चंद्र सिंह गढ़वाली जिन्होंने अंग्रेज़ों के हुक्म पर भारतीयों पर गोली चलाने से किया था इनकार

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
सन 1930 में महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह का सबसे अधिक असर सीमांत प्रांत में दिख रहा था.
'सीमांत गांधी' के नाम से मशहूर हो चुके ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के बढ़ते असर को देखते हुए अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें और उनके कुछ साथियों को 23 अप्रैल की सुबह गिरफ़्तार कर लिया था.
ख़ान उस समय उत्मनज़ई से पेशावर आ रहे थे, सीमांत गांधी की गिरफ़्तारी की ख़बर सुनते ही हज़ारों लोगों ने चरसद्दा जेल को घेर लिया था जहां सीमांत गांधी को रखा गया था. पेशावर शहर में हज़ारों लोगों का हुजूम इकट्ठा हो चुका था. वहां के पठान क़िस्साख़्वानी बाज़ार में 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' के नारे लगा रहे थे.
इस बीच एक अंग्रेज़ अधिकारी मोटर साइकिल पर तेज़ी से जुलूस के बीच गुज़रा जिससे कई लोग कुचले गए और भगदड़ जैसा माहौल बन गया.
नाराज़ भीड़ ने मोटर साइकिल में आग लगा दी. अंग्रेज़ अधिकारी की जलकर मौत हो गई. वहां हथियारबंद पुलिस की मौजूदगी के बावजूद प्रशासन ने फ़ौज को बुलाने का हुक्म दे दिया. कुछ ही देर में वहां सेना की चार बटालियनें पहुंच गईं और हथियारों से लैस सैनिक शहर में चारों तरफ़ फैल गए.

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गढ़वाली 'सीज़फ़ायर'
काबुल फाटक के सामने हज़ारों पठानों का हुजूम ख़ड़ा था. उसके ठीक सामने रॉयल गढ़वाल राइफ़ल्स की एक कंपनी खड़ी थी. भीड़ के तेवर देखते हुए कंपनी कमांडर ने हुक्म दिया, जुलूस के दाएं-बाएं कवर ले लो. हर सिपाही की राइफ़ल में पांच कारतूस भरे हुए थे.
रमेश पोखरियाल 'निशंक' अपनी किताब 'पेशावर के नायक, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली' में लिखते हैं, "उनकी राइफ़लों पर संगीनें चढ़ी हुई थीं. कैप्टन रिकेट ने ज़ोर से चिल्लाकर कहा, 'भाग जाओ वरना गोली से मारे जाओगे.' लेकिन पठान टस-से-मस नहीं हुए. रिकेट ने आदेश दिया, 'गढ़वाली थ्री राउंड फ़ायर (गढ़वाली तीन बार गोली चलाओ).' उस समय हवलदार मेजर चंद्र सिंह गढ़वाली कैप्टन रिकेट के बाईं ओर खड़े थे. उन्होंने चिल्लाकर हुक्म दिया, 'गढ़वाली सीज़ फ़ायर.' हुक्म सुनते ही गढ़वाली कंपनी ने अपनी अपनी बंदूकें ज़मीन पर टिका दीं. ये देखकर कप्तान रिकेट आग-बबूला हो गया. उसने लाल आंखों से चंद्र सिंह की ओर देख कर कहा, 'क्या बात है?' चंद्र सिंह गढ़वाली ने जवाब दिया, 'ये सारे लोग निहत्थे हैं. हम इन पर गोली कैसे चलाएं?''

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अंग्रेज़ों ने चलाई गोलियां
इस घटना से बौखलाए कैप्टन रिकेट ने तत्काल ही अपने अर्दली के ज़रिए काबुली गेट के ऊपर खड़े अधिकारियों को एक चिट भेजी, फ़ौरन 30 अंग्रेज़ों की एक प्लाटून आ गई. उन्होंने गोलियां चलानी शुरू कर दी. वहां भगदड़ मच गई और सैकड़ों लोग मारे गए.
इसके बाद लोग अपने मकानों की छतों पर चढ़कर दोनों ओर से पत्थर, बोतल, कुल्हाड़ी, जो कुछ भी हाथ आया उसको सिपाहियों पर फेंकने लगे. इससे कई पुलिसकर्मी और पलटन के जवान घायल हो गए. ख़ुद चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके कई साथी भी इसमें घायल हो गए. पूरे शहर में मार्शल लॉ घोषित कर दिया गया.
राजमोहन गांधी ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ की जीवनी 'ग़फ़्फ़ार ख़ाँ, नॉन वॉयलेंट बादशाह ऑफ़ पख़्तूंस' में लिखते हैं, "वैसे तो आधिकारिक रूप से सिर्फ़ 20 लोगों की गोली लगने से मौत हुई लेकिन प्रदर्शनकारियों के अनुसार उस दिन पेशावर और सीमांत प्रांत की दूसरी जगहों पर अंग्रेज़ों की गोलियों से 200 से 300 लोग मारे गए. आख़िरकार अंग्रेज़ फ़ौज ने लड़ाकू विमानों की मदद से पेशावर पर दोबारा नियंत्रण कर लिया. बाद में सरकारी आदेश न मानने वाले गढ़वाल राइफ़ल्स के जवानों का कोर्ट मार्शल किया गया और उन्हें लंबी जेल सज़ाएं दी गईं."

