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बांग्लादेश के सेना प्रमुख ने जो कहा, उसका क्या मतलब निकाला जा रहा है?
- Author, कादिर कल्लोल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, ढाका
बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष जनरल वकार-उज़-ज़मां का हालिया भाषण देश की राजनीति में बहस का मुद्दा बन गया है. इस बात पर कयास और चर्चा का दौर लगातार तेज़ हो रहा है कि उन्होंने अपने भाषण के जरिए क्या संदेश दिया है.
उन्होंने राजनीतिक दलों की ओर से एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने, पिलखाना हत्याकांड और खुफिया विभाग समेत विभिन्न संस्थानों के बारे में बाते की हैं.
अपनी स्पीच में सेनाध्यक्ष ने देश की स्वाधीनता और संप्रभुता के सवाल पर लोगों को आगाह किया है.
भाषण के दौरान जनरल वकार-उज़-ज़मां की शारीरिक भाव भंगिमा और भाषा काफी कड़ी नज़र आई थी. इससे कई राजनेता भी हैरान हैं.
इसकी वजह यह है कि देश की अंतरिम सरकार के बीते छह महीने के कार्यकाल के दौरान अलग-अलग जगहों पर विभिन्न कार्यक्रमों में दिए गए उनके भाषण और हाल के भाषण में फ़र्क़ साफ़ नज़र आता है.
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क्या सेना प्रमुख ने राजनेताओं को चेताया है?
सेनाध्यक्ष जनरल वकार ने बीते साल जुलाई में हुए आंदोलन के कारण शेख हसीना सरकार के तख्ता पलट के बाद, पांच अगस्त, को राजनीतिक दलों के साथ बैठक के बाद भी भाषण दिया था.
उनका भाषण शेख हसीना के सत्ता और देश छोड़ने के साथ ही अंतरिम सरकार के गठन और तात्कालिक परिस्थिति के बारे में था. उस दिन सेना प्रमुख की शारीरिक भाव भंगिमा या भाषा इतनी कड़ी नहीं थी.
कई राजनेताओं का मानना है कि सेनाध्यक्ष के हालिया भाषण की कड़ी भाषा की सबसे बड़ी वजह अंतरिम सरकार और राजनीतिक दलों की नाकामी है.
उनमें से कुछ का कहना है कि सामूहिक तख्ता पलट के बाद सत्ता संभालने वाली अंतरिम सरकार कई मोर्चे पर नाकाम रही है. खासकर कानून और व्यवस्था की स्थिति को लेकर काफी चिंता और आशंका का माहौल बना है. इसके अलावा राजनीतिक दलों में भी मतभेद सतह पर आ गया है. कई लोग इसे समग्र तौर पर एक अनियंत्रित परिस्थिति के तौर पर देखते हैं.
अंतरिम सरकार के छह महीने के कार्यकाल पर लोगों के मन में भरोसे का अभाव और संदेह है. उनके लिए यह तय करना मुश्किल है कि यह सरकार परिस्थिति पर किस हद तक नियंत्रण कायम कर सकी है. राजनीतिक दलों का भी मानना है कि कई मामलों में सरकार अपना नियंत्रण कायम या साबित नहीं कर सकी है.
प्रमुख राजनीतिक पार्टी बीएनपी के महासचिव मिर्ज़ा फख़रुल इस्लाम आलमगीर बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "मेरी राय में राजनीतिक दलों समेत तमाम संबंधित पक्ष एकजुट होकर अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर पा रहे हैं. इसी वजह से सेना प्रमुख ने सबको आगाह करते हुए उक्त भाषण दिया है."
सेना प्रमुख ने मंगलवार को ढाका के रावा क्लब में कठोर भाषा में अपने भाषण के दौरान राजनीतिक दलों के बीच मतभेदों समेत विभिन्न मुद्दों पर बार-बार चेतावनी दी. यह कार्यक्रम बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) मुख्यालय में साल 2009 में हुए नरसंहार में मारे गए सैन्य अधिकारियों की याद में आयोजित किया गया था.
राजनीतिक दलों को सेना प्रमुख का संदेश
सेनाध्यक्ष जनरल वकार-उज़-ज़मां ने अपने भाषण में राजनीतिक दलों को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वो एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने और लड़ने से बाज नहीं आए, तो देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी. उनका कहना था, "यह देश सबका है. हम सुख और शांति के साथ रहना चाहते हैं. हम हमले, झगड़े और अशांति नहीं चाहते."
सेना प्रमुख का यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब राजनीतिक दलों के आपसी मतभेद सतह पर आ गए हैं. खासकर बीते कुछ दिनों से बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के बीच वाक युद्ध का सिलसिला लगातार तेज़ हो रहा है. विभिन्न क्षेत्रों में सुधार, स्थानीय चुनावों और संसदीय चुनाव के मुद्दे पर इन दोनों दलों के आपसी मतभेदों का असर दूसरे राजनीतिक दलों पर भी पड़ा है. इन मुद्दों पर पार्टियों का परस्पर विरोधी रुख़ अब साफ़ नजर आने लगा है.
दूसरी ओर, हसीना सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आंदोलन का नेतृत्व करने वाले छात्रों की नई पार्टी का शुक्रवार को गठन किया जाएगा. इस पार्टी के गठन की कवायद में शामिल कई छात्र नेताओं ने भी विभिन्न मुद्दों पर बीएनपी की आलोचना की है. इससे विवाद भी पैदा हुआ है.
अंतरिम सरकार में शामिल छात्रों के तीन प्रतिनिधियों में से एक नाहिद इस्लाम ने सलाहकार के पद से इस्तीफा दे दिया है. अब वो नई पार्टी का नेतृत्व संभालेंगे.
उनके अलावा बाकी दो सलाहकार-आसिफ महमूद औऱ महफूज आलम सलाहकार के पद पर बने रहेंगे. महफूज आलम को अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय का भी जिम्मा सौंप दिया गया है. पहले यह मंत्रालय नाहिद इस्लाम के पास था.
विभिन्न राजनीतिक पार्टियां अब यह सवाल उठा रही हैं कि नई पार्टी से उनका क्या संबंध है और वो उससे किस हद तक जुड़े हुए हैं?
सलाहकार के पद पर रहने के दौरान ही पार्टी के गठन की प्रक्रिया में शामिल होने की वजह से अंतरिम सरकार की निष्पक्षता का सवाल भी सामने आ गया है. खासकर बीएनपी के महासचिव मिर्ज़ा फख़रुल इस्लाम आलमगीर ने हाल में बीबीसी बांग्ला से एक बातचीत के दौरान यह सवाल उठाया था.
बीएनपी समेत विभिन्न पार्टियों ने छात्रों की इस नई पार्टी के गठन के पीछे सरकार का हाथ होने का भी आरोप लगाया है. उसके बाद कई छात्र नेताओं ने आलमगीर और बीएनपी की आलोचना भी की थी. इस वजह से बीएनपी के साथ उसकी दूरियां बढ़ी हैं.
विभिन्न राजनीतिक संगठनों के आपसी मतभेदों और परस्पर विरोधी रवैए के कारण कई तरह के संकट पैदा हुए हैं और आम लोगों का भरोसा भी कम हुआ है. सरकार भी मौजूदा राजनीतिक हालात में कोई भूमिका नहीं निभा पा रही है.
सेना प्रमुख ने इसी पृष्ठभूमि में संबंधित पक्षों को आगाह किया है. उन्होंने अपने भाषण के दौरान कई बार 'सतर्क' शब्द का इस्तेमाल किया था. जनरल वकार ने यह भी आशंका जताई कि इससे देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी.
अब सेना प्रमुख के भाषण को लेकर बीएनपी में विचार-विमर्श और बहस जारी है. लेकिन पार्टी के महासचिव मिर्ज़ा फख़रुल इस्लाम आलमगीर ने बीबीसी बांग्ला को बताया, "सेना प्रमुख के भाषण को लेकर कोई गलतफहमी नहीं है. उनका भाषण बढ़िया ही था. इस समय देश में सबका एकजुट होना समय की मांग है."
