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निज़ाम के ज़माने का अखंड हैदराबाद क्यों चाहते हैं केसीआर?
इमरान क़ुरैशी
बीबीसी हिंदी के लिए, बेंगलुरु से
महाराष्ट्र में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
उनके ‘अखंड हैदराबाद-डेक्कन ऑफ़ निज़ाम एरा’ खड़ा करने की कोशिशें असल में भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) को राष्ट्रीय राजनीति में लॉन्च करना है.
के. चंद्रशेखर राव, जिन्हें केसीआर के नाम से भी जाना जाता है, पंढरपुर में स्थित श्री विठ्ठल रुक्मिणी मंदिर में पूजा करने के लिए 600 कारों के विशाल काफ़िले के साथ सोलापुर पहुंचे, जहां आषाढ़ एकादशी से पहले लाखों किसान दर्शन के लिए पहुँचते हैं.
वो उस्मानाबाद ज़िले के तुलजापुर स्थित तुलजा भवानी मंदिर भी पहुँचे.
ऐसे समय में जब इसी साल दिसंबर में तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर महाराष्ट्र में उनकी कोशिशों से विपक्षी दल हैरान नहीं हैं.
बीजेपी के प्रवक्ता कृष्णा सागर राव ने बीबीसी से कहा, “वो आसान रास्ता अपनाना चाहते हैं. उन्हें महाराष्ट्र में कुछ मौक़ा दिखाई देता है क्योंकि यहां त्रिकोणीय राजनीति है और वो कुछ सीटें हासिल करने के लिए ख़ुद को किसानों के दोस्त के रूप में पेश कर सकते हैं.”
“असल में वो निज़ाम की तरह एक अखंड हैदराबाद-दक्कन साम्राज्य स्थापित करना चाह रहे हैं.”
आश्चर्यजनक है कि जिस दिन केसीआर अबकी बार किसान सरकार का नारा दे रहे थे, उसी समय उनकी पार्टी के ज़िला परिषद से लेकर लोकसभा तक के पार्टी नेता दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में बीआरएस से इस्तीफ़े की घोषणा देने के लिए बैठे थे.
हालांकि महाराष्ट्र में केसीआर का भव्य स्वागत हुआ और इसे शेतकारी संगठन के सदस्यों ने आयोजित किया था.
स्वर्गीय शरद जोशी शेतकारी संगठन के नेता थे और एक ज़माने में ये बहुत ताक़तवर संगठन हुआ करता था.
इस संगठन के अधिकांश सदस्यों ने हाल के समय में बीआरएस जॉइन कर लिया.
बीआरएस महाराष्ट्र के नेता शंकरन्ना ढोंगड़े ने बीबीसी से कहा, “सालों से हम छोटे-छोटे ग्रुपों में बिखरे हुए थे. हमें लगा कि किसानों की मुक्ति इस समय प्रदर्शन पर नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है.”
“यहाँ वहाँ प्रदर्शन कर हम सत्ता पर कब्ज़ा नहीं कर सकते. सिर्फ़ राजनीतिक सत्ता के माध्यम से ही नीतियों में बदलाव लाया जा सकता है.”
तेलंगाना मॉडल
ढोंगड़े और बीआरएस के प्रवक्ता दोसाजू श्रवण इशारा करते हैं कि महाराष्ट्र में पार्टी के प्रति मुख्य आकर्षण तेलंगाना में केसीआर की किसानों के समर्थन वाली नीतियां है.
श्रवण ने कहा, “अप्रैल 2014 में जबसे केसीआर सत्ता में आए, तबसे तेलंगाना में बहुत नाटकीय बदलाव आ चुका है. किसान हितैषी नीतियों ने तेलंगाना को एक बंजर राज्य से उपजाऊ राज्य में बदल दिया.”
सत्ता में आने के तुरंत बाद केसीआर ने अपना ध्यान वो सबकुछ देने पर लगाया, जिसका वायदा उन्होंने अलग राज्य बनाने के अभियान के दौरान किया था.
उन्होंने कई स्कीमें लॉन्च कीं जैसे- साल में दो फसल उगाने के लिए प्रति एकड़ 10,000 रुपये देने (रायथू बंधु), छोटे स्तर की औद्योगिक यूनिट खोलने के लिए दलितों को 10 लाख रुपये की मदद (दलित बंधु), सबसे पिछड़े वर्ग के लिए एक लाख रुपये का प्रोत्साहन कर्ज़ जिसे लौटाने की ज़रूरत नहीं, खेती के उत्पादों को सीधे किसानों से खरीदना आदि.
श्रवण कहते हैं, “महाराष्ट्र तेलंगाना जैसा ही है. इसके पास पानी तो बहुत है लेकिन उपजाऊ ज़मीन नहीं है. उनका विचार है कि तेलंगाना की तरह इसका काया कल्प किया जाए.”
“हां, ये सही है कि जहाँ उन्होंने अभी दौरा किया है, वो ओल्ड निज़ाम रियासत है. लेकिन मध्य प्रदेश के भी बहुत सारे लोग हैं जो हमारे संपर्क में हैं.”
1956 के बाद निज़ाम रियासत में उस्मानाबाद, औरंगाबाद, नांदेड़ (अब महाराष्ट्र में) और गुलबर्ग और रायचूर (कर्नाटक के हैदरबाद-कर्नाटक क्षेत्र में) शामिल थे.
कृष्णा सागर राव कहते हैं, “वो मानते हैं कि तेलंगाना में उनका पैर जम चुका है, इसलिए अब वो आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में अपना असर बढ़ाना चाहते हैं.”
केसीआर राजनीतिक पैंतरा बदल रहे हैं?
क्या हाल ही में बीआरएस नेताओं का कांग्रेस में चले जाने से केसीआर की विस्तार योजनाओं पर असर पड़ेगा?
बीआरएस के सोशिल मीडिया प्रमुख एम कृशांक कहते हैं, “इससे हम पर बहुत मामूली असर पड़ा है क्योंकि जो छोड़ कर गए हैं, उनमें से कुछ ने उपचुनावों में पार्टी के ख़िलाफ़ काम किया था.”
हालांकि कांग्रेस तीन कारणों से ख़ुश है. पहला, इसलिए कि जो नेता शामिल हुए हैं, उनका चुनावी आधार है और ‘ज़मीनी सच्चाई से परिचित हैं.’
तेलंगाना कांग्रेस की जनरल सेक्रेटरी कोटा नीलिमा के मुताबिक़, “तीसरा कारण है, वो एक तरफ़ तो सेक्युलर चेहरा रखे हुए हैं जबकि दूसरी तरफ़ बीजेपी के समर्थन से अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रहे हैं.”
वो कहती हैं कि तीसरा कारण है, “जैसे ही उनके परिवार की सदस्य (के कविता) का दिल्ली के शराब घोटाले में नाम आया, उन्होंने अपने हमले का रुख़ बीजेपी की बजाय कांग्रेस की ओर मोड़ दिया. पिछले 40 दिनों में उनके व्यवहार को देखिए. आज केसीआर खुलेआम मैदान में हैं. वो एमआईएम-2.0 (ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के संदर्भ में) हो चुके हैं. वो सेक्युलर वोट काटना चाहते हैं. ये बीजेपी की बी टीम है.”
लेकिन क्रिशांक इस आरोप का खंडन करते हुए कहते हैं कि केसीआर लगातार बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर हमला करते रहे हैं.
“ये कहना कि कविता के ख़िलाफ़ मुक़दमे की वजह से उन्होंने पैंतरा बदल दिया है, हास्यास्पद है. उनके ख़िलाफ़ कोई केस नहीं है. सच्चाई ये है कि तेलंगाना में हम बीजेपी को चुनौती दे रहे हैं, न कि कांग्रेस.”
कृशांक ने कहा, “कांग्रेस अब वाईएसआर तेलंगाना पार्टी (वाईएसआरटीपी) के वाईएस शर्मीला के साथ करीबी बढ़ा रही है, जिन्होंने तेलंगाना गठन के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी.”
“साल 2018 में कांग्रेस टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू के साथ चली गई थी. 2023 में अब वो शर्मीला के साथ जाना चाहती है. शर्मीला के पारिवारिक झगड़े (भाई के साथ) को लेकर कांग्रेस, आंध्र प्रदेश के बंटवारे की कड़वाहट को तेलंगाना में लाना चाहती है.”
केसीआर अपना आधार क्यों बढ़ा रहे हैं?
तेलंगाना जन समिति के प्रोफ़ेसर एम कोडांडरम अलग राज्य के रूप में तेलंगाना के गठन के संघर्ष का दिमाग जैसे थे.
वो लंबे समय तक केसीआर के सलाहकार रहे और नीतिगत मुद्दों पर उनका मनमुटाव हुआ तो अलग हो गए.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “महाराष्ट्र जाने का पहला मक़सद तो ये है कि स्थानीय मुद्दों से राष्ट्रीय मुद्दों की ओर ध्यान मोड़ जाए. दूसरा कारण है कि अगर लोकसभा में कुछ सीटें जीत जाते हैं तो 2024 में जिसकी भी सरकार आए उसके साथ होने वाली सौदेबाजी में अपना कद बढ़ाया जाए."
"और तीसरा, हो सकता है कि बीजेपी को ख़ुश करने के लिए वो कांग्रेस, एनसीपी और उसके सहयोगियों के वोट में सेंध लगा रहे हों.”
वो कहते हैं, “ये साबित करना मुश्किल है कि कहीं दिल्ली शराब घोटाले में कविता का नाम आने के बाद तो उन्होंने अपना पक्ष नहीं बदला. अधिकांश लोगों को लगता था कि वो गिरफ़्तार हो सकती हैं और जब ऐसा नहीं हुआ तो लोगों ने समझ लिया कि बीजेपी के साथ उनकी सहमति बन गई है.”
“लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने पश्चिम बंगाल में जिस तरह ईडी को सक्रिय किया था, वैसी कोई कार्रवाई यहां नहीं की. शायद राष्ट्रीय नेतृत्व सोचता है कि अगर कविता के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई तो इससे कांग्रेस को फायदा होगा.”
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