ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में मोदी-शाह क्यों झोंक रहे हैं बीजेपी की पूरी ताक़त?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तेलंगाना राज्य जहाँ भारतीय जनता पार्टी के पास 119 में से केवल दो विधायक हैं और जहाँ 17 लोकसभा सीट में केवल 4 सांसद हैं, वहाँ एक नगर निगम चुनाव में बीजेपी ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है.

ये चुनाव ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के हैं. इस नगर निगम का सालाना बजट लगभग साढ़े पाँच हजार करोड़ का है और आबादी लगभग 82 लाख लोगों की है.

देश के हर कोने में आज इस नगर निगम चुनाव की चर्चा हो रही है.

बीजेपी के पार्टी अध्यक्ष वहाँ रोड शो कर रहे हैं, दूसरे केंद्रीय कैबिनेट मंत्री स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर भी वहाँ प्रचार के लिए जा चुके हैं. बीजेपी युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी सूर्या भी पिछले एक हफ़्ते से वहीं डेरा डाले बैठे हैं.

ख़बर है कि गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी प्रचार के लिए जा सकते हैं.

पार्टी के वरिष्ठ नेता भूपेन्द्र यादव, जिन्होंने बिहार में बीजेपी की जीत की रणनीति तैयार की थी, उन्हें इस चुनाव की ज़िम्मेदारी दी गई है.

ऐसे में हर कोई आज एक ही सवाल पूछ रहा है, एक तेलंगाना राज्य के एक छोटे से नगर निगम चुनाव में पार्टी आख़िर अपना सर्वस्व क्यों दांव पर लगा रही है?

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव 1 दिसंबर को होना है और 4 दिसंबर को इसके नतीजे आ जाएँगे. यहाँ 150 सीटें हैं, जिस पर जीत ये तय करेगी की नगर निगम में मेयर किस पार्टी का बनेगा.

पिछले चुनाव में 99 सीटें तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को मिली थी. 44 सीटों पर औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) ने जीत दर्ज की थी. बीजेपी को 4 सीटों से संतोष करना पड़ा था.

नगर निगम के चुनाव अक्सर स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं. बिजली, पानी, सड़क, कूड़ा यही मुद्दे होते हैं. राज्य के बड़े नेता चुनाव प्रचार में चले जाएँ तो वो ही बड़ी बात होती है, क्षेत्रीय पार्टी का अध्यक्ष प्रचार कर ले तो बात फिर भी समझ आती है, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष प्रचार के लिए मैदान में उतरे, तो लगता है कि पार्टी का 'बहुत कुछ' दांव पर है.

दुब्बाक सीट पर उपचुनाव

आख़िर बीजेपी के लिए ये 'बहुत कुछ' क्या है?

हैदराबाद में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिनेश आकुला कहते हैं, "नबंवर की शुरुआत में दुब्बाक असेंबली सीट के लिए यहाँ उपचुनाव हुए थे. ये सीट टीआरएस की सीटिंग सीट थी, जो विधायक की मौत के बाद ख़ाली हुई थी. पार्टी ने विधायक की पत्नी को ही उम्मीदवार बनाया था.

ये सीट इसलिए अहम है क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव जिस सीट से चुनाव जीत कर आते हैं, उससे लगी हुई सीट है. एक तरह से इसे टीआरएस का गढ़ माना जाता है. इस उपचुनाव में टीआरएस का पूरा चुनाव प्रबंधन के चंद्रशेखर राव के भतीजे हरीश राव ने संभाला था. अब तक टीआरएस में हरीश राव को चुनाव जिताने का अहम रणनीतिकार माना जाता था. लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी टीआरएस ये उपचुनाव हार गई और बीजेपी को यहाँ जीत मिली."

इसी जीत से बीजेपी के हौसले बुलंद हैं.

आँकड़ो की बात करें तो दुब्बाक सीट के उप-चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 13.75 फ़ीसद से बढ़ कर 38.5 फ़ीसद हो गया था. बीजेपी की महत्वाकांक्षा को इन आँकड़ों से बल मिला है.

दिनेश आकुला कहते हैं कि बीजेपी की इन चुनावों में रणनीति को समझने के लिए टीआरएस और एआईएमआईएम की रणनीति को समझने की ज़रूरत भी पड़ेगी.

