कोलकाता रेप-मर्डर केस: डॉक्टरों का विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक दलों का 'नफ़ा-नुकसान'

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता से
पिछले चार दशकों में पश्चिम बंगाल और ख़ास तौर पर कोलकाता शहर ने सड़कों पर इतना जन सैलाब नहीं देखा था. लेकिन बीते कुछ सप्ताह से क्या दिन और क्या रात- हर समय सड़कों पर लोग दिखे.
नौ अगस्त को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक ट्रेनी डॉक्टर की बलात्कार के बाद हत्या के विरोध में जन आक्रोश फूट पड़ा था.
सड़कों पर पहली बार ऐसा देखा गया था जब इन प्रदर्शनों में किसी भी राजनीतिक दल के झंडे नज़र नहीं आ रहे थे और न ही आंदोलन का नेतृत्व करने वाला कोई चेहरा. प्रदर्शनों में बुज़ुर्ग थे, महिलाएं थीं और बच्चे भी थे.
यह आंदोलन जूनियर डॉक्टरों ने शुरू किया था जो पीड़िता और उनके परिवार के लोगों के लिए इंसाफ़ की मांग कर रहे थे. घटना नौ अगस्त की अहले सुबह सामने आई.
मगर इस पूरे मामले में जिस तरह से मेडिकल कॉलेज के प्रशासन और स्थानीय पुलिस की भूमिका रही, उसको लेकर कई सवाल उठने लगे और लोगों का आक्रोश भड़कने लगा.

बुलाना पड़ा विधानसभा का विशेष सत्र
घटना के विरोध में प्रदर्शनों का सिलसिला चल ही रहा था और 14-15 अगस्त की रात कोलकाता शहर में महिलाओं ने 'रीक्लेम द नाइट' का नारा देकर "महिलाओं का अधिकार" फिर से स्थापित करने की अपील की. इस आह्वान पर मानो पूरा कोलकाता शहर रात को सड़कों पर उमड़ पड़ा.
इस दौरान आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में जूनियर डॉक्टरों का भी धरना चल रहा था. तभी वहां पर एक ‘अज्ञात भीड़’ ने हमला कर दिया.
भीड़ ने न सिर्फ़ धरना स्थल को तहस-नहस किया बल्कि अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भी तोड़फोड़ की. आरोप लगे कि हत्या वाली जगह पर भी छेड़छाड़ की गई. ऐसा सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में कहा.
अभी तक सड़कों पर जो आंदोलन चल रहे थे उनमें राजनीतिक दल, ख़ास तौर पर वामपंथी संगठन और बीजेपी खुले तौर पर शामिल नहीं हो रहे थे. लेकिन अस्पताल में हमले के बाद इन दलों ने भी खुलकर मोर्चाबंदी करनी शुरू कर दी.
इसके बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर "अपराजिता बिल" पेश किया. इस बिल को सर्वसम्मति से पारित भी कर दिया गया.

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यहां से राज्य की राजनीति में पेच फंसा. चूँकि विधानसभा में वाम संगठनों का कोई भी विधायक नहीं है तो मुख्य विपक्षी दल ने इस बिल का समर्थन किया.
सदन में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने सदन में कहा कि बीजेपी बिल का समर्थन करती है और उसे जल्दी लागू किया जाना चाहिए.
इस बिल में बलात्कार और हत्या के मामलों में तय सीमा के अन्दर ट्रायल और फांसी की सज़ा का प्रावधान किया गया है.
जिस समय नेता प्रतिपक्ष सदन में बिल का समर्थन कर रहे थे, उसी दिन प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने इसे "असंवैधानिक" बताया.
जहां अपने राजनीतिक करियर में पहली बार ममता को इस मामले में बेहद दबाव में देखा गया, वहीं मुख्य विपक्षी दल में भी नेताओं के बीच सामंजस्य नहीं दिख पाया. वो अलग-अलग बयान देते सुनाई दिए.
तृणमूल कांग्रेस के अंदर से भी भारी विरोध के स्वर बुलंद होने लगे जो पहले कभी नहीं हुआ था.
पार्टी के राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने अपनी सदस्यता त्याग दी. वहीं पार्टी के दूसरे सांसद सुखेंदु शेखर रॉय भी सरकार के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया में पोस्ट करने लगे.

टीएमसी के भीतर विरोध के स्वर
बंगाल की राजनीति में ये बेहद महत्वपूर्ण और गंभीर मोड़ आ चुका था.
2011 के बाद प्रदेश की राजनीति से पूरी तरह साफ़ हो चुके वाम दल भी सत्ता के ख़िलाफ़ पनपे जन आक्रोश में अपना राजनीतिक भविष्य तलाशने लगे.
बीजेपी भी हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में अपने ख़राब प्रदर्शन के बाद मज़बूती से प्रदेश की राजनीति पर पकड़ बनाने के लिए रणनीति बनाने लगी.
जानकार कहते हैं कि भाजपा के लिए ये मौक़ा अच्छा ज़रूर था, जब पहली बार ममता बनर्जी दबाव में दिखीं और जब उन्होंने अपनी सरकार को चारों तरफ़ से घिरता हुआ पाया.

राजनीतिक विश्लेषक तापस सिन्हा कहते हैं कि "बीजेपी रणनीति बनाने में ही व्यस्त रही और उनकी ट्रेन छूट गई."
वह कहते हैं, "बीजेपी के नेता इस मुद्दे पर एक स्टैंड नहीं ले सके. प्रदेश अध्यक्ष कुछ और कह रहे थे और विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी सदन में बिल का समर्थन कर रहे थे. पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने ख़ामोशी अपना ली थी."
"9 अगस्त को घटना घटी और भाजपा पहली बार सड़क पर विरोध करती हुई नज़र आई, मगर ये अपने बैनर तले नहीं था. 27 अगस्त को एक लगभग अज्ञात संगठन- पश्चिम बंग छात्र समाज के पीछे सचिवालय पर प्रदर्शन का कार्यक्रम रखा गया. लेकिन इस दौरान वाम दलों ने प्रदेश भर में, शहर से लेकर सुदूर अंचलों तक, आंदोलन की बागडोर संभाल ली थी."
बीजेपी-लेफ़्ट में श्रेय लेने की होड़

सरकार और ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ लोगों में पनपे आक्रोश को देखते हुए राजनीतिक दलों ने भी अपने-अपने तरकश के सारे तीर निकाल लिए. वो इस जन सैलाब में वो पहले बिना झंडे के और बाद में खुलकर शामिल हो गए.
अब इनमें आंदोलन की सफलता का श्रेय लेने की होड़ लग गयी है.
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के युवा संगठन यानी डेमोक्रेटिक यूथ फे़डरेशन ऑफ़ इंडिया की पॉलोबी मजूमदार दावा करती हैं कि प्रदेश भर में जितने भी प्रदर्शन हो रहे थे, उन सब का आयोजन वाम दल ही कर रहे थे.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "सब लोग कह रहे थे कि इंसाफ़ नहीं मिल पा रहा है, सरकार ज़्यादती कर रही है, दोषियों को बचाने का प्रयास कर रही है. लोग सड़कों पर उतर रहे थे तो हम कैसे पीछे रहते? हम आंदोलन को दिशा दे रहे रहे थे."
सीपीएम के छात्र संगठन, स्टूडेंट्स फे़डरेशन ऑफ़ इंडिया की दीधिती रॉय ने भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच गुप्त गठजोड़ का आरोप लगाया.
उनका कहना था कि दोनों ही दलों की जहां सरकारें हैं वहां पर बलात्कारियों को बचाने के प्रयास होते हैं.
वो कहती हैं, "केंद्र सरकार और राज्य सरकार में कोई अंदरूनी सहमति है. भाजपा का या सरकार का कोई बड़ा केन्द्रीय नेता इस घटना को लेकर उतनी आक्रामकता नहीं दिखा रहा है. इस मामले में ये दोनों ही दल कटघरे में हैं."
अगर वाम दल इस आंदोलन के ज़रिए अपना भविष्य तलाशने की जुगत में हैं, तो विपक्ष के दूसरे दल भी इसमें भला पीछे कैसे रह सकते हैं?

सांसद और प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता शमिक भट्टाचार्य ने बीबीसी से एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल की घटना के विरोध में जहां-जहां आंदोलन आयोजित किये गए, उन सब में उनके कार्यकर्ता शामिल थे.
उन्होंने कहा, "हम लोग भी लगातार कोशिश कर रहे हैं कि हम इस आंदोलन में बने रहें, अलग से भी रहें. जो आम लोग सड़कों पर उतरे उनमें बड़ी संख्या में हमारे कार्यकर्ता भी शामिल थे."
"यहां पर वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस में कोई आपसी सहमति है. दोनों मिलकर भाजपा शासित राज्यों की आलोचना कर रहे हैं जबकि चाहे हाथरस हो या गुजरात इस तरह की घटनाएं जहां भी हुईं वहां अधिकारियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की गई. यहां देख लीजिए, कोलकाता पुलिस के कमिश्नर से लेकर थाना प्रभारी, मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल और दूसरे लोग जिनकी संलिप्तता हो सकती है, उनको बचाया जा रहा है, वो भी डंके की चोट पर."
विपक्षी नेताओं पर टीएमसी का पलटवार

तृणमूल कांग्रेस इस बार जिस राजनीतिक तूफ़ान का सामना कर रही है ऐसा उसने पहले कभी नहीं झेला है.
यह पहला मौक़ा है जब सरकार और संगठन की नाव मझधार में फंसी हुई नज़र आ रही है. मगर इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने विपक्ष के ख़िलाफ़ अपनी मोर्चाबंदी भी जारी रखी है.
फ़िरहाद हकीम राज्य सरकार में शहरी विकास मंत्री हैं और पार्टी के बड़े चेहरों में से एक हैं. वो कोलकाता के मेयर भी हैं.
उनका दावा है, "किसी भी दूसरे राज्य में ऐसा देखने को नहीं मिलेगा जब सरकार और सत्तारूढ़ दल, लोगों के साथ इंसाफ़ की मांग करने के लिए उनके साथ सड़कों पर उतरा हो."
बीबीसी से उन्होंने कहा, "लोग इंसाफ़ चाहते हैं. हम भी इंसाफ़ चाहते हैं. लोग घटना की जांच सीबीआई से कराना कहते थे. हम भी यही चाहते थे. मुख्यमंत्री ने पहले ही कोलकाता पुलिस को डेडलाइन दे दी थी कि अगर तय समय सीमा के अंदर जांच पूरी नहीं होती है तो मामला सीबीआई को दे दिया जायेगा."
तो क्या इसका राजनीतिक रूप से भी तृणमूल कांग्रेस को नुक़सान होगा?
फ़िरहाद हकीम ऐसा नहीं मानते हैं.
वो कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कोई राजनीतिक भविष्य ही नहीं है और जहां तक बात वाम दलों की है तो हम दशकों से उनके ख़िलाफ़ लड़ते हुए ही बड़े हुए हैं."
"वाम दलों का न तो विधानसभा में प्रतिनिधित्व है और न ही पश्चिम बंगाल से लोक सभा में उनका कोई सदस्य है. भाजपा और वाम दल इस आंदोलन के बहाने अपनी रोटियां सकने की कोशिश कर रहे हैं मगर उन्हें सफलता नहीं मिल पाएगी."

तृणमूल कांग्रेस और विपक्ष के अपने अलग-अलग दावे ज़रूर हैं, मगर जानकार मानते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम में अगर किसी को सबसे ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ा है, तो वो है तृणमूल कांग्रेस.
राजनीतिक विश्लेषक तापस सिन्हा कहते हैं, "इस पूरे घटनाक्रम में अगर किसी एक दल को सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ है वो है तृणमूल कांग्रेस. इसमें कोई शक़ नहीं कि जिस तरह से मामले को हैंडल किया गया उससे लोगों के बीच सीएम ममता बनर्जी की साख कमज़ोर हुई है."
"उनकी पार्टी में विरोध के ज़ोरदार स्वर उभरे. इस घटनाक्रम ने राज्य सरकार और संगठन को आत्मचिंतन के मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है."
साल 2026 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.
सवाल उठता है कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना के ख़िलाफ़ पनपे जन आक्रोश का विपक्षी दल कितना फ़ायदा उठा सकते हैं?
ये भी देखना होगा कि इस घटना के बाद तृणमूल कांग्रेस भी अपनी ज़मीन को किस हद तक बचा पाने में कामयाब रहेगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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