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सम्राट हर्षवर्धन जो तलवार और कलम दोनों चलाने में थे माहिर - विवेचना
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
हर्षवर्धन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद छोटे-छोटे राज्यों में बंटे उत्तरी भारत को एक सूत्र में बांधने का महत्वपूर्ण काम किया था.
राजाओं में ऐसे गुण कम ही देखने में मिलते हैं कि वह महान विजेता के साथ-साथ सफल प्रशासक और साहित्यकार भी हों.
सन् 590 में जन्मे हर्ष की जीवनी हर्षचरितम में बाणभट्ट लिखते हैं, "लगातार हथियार चलाने के अभ्यास की वजह से उनके हाथ काले पड़ गए थे, मानों वह समस्त राजाओं के प्रताप की अग्नि को शांत करने में मलिन हो गए हों."
16 साल की उम्र में थानेश्वर की गद्दी पर बैठते समय हर्ष के सामने कई विकट चुनौतियां थीं लेकिन उन्होंने इन चुनौतियों से घबराए बिना अपना रास्ता प्रशस्त किया.
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विजय नाहर अपनी किताब 'शीलादित्य सम्राट हर्षवर्धन और उनका युग' में लिखते हैं, "अपने पिता प्रभाकरवर्धन की मृत्यु, माता का सती हो जाना, बड़े भाई राज्यवर्धन की षड्यंत्र में मृत्यु, बहनोई मौखरी नरेश गृहवर्मा की हत्या और बहन राज्यश्री का राज्य छोड़कर विंध्याचल के जंगलों में पलायन जैसी कई भीषण और विकट घटनाएं हर्ष के जीवन में हुईं लेकिन छोटी उम्र और अनुभवहीनता के बाद भी उन्होंने बहुत बहादुरी से इनका सामना किया."
हर्ष कन्नौज के राजा बने
प्रभाकरवर्धन की मत्यु के समय हर्षवर्धन वहां मौजूद थे जबकि उनके बड़े बेटे राज्यवर्धन हूणों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे थे.
राज्यवर्धन हूणों के विरुद्ध युद्ध जीतकर जब वापस लौटे तो उन्हें अपने पिता की मृत्यु का सामाचार मिला. वह इसे सुनकर इतने व्यथित हुए कि उन्होंने संन्यास लेने की इच्छा प्रकट की लेकिन हर्ष ने अपने बड़े भाई को आग्रह कर राजगद्दी पर बैठाया.
इसी बीच राज्यवर्धन को अपने बहनोई मौखरी गृहवर्मा की हत्या का समाचार मिला. वह अपनी सेना के साथ अपने बहनोई की हत्या का बदला लेने चल पड़े. उन्होंने मालवा नरेश की सेना को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार कर गौड़ नरेश शशांक के शिविर को घेर लिया लेकिन शशांक ने षड्यंत्र कर राज्यवर्धन की हत्या करवा दी.
बाणभट्ट लिखते हैं, "शशांक ने राज्यवर्धन की अधीनता स्वीकार करते हुए उनसे अपनी बेटी का विवाह करने का प्रस्ताव किया. जब वह उनसे मिलने अकेले उनके शिविर में गए तो उन्होंने उनकी हत्या करवा दी."
चीनी यात्री ह्वेनसांग जब भारत आए तब हर्षवर्धन का दौर शुरू होने वाला था. वह लिखते हैं, "जब राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद कन्नौज की गद्दी ख़ाली हुई तो कन्नौज के दरबारियों ने राज्यवर्धन के छोटे भाई हर्षवर्धन से गद्दी संभालने का अनुरोध किया. शुरू में हर्ष ने इस अनुरोध को स्वीकार करने से इनकार कर दिया लेकिन उन्हें धर्मगुरुओं ने सलाह दी कि वह राजा बन जाएं लेकिन सिंहासन पर न बैठें और न ही अपने लिए 'महाराजा' शब्द का प्रयोग करें. इस तरह हर्ष कन्नौज के राजा बने. उन्होने अपने लिए 'राजपुत्र' शब्द का प्रयोग किया."
'महान योद्धा'
हर्ष का औपचारिक राज्याभिषेक सन 612 में हुआ.
16 वर्ष की छोटी उम्र मे हर्ष पांच हज़ार हाथियों, बीस हज़ार घोड़ों और इतने ही पैदल सैनिकों की सेना लेकर अपने भाई और बहनोई की हत्या का प्रतिशोध लेने निकल पड़े.
ह्वेनसांग ने लिखा, "गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त की तरह हर्ष भी महान योद्धा था. छह साल में उसने अपनी बहन को ढूंढकर कन्नौज में रखा और कन्नौज सहित पंचभारत यानी सारस्वत, कान्यकुब्ज, गौड़, मिथिला और उत्कल (ओडिशा) पर अधिकार कर लिया. इस समय तक हर्ष की सेना ने विशाल रूप ले लिया था. उसकी सेना में साठ हज़ार हाथी, एक लाख घोड़े और इतनी ही संख्या में पैदल सैनिक हो गए थे. इतनी विशाल सेना के साथ उसने जल्द ही वल्लभी, भड़ौच और सिंध पर विजय प्राप्त कर अपने राज्य की सीमा पश्चिमी समुद्र तक बढ़ा ली थी."
बाणभट्ट् के अनुसार हर्ष की सेना प्रतिदिन तकरीबन 16 मील की दूरी तय करती थी. हर्ष के शासन की ख़ास बात ये थी कि उसने पराजित राजाओं को उनका राज्य लौटा दिया था और उनसे कर वसूल करता रहा था.
हर्ष का ये संघात्मक दृष्टिकोण था. गुप्त शासकों ने भी इसी नीति को अपनाया था. सन 634 में हर्ष ने दक्षिण के चालुक्य सम्राट पुलकेशिन (द्वितीय) से युद्ध किया था जिसमें उनकी हार हुई थी और वह दक्षिण तक अपना साम्राज्य फैलाने में नाकाम रहे थे.
विजय नाहर लिखते हैं, "इस हार के बावजूद हर्ष के साथ लगाया गया 'महान विजेता' का विशेषण ग़लत नहीं साबित हो जाता. दुनिया के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब महान योद्धा भी कभी युद्ध में पराजित हुए हैं, जैसे फ़्रांस के नेपोलियन बोनापार्ट."
मेहनती और कुशल प्रशासक
अशोक की तरह हर्ष को भी अपने राज्य में घूमने की आदत थी ताकि उसे इस बात का अंदाज़ा लग सके कि जनता किस हाल में रह रही है. हर्ष हमेशा अपनी जनता के दुखों के प्रति सजग रहते थे.
एएल बाशम ने अपनी किताब 'द वंडर दैट वाज़ इंडिया' में लिखा था, "हर्ष अपने नागरिकों की शिकायतें दरबार में नहीं बल्कि उनके बीच जाकर सड़क पर सुनते थे. दोस्तों के प्रति उनकी बहुत निष्ठा थी. दूर-दराज़ के राज्य असम के राजा भास्करवर्मन उनके दरबार में आया करते थे. उन्होंने शशांक के खिलाफ़ लड़ाई में उनका साथ दिया था."
ह्वेनसांग लिखते हैं, "हर्ष बहुत ही मेहनती राजा थे. उनका दिन तीन भागों में विभाजित होता था. पहले भाग में वह पूरा समय राज-काज में लगाते थे. दूसरे दो भागों में वह धार्मिक काम किया करते थे. वह कभी थकते नहीं थे और अपने लोगों का काम करने में कभी-कभी नींद और खाना भी भूल जाते थे. उनके समय में करों की दर बहुत कम हुआ करती थी, हर्ष के समय में मंत्रियों और अधिकारियों को वेतन नकद न देकर ज़मीन के रूप में दिया जाता था. उन्हें उस ज़मीन की देखभाल करनी होती थी और उससे होने वाली आमदनी उनकी अपनी होती थी. हर्ष ने राज्य की कुल भूमि का चौथाई भाग अपने अधिकारियों को देने के लिए निर्धारित कर दिया था. दूसरे चौथाई भाग से राज्य का खर्चा चलता था. गेहूं और चावल जनसाधारण का भोजन था."
मृत्यु दंड के ख़िलाफ़ थे हर्षवर्धन
दिलचस्प बात ये है कि हर्ष के समय में मृत्यु दंड नहीं दिया जाता था. लोगों में आपस में बहुत सद्भाव था इसलिए अपराध कम होते थे.
जाने-माने इतिहासकार राधा कुमुद मुखर्जी अपनी किताब 'हर्ष' में लिखते हैं, "देशद्रोह के लिए मृत्यु दंड न देकर आजीवन कारावास की सज़ा दी जाती थी. नैतिकता के ख़िलाफ़ किए गए अपराधों पर या तो अपराधी के अंग काट लिए जाते थे या उसे देशनिकाला या जंगलों में भेज दिया जाता था. कभी-कभी उन्हें समाज से बहिष्कृत भी कर दिया जाता था, लोग बुराइयों से दूर रहते थे और पाप करने से डरते थे."
सम्राट हर्षवर्धन की राजधानी बनने के बाद कन्नौज का गौरव दोगुना हो गया था. ह्वेनसांग ने लिखा था, "कन्नौज में हर जगह आर्थिक संपन्नता थी. लोग सभ्य थे. ये नगर वाणिज्य व्यापार का केंद्र था. ये शहर पांच मील लंबे और सवा मील चौड़े क्षेत्र में फैला हुआ था. उसमें बने घर स्वच्छ और सुंदर थे. उनकी दीवारे ऊंची और मोटी थीं. वहां कई सुंदर उद्यान, साफ़ जल के तालाब और एक अजायबघर था. वहां के लोग चिकने और रेशमी वस्त्र पहनते थे. उनकी भाषा परिमार्जित और मधुर थी. कसाई, मछुआरे, नाचने वाले और जल्लाद शहर से बाहर रहते थे. सेना रात में राजमहल के चारों ओर पहरा देती थी."
हर्ष जैसे दानी भारत के इतिहास में कम लोग हुए हैं. विजय नाहर लिखते हैं, "प्रयाग के महामोक्षपरिषद में जो पांच साल में एक बार होता था, हर्ष सैन्य साज-समान को छोड़कर अपना सर्वस्व दान कर देते थे. यहां तक कि वह अपने पहने वस्त्र तक दान कर देते थे. उसके बाद अपनी बहन से पुराने वस्त्र मांग कर पहनते थे."
नालंदा विश्वविद्यालय के संरक्षक
सम्राट हर्ष वीर होने के साथ साथ स्वयं भी विद्वान और विद्वानों के संरक्षक थे. उन्होंने महाकवि बाणभट्ट को सभा पंडित बनाया था. हर्ष स्वयं संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान रखते थे. उन्होंने संस्कृत के तीन नाटक 'रत्नावली', 'प्रियदर्शिका' और 'नागानंद' लिखे थे.
जयदेव ने तो हर्ष की तुलना भास और कालिदास से की है. सम्राट हर्ष के दरबार में महाकवि बाणभट्ट, मयूर, जयदेव, दिवाकर और भर्तृहरि जैसे उच्च कोटि के विद्वान मौजूद थे.
मशहूर इतिहासकार ईबी हैवेल अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ आर्यन रूल इन इंडिया फ़्रॉम द अरलिएस्ट टाइम्स टू द डेथ ऑफ़ अकबर' में लिखते हैं, "सम्राट हर्ष कलम के प्रयोग में उतने ही निपुण थे जितने तलवार के प्रयोग में."
डॉक्टर हेमचंद्र रायचौधरी ने लिखा था, "हर्ष एक महान सेनानायक और प्रबंधक था. इससे बढ़कर वह साहित्य और धर्म का एक महान संरक्षक भी था."
डॉक्टर आरसी मजूमदार अपनी किताब 'द क्लासिकल एज' में लिखते हैं, "हर्ष एक उत्कृष्ट साहित्यकार और विद्या प्रेमी था. अपनी रचना 'नागानंद' में हर्ष ने प्रणय के साथ मानवता, बंधुत्व, करुणा और प्रेम का जो संदेश दिया है, उसने हर्ष को साहित्यकार के रूप में अमरत्व प्रदान कर दिया है."
हर्ष के समय नालंदा विश्वविद्यालय संसार के सर्वोत्तम शिक्षा संस्थानों में से एक था. हर्ष उसके संरक्षक थे. उसकी देखरेख के लिए उन्होंने 100 ग्राम दान में दिए थे और वहां सौ फ़ीट का पीतल का एक स्तूप भी बनवाया था. इतिहासकारों का मानना है कि विद्वानों और शिक्षा संस्थानों के संरक्षक होने के कारण साहित्यिक क्षेत्र में हर्ष अशोक से भी आगे थे.
बाद में बौद्ध धर्म अपनाया
सम्राट हर्ष कौन-सा धर्म मानते थे, इस बारे में इतिहासकारों की अलग-अलग राय है, बाणभट्ट के अनुसार हर्ष के पूर्वजों का धर्म शैवधर्म था. हर्ष के जन्म के अवसर पर जिस तरह से यज्ञ, हवन और वेदमंत्रों का पाठ हुआ था उससे यह आभास मिलता है कि वर्धन वंश वैदिक धर्म को मानता था. इसके अलावा हर्ष की मुद्राओं में शिव और नंदी का चिन्ह अंकित होना उनके शैव होने की तऱफ़ इशारा करता है.
बंसखेड़ा और मधुबन के शिलालेखों में उनके नाम के साथ 'परम परमेश्वर' विशेषण का इस्तेमाल किया गया है जो उस युग में शैव धर्म के अनुयायियों के लिए इस्तेमाल होता था लेकिन बाणभट्ट और ह्वेनसांग दोनों लिखते हैं कि अपने जीवन के उत्तरार्ध में हर्ष बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गए थे और भगवान बुद्ध में उनकी अत्यधिक श्रद्धा हो गई थी.
हर्ष के दो नाटकों 'रत्नावली' और 'प्रियदर्शिका' में जिन देवताओं की स्तुति की गई है वे सभी वैदिक धर्म के हैं लेकिन हर्ष के तीसरे नाटक 'नागानंद' में उन्होंने बुद्ध को देवता मानकर उनकी स्तुति की है लेकिन इसके साथ ही उसमें गरुड़ और गौरी की स्तुति भी है.
राधा कुमुद मुखर्जी लिखते हैं, "सम्राट हर्ष शुरू में बौद्ध धर्म के अनुयायी नहीं थे लेकिन बाद में बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी उन्होंने अन्य धर्मों की उपेक्षा नहीं की. अशोक और कनिष्क की तरह हर्ष ने बौद्ध धर्म का प्रचार नहीं किया लेकिन पतन की ओर अग्रसर हो रहे बौद्ध धर्म की रक्षा का श्रेय हर्ष को दिया जाता है. उन्होंने कन्नौज की धार्मिक सभा और प्रयाग की महामोक्षपरिषद में भगवान बुद्ध की प्रथम पूजा कर बौद्ध धर्म की महत्ता को बढ़ाया."
हर्ष के दरबार में ह्वेनसांग
चीन लौटने से पहले ह्वेनसांग को सम्राट हर्ष ने अपने दरबार में वाद-विवाद के लिए बुलाया था. उस समय हर्ष का शासन अपने चरमोत्कर्ष पर था. इससे पहले दोनों की मुलाकात हो चुकी थी और दोनों एक दूसरे के मित्र बन गए थे.
ह्वेनसांग सन 643 में हर्षवर्धन के दरबार में आए थे. उस समय उन्हें शासन करते हुए 37 साल हो चुके थे, हर्ष 40 वर्ष से अधिक समय तक गद्दी पर रहे. इस मुलाकात में हर्ष ने ह्वेनसांग से चीन और उसके शासक के बारे में कई सवाल पूछे और चीन के बारे में अपनी जानकारी दिखाकर ह्वेनसांग को चकित कर दिया.
इस बीच हर्ष ने चीन के राजा ताइज़ोग को अपने दूतों के ज़रिए बोध गया के बोधिवृक्ष की एक पौध और बौद्ध चिकित्सकीय और खगोलीय आलेख उपहार में भेजे. हर्ष के दरबार में ह्वेनसांग ने कई विद्वानों से वाद-विवाद किया.
विलियम डैलरिंपिल अपनी किताब 'द गोल्डेन रोड' में लिखते हैं, "ह्वेनसांग ने हर्ष से मिले हाथी पर बैठकर चीन वापसी की यात्रा शुरू की. हर्ष ने उसके साथ अपने चार अधिकारी भी चीन भेजे. उनके पास हर्ष के लिखे हुए पत्र थे जिसमें बीच में पड़ने वाले राज्यों के राजाओं से कहा गया था कि वे ह्वेनसांग के दल को सभी तरह की सहायता और घोड़े उपलब्ध कराएं."
मृत्यु के बाद साम्राज्य हुआ छिन्न-भिन्न
हर्ष को प्राचीन भारत के इतिहास के श्रेष्ठतम सम्राटों में से एक माना जाता है.
केएम पणिक्कर अपनी किताब 'श्रीहर्ष ऑफ़ कन्नौज' में लिखते हैं, "हर्ष चंद्रगुप्त मौर्य से शुरू होने वाली उन शासकों की लंबी पंक्ति के अंतिम शासक थे जिनके समय में दुनिया ने भारत को एक प्राचीन और महान सभ्यता के तौर पर ही नहीं बल्कि मानवता की उन्नति के लिए कार्यशील एक सुव्यवस्थित और शक्तिशाली राज्य के रूप में देखा. इसमें कोई संदेह नहीं कि एक शासक, कला के संरक्षक और साहित्यकार के रूप मे हर्ष को भारतीय इतिहास में एक ऊंचा स्थान प्राप्त होगा."
सन 655 में उन्होंने अंतिम सांस ली लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि हर्ष चंद्रगुप्त मौर्य और समुद्रगुप्त के समान ऐसा साम्राज्य स्थापित करने में असमर्थ रहे जो उनके बाद भी वर्षों तक कायम रह पाता.
उनकी मृत्यु के तुरंत बाद ही उनका साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया. संभवत: इसका एक कारण यह था कि हर्ष की कोई संतान नहीं थी और न ही उन्होंने अपना कोई योग्य उत्तराधिकारी नामित किया था.
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