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अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को क्यों बदलनी पड़ी सीट, क्या इस बार जीत पक्की है?
- Author, त्रिभुवन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
बड़े नेताओं के लाडले अगर मिज़ाज का मौसम नहीं मिलने के कारण सियासत में पहली ही बार में कामयाब न हों तो मुश्किलें बढ़ जाती हैं.
राजस्थान की राजनीति में अशोक गहलोत की छवि 1998 से 2003 की अवधि में ऐसे गांधीवादी नेता की रही है, जिनके बारे में तब दावा किया जाता था कि परिवारवाद, जातिवाद, सरकार से चिपके रहने और राजनीतिक मौक़ापरस्ती जैसी चीज़ों से उनका कोई लेना-देना नहीं है.
उनकी स्थति यह रही कि वे 1998 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उनके मंत्रियों के परिवार लालबत्ती लगी कारों में घूमते थे और उनका परिवार साधारण कार में. उन्होंने बहुत साल तक अपने परिवार और अपने बेटे को भी सरकारी आभामंडल से दूर बनाए रखा.
गहलोत सियासत के सफ़र में तेज़ी से आगे बढ़ते रहे और उनका इंतज़ार घर में होता रहा.
वे ख़ुद तो ताक़तवर बन गए; लेकिन अपने परिवार को सत्ता से दूर रखने में संभवत: उनका परिवार वह सब हासिल नहीं कर पाया, जो दूसरे नेताओं के परिवारों या संतानों ने कर लिया.
कहां है भाजपा और कांग्रेस की राजनीति
पिछले कुछ साल में राजस्थान की राजनीति में बहुत रेत उड़ चुकी है. कांग्रेस के भीतर भी वैसे हालात नहीं रहे हैं, जो एक दशक पहले थे.
अब राजस्थान भाजपा की राजनीति में भी बहुत बदलाव आ गया है. वे पहले की तुलना में अधिक आक्रामक हुई है और ज़मीनी स्तर पर उसका काम बढ़ा है.
अब जब प्रदेश की हवाओं में सियासत बहुत बढ़ गई है तो पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को गृह क्षेत्र जोधपुर के बजाय जालौर लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया गया है.
जोधपुर से भाजपा ने इस बार भी केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को टिकट दिया है.
पिछले लोकसभा चुनाव में इस सीट से वैभव गहलोत को उम्मीदवार बनाया गया था. उस समय राज्य में कांग्रेस की सरकार आई थी और गहलोत मुख्यमंत्री थे.
लेकिन वैभव गहलोत भाजपा उम्मीदवार शेखावत के मुक़ाबले 2,74,440 वोटों से हार गए थे.
यह मोदी लहर का समय था और जोधपुर लोकसभा के तहत आने वाले सभी आठों विधानसभा क्षेत्रों में उनके लिए उपयुक्त समीकरण नहीं बन पाए.
मोदी के पक्ष में ऐसी सुनामी चली कि फलौदी, लोहावट, शेरगढ़, सरदारपुरा, जोधपुर, सूरसागर, लूणी और पोकरण विधानसभा में से किसी में भी वैभव आगे नहीं बढ़ सके.
हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में कांग्रेस की सरकार थी और गहलोत ने लोकलुभावन कार्यक्रमों की झड़ी लगा दी और सुदूर इलाकों तक में लोगों को फायदा पहुँचाने वाली योजनाएं लागू कीं.
जालौर क्षेत्र पर गहलोत की निगाहें पहले से ही थीं और उन योजनाओं का खू़ब लाभ उस इलाके को दिलवाया गया. समय रहते काफी सियासी समीकरण साधे गए और जालौर में वैभव गहलोत की सक्रियता काफ़ी रही.
विधानसभा चुनाव के बाद वैभव की सक्रियता जालौर में और बढ़ी और इसी कारण यह अनुमान लगाए जाने लगे कि आने वाले समय में इस सीट से वे पार्टी उम्मीदवार हो सकते हैं.
कैसा है जालौर लोकसभा सीट का इतिहास
इतिहास और पुराने चुनावों का ख़याल करें तो लोकसभा के लिए जालौर ऐसी सीट रही है, जहाँ कोई भी ताक़तवर नेता बाहर से आकर आसानी से चुनाव जीत सकता है.
कभी कांग्रेस नेता बूटा सिंह पंजाब से यहां आकर चुनाव जीतते रहे हैं तो भाजपा नेता बंगारू लक्ष्मण की पत्नी बी सुशीला भी 2004 में इस सीट से लोकसभा में पहुँची हैं.
बूटा सिंह 1998 में तो निर्दलीय ही जीतकर लोकसभा पहुँच गए थे.
यह हैरानी की बात है कि जातिप्रेम से कूट-कूट कर भरे राजस्थान के इस इलाके में जहाँ सिख नाम मात्र को भी नहीं हैं, वहाँ से बूटा सिंह चार बार लोकसभा पहुँचे.