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गढ़वाली का सैनिक जीवन
सन 1891 में रौणीसेरा मासो, गढ़वाल में जन्मे चंद्र सिंह गढ़वाली 3 सितंबर, 1914 को भारतीय सेना में शामिल हुए थे. पहले विश्व युद्ध में सबसे पहले उन्हें फ़्रांस भेजा गया.
इसके बाद उन्होंने अंग्रेज़ों की तरफ़ से मेसोपोटामिया की लड़ाई में हिस्सा लिया जिसमें उनकी जीत हुई. उसके बाद उन्हें सन 1918 में बग़दाद की लड़ाई में हिस्सा लेने भी भेजा गया. विश्व युद्ध से लौटने के बाद सन 1920 में उन्हें वज़ीरिस्तान भेजा गया. जब पेशावर से ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन की ख़बरें आने लगीं तो उन्हें वहां भेजा गया.
इस फ़ौजी बग़ावत की ख़बर जंगल में आग की तरह पूरे भारत में फैल गई. 24 अप्रैल को सुबह आठ बजे गढ़वाली सैनिकों को फिर से शहर जाने का आदेश दिया गया लेकिन उन्होंने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया.
कंपनी के कैप्टन चैपल गुस्से में बोले, "आपको मालूम है कि आपने ट्रेनिंग के समय शपथ ली थी कि हर आदेश का पालन करेंगे. इस पर चंद्र सिंह गढ़वाली ने जवाब दिया था, 'लड़ाई यदि दुश्मन की फ़ौज से होती तो हम अपनी जान भी दे देते, लेकिन हम अपने निहत्थे देशवासियों पर गोली नहीं चलाएंगे."
चंद्र सिंह को अपने साथियों के साथ 12 किलोमीटर पैदल चलाकर स्टेशन लाया गया. वहां से सभी बाग़ी सैनिकों को ट्रेन से एबटाबाद पहुंचाया गया.

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चंद्र सिंह गढ़वाली को किया गया गिरफ़्तार
26 अप्रैल की शाम एक अर्दली ने आकर चंद्र सिंह से कहा कि उनको कर्नल साहब बुला रहे हैं.
राहुल सांकृत्यायन अपनी किताब 'वीर चंद्र सिंह गढ़वाली' में लिखते हैं, "चंद्र सिंह ने अर्दली से पूछा कर्नल साहब अकेले हैं या और भी कोई उनके साथ है? अर्दली ने जवाब दिया वहां बहुत से लोग हैं, जनरल साहब, एबटाबाद के डिप्टी कमिश्नर और वहां के पुलिस सुपरिटेंडेंट. यह सुनते ही चंद्र सिंह ने समझ लिया कि उन्हें वहां से लौटकर आना नहीं है. वह तुरंत अपना सामान संभाल, वर्दी, बूट, ओवरकोट पहनकर और गोरखा हैट अपने सिर पर लगाकर पलटन के सभी सिपाहियों से मिलने के लिए निकल पड़े. उन्होंने उनसे कहा, 'भाइयों आपसे यह मेरी आख़िरी मुलाक़ात है."
जब चंद्र सिंह अफ़सरों से मिलने पहुंचे तो वह बाहर निकल आए. मेजर ब्रोन्सकिल ने कहा, 'चंद्र सिंह अब तुम कैद कर लिए गए हो.' उसी समय कैमरे से चंद्र सिंह का फ़ोटो लिया गया. उन्हें मोटर में बैठा दिया गया. मेजर ब्रोंन्सकिल ने खुद मोटर ड्राइव की. वह उन्हें काकुल ले गए जहां उन्हें एक कोठरी में डाल दिया गया और उनके ऊपर डबल गारद का पहरा बैठा दिया गया.

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आजीवन कारावास की सज़ा
गढ़वाली सैनिकों पर 2 जून, 1930 से सैनिक अदालत में मुक़दमा चलना प्रारंभ हुआ. हिरासत में लिए गए सैनिकों को कड़े पहरे में रखा गया था. इनमें भी चंद्र सिंह पर ख़ास नज़र रखी जा रही थी. वह अकेले शख़्स थे जिन्हें हथकड़ी पहनाकर अदालत में लाया गया था.
रमेश पोखरियाल लिखते हैं, "उन्होंने बेंच के प्रमुख से सवाल भी किया, जनरल साहब, 60 मुजरिमों में से मैं भी एक मुजरिम हूं लेकिन सिर्फ़ मुझ पर ही इतनी सख़्ती क्यों? जनरल ने जवाब दिया, तुम ख़तरनाक आदमी हो. तुम्हारे ख़िलाफ़ ख़ुफ़िया पुलिस की रिपोर्ट है कि तुमने ही बग़ावत करवाई है इसलिए तुम्हें नंबर एक अभियुक्त बनाया गया है."
बैरिस्टर मुकुंदी लाल ने चंद्र सिंह की तरफ़ से जिरह की. उनके तर्क सुनकर बेंच ने रॉयल गढ़वाल राइफ़ल को तोड़ने का सरकार का फ़ैसला ख़ारिज कर दिया. उसने सरकार की चंद्र सिंह को सज़ा-ए-मौत देने की मांग भी नहीं मानी. उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई.
उनके दूसरे साथियों को एक साल से लेकर पंद्रह साल की सज़ा सुनाई गई.

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पैरों में बेड़ियां
चंद्र सिंह की सारी जायदाद ज़ब्त कर ली गई और उन्हें फ़ौज से बर्ख़ास्त कर दिया गया.
रमेश पोखरियाल लिखते हैं, "कोर्ट का आदेश होते ही सारी बटालियन के सामने चंद्र सिंह को बेइज़्ज़त किया गया. उनके बिल्ले, बैच सब नोच लिए गए. उनकी वर्दी को कैंची से काट दिया गया. सारी जनता यह तमाशा देख रही थी."
छह साल तक चंद्र सिंह को एबटाबाद की जेल में रखा गया.
राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं, "चंद्र सिंह को एक ऐसी कोठरी में ले जाया गया जिसमें साढ़े छह फ़ीट लंबा और डेढ़ फ़ीट का एक चबूतरा था. जिसके पास आटा पीसने की एक चक्की रखी हुई थी. वहां पानी का एक घड़ा, दो फटे पुराने कंबल, एक घुटने तक का जांघिया, आधी आस्तीन की कोहनी तक की दो कमीज़ें, एक लाल टोपी, एक लोहे का तसला और एक कटोरा और एक लंगोट रखे हुए थे. चंद्र सिंह जब देह पर चुभने वाले कंबल को बिछाकर ज्यों ही लेटे उनके ऊपर खटमल, पिस्सू, मच्छर और चीटियां और तरह-तरह के कीड़े टूट पड़े. फिर उनके पैरों में बेड़ियां पहनाई गईं."

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ग्यारह साल बाद हुई रिहाई
यह बेड़ी उनके पैरों में पूरे छह साल रही और तभी निकाली गईं जब 20 अप्रैल, 1936 को उन्हें बरेली जेल भेज दिया गया.
यहीं वह कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों यशपाल, शिव वर्मा और विजय कुमार सिंह के संपर्क में आए.
देवेंद्र सिंह असवाल अपने लेख 'वीर चंद्र सिंह गढ़वाली 'द सोल्जर हू रिफ़्यूज़्ड टू फ़ायर ऑन अनआर्म्ड सिविलियंस' में लिखते हैं, "बरेली जेल के कैदी उन्हें 'हवलदार' या 'गढ़वाली' कह कर पुकारते थे जो चंद्र सिंह को पसंद नहीं था.
तब यशपाल ने उन्हें 'बड़े भाई' कहना शुरू किया. उसके बाद तो नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और गोविंद वल्लभ पंत ने उन्हें 'बड़े भाई' कह कर ही पुकारा. इसी जेल में पंडित नेहरू की उनसे पहली बार मुलाकात हुई.
वहीं सरकार का फ़रमान आया कि चंद्र सिंह को छोड़कर पेशावर विद्रोह के बाक़ी कैदियों की सज़ा आधी की जाती है. इसके बाद उन्हें लखनऊ जेल भेज दिया गया.
जहां सुभाष चंद्र बोस उनसे मिलने आए. वहीं जवाहरलाल नेहरू भी गिरफ़्तार होने के बाद भेजे गए. दोनों ने साथ-साथ जेल में 42 दिन बिताए. कई जेलों में रहने के बाद आख़िरकार 20 सितंबर, 1941 को 11 साल, तीन महीने, 18 दिन जेल में रहने के बाद चंद्र सिंह गढ़वाली को रिहा कर दिया गया.
सितंबर, 1942 में ही रॉयल गढ़वाल राइफ़ल्स की दो बटालियनें सुभाष चंद्र बोस की 'आज़ाद हिंद फ़ौज' में शामिल हो गईं. ब्रिटिश रक्षा मंत्री फ़िलिप मेसन ने माना कि गढ़वाली सैनिक राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत थे. उन्होंने बोस के साथ मिलकर भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ी.

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गांधी के वर्धा आश्रम पहुंचे चंद्र सिंह
वह रिहा तो कर दिए गए लेकिन उनके गढ़वाल जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. लखनऊ से चंद्र सिंह इलाहाबाद आए और वहां से 1942 में महात्मा गांधी के वर्धा सेवाग्राम आश्रम चले गए. वहां वह बापू के आचार-विचार, नियम-धर्म से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वहीं रहकर काम करने का मन बना लिया.
सेवाग्राम में रहने के ही दौरान महात्मा गांधी के जीवनीकार और अमेरिकी पत्रकार लुई फ़िशर वहां आए. गांधीजी ने जब चंद्र सिंह का उनसे ज़िक्र किया तो वह उनसे मिलने चले आए.
राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं, "फ़िशर ने चंद्र सिंह से पूछा क्या भारतीय सेना दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेज़ों की तरफ़ से लड़ेगी? चंद्र सिंह ने जवाब दिया, 'सेना तो अनुशासन की पाबंद होती है, इसलिए हुक्म होने पर वह ज़रूर लड़ाई में हिस्सा लेगी, लेकिन उसे अपने देश का भी ख़्याल है. वह मन से लड़ाई में शामिल नहीं होगी."
फ़िशर ने फिर उन्हें टटोला, "अगर उसे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के लिए कहा जाएगा तो?"
चंद्र सिंह ने जवाब दिया, "वह कभी अपने भाइयों पर गोली नहीं चलाएगी. अंग्रेज़ उसे हमारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे."
फ़िशर ने इस बातचीत को अमेरिकी पत्रों में छपवा दिया. अंग्रेज़ों ने उसकी कापियां भारत में नहीं आने दीं. उनको डर लगा कि कहीं इससे सेना पर बुरा असर न पड़े.

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चुनाव में नहीं मिली कामयाबी
भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण चंद्र सिंह गढ़वाली को एक बार फिर हिरासत में ले लिया गया. कई जेलों में तीन साल तक रहने के बाद उन्हें 1945 में रिहा कर दिया गया.
तब भी गढ़वाल में प्रवेश न करने की उन पर लगाई गई पाबंदी जारी थी. काफ़ी भागदौड़ के बाद 22 दिसंबर, 1946 को उन्हें गढ़वाल में प्रवेश करने की इजाज़त मिली.
सन 1950 में वो अपने परिवार के साथ कोटद्वार में ध्रुवपुर में आकर बस गए. उसके बाद उन्होंने सीपीआई से 1952, 57, और 1962 के आम चुनाव लड़े लेकिन किसी में उनकी जीत नहीं हो पाई.

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आज़ाद भारत में भी जेल से नहीं छूटा पीछा
देश के आज़ाद होने पर भी चंद्र सिंह गढ़वाली का जेल से नाता नहीं टूट पाया. आज़ाद भारत में भी उन्हें दो बार जेल की यात्रा करनी पड़ी. पहले तो ग़लत वारंट के आधार पर उन्हें 1948 में गिरफ़्तार किया गया.
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत के हस्तक्षेप और लिखित रूप से खेद प्रकट करने के बाद उन्हें रिहा किया गया. इसके बाद 1962 के चीनी हमले के समय भी उन्हें हिरासत में लिया गया.
रमेश पोखरियाल लिखते हैं, "सरकार को शक था कि उस समय देश के कम्युनिस्ट चीन से मिले हुए थे. कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हो गया. दो कम्युनिस्ट पार्टियां बनी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी. सरकार ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं की धरपकड़ शुरू कर दी. चंद्र सिंह अपने-आप को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य मानते थे, इसलिए उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया."
बाद में पत्नी के इलाज के लिए सरकार को भेजे गए प्रार्थना-पत्र के आधार पर उन्हें पेरोल पर छोड़ दिया गया.
एक अक्तूबर, 1979 को आज़ादी की लड़ाई के इस नायक ने लंबी बीमारी के बाद हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं. उनकी मृत्यु के कुछ दिनों बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उन्हें श्रद्धांजलि देने कोटद्वार में उनके निवास स्थान पर आईं.
सन 1994 में भारत सरकार ने उनकी याद में एक डाक टिकट जारी किया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.