जमात-ए-इस्लामी के नेताओं का कहना है कि राजनीतिक दलों को एक-दूसरे पर कीचड़ उछालना बंद कर देना चाहिए. पार्टी के केंद्रीय प्रचार सचिव मतीउर रहमान आकंद ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "सेना प्रमुख के भाषण में वही चिंता झलकती है, जो राजनीति में एकता की जगह विभाजन से पैदा हुई है."
हालांकि, फिलहाल बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं. इसकी वजह यह है कि दोनों पार्टियां विभिन्न मुद्दों पर एक-दूसरे की आलोचना करती रही हैं.
जमात के केंद्रीय नेता मतीउर रहमान ने कहा है कि देश की अस्थिर परिस्थिति के साथ स्वाधीनता और संप्रभुता के खतरे में पड़ने का मुद्दा क्यों आया, इस पर और सेना प्रमुख के भाषण में सामने आने वाले विभिन्न मुद्दों पर पार्टी में चर्चा के बाद ही आधिकारिक प्रतिक्रिया दी जाएगी.
बीबीसी ने जब दूसरे दलों और गठबंधनों के अलावा डेमोक्रेसी फोरम में शामिल कई दलों के नेताओं से बात की, तो वो आपस में चर्चा से पहले कोई औपचारिक बयान देने को तैयार नहीं हुए.
क्या भरोसा बहाल होगा?
सेना प्रमुख जनरल वकार-उज़-ज़मां ने अपने भाषण में यह भी कहा था कि उनकी कोई निजी महत्वाकांक्षा नहीं है. उनकी इस टिप्पणी पर भी चर्चा हो रही है.
लेकिन कई राजनेताओं का कहना है कि विभिन्न गिरोहों की अनुशासनहीनता और भीड़ की हिंसा जारी है. इसके साथ ही डकैती, लूट और रंगदारी पर भी अंकुश नहीं लगाया जा सका है. कानून और व्यवस्था की स्थिति में भारी गिरावट के कारण अंतरिम सरकार के प्रति भरोसे का संकट बढ़ा है.
अब इस सवाल पर भी चर्चा हो रही है कि अगर यह सरकार चौतरफा अराजकता के माहौल को संभालने में नाकाम है, तो क्या देश में सैनिक शासन लागू हो सकता है?
इसी पृष्ठभूमि में सेना प्रमुख ने कहा था कि उनकी कोई निजी महत्वाकांक्षा नहीं है. उन्होंने चुनाव का भी जिक्र किया है.
फिलहाल राजनीतिक दलों को उम्मीद है कि न्यूनतम या जरूरी सुधारों के बाद चुनाव के जरिए देश में लोकतंत्र की बहाली होगी.
बांग्लादेश कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव रुहीन हुसैन प्रिंस कहते हैं, "सत्ता में रहने वालों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि स्वतंत्र औऱ निष्पक्ष चुनाव हों जिसमें तमाम पार्टियां शामिल हो सकें."
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि देश की मौजूदा अस्थिर परिस्थिति में सेना प्रमुख का भाषण लोगों का भरोसा लौटाने में मदद कर सकता है.
डीजीएफआई और एनएसआई समेत विभिन्न संगठन सवालों के घेरे में क्यों?
सेना प्रमुख का कहना था, "पुलिस, आरएबी, डीजीएफआई और एनएसआई जैसे संस्थानों ने अतीत में देश के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए हैं. इन संस्थानों ने कुछ खराब काम भले किए हों, लेकिन अनगिनत बढ़िया काम किए हैं. अगर किसी ने कोई अपराध किया है तो उसे उसकी सजा ज़रूर मिलेगी. लेकिन इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम इस तरीके से काम करेंगे कि यह तमाम संगठन कमजोर न हो जाएं."
पहले सत्ता में रही अवामी लीग के कार्यकाल के दौरान विभिन्न सरकारी संगठनों के खिलाफ अपहरण औऱ हत्या समेत मानवाधिकारों के उल्लंघन के कई आरोप लगे हैं. पुलिस, बीजीबी, डीजीएफआई और एनएसआई की पहले की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं.
कई लोगों ने यह सवाल उठाया है कि ऐसे विवादास्पद संगठनों को बने रहने देना चाहिए या नहीं? विश्लेषकों का कहना है कि सेना प्रमुख ने अपने भाषण में ऐसे तमाम सवालों के प्रति अपना नज़रिया स्पष्ट कर दिया है.
सेना प्रमुख वकार-उज़-ज़मां का कहना था, "हमें यह बात याद रखनी होगी कि सेना के किसी सदस्य ने यह बर्बरता नहीं की. यह पूरा कांड तत्कालीन बीजीबी (बीडीआर) के सदस्यों का किया धरा था. इसमें कोई 'किंतु' और 'परंतु' नहीं है."
उनका कहना था, "अगर इस मामले में 'किंतु' और 'लेकिन' उठता है, तो उस न्यायिक प्रक्रिया में बाधा पहुंचेगी जो लंबे समय से चल रही है. कई लोग बीते 16-17 साल से जेल में हैं, कई लोगों को सजा मिल चुकी है. हमें इस बात को स्पष्ट तौर पर याद रखना होगा. इस न्यायिक प्रक्रिया की राह में बाधा न पहुंचाएं. जिन तमाम सदस्यों को सजा मिली है, वो उसी के लायक थे."
दावा किया जा रहा है कि 16 साल पुराने उस हत्याकांड की दोबारा जांच की जा रही है. इस बीच, उस घटना में लंबे समय से जेल में रहे बीजीबी (बीडीआर) के कई सदस्यों को जेल से रिहा कर दिया गया है.
सेना के दो पूर्व अधिकारियों से बातचीत से लगा कि जेल में रहने वाले कई लोगों की रिहाई के कारण उस कांड में मृत या घायल सेना के जवानों के परिवारों में भारी नाराज़गी पनपी है. उसे एक तरह का दबाव कहा जा सकता है.
यही वजह है कि सेना प्रमुख ने अपने भाषण में इस मामले का जिक्र किया था. कई लोग इसे गुस्से की अभिव्यक्ति भी मान रहे हैं.
'चुनाव की ओर ही बढ़ना होगा'
सेना प्रमुख वकार-उज़-ज़मां ने देश में एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और भागीदारी पूर्ण चुनाव के आयोजन की उम्मीद जताई है. उनका कहना था, हम देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनाव की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. उससे पहले सरकार जरूरी सुधारों को पूरा करेगी.
जनरल वकार ने कहा, "मैंने जितनी बार डॉ यूनुस के साथ बात की है, वो इस बात पर मुझसे पूरी तरह सहमत थे कि देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और सभी को साथ लेकर चुनाव होने चाहिए. ये दिसंबर तक हो जाने चाहिएं. मुझे लगता है कि सरकार उसी दिशा में बढ़ रही है."
इससे पहले अंतरिम सरकार के गठन के शुरुआती दिनों में सेना प्रमुख ने 18 महीने के भीतर चुनाव की बात कही थी. उन्होंने अपने अंतिम भाषण में भी इसका जिक्र किया था.
हालांकि, बीएनपी समेत विभिन्न राजनीतिक दल अंतरिम सरकार के गठन के समय ही चुनाव के रोडमैप की मांग करती रही हैं. लेकिन सरकार चुनाव की तारीख पर कोई संकेत नहीं दे रही थी.
वैसी परिस्थिति में सेना प्रमुख ने 18 महीनों के भीतर चुनाव कराने की बात कही थी. इसके बाद मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने कहा था कि राजनीतिक पार्टियां कितना सुधार चाहती हैं, उसी आधार पर दिसंबर या अगले साल जून के भीतर चुनाव कराए जा सकते हैं.
सेना प्रमुख ने अपने ताज़ा भाषण में सभी को साथ लेकर चुनाव की बात कही है. बीएनपी समेत तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं का कहना है कि दिसंबर में चुनाव कराने के लिए इसी समय से तैयारियां शुरू हो जानी चाहिए थी. लेकिन फिलहाल सरकार की ओर से ऐसी कोई तैयारी नहीं नज़र आ रही है.
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सेना प्रमुख के भाषण से चुनाव का मुद्दा और प्रासंगिक हो जाएगा.
सुरक्षा विश्लेषक और सेवानिवृत्त मेजर जनरल एएनएम मुनीरुज्जमां ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "देश को चुनाव की राह पर डालने से समस्याएं कम हो जाएंगी."
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