"पिछली बार ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव (जीएचएमसी) में केटी रामा राव, जो सीएम के चंद्रशेखर राव के बेटे हैं, ने पूरी रणनीति तैयार की थी. के चंद्रशेखर राव, अपने बेटे को राज्य की सत्ता संभालने के लिए तैयार कर रहे थे. पार्टी में के चंद्रशेखर राव के बेटे से ज़्यादा उनके भांजे हरीश राव की चलती थी. हरीश राव को पार्टी में साइडलाइन करने के लिए के चंद्रशेखर राव ने ये दांव चला था. इसका उन्हें फ़ायदा भी मिला. केटी रामा राव के नेतृत्व में टीआरएस ने जीएचएमसी चुनाव में 99 सीटें जीती. इस बार अगर टीआरएस दोबारा से नगर निगम चुनाव जीतती है तो केटीआर की पकड़ पार्टी में और मज़बूत हो जाएगी. केटी राव फ़िलहाल राज्य के शहरी विकास मंत्री हैं. हरिश राव जो के चंद्रशेखर राव के भतीजे हैं, उप-चुनाव में हार की वजह से पार्टी में फ़िलहाल किनारे पर हैं."

बीजेपी पार्टी की इस अंदरूनी कलह का फ़ायदा उठा सकती है.

बीजेपी के लिए क्यों है ये चुनाव अहम?

बीजेपी इस चुनाव में अपना भाग्य आज़मा कर एक तीर से कई शिकार करना चाहती है.

पहला तो ये कि पार्टी अध्यक्ष के तौर पर 2017 में अमित शाह ने लक्ष्य रखा था, बीजेपी को पंचायत से पार्लियामेंट तक ले जाना है. ये उसी लक्ष्य को हासिल करने की बीजेपी की कोशिश है.

दूसरा ये कि टीआरएस में अंदरूनी राजनीति की वजह से राज्य में उनकी पकड़ पहले से थोड़ी ढीली पड़ी है. बीजेपी को लगता है कि टीआरएस पर चोट के लिए ये सही मौक़ा है. इस बार के मॉनसून में जब दो बार तेज़ बारिश हुई तो शहरी इलाक़ों में इसका बहुत बुरा असर पड़ा था. एक तरह से पूरा शहर दो बार डूब गया था. टीआरएस को इस वजह से स्थानीय जनता का रोष झेलना पड़ा. अब नंवबर की शुरुआत में दुब्बाक सीट पर हार के बाद भी टीआरएस बाहर से थोड़ी कमज़ोर दिख रही है.

तीसरी बात ये कि कांग्रेस पूरे प्रयास के बाद भी दुब्बाक सीट पर तीसरे नंबर पर रही थी. बीजेपी राज्य में कांग्रेस की जगह ख़ुद को लाने का सही मौक़ा समझ रही है. साथ ही एआईएमआईएम को दूसरे राज्यों के चुनाव में हमेशा बीजेपी की 'बी-टीम' क़रार दिया जाता है. बीजेपी इस चुनाव में उस भ्रम को तोड़ना चाहती है.

चौथा कारण है जीएचएमसी का बजट. इन नगर निगम का बजट लगभग साढ़े पाँच हज़ार करोड़ रुपये सालाना है. कई राजनीतिक विश्लेषक इस नगर निगम को राज्य की सत्ता की चाबी मानते हैं.

नगर निगम चुनाव में ध्रुवीकरण की राजनीति

राज्य की राजनीति पर पकड़ रखने वाले दूसरे विश्लेषक जिनका नागाराजू बीजेपी की इस नई रणनीति के पीछे की वजह राज्य के नए प्रदेश अध्यक्ष को मानते हैं.

नागाराजू कहते हैं, "कई सालों में पहली बार बीजेपी ने प्रदेश अध्यक्ष ऐसे नेता को बनाया है जो हैदराबाद से नहीं आते. प्रदेश के अध्यक्ष इस समय बंदी संजय कुमार हैं, जो करीमनगर लोकसभा सीट से सांसद भी हैं. दुब्बाक सीट पर हुए उप-चुनाव में पार्टी की जीत का सेहरा बंदी संजय कुमार के सिर ही बांधा गया."

पार्टी को लगता है, दुब्बाक सीट पर बंदी संजय कुमार की रणनीति सफल रही है और इसलिए नगर निगम चुनाव में उसी रणनीति से आगे चल रही है.

नागाराजू कहते हैं, "अब से पहले बीजेपी राज्य में कभी टीआरएस पर खुल कर हमला नहीं करती थी. राज्य में लोगों के बीच एक धारणा ये भी है कि टीआरएस और ओवैसी के बीच अंदरूनी गठबंधन है, जिसे दोनों ही पार्टी बाहर ज़ाहिर नहीं करती है.

