राजस्थान में क्या अशोक गहलोत और सचिन पायलट का विवाद ख़त्म हो गया है?

    • Author, त्रिभुवन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

राजस्थान में किसी से भी बात करें तो एक बात साफ़तौर पर उभरेगी कि सचिन पायलट के पास उम्र है. वे अभी महज़ 46 साल के हैं और गहलोत 72 साल के. दोनों के बीच उम्र का काफ़ी फ़ासला है.

लेकिन उम्र की बात करें तो यहाँ एक ऐसी फांस भी है, जिन पर अधिकतर काँग्रेस राजनेताओं या काँग्रेस समर्थक राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान नहीं है.

और वह है काँग्रेस और भाजपा के बीच वोट प्रतिशत का लगातार घटता अंतर.

राजस्थान के चुनावी आंकड़े बताते हैं, काँग्रेस में अशोक गहलोत 1998 में मुख्यमंत्री बने तो भाजपा और काँग्रेस के बीच वोट प्रतिशत का अंतर था 11.72 प्रतिशत.

वे दूसरी बार 2008 में मुख्यमंत्री बने तो वोटों का यह प्रतिशत 2.55 हो गया और 2018 में जब काँग्रेस सत्ता में आई तो भाजपा और काँग्रेस के बीच का वोट प्रतिशत अंतर 0.54 रह गया.

पिछले तीन चुनावों में जब जब काँग्रेस सत्ता में आई तो भाजपा और काँग्रेस के वोटों का अंतर नीचे दी गई तालिका से पता चलता है.

कांग्रेस की चुनौती

यानी यह तालिका साफ़तौर पर इशारा कर रही है कि काँग्रेस के ओल्ड गार्ड्स के लिए राजस्थान में राजनीति जितनी आसान रही थी, वह अब आने वाले दिनों में इस दल के भविष्य के नेताओं के लिए बहुत मुश्किल होगी.

क्योंकि दोनों दलों के बीच जीत हार के नतीजों में वोट प्रतिशत में गिरावट इस तरह हो रही है कि काँग्रेस ने अपने भीतर बदलाव के लिए कुछ नया नहीं किया तो वह 11.72 से 2.55 और 2.55 से 0.54 पर लुढ़की तो कोई सोच सकता है कि आने वाले वर्षों में काँग्रेस और उनके नए नेताओं का भविष्य क्या होगा!

प्रदेश के राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि आंकड़ों की हक़ीक़त के अनुसार काँग्रेस ने अपनी युवा और पुरानी पीढ़ी के बीच समन्वय स्थापित किया होता तो ज़मीनी स्तर पर पार्टी की हालत बेहतर होती.

लेकिन हाईकमान और