चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को सौंपी, जिसके बाद विवाद हुआ और भजनलाल ने अपनी अलग पार्टी बना ली थी.
जिसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने हुड्डा के नेतृत्व में दोबारा सरकार बनाई थी. लेकिन पहले जितनी सीटें नहीं मिल पाईं और पार्टी को दूसरे विधायकों का समर्थन लेना पड़ा था.
हरियाणा से कांग्रेस के एआईसीसी सदस्य अजय शर्मा का कहना है, "2014 में पानीपत की रैली में हुड्डा ने कहा कि वो जाट पहले हैं और मुख्यमंत्री बाद में हैं. जिसके बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को 15 सीट ही मिल पाई थीं, कांग्रेस ने कभी जाति की राजनीति नहीं की है."
शर्मा का कहना है कि उसके बाद ये हुड्डा को कांग्रेस ने तीसरा मौका दिया था जिसमें असफलता ही मिली है.
अजय शर्मा कहते हैं, "जिस हिसाब से हुड्डा समर्थकों को टिकट मिला, ये साफ हो गया कि वे ही सीएम बनेंगे, जिसके बाद ग़ैर-जाट लामबंद हुआ है. सिर्फ जाटों की बदौलत कांग्रेस सत्ता में नहीं आ सकती है."
लोकमत अख़बार के नेशनल एडिटर हरीश गुप्ता का कहना है., "हार की वजह अति आत्मविश्वास और जाट राजनीति है. कांग्रेस ने बंसीलाल के समय में भी जाटों की राजनीति नहीं की, बल्कि बंसीलाल, ओपी जिंदल जैसे वैश्य समाज और दलित-ब्राह्मण समुदाय के लोगों को साथ लेकर चलते थे. बाद में भजनलाल गैर जाट थे ही, लेकिन हुड्डा की वजह से ये संदेश गया कि कांग्रेस में जाटों का दबदबा है."
वहीं ओमकार चौधरी का कहना है कि गैर जाट डर गया और बीजेपी के साथ इसलिए चला गया है कि उसको लगा कि जाट का दबदबा सरकार में आने के बाद बढ़ेगा और इसका सीधा नुकसान उसे होगा. कांग्रेस इस मूड को भांप नहीं पाई और गलती पर गलती करते चली गई.
2004 और 2009 में हरियाणा कांग्रेस की प्रभारी महासचिव रहीं मारग्रेट अल्वा ने हार का विश्लेषण किया है और आपसी लड़ाई को हार की एक वजह बताया है.
अल्वा ने एक्स पर लिखा, "जीत के लिए तटस्थ रहना और पार्टी को एकजुट रखने के साथ-साथ लोगों की महत्वाकांक्षाओं और पार्टी के हित में संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है. इस चुनाव में हम संतुलन बनाने में नाकामयाब रहे, बहुत सारे बागी उम्मीदवार मैदान में थे जो पार्टी के ख़राब मैनेजमेंट को उजागर करते हैं."
अल्वा के समय कांग्रेस ने दो चुनाव हरियाणा में जीते.
वो आगे लिखती हैं कि सार्वजनिक झगड़े और झूठी शान बताना ये भी एक वजह रही है. इसके अलावा एक अभियान जिससे हरियाणा में कई वर्गों में असुरक्षा की भावना पैदा हुई और निश्चित जीत हार में बदल गयी.
जाट राजनीति का भविष्य

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चौधरी देवीलाल, चौधरी बंसीलाल, ओमप्रकाश चौटाला और भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, ये सभी जाट बिरादरी से हैं.
इनमें बंसीलाल सबसे लंबे वक्त तक मुख्यमंत्री रहे, 11 साल 300 दिन. एक बार वो अपनी पार्टी- हरियाणा विकास पार्टी के ज़रिए मुख्यमंत्री बने.
दूसरी सबसे लंबी पारी खेली भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने, जिनको तक़रीबन दस साल का मौक़ा मिला.
गैर-जाट की बात करें तो भजनलाल को बंसीलाल से और मनोहरलाल खट्टर को हुड्डा से ज़्यादा वक्त मिला है. लेकिन चुनाव नतीजे बताते हैं कि बीजेपी का गैर-जाट का समीकरण हिट हो गया है.
हरिभूमि के पूर्व संपादक ओमकार चौधरी का कहना है कि "राजनीति में ये कहना दुरुस्त नहीं होगा कि जाट राजनीति का अंत हो गया है या आगे जाट मुख्यमंत्री नहीं बनेगा, बल्कि राजनीति में समीकरण बदलता रहता है, तो पांच साल बाद क्या होगा ये कहना मुश्किल है."
लोकमत के नेशनल एडीटर हरीश गुप्ता का कहना है कि जाट मुख्यमंत्री बनेगा या नहीं, ये कहना मुश्किल है लेकिन जो जाट राजनीति में सबको साथ लेकर चलने की रणनीति पर अमल करेगा वो राज्य का मुख्यमंत्री बन सकता है, जैसे बंसीलाल ने किया था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित












