मार्क कार्नी के प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या भारत और कनाडा के रिश्ते सुधरेंगे?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाल ही में कनाडा की लिबरल पार्टी के नेतृत्व का चुनाव जीत लेने के बाद पूर्व केंद्रीय बैंकर मार्क कार्नी अब कनाडा के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं.
मार्क कार्नी नौ साल तक कनाडा के प्रधानमंत्री रहे जस्टिन ट्रूडो की जगह लेंगे.
ट्रूडो ने अपनी ही पार्टी से बढ़ते दबाव की वजह से जनवरी में अपने इस्तीफ़े की घोषणा करते हुए कहा था कि वे तब तक पद पर बने रहेंगे, जब तक उनकी लिबरल पार्टी नया नेता नहीं चुन लेती.
पिछले कुछ समय से भारत और कनाडा के रिश्ते अच्छे नहीं हैं, ऐसे में नज़रें इस बात पर भी टिकी हैं कि कार्नी के प्रधानमंत्री बनने पर कनाडा और भारत के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा.

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क्या कहना है कार्नी का?

कनाडा में इस साल अक्टूबर में संघीय चुनाव होने हैं, लेकिन माना जा रहा है कि कार्नी प्रधानमंत्री बनते ही जल्द से जल्द चुनाव करवाने की घोषणा कर सकते हैं.
विश्लेषकों के मुताबिक़, जल्दी चुनाव करवाने से लिबरल पार्टी को इस बात का फ़ायदा मिल सकता है कि उसने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया धमकियों का डटकर मुक़ाबला किया है.
हाल ही में मार्क कार्नी ने कहा कि अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो वे भारत के साथ व्यापार संबंधों को बहाल करेंगे. उन्होंने समान विचारधारा वाले देशों के साथ कनाडा के व्यापार संबंधों में विविधता लाने की भी बात की.
कार्नी ने कहा, "कनाडा के पास समान सोच वाले मित्र देशों के साथ अपने व्यापार संबंध डावर्सिफ़ाई करने का अवसर है. हमारे पास भारत के साथ संबंधों को फिर से बनाने के अवसर हैं. उस वाणिज्यिक संबंध के इर्द-गिर्द मूल्यों की साझा भावना होनी चाहिए और अगर मैं प्रधानमंत्री हूं तो मैं इस अवसर का बेसब्री से इंतज़ार करूंगा."
जनवरी में जब जस्टिन ट्रूडो ने अपने इस्तीफ़े की घोषणा की थी, तो भारत के विदेश मंत्रालय ने कनाडा के साथ अपने मज़बूत द्विपक्षीय संबंधों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर ज़ोर दिया था.
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने उस वक़्त कहा था कि भारत कनाडा की राजनीतिक घटनाक्रम पर नज़र बनाये हुए है.
साथ ही, उन्होंने ये भी कहा था कि भारत और कनाडा के बीच गहरे संबंध हैं और भारत को उम्मीद है कि ये रिश्ते मज़बूत बने रहेंगे और भारत इस दिशा में कोई भी कदम उठाने के लिए तैयार रहेगा.
क्यों आया भारत-कनाडा रिश्तों में तनाव?

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सितंबर 2023 में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के पीछे भारतीय एजेंटों का हाथ होने का इल्ज़ाम लगाया.
भारत ने इन आरोपों को पूरी तरह ख़रिज किया था और इन्हें 'बेतुके' और 'प्रेरित' बताया था.
इस बयान से शुरू हुए राजनयिक संकट के चलते दोनों देशों ने एकदूसरे के राजनयिकों को अपने यहां से निष्कासित कर दिया, अपने नागरिकों के लिए प्रतिकूल ट्रैवल एडवाइज़री जारी की और भारत ने कनाडा में वीज़ा सेवाओं को भी बंद कर दिया.
साथ ही, भारत ने कहा था कि भारत में वॉन्टेड लोगों को कनाडा में पनाह दी जा रही है.
भारत का ये भी कहना था कि इन अपराधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने या उनके प्रत्यर्पण के लिए कनाडा की तरफ़ से कोई मदद नहीं मिली है.
इन तल्ख़ियों के बीच भारत और कनाडा के संबंध अपने निम्नतम स्तर पर पहुँच गए थे.
जस्टिन ट्रूडो के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद अब चर्चा तेज़ है कि क्या कनाडा भारत के साथ अपने रिश्ते सुधार पायेगा?
'रिश्तों को बेहतर करने की ज़िम्मेदारी कनाडा पर'

अजय बिसारिया कनाडा में भारत के उच्चायुक्त के तौर पर काम कर चुके हैं.
उनका कहना है कि कनाडा में ट्रूडो से अलग सरकार में कोई भी बदलाव एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है और इसमें संबंधों को फिर से स्थापित करने का मौका बनने की क्षमता है.
वे कहते हैं, "लेकिन भारत ऐसा करने में कोई जल्दबाज़ी नहीं करेगा क्योंकि सबसे पहले जो होगा वह यह है कि मार्क कार्नी प्रधानमंत्री बनेंगे और जल्द ही चुनाव कराने की संभावना है और संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए जनादेश के साथ एक नए प्रधानमंत्री के आने के बाद ही कनाडा और भारत बातचीत करेंगे."
बिसारिया के मुताबिक़, अब ज़िम्मेदारी कनाडा पर है क्योंकि भारतीय उच्चायुक्त और वरिष्ठ राजनयिकों को निष्कासित करने का आख़िरी कदम कनाडा ने नवंबर में उठाया था.
वे कहते हैं, "राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से अभी व्यापार और लोगों के बीच का सकारात्मक संबंध प्रभावित नहीं है, लेकिन दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध अब तक के सबसे निचले स्तर पर हैं. ऐसे में कनाडा को या कनाडा के नए प्रधानमंत्री को संबंधों को स्थिर करने के लिए कदम उठाने होंगे. मिसाल के तौर पर सबसे पहले एकदूसरे के यहां उच्चायुक्तों की बहाली करना."
बिसारिया कहते हैं, "कुल मिलाकर ट्रूडो का जाना एक अच्छा मौका है क्योंकि पूरी कहानी और साथ ही खराब संबंधों का सार यह था कि ट्रूडो ने संबंधों को व्यक्तिगत बना दिया था. तो भारत में इसे ट्रूडो की समस्या के रूप में देखा गया, कनाडा की समस्या के रूप में नहीं."
प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत नई दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति विभाग के उपाध्यक्ष हैं.
उनका कहना है कि जस्टिन ट्रूडो की जगह मार्क कार्नी का आना भारत के लिए अच्छी ख़बर है.
पंत कहते हैं, "मुझे लगता है कि ट्रूडो के साथ मामला बहुत व्यक्तिगत हो गया था. ऐसा लगने लगा था कि ट्रूडो घरेलू राजनीति से परे देख ही नहीं पा रहे थे. बेशक़ घरेलू राजनीति मार्क कार्नी की नीतियों को भी आकार देती रहेगी, लेकिन मुझे लगता है कि जब सरकार या नेतृत्व में बदलाव होता है तो हमेशा एक नई शुरुआत का मौका होता है. भारत और कनाडा के बीच ऐसा होने की संभावना है और दोनों देश संभवतः रिश्तों को सामान्य बनाने के साथ आगे बढ़ेंगे."
पंत कहते हैं, "दोनों देश अब मुद्दों से किस हद तक निपटते हैं और बाद में घरेलू राजनीति किस हद तक प्रभावित करती है, यह देखना बाक़ी है. लेकिन मुझे लगता है कि अब रिश्तों को फिर से शुरू करने और इसे फिर से संतुलित करने का एक मौका है."
क्या कनाडा के रुख़ में नरमी आएगी?

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कनाडा में बदलते हालात की वजह से अगर आप्रवासन या खालिस्तान जैसे मुद्दों की बात करें, तो क्या कनाडा के रुख़ में कोई नरमी या बदलाव आएगा?
इस पर अजय बिसारिया कहते हैं कि इन मुद्दों से जुड़ी मुश्क़िलें दूर नहीं होंगी क्योंकि कुछ वोट बैंक जैसे कि खालिस्तानी वोट बैंक किसी भी प्रधानमंत्री के लिए महत्वपूर्ण बने रहेंगे.
वे कहते हैं, "तो यह पूरी तरह से दूर नहीं होगा. लेकिन, चूंकि ट्रूडो ने इसे व्यक्तिगत बना दिया था और इसे हद तक ख़राब कर दिया, तो अब इसे बेहतर बनाने का मौका मिलेगा. इसलिए हालांकि हम इसे तुरंत सामान्य नहीं कर सकते, इसमें लंबा समय लगेगा. हम संबंधों को स्थिर कर सकते हैं और इसे उस गड्ढे से बाहर निकाल सकते हैं जिसमें यह है."
वहीं प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, "लिबरल्स के लिए ऐसा करना बहुत मुश्किल है. मुझे लगता है कि इसके पीछे एक घरेलू राजनीतिक तर्क है क्योंकि चुनावी मुक़ाबला कड़ा है. हम देख रहे हैं कि कंज़र्वेटिव्स आगे चल रहे हैं और अब लिबरल्स भी अपने वोट प्रतिशत में सुधार कर रहे हैं. लेकिन अगर यह एक कड़ा चुनाव है, तो मुझे लगता है कि राजनीतिक गणनाएँ खेल में आ जाएँगी. जहाँ तक मार्क कार्नी का सवाल है, हमें सार के बजाय शैली में बदलाव देखने को मिल सकता है."
प्रोफ़ेसर पंत के मुताबिक़, ट्रूडो ने जिस तरह मुद्दों को सार्वजनिक तौर पर व्यक्तिगत बनाया, वो भी शैली के बारे में ही था.
वे कहते हैं, "भारत जानता है कि कनाडा में खालिस्तान की समस्या है, और ये बात कनाडा भी जानता है कि समस्या है. आपको पता होना चाहिए कि इससे बंद दरवाजों के पीछे अधिक कूटनीतिक तरीके से कैसे निपटा जाए, बजाय एक-दूसरे पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने के, जैसा कि ट्रूडो ने करने का फै़सला किया था."
पंत के मुताबिक़, "दोनों देशों के बीच रिश्तों में बदलाव के तौर पर आने वाले दिनों में कनाडा सरकार का स्वर नरम हो सकता है."
वे कहते हैं, "लेकिन जब सार की बात आती है तो आपको इस बात का इंतज़ार करना होगा कि चुनावों में क्या राजनीतिक समीकरण बैठते हैं और लिबरल्स के अलग-अलग गुट और अलग-अलग गठबंधन साझेदार चुनावों के बाद कितने मज़बूत बनकर उभरते हैं. क्योंकि मुझे लगता है कि इस वक़्त मार्क कार्नी भी अपने विकल्प खुले रखना चाहेंगे और इसलिए वह अपने सहयोगियों को पूरी तरह से अलग-थलग नहीं करना चाहेंगे."
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं कि ये कहना मुश्किल है कि कार्नी हालात पूरी तरह से बदल देंगे.
वे कहते हैं, "लेकिन मुझे लगता है कि निश्चित रूप से उनकी शैली अलग हो सकती है और यह दृष्टिकोण इनमें से कुछ मुद्दों को हल करने में भी मदद कर सकता है."
भारत की रणनीति क्या होगी?

अजय बिसारिया कहते हैं कि कनाडा के साथ रिश्तों में आई खटास पर भारत का रुख़ और नज़रिया परिपक्व था.
वे कहते हैं, "इसलिए जब संकट चल रहा था, तब भी हमने इसे ट्रूडो की समस्या के रूप में देखा. भारत इस रिश्ते को स्थिर और सामान्य बनाने के लिए तैयार है और वो कनाडा की एक नई सरकार के साथ बातचीत करने के लिए तैयार होगा, जो ट्रूडो का बोझ नहीं उठाएगी."
बिसारिया कहते हैं कि भारत और कनाडा के बीच पहले से ही आधिकारिक स्तर पर और ट्रैक टू स्तर पर बहुत सारे संपर्क हैं और अगले हफ़्ते कनाडाई ख़ुफ़िया प्रमुख डेनियल रोजर्स अपने समकक्ष अजीत डोभाल के साथ बैठक करने के लिए भारत में होंगे.
वे कहते हैं, "तो सुरक्षा स्तर पर, आधिकारिक स्तर पर ये बातचीत जारी रहेगी. लेकिन राजनीतिक संबंधों को सामान्य बनाने के लिए एक नई सरकार को बनना होगा और फिर उनके साथ बातचीत करनी होगी. जैसा मैंने कहा, पहल उनकी ओर से होनी चाहिए क्योंकि उन्होंने संबंधों को ख़त्म करने की पहल की थी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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