बंदी संजय कुमार ने पार्टी अध्यक्ष बनते ही इस बात को घूम-घूम कर कहना शुरू किया. दुब्बाक सीट पर हुए उप-चुनाव में उन्होंने यही रणनीति अपनाई."

वो आगे कहते हैं, "बीजेपी के बड़े नेता कह रहे हैं, टीआरएस को वोट देना ओवैसी को वोट देने जैसा है. हाल ही में पार्टी नेता लोकसभा सांसद तेजस्वी सूर्या ने निगम चुनाव में रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा उठाया, उन पर सर्जिकल स्ट्राइक की बात की, तो स्मृति ईरानी भी इस पर बोलने में पीछे नहीं रहीं. ऐसा कह कर बीजेपी एक नगर निगम चुनाव में ध्रवीकरण की राजनीति कर रही है और दूसरी पार्टियों को इसका जवाब देना पड़ रहा है."

तेजस्वी सूर्या ने प्रचार के दौरान कहा, "इससे ज़्यादा हास्यास्पद बात कुछ नहीं हो सकती है कि अकबरुद्दीन ओवैसी और असदउद्दीन ओवैसी विकास की बात कर रहे हैं. उन्होंने पुराने हैदराबाद में केवल रोहिंग्या मुसलमानों का विकास करने का काम किया है. ओवैसी को वोट भारत के ख़िलाफ़ वोट है."

इसके जवाब में असदउद्दीन ओवैसी ने कहा, "सिकंदराबाद से बीजेपी सांसद जी किशन रेड्डी, केंद्र में गृह राज्यमंत्री हैं. अगर रोहिंग्या मुसलमान और पाकिस्तानी यहाँ रहते हैं, तो वो क्या कर रहे हैं."

जिनका नागाराजू के मुताबिक़ अब तक के जीएचएमसी चुनाव के इतिहास में केवल बिजली, सड़क, पानी की बात होती थी. ये पहला मौक़ा है जब इस बार मुसलमान, सर्जिकल स्ट्राइक, बांग्लादेश, और पाकिस्तान के बारे में बात हो रही है.

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम तक़रीबन 24 विधानसभा सीट में फैला है. तेलंगाना की जीडीपी का बड़ा हिस्सा यहीं से आता है. अगर इस निगम पर बीजेपी का क़ब्ज़ा हो जाता है, तो राज्य की सत्ता के बीजेपी और क़रीब पहुँच सकती है.

दरअसल हैदराबाद में तक़रीबन 40 फ़ीसद मुसलमान रहते हैं और एआईएमआईएम के अध्यक्ष यहीं से लोकसभा सांसद हैं.

जीत की उम्मीद

बीजेपी कभी भी तेलंगाना में बड़ी पार्टी नहीं रही है.

तेलंगाना विधानसभा चुनाव 2018 के अंत में हुए थे. 119 सीटों वाली विधानसभा में 88 सीट टीआरएस के पास हैं. 19 सीटों के साथ कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है, एआईएमआईएम के पास केवल सात विधायक हैं और बीजेपी के पास केवल 1 विधायक है. लेकिन हाल ही में हुए दुब्बाक सीट के उपचुनाव के नतीजों के बाद अब बीजेपी के पास दो सीटें है और टीआरएस के पास 87 सीटें हैं.

लेकिन छह महीने बाद जब 2019 में लोकसभा चुनाव हुए तो राज्य की 17 सीटों में से बीजेपी के पास चार सीटें आई, कांग्रेस के पास तीन सीटें, एआईएमआईएम के खाते में एक सीट. बाक़ी की नौ सीटों पर टीआरएस ने क़ब्ज़ा किया.

जिनाका नागाराजू कहते हैं कि बीजेपी इस नगर निगम चुनाव में कितनी सीटें जीतेगी वह इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं.

लेकिन वो एक बात ज़रूर कहना चाहते हैं, "इस चुनाव में बीजेपी सेंटर स्टेज में है. उन्होंने एक तरह से 'साइकोलॉजिकल वॉर' में जीत दर्ज की है. आज की तारीख़ में इस चुनाव में कांग्रेस को कोई नहीं पूछ रहा है. सब टीआरएस, बीजेपी की ही बात कर रहे हैं. अब वोटर पर है वो किस पार्टी को चुनते हैं. जो टीआरएस को नहीं चुनेंगे वो बीजेपी को चुनेंगे, ऐसा लग रहा है. कांग्रेस के लिए ये चिंता का सबब होना चाहिए. ये अपने आप में एक तरह से बीजेपी की जीत है."

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