भाजपा के नेताओं की मानें तो उन्हें पहले से उम्मीद थी कि इस सीट पर वैभव गहलोत उम्मीदवार हो सकते हैं. इस लिहाज़ से इस बार पहले से ही पार्टी ने किसी स्थानीय कार्यकर्ता या कांग्रेस के ही किसी नेता को उतारने पर विचार करना शुरू कर दिया था.
अब तक इस सीट पर पार्टी के तीन बार से सांसद देवजी पटेल थे. लेकिन उन्हें इस बार सांचौर विधानसभा सीट से टिकट दिया गया तो 30,535 वोट से हार गए और भाजपा के बागी उम्मीदवार जीवाराम चौधरी निर्दलीय जीते.
इन हालात में भाजपा ने यहाँ से अपना उम्मीदवार एक ज़मीनी कार्यकर्ता और ज़िला परिषद के सदस्य लुंबाराम चौधरी को बनाया है.
जालौर संसदीय सीट पर भाजपा चार बार से लगातार जीत रही है. 2004 में यहाँ से सुशीला बंगारू निर्वाचित हुईं और उसके बाद के तीन चुनावों 2009, 2014 और 2019 में भाजपा के ही टिकट पर देवजी पटेल लोकसभा पहुँचे.
इलाक़े के राजनेताओं का कहना है कि इस क्षेत्र को बड़े नेता हमेशा से खालसा यानी बिना किसी मालिक का इलाक़ा समझते हैं और जिसका मन करता है, वह टिकट लेकर यहाँ आ जाता है और चुनाव जीतकर वापस चला जाता है.
इस लिहाज़ से यहाँ वैभव गहलोत के लिए संभावनाएं काफ़ी हैं; लेकिन यह जीत इतनी आसान नहीं है.
वैभव गहलोत के लिए उपयुक्त क्यों है जालौर
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार वैभव गहलोत के लिए जोधपुर की तुलना में जालौर सीट अधिक उपयुक्त थी; क्योंकि जहाँ विधानसभा चुनाव के दौरान जोधपुर संसदीय क्षेत्र में आने वाली आठ विधानसभाओं में से कांग्रेस के पास सिर्फ़ एक सीट सरदारपुरा है, जहाँ से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जीतकर आते हैं.
वहीं जालौर संसदीय क्षेत्र की आठ विधानसभा में से तीन कांग्रेस के पास हैं. एक निर्दलीय विधायक है.
जोधपुर में भाजपा के पास आठ में से सात सीटें हैं तो जालौर में आठ में से चार.
जालौर सीट पर विधानसभा चुनावों के हिसाब से देखें तो भाजपा का वोट 6,59,694 है तो कांग्रेस उम्मीदवारों को मिला वोट 6,67,309 यानी 7,615 वोट ज़्यादा है.
वैभव के लिए आसानी यह भी है कि यहाँ 80 हज़ार से अधिक मतदाता माली हैं, लेकिन इनका रुझान आम तौर पर भाजपा की तरफ़ रहता है. इलाके के राजनीतिक लोगों का मानना है कि इन मतदाताओं को गहलोत अपने रसूख से साथ ला सकते हैं.
कुछ नेताओं का मानना है कि अब हरियाणा में माली मुख्यमंत्री बनाने के बाद भाजपा यहाँ भी इस तुरुप का इस्तेमाल ज़रूर करेगी.
लेकिन राजस्थान की राजनीति में असंभव को संभव बनाने का नाम ही अशोक गहलोत है.
अगर इस संसदीय क्षेत्र के जातिगत समीकरणों को समझने की कोशिश करें तो यहाँ ओबीसी का मतदाता 45 प्रतिशत से अधिक है, जिसके लिए वैभव गहलोत प्रचार कर रहे हैं कि वंचितों की पहचान करके आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से अधिक किया जाना चाहिए.
इलाके में बड़ी तादाद में रहबारी, बिश्नोई, रावणा राजपूत, भौमिया राजपूत, ब्राह्मण, चौधरी या कलबी जैसी जातियों के मतदाता हैं.
जातिगत जनगणना और आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से बढ़ाने के मुद्दे ऐसे हैं, जो इलाके के दो लाख ब्राह्मणों और दो लाख राजपूतों को नाक भौं सिकोड़ने पर मजबूर करते हैं.
इलाके में सात लाख तादाद वाला एससी-एसटी और मुस्लिम तबका ऐसा है, जो कांग्रेस की कमज़ोर रक्तवाहिनियों में नया उष्ण रक्त उड़ेल सकता है.
भाजपा के लिए इस क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की क़िलेबंदी सुकून देने वाली है तो हिंदुत्व भी उसे अलग ताक़त देता है.
इस आदिवासी इलाके में चौधरी, रहबारी, रायका, राजपूत, ब्राह्मण आदि वर्गों के संतों और साधुओं के मठ भी बड़ा सियासी उलटफेर करते हैं.
यह भी दिलचस्प है कि अशोक गहलोत ने दूसरी और तीसरी बार मुख्यमंत्री रहते हुए गौशालाओं, मठों, संतों और साधुओं को खु़श करने के लिए जो कुछ किया था, वह भाजपा की सरकारें कभी नहीं कर पाईं.
