सुप्रीम कोर्ट का आदेश- 'बिहार ड्राफ्ट सूची से हटाए गए 65 लाख वोटरों के नाम बताए ईसी', आधार को लेकर ये कहा

बिहार वोटर

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इमेज कैप्शन, बिहार में जारी वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को लेकर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश में कई अहम बातें कही गई हैं.
    • Author, उमंग पोद्दार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज लगातार तीसरे दिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई जिसके बाद अदालत ने इस पर एक अंतरिम आदेश दिया है.

अदालत ने चुनाव आयोग से कहा है कि वो उन 65 लाख मतदाताओं की लिस्ट जारी करे, जो ड्राफ़्ट लिस्ट में शामिल नहीं किए गए हैं.

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा है कि ये जानकारी बूथ वार होगी, जिसे हर मतदाता के ईपीआईसी नंबर से खोजा जा सकेगा.

अदालत ने चुनाव आयोग को ये लिस्ट मंगलवार, 19 अगस्त शाम 5 बजे तक पब्लिश करने का वक़्त दिया है.

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चुनाव आयोग से कहा गया है कि लोगों का नाम किस आधार पर ड्राफ़्ट में शामिल नहीं किया गया है, इसका ज़िक्र भी होना चाहिए.

इसके अलावा, कोर्ट ने कहा है कि आयोग एसआईआर की प्रक्रिया के ज़रूरी दस्तावेज़ों में आधार कार्ड को भी शामिल करे.

सर्वोच्च अदालत के फ़ैसले का विपक्षी दलों ने स्वागत किया है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने आज स्पष्ट, ठोस और साहसिक तरीके से भारत के संविधान को क़ायम रखा है. प्रधानमंत्री और उनके समर्थकों की चालों से हमारे गणराज्य को बचाने का यह एक लंबा संघर्ष है. लेकिन बिहार एसआईआर मामले पर सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला उम्मीद की किरण है. यह एक बड़ा पहला क़दम है."

आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा, "आज सुप्रीम कोर्ट में बहस के बाद जो अंतरिम आदेश आया है, हम कह सकते हैं कि लोकतंत्र की जीत हुई है."

तेजस्वी यादव ने कहा कि एसआईआर को लेकर सभी विपक्षी दलों ने किसी भी मंच पर लड़ाई लड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

उन्होंने कहा, "एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर हमारी जो मांगें रही हैं, आज सुप्रीम कोर्ट ने हमारी उन मांगों पर मुहर लगाने का काम किया है."

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

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ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट से बाहर किए गए 65 लाख लोगों के नामों की सूची प्रकाशित करने का आदेश देने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया, "यह सूची प्रत्येक ज़िला निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट (ज़िला-वार) पर प्रदर्शित की जाएगी. प्रदर्शित सूची में नाम न जुड़ने का कारण भी बताया जाएगा."

चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट में नाम शामिल न होने के पीछे मृत्यु, पलायन और नाम के दोहराव जैसे कारण हैं.

इसके अलावा, अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को यह जानकारी भी सार्वजनिक करनी चाहिए कि सूची प्रकाशित की जा चुकी है.

पीठ ने कहा, "बिहार राज्य में दैनिक समाचार पत्रों में स्थानीय भाषा और अंग्रेज़ी, दोनों में इसका व्यापक प्रचार किया जाए. इसके अतिरिक्त, टीवी और रेडियो चैनलों पर भी इसका प्रसारण किया जाए."

साथ ही, अदालत ने कहा कि यदि ज़िला निर्वाचन अधिकारियों के पास कोई सोशल मीडिया वेबसाइट है, तो वहां भी यह जानकारी प्रदर्शित की जानी चाहिए. 65 लाख लोगों की सूची बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी की वेबसाइट पर भी डाली जाए और इसे पंचायत भवनों और प्रखंड पंचायत कार्यालयों में सूची चस्पा करना अनिवार्य होगा.

सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक नोटिस में स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि जिन लोगों के नाम ड्राफ़्ट सूची में शामिल नहीं हैं, वे आधार कार्ड की प्रति के साथ चुनाव आयोग से संपर्क कर सकते हैं.

चुनाव आयोग को यह काम 19 अगस्त शाम 5 बजे तक पूरा करना होगा और इसके बाद अदालत में अनुपालन रिपोर्ट दाख़िल करनी होगी.

अगली सुनवाई 22 अगस्त दोपहर 2 बजे होगी.

चुनाव आयोग की ओर से दलील

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पिछले दो दिनों से याचिकाकर्ताओं के वकील इस बात पर दलील दे रहे थे कि एसआईआर प्रक्रिया को क्यों रोका जाना चाहिए.

आज, चुनाव आयोग ने यह तर्क रखा कि यह प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए. राकेश द्विवेदी ने कहा कि पहले चुनाव आयोग को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर अदालत के भीतर और बाहर बार-बार चुनौतियों का सामना करना पड़ा. अदालत द्वारा ईवीएम की वैधता बरकरार रखने के बाद, अब ध्यान मतदाता सूचियों पर केंद्रित हो गया है.

उन्होंने कहा, "आज चुनाव आयोग तीख़े राजनीतिक शत्रुता वाले माहौल में काम करता है. जो हारते हैं, उनके पास कुछ न कुछ बहाने होते हैं. इसलिए हम राजनीतिक दलों के संघर्षों के बीच फंसे हुए हैं."

उन्होंने कहा कि एक ओर अधिकतर याचिकाकर्ताओं के वकील इस प्रक्रिया की वैधता पर केंद्रित रहे, कुछ ने इसमें 'नाटकीयता' लाने की कोशिश की.

दो दिन पहले, एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव दो ऐसे लोगों को अदालत में लाए थे जिन्हें चुनाव आयोग ने 'मृत' घोषित कर दिया था.

राकेश द्विवेदी ने कहा, "आपने कुछ लोगों को बिना किसी हलफ़नामे के पेश किया. आपको नहीं पता वे कौन हैं, कहां से आए हैं."

हालांकि, पीठ ने कहा कि "हम इस बात को भूल चुके हैं. हम रिकॉर्ड के आधार पर चलते हैं."

उन्होंने कहा कि लगभग 75 लाख लोगों को दस्तावेज़ जमा करने होंगे. उन्होंने बताया, "एक करोड़ लोगों ने दस्तावेज़ जमा करा दिए हैं और 4 करोड़ लोग 2003 की सूची में हैं."

उन्होंने आगे कहा कि कई लोग ऐसे भी हैं जो 2003 की सूची में शामिल लोगों के बच्चे हैं.

उन्होंने पीठ को बताया कि इस साल चुनाव आयोग की सूची में लगभग 7.89 करोड़ वोटर दर्ज हैं, जिनमें से 4 करोड़ से अधिक 2003 की चुनाव आयोग की मतदाता सूची में भी मौजूद थे, जब अंतिम बार व्यापक पुनरीक्षण किया गया था.

उन्होंने अदालत से कहा, "हम जांच की प्रक्रिया जारी रखे हुए हैं. क्यों न 15 दिन इंतज़ार किया जाए."

ड्राफ़्ट लिस्ट से बाहर किए गए वोटर

वीडियो कैप्शन, अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ही तेज़ हुई BJP और TMC की जंग

पीठ ने कहा कि वे ये मानते हैं कि चुनाव आयोग के पास इस प्रक्रिया को कराने का अधिकार है.

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "मान लेते हैं कि जहां तक एसआईआर के लिए चुनाव आयोग के अधिकार का सवाल है, प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि आपके पास यह अधिकार है."

हालांकि उन्होंने कहा कि अदालत 'प्रक्रिया के हिस्से' पर ध्यान केंद्रित करेगी. उन्होंने कहा कि मतदान एक वैधानिक अधिकार है और इसका उल्लेख संविधान में भी किया गया है. जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग को प्रक्रिया को सुगम बनाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "पारदर्शिता से मतदाता का विश्वास और मतदान तक उसकी पहुंच बढ़ेगी."

इसके बाद बहस का रुख़ उन 65 लाख मतदाताओं की ओर मुड़ा जिनके नाम ड्राफ़्ट लिस्ट में शामिल नहीं किए गए हैं.

याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि ऐसी सूची चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाए. अपनी दलीलों में राकेश द्विवेदी ने कहा कि यह सुविधा मौजूद है, मतदाता अपना ईपीआईसी नंबर डालकर देख सकते हैं कि उनका नाम सूची में है या नहीं.

हालांकि पीठ ने पूछा, "आप यह अतिरिक्त क़दम क्यों नहीं उठाते कि वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से उन लोगों की सूची डालें जिनके नाम नहीं हैं और उनके नाम हटाने के कारण भी बताएं."

इस पर चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि चुनाव आयोग के बूथ स्तर के अधिकारियों और राजनीतिक दलों के बूथ स्तर के एजेंटों के पास उन लोगों की सूची है जिनके नाम ड्राफ़्ट सूची में नहीं हैं.

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "हम नहीं चाहते कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं द्वारा की जाए."

उन्होंने यह भी कहा कि वह नहीं चाहते कि मतदाता बूथ स्तर के अधिकारियों पर निर्भर रहें, क्योंकि कई बार वे उपलब्ध भी नहीं हो सकते.

इसलिए पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग को 65 लाख लोगों की सूची ज़िला-वार तैयार कर अपनी वेबसाइट पर अपलोड करनी होगी और पंचायत कार्यालयों में इसके प्रिंटआउट चिपकाने होंगे. इसमें उनके नाम शामिल न होने का कारण भी बताया जाना चाहिए.

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "मतदाताओं को यह स्वतंत्र अधिकार होना चाहिए कि वे किसी भी राजनीतिक कार्यकर्ता या यहां तक कि किसी बीएलओ के बिना, खुद के बारे में जानकारी हासिल कर सकें."

उन्होंने कहा कि यह जानकारी सार्वजनिक करने से मतदाताओं के अपने नाम के हटाए जाने की जानकारी मिलने की संभावना बढ़ जाएगी.

सूची को मशीन-पठनीय बनाने को लेकर भी बहस हुई. हालांकि राकेश द्विवेदी ने कहा कि वे सूची को ईपीआईसी नंबर के माध्यम से खोजने योग्य बना देंगे, लेकिन पूरी सूची को मशीन-पठनीय बनाना 'गोपनीयता का उल्लंघन' होगा.

याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि पूरा डेटा एक जगह उपलब्ध कराया जाए. लेकिन चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने इस पर आपत्ति जताई.

उन्होंने कहा, "एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स डेटा माइनिंग करना चाहती है. हमारी चिंता मतदाताओं को लेकर है. हम बूथ स्तर पर मौजूद डेटा को रखेंगे, उसे ज़िला स्तर पर इकठ्ठा करेंगे और फिर डेटा देंगे."

आधार पर क्या कहा?

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याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी मांग की थी कि चुनाव आयोग मतदाता सत्यापन के लिए दस्तावेजों के साथ आधार को भी स्वीकार करे. अदालत ने अपने पहले के आदेश में सुझाव दिया था कि चुनाव आयोग इस पर विचार कर सकता है.

राकेश द्विवेदी ने अदालत को बताया कि ज़मीनी स्तर पर आधार स्वीकार किया जा रहा है. हालांकि पीठ ने कहा, "बात यह है कि आधार आसानी से उपलब्ध है."

इसलिए अदालत ने चुनाव आयोग से स्पष्ट रूप से बताने को कहा कि जिनके नाम सूची से बाहर हैं, वे अपना आधार कार्ड लेकर चुनाव आयोग से संपर्क कर सकते हैं.

पीठ ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के विज्ञापनों और सार्वजनिक बयानों में इस संबंध में "आम आदमी के लिए सरल भाषा" का प्रयोग होना चाहिए.

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 22 अगस्त की तारीख तय की.

अदालत ने कहा कि वह अपने आदेश के पालन की निगरानी करेगी.

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "हम अभी सिर्फ़ व्यापक सिद्धांतों पर ग़ौर कर रहे हैं. हम दोनों पक्षों से वादा करते हैं कि जब कोई विवाद आएगा तो हम उसे सुलझाएंगे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित