चिकन अगर आप ख़ुद से पकाते हैं तो ये काम बिल्कुल ना करें

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- Author, एस्टर कहाम्बाइ
- पदनाम, बीबीसी ग्लोबल हेल्थ
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
क्या आप पकाने से पहले चिकन धोते हैं? यह एक ऐसा सवाल है, जिससे सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त बहस छिड़ जाती है.
पश्चिमी दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में मानी जाने वाली आधिकारिक खाद्य सुरक्षा सलाह साफ़ है - कच्चे चिकन को धोना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे नुकसानदेह बैक्टीरिया फ़ैलते हैं.
लेकिन दुनिया भर में बहुत से रसोइयों के लिए यह एक पुरानी सांस्कृतिक परंपरा है, जो साफ़ सफ़ाई और देखभाल की सोच से गहराई से जुड़ी हुई है.
जमैका की टीवी शेफ़ और लेखिका अप्रैल जैक्सन जैसे कुछ लोग जानबूझकर ऑनलाइन इस विवाद को हवा देना पसंद करती हैं.
वह कहती हैं, "मैं जानबूझकर कुछ वीडियोज़ में चिकन धोते हुए क्लिप डालती हूँ क्योंकि मुझे पता है कि यह बहुत गर्म या सनसनीखेज मुद्दा है. लोग कहते हैं कि मुझे कटोरे या सिंक में चिकन नहीं धोना चाहिए, कुछ कहते हैं कि यह घिनौना है, यह गंदी हरकत है."
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लेकिन दूसरे लोगों का मानना है कि बिना धोया हुआ चिकन खाना अच्छा नहीं होता.
कॉन्टेंट क्रिएटर फ़दवा हिलिली, जिन्होंने अपनी मोरक्कन मां के चिकन धोने के 10 स्टेप तरीक़े दिखाते हुए एक टिकटॉक वीडियो बनाया था. वह कहती हैं कि उन्हें सोशल मीडिया पोस्ट के नीचे इस तरह की बातें करने वाले लोगों की टिप्पणियां पढ़ना अच्छा लगता है.
वह कहती हैं, "लोग लिखते हैं 'इसी वजह से आप किसी के घर खाना नहीं खाते या ऑफिस की पॉटलक में शामिल नहीं होते'."
बिना धोए चिकन को लेकर यह अविश्वास एशिया, कैरेबियन, दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और कुछ भूमध्यसागरीय संस्कृतियों वाले कई घरों में पाया जाता है.
लेकिन विज्ञान क्या कहता है? यह जानने के लिए बीबीसी वर्ल्ड सर्विस एक फ़ूड साइंस प्रयोगशाला तक पहुंची.
चिकन धोने में इतना जोखिम क्यों होता है?

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कच्चे चिकन में कैंपिलोबैक्टर और सैल्मोनेला जैसे बैक्टीरिया होते हैं, जो फ़ूड पॉइज़निंग की वजह बनते हैं.
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग में फ़ूड माइक्रोबायोलॉजी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर किमोन एंड्रियास करात्ज़स कहते हैं, "जब आप अपनी रसोई में चिकन धोते हैं, तो बहुत ही बारीक बूंदें बनती हैं, जो बीमारी फैला सकती हैं."
ये सूक्ष्म बूंदें बड़ी मात्रा में मौजूद अदृश्य बैक्टीरिया को सिंक, किचन की सतहों और आस-पास रखे किसी भी खाने पर फैला सकती हैं.
इसे समझाने के लिए करात्ज़स ने एक प्रयोग किया. उन्होंने एक कच्चे चिकन पर ऐसा रसायन लगाया जिससे यूवी लाइट में बैक्टीरिया दिखाई देने लगें. फिर उन्होंने चिकन को नल के नीचे 10 सेकंड से भी कम समय तक धोया. चिकन पर गिरने वाला पानी उछलकर पूरे सिंक में फैल गया.
नंगी आंखों से देखने पर ये सिर्फ़ पानी की बूंदें लगती हैं, जिन्हें आसानी से पोंछा जा सकता है. लेकिन यूवी लाइट में साफ़ दिखा कि क्रॉस कंटैमिनेशन हो चुका था. बैक्टीरिया वाली बूंदें काउंटर पर, प्रोफेसर के लैब कोट पर, हमारे कैमरे पर और सबसे अहम बात, लेटस और गाजर पर जा गिरीं- जिन्हें कच्चा खाया जाना था.
इसका मतलब यह है कि भले ही आप असली चिकन को अच्छी तरह पका लें, फिर भी अगर आप उन सतहों पर रखा हुआ दूसरा खाना खाते हैं तो आप बीमार पड़ सकते हैं.
करात्ज़स कहते हैं, "इसी वजह से लोग सैल्मोनेला और कैंपिलोबैक्टर से बीमार होते हैं- आप कच्ची खाई जाने वाली किसी चीज़ को उन कीटाणुओं से दूषित कर देते हैं जो किसी ऐसी चीज़ से आए हों जिसे बाद में पकाया जाना था."
कैंपिलोबैक्टर इतना ख़तरनाक क्यों होता है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, कैंपिलोबैक्टर दस्त से जुड़ी बीमारियों की दुनिया भर में चार प्रमुख वजहों में से एक है.
यह पेट का संक्रमण- जिसमें दस्त और उल्टी होती है- पैदा करने वाला सबसे आम बैक्टीरिया है और इसका असर ज़्यादातर छोटे बच्चों पर पड़ता है.
यह सैल्मोनेला से भी ज़्यादा ख़तरनाक माना जाता है. इसकी एक वजह यह है कि टीकाकरण कार्यक्रमों की वजह से मुर्गियों में सैल्मोनेला का स्तर कम हुआ है लेकिन कैंपिलोबैक्टर के लिए कोई वैक्सीन मौजूद नहीं है.
दोनों बैक्टीरिया- कैंपिलोबैक्टर और सैल्मोनेला - मुर्गियों की आंतों में प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं. जब मुर्गियों को काटा और प्रोसेस किया जाता है, तो आंतों से निकला पदार्थ मांस की सतह को दूषित कर सकता है.
करात्ज़स कहते हैं, "आपको हमेशा अपने चिकन को ऐसे देखना चाहिए जैसे उसमें कैंपिलोबैक्टर और सैल्मोनेला मौजूद हों. दुनिया भर में ज़्यादातर मुर्गियां फ्री रेंज होती हैं. उन्हें बहुत सख़्त और नियंत्रित माहौल में नहीं पाला जाता, इसलिए उनमें सैल्मोनेला और कैंपिलोबैक्टर ज़्यादा होता है."
कैंपिलोबैक्टर की बहुत ही छोटी मात्रा भी संक्रमण पैदा करने के लिए काफ़ी होती है - सिर्फ़ एक बूंद में करीब 10 ट्रिलियन कैंपिलोबैक्टर हो सकते हैं, जो धरती पर मौजूद इंसानों की संख्या से हज़ार गुना से भी ज़्यादा है.
करात्ज़स कहते हैं, "अगर किसी चीज़ पर कैंपिलोबैक्टर की बस एक छोटी सी बूंद या चिकन का रस लग जाए, तो वह आपको बहुत आसानी से बीमार कर सकती है."
संक्रमण के लक्षण क्या होते हैं?

सरकारी संस्था फ़ूड स्टैंडर्ड्स एजेंसी के अनुसार, ब्रिटेन में ही हर साल ढाई लाख से ज़्यादा लोग इससे संक्रमित होते हैं.
आमतौर पर संक्रमण के दो से पाँच दिन बाद इसके लक्षण दिखते हैं. सबसे आम लक्षणों में दस्त (जो अक्सर ख़ून मिश्रित होता है), पेट दर्द, बुख़ार, सिरदर्द, जी मिचलाना और उल्टी शामिल हैं.
60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों और बच्चों को गंभीर बीमारी का जोखिम ज़्यादा होता है. कुछ लोगों में लक्षण बहुत ज़्यादा गंभीर या लंबे समय तक बने रह सकते हैं और उन्हें एंटीबायोटिक इलाज की ज़रूरत पड़ सकती है.
कई मामलों में आगे चलकर इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, अर्थराइटिस जैसी बीमारियां हो सकती हैं और बहुत ही दुर्लभ मामलों में एक तरह का लकवा, गिलियन बार सिंड्रोम, भी हो सकता है.
लेकिन आम तौर पर लोग पेट की बीमारी को चिकन तैयार करने से जोड़कर नहीं देखते.
विशेषज्ञों का कहना है कि कई संक्रमणों की कभी आधिकारिक पहचान ही नहीं हो पाती.
आंकड़ों में सिर्फ़ वही मामले गिने जाते हैं, जिनमें कोई इतना बीमार हुआ हो कि वह इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाए और जांच के लिए सैंपल दे.
करात्ज़स कहते हैं, "हमें तो समस्या की सिर्फ़ झलक दिख रही है. असल मामलों की संख्या इससे दस गुना तक ज़्यादा हो सकती है."
लोग आज भी चिकन क्यों धोते हैं?
2024 में साइंस जर्नल फ़ूड कंट्रोल में छपे एक अध्ययन में पाया गया कि दक्षिण पूर्व एशिया के आठ देशों में 96% लोगों ने बताया कि वे चिकन धोते हैं.
वहीं पिछले 10 सालों में अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में हुई रिसर्च से पता चला कि 39% से 70% उपभोक्ता भी ऐसा करते हैं.
पश्चिमी दुनिया के बड़े हिस्से में चिकन को बहुत सख़्त नियमों वाले औद्योगिक माहौल में प्रोसेस किया जाता है और वह पहले से साफ़ हालत में बेचा जाता है.
लेकिन कई क्षेत्रों में मांस स्थानीय स्तर पर काटा जाता है, कभी-कभी खुले बाज़ारों में, जहां साफ़ बहते पानी और स्वच्छ सतहों की सुविधा हर जगह एक सी नहीं होती. ऐसे मामलों में चिकन धोना एक ज़रूरी कदम माना जाता है.
हालांकि कुछ लोगों के लिए यह सिर्फ़ साफ़ सफ़ाई की बात नहीं है, बल्कि पहचान, परवरिश और घर से जुड़ाव का सवाल भी है.
जब शेफ़ जैक्सन पहली बार ब्रिटेन गईं और उन्होंने पैकेट पर कच्चा चिकन न धोने की चेतावनी देखी, तो उन्हें इतनी हैरानी हुई कि उन्होंने उसकी तस्वीर जमैका में अपने परिवार को भेज दी.

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वह कहती हैं कि वह विज्ञान को समझती हैं, लेकिन, "जब हम चिकन धोते हैं, तो आप देख सकते हैं कि पानी कितना धुंधला हो जाता है. वह बहुत गंदा सा दिखता है, और सांस्कृतिक वजहों से हम वह खाना नहीं चाहते."
कई लोग तर्क देते हैं कि असली बात यह है कि चिकन को कैसे धोया जाता है. बीबीसी से बात करने वाले दोनों शेफ़ चिकन को कटोरे में धोते हैं, अक्सर सिरका या नींबू डालकर, और बाद में उस जगह को अच्छी तरह साफ़ करके डिसइन्फ़ेक्ट करते हैं.
हिलिली कहती हैं, "मेरी मां पहले सिंक को गरम पानी और साबुन से पूरी तरह साफ़ करती हैं, और फिर उस पर एंटी बैक्टीरियल स्प्रे भी करती हैं."
जो लोग चिकन धोने को लेकर काफ़ी पुख़्ता राय रखते हैं, उनका कहना है कि 'चिकन बिल्कुल न धोने' की सामान्य सलाह फ़ूड सेफ्टी गाइडलाइन्स में मौजूद बड़ी असंगतियों को और बढ़ाती है.

जैक्सन कहती हैं, "मान लीजिए आप उस चॉपिंग बोर्ड को धो रहे हैं जिस पर चिकन रखा गया था, तो उसमें भी वही जोखिम होता है."
वह आगे जोड़ती हैं, "फ़्रेंच पकवानों में चिकन पकाने से पहले उसे ब्राइन किया जाता है, यानी नमक वाले पानी में भिगोया जाता है. और मैंने कभी किसी को यह सलाह देते नहीं सुना कि ऐसा नहीं करना चाहिए. जबकि प्रक्रिया तो असल में वही है."
हालांकि करात्ज़स इस बात से सहमत हैं कि कटोरे में धोना ज़्यादा सुरक्षित हो सकता है, लेकिन उनका कहना है कि जोखिम इसमें भी बना रहता है, और यह तय नहीं है कि नींबू या सिरके से धोने से भारी मात्रा में बैक्टीरिया कम हो ही जाएंगे.
वह कहते हैं, "बैक्टीरिया को मारने का एक ही तरीका है- उसे पकाना. और ज़्यादातर मामलों में वह कंपनी चिकन को धो चुकी होती है जो उसे आपको बेचती है. इसलिए वास्तव में उसे दोबारा धोने की कोई ज़रूरत नहीं होती."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.