इलाके का ताक़तवार समुदाय बिश्नोई काफी समय से कांग्रेस के साथ सुकून से दिखता है और पिछले दिनों पेपर लीक, नकल और डमी परीक्षार्थी प्रकरण में जिस तरह बिश्नाई समाज को निशाना बनाया गया है, उसका भी राजनीतिक असर है.
जालौर सीट पर भाजपा की क़िलेबंदी बहुत मज़बूत दिख रही है; लेकिन अशोक गहलोत जातिगत तोड़फोड़ करने, विरोधी दल के नेताओं से समीकरण साधने और बहती बयार का रुख मोड़ने के मास्टरमाइंड माने जाते हैं.
जालौर में सचिन पायलट का असर
इस सीट पर दो विधायक सचिन पायलट गुट के हैं. पायलट गुट के नेता करण सिंह उचियारड़ा को जोधपुर में टिकट दिया गया है.
उचियारड़ा बहुत लंबे समय से टिकट के दावेदार रहे हैं; लेकिन अभी तक वे यह संदेश देने में कामयाब नहीं हुए हैं कि वे भाजपा के नेता गजेंद्र सिंह शेखावत के लिए कोई बड़ी चुनौती बन सकते हैं.
अलबत्ता, कुछ इलाकों में यह चर्चा है कि उचियारड़ा जोधपुर के पूर्व राजघराने और पूर्व महाराजा गज सिंह के नज़दीकी हैं. अगर उन्हें यह मदद मिलती है तो उचियारड़ा आने वाले दिनों में शेखावत के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं.
राजस्थान में कांग्रेस हो या भाजपा, यहां एक पुरानी प्रवृत्ति रही है कि साथ चलने वाले कुछ मुसाफ़िर भी ख़ेमों में सेंधमारी करने में संकोच नहीं करते. चूरू इसका ताज़ा उदाहरण है
यह भी माना जा रहा है कि अशोक गहलोत इस बार जालौर पर बहुत ताक़त लगाएंगे और अपने बेटे को जितवाने की भरपूर कोशिश करेंगे; क्योंकि कांग्रेस में यह परंपरा बहुत सुदृढ़ है कि अगर कोई दो चुनाव लगातार हार जाए तो उसे तीसरे चुनाव में टिकट नहीं दिया जाता.
पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत, राजस्थान कांग्रेस के प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा और राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा ने पिछले दिनों में हनुमान बेनीवाल की आरएलपी और भारतीय आदिवासी पार्टी के साथ गठबंधन की कोशिशें की हैं; हालांकि उसका जालौर पर सीधा असर नहीं दिखता.
अलबत्ता, वहाँ जालौर की रेवदर ऐसी सीट है, जहाँ बीएपी के मेघाराम गरासिया को 23,894 वोट मिले थे. इन वोटों का फ़ायदा भी कांग्रेस उठा सकती है.
कुछ राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस समय रहते गठबंधन पर काम करती और बीएपी, माकपा, बसपा या आरएलपी के साथ आज से बीस दिन पहले चीज़ें तय कर लेती तो आज वह काफ़ी अच्छी स्थिति में होती.
लेकिन कांग्रेस के नेता अपनी अना के तीर पुरानी शत्रुताओं के ज़हर में बुझाकर ही अपने तरकश संभालते हैं.
अब देखना यह है कि कांग्रेस इस आदिवासी इलाक़े की सियासी सीपियों में भरे पानी को समंदर का रूप देकर अपनी नैया खे ले जाएगी या बस इसी शोर में सियासी हसरतें चुनावी गुंचों पर बिन खिले ही मुरझा जाएंगी?
कौन हैं वैभव गहलोत ?
लॉ ग्रेजुएट वैभव गहलोत क़रीब दो दशक से कांग्रेस की राजनीति में हैं. उन्हें पीसीसी में पार्टी नेता सीपी जोशी उस समय अपने इलाक़े से सदस्य बनाकर लाए, जिस समय उनका तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुक़ाबला चल रहा था.
वैभव दो बार राजस्थान क्रिकेट संघ यानी आरसीए के अध्यक्ष रहे. इस बार राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद समीकरण बदले तो उन्होंने आरसीए से इस्तीफ़ा दे दिया.
वे सौम्य छवि के मिलनसार नेता हैं. उनमें राजनेताओं के बेटों जैसा व्यवहार नहीं है. अशोक गहलोत के निजी जानकारों की बातों पर भरोसा करें तो वैभव को इस बात का भी नुकसान हुआ है कि उन्हें उनके पिता ने वैसी छूट कभी नहीं दी, जो आम तौर पर राजनेताओं के बेटों को मिलती है.
राजनीतिक रूप से अशोक गहलोत के विरोधी उन पर भले कैसे भी तंज़ करें; लेकिन उनके निजी जानकारों की बात मानें तो गहलोत ने अपने परिजनों पर अब तक अपना कठोर अंकुश रखा है.
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