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बांग्लादेश क्या बांग्ला राष्ट्रवाद से इस्लामी राष्ट्रवाद में शिफ़्ट हो रहा है?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान धर्म के आधार पर बना था और फिर इससे बांग्लादेश भाषा के आधार पर अलग हुआ. बांग्लादेश की आज़ादी की बुनियाद बांग्ला राष्ट्रवाद था लेकिन यह राष्ट्रवाद इस्लाम के ख़िलाफ़ नहीं था.
मार्च 1948 में मोहम्मद अली जिन्ना ने जब उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा घोषित किया, तभी बांग्ला राष्ट्रवाद का बीज पड़ चुका था. इसी का नतीजा था कि 1952 में पूर्वी पाकिस्तान में भाषायी आंदोलन शुरू हो गया था.
जब बांग्लादेश अलग हुआ तो धर्म के आधार पर बने पाकिस्तान को लेकर लोग सवाल उठाने लगे थे. लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि धार्मिक पहचान ही सबकुछ नहीं होती है. ऐसे में धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने का फ़ैसला ग़लत था. लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया था कि बंगाली पहचान इस्लामी पहचान से अलग है.
बांग्लादेश जब बना तो उसने बांग्ला राष्ट्रवाद और सेक्युलर गणतंत्र को अपनाया. शेख़ मुजीब-उर रहमान ने फ़ैसला किया था कि एक राष्ट्र-राज्य के रूप में बांग्लादेश की बुनियाद धर्मनिरपेक्षता में होगी. यह फ़ैसला पाकिस्तान के इस्लामिक राष्ट्र के अनुभव के बाद किया गया था. बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी धड़ों को बैन भी किया गया था क्योंकि इन्हें पाकिस्तान परस्त माना जाता था.
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लेकिन बांग्लादेश का सेक्युलर किरदार बहुत दिनों तक मज़बूत नहीं रहा. 1975 में बांग्लादेश के संस्थापक शेख़ मुजीब-उर रहमान की हत्या कर दी गई और सैन्य तख़्तापलट हो गया. बांग्लादेश के सेक्युलरिज़म के लिए यह बड़ा झटका था.
सैन्य तानाशाह ज़िआ-उर रहमान ने 1977 में बांग्लादेश के संविधान से सेक्युलरिज़म हटा दिया और इस्लामिक पार्टियों पर लगी पाबंदी भी हटा ली. 1988 में जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद ने इस्लाम को राजकीय धर्म बना दिया था.
हालांकि 2009 में शेख़ हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग की सरकार आई तो संविधान में सेक्युलरिज़म को शामिल करने का वादा किया. 2011 में बांग्लादेश के संविधान में सेक्युलरिज़म को फिर से शामिल कर लिया गया और इस्लाम राजकीय धर्म के रूप में बना रहा.
इस्लाम राजकीय धर्म
बांग्लादेश के संविधान के अनुच्छेद दो के मुताबिक़ इस्लाम राजकीय धर्म है लेकिन साथ ही अनुच्छेद 12 में कहा गया है कि बांग्लादेश धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और दूसरे धर्म के लोगों को भी बराबर का अधिकार हासिल है.
पिछले साल अगस्त महीने में शेख़ हसीना के बेदख़ल होने के बाद से एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि क्या बांग्लादेश बांग्ला राष्ट्रवाद से इस्लामिक राष्ट्रवाद की ओर बढ़ रहा है?
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने कई सुधार आयोगों का गठन किया था. इसमें एक संवैधानिक सुधार आयोग भी था. इस आयोग ने बांग्लादेश के संविधान से सेक्युलरिज़म टर्म हटाने के की सिफ़ारिश की थी.
मोहम्मद यूनुस की सरकार को बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी संगठन भी समर्थन कर रहा है. जमात-ए-इस्लामी के बारे में कहा जाता है कि यह बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के दौरान पाकिस्तान के साथ था. जमात एक तरह से स्वतंत्र बांग्लादेश का विरोध करता रहा है.
इसी महीने बांग्लादेश की न्यूज़ वेबसाइट प्रथम आलो को दिए इंटरव्यू में बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफ़ीक़ुर रहमान ने कहा था, ''1971 में हमारा रुख़ सिद्धांत से जुड़ा था. हम भारत के फ़ायदे के लिए स्वतंत्र देश नहीं चाहते थे. हम चाहते थे कि पाकिस्तानी हमें मताधिकार देने के लिए मजबूर हों. अगर यह संभव नहीं होता तो कई देशों ने गुर्रिल्ला युद्ध के ज़रिए आज़ादी हासिल की है."
शफ़ीक़ुर रहमान ने कहा था, "अगर हमें किसी के ज़रिए या किसी के पक्ष में आज़ादी मिलती तो यह एक बोझ हटाकर दूसरे बोझ के तले दबने की तरह होता. पिछले 53 सालों से बांग्लादेश के लिए क्या यह सच नहीं हुआ है? हमें यह क्यों सुनने के लिए मिलना चाहिए कि कोई ख़ास देश किसी ख़ास पार्टी को पसंद नहीं करता है. कोई ख़ास देश अगर नहीं चाहता है तो कोई ख़ास पार्टी सत्ता में नहीं आ पाती है. क्या स्वतंत्र देश का यही तेवर होता है? बांग्लादेश के युवा अब ये सब सुनना नहीं पसंद करते हैं.''
कोलकाता यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर हिमाद्रि चटर्जी कहते हैं कि बांग्लादेश में हमेशा से हाइब्रिड राष्ट्रवाद था.
बांग्ला राष्ट्रवाद बनाम इस्लामिक राष्ट्रवाद
प्रोफ़ेसर चटर्जी कहते हैं, ''बांग्लादेश बांग्ला राष्ट्रवाद के ज़रिए बना है लेकिन इस्लाम कहीं गया नहीं था. बांग्ला राष्ट्रवाद की वकालत करने वाले इस्लाम विरोधी नहीं थे. यहां शुरू से ही हाइब्रिड राष्ट्रवाद था. शेख़ हसीना को लगा कि वह बांग्लादेश केवल बांग्ला राष्ट्रवाद के ज़रिए संभाल लेंगी और यही उनकी ग़लती थी. मुक्ति युद्ध के रोमांस से बांग्लादेश कब का निकल चुका था. शेख़ हसीना इस बात को समझ नहीं पाईं.''
प्रोफ़ेसर हिमाद्रि चटर्जी कहते हैं, ''बांग्लादेश को अभी देखने पर ऐसा ही लगता है कि बांग्ला राष्ट्रवाद पर इस्लामिक राष्ट्रवाद हावी हो रहा है लेकिन वहाँ की जनता ऐसा नहीं होने देगी. बांग्लादेश के लोगों ने पाकिस्तान को देखा है और अब भी देख रहे होंगे. मुझे नहीं लगता है कि ऐसी ग़लती करेंगे.''
सुमित गांगुली स्टैनफ़ॉर्ड यूनिवर्सिटी में भारत-अमेरिका संबंध पर हटिंगटन प्रोग्राम में सीनियर फेलो हैं. उन्होंने 12 फ़रवरी को अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में बंगाली राष्ट्रवाद और इस्लामिक कट्टरपंथ को लेकर एक लेख लिखा था.
इस लेख में सुमित गांगुली कहते हैं, ''1980 के दशक में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी खाड़ी के देशों में काम करने गए. इनमें से ज़्यादातर लोगों को सऊदी अरब में काम मिला. बांग्लादेश के लोगों को सऊदी अरब में बिल्कुल अलग इस्लाम दिखा. इसके साथ ही बांग्लादेश की राजनीति में इस्लाम की भागीदारी बढ़ रही थी. सऊदी अरब ने बांग्लादेश में मदरसों को फंड देना शुरू किया."
''इन मदरसों का इस्लाम बंगाली इस्लाम से बिल्कुल अलग था. बांग्लादेश की सोसाइटी में इस इस्लाम की जड़ें मज़बूत हुईं. ज़ाहिर है कि बंगाली राष्ट्रवाद कट्टरपंथी इस्लाम के साथ बहुत सहज नहीं था. शेख़ हसीना के जाने के बाद बंगाली राष्ट्रवाद की असहजता और बढ़ी है. शेख़ मुजीब-उर रहमान के घर पर हमला इसी असहजता की झलक थी. इस हमले के पीछे जमात-ए-इस्लामी के लोग थे.''
पाकिस्तान के जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक परवेज़ हुदभाई पिछले साल नवंबर में बांग्लादेश गए थे. परवेज़ हुदभाई ने भी ऐसा महसूस किया कि बांग्लादेश में बांग्ला राष्ट्रवाद पर इस्लामिक राष्ट्रवाद हावी हो रहा है.
भारत दुश्मन या पाकिस्तान?
परवेज़ हुदभाई कहते हैं, ''बांग्लादेश में एक बेचैनी है. अभी एक तरफ़ सेक्युलर नेशनलिज़म है, जिसमें भाषायी पहचान की बात है. इस बात पर बांग्लादेश के लोग अरसे तक गर्व करते रहे हैं. दूसरी तरफ़ बांग्लादेश के भीतर मज़हबी ताक़त भी सिर उठा रही है. इनकी कोशिश है कि बांग्लादेश को इस्लामी रंग दिया जाए. लेकिन मेरा मानना है कि बांग्लादेशी समाज के अंदर मज़बूती है. बांग्लादेश की औरतें बुर्क़ा नहीं पहनती हैं, मर्दों के साथ काम करती हैं और पाकिस्तानी महिलाओं की तुलना में ज़्यादा आधुनिक हैं. मेरे ख़्याल में बांग्लादेश में कश्मकश है लेकिन इस्लामी ताक़तों की जीत नहीं होगी. बांग्लादेश के लोगों को याद होगा कि 1971 में इस्लाम के नाम पर कितना अत्याचार हुआ था.''
परवेज़ हुदभाई कहते हैं, ''शेख़ हसीना के जाने के बाद इस्लामी ताक़तों को बढ़ावा मिला है लेकिन बांग्लादेश के लोग अतीत को इतनी आसानी से भूल नहीं जाएंगे. पाकिस्तान इस्लामिक राष्ट्रवाद में कितना फल फूल रहा है, बांग्लादेश के लोग देख रहे होंगे. बांग्लादेश को देखना चाहिए कि धार्मिक राष्ट्रवाद ने पाकिस्तान को कहाँ पहुँचा दिया. बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले हुए हैं लेकिन अब भी वहाँ हिन्दू और मुस्लिम साथ में काम करते हैं, जो कि पाकिस्तान में संभव नहीं है.''
परवेज़ हुदभाई कहते हैं कि अगर बांग्लादेश में बांग्ला राष्ट्रवाद पर इस्लामिक राष्ट्रवाद हावी होता है तो यह मुल्क टूट फूट की ओर बढ़ेगा.
हुदभाई कहते हैं, ''मैं अभी ढाका गया था तो ढाका यूनिवर्सिटी में लोग वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस की जयंती मना रहे थे. ऐसा कभी पाकिस्तान में नहीं हो सकता है. मुझे यह बात बहुत अच्छी लगी. मोहम्मद यूनुस भी इस कार्यक्रम में आए थे.''
बांग्लादेश में राष्ट्रवाद को लेकर काफ़ी बहस हो रही है. बांग्लादेश के राष्ट्रवाद में पाकिस्तान को दुश्मन माना जाए या भारत को इस पर भी बहस हो रही है. परवेज़ हुदभाई कहते हैं कि बांग्लादेश में पाकिस्तान को लेकर सोच बदल रही है क्योंकि अब वो ग़ुस्सा नहीं दिख रहा है. बांग्लादेश की राजनीतिक पार्टियां भी मुक्ति युद्ध में भारत की भूमिका पर सवाल उठा रही हैं.
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य मिर्ज़ा अब्बास ने पिछले साल एक दिसंबर को कहा था, ''भारत दो हिन्दू देश बनाना चाहता है. ये चटगाँव पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं. हर कोई कहता है कि बांग्लादेश एक छोटा और ग़रीब देश है. लेकिन मैं मानता हूँ कि बांग्लादेश एक उदार और मज़बूत देश है. भारत को याद रखना चाहिए कि हमारे पास छोटी सेना है लेकिन 1971 में हमने बिना ट्रेनिंग के लड़ाई लड़ी थी. बांग्लादेश के 20 करोड़ लोग सैनिक हैं.''
मिर्ज़ा अब्बास ने कहा, ''यहाँ तक कि इसी साल तानाशाह हसीना को हमारे बेटों और बेटियों ने बिना हथियार के सत्ता से हटाया. राहुल गांधी ने कहा था कि भारत ने बांग्लादेश को मुक्त कराया. लेकिन भारत ने बांग्लादेश नहीं बनाया. हमने बांग्लादेश मुक्त कराया. भारत ने तो पाकिस्तान को बाँटा और ये अपने स्वार्थ में किया न कि हमारे स्वार्थ के लिए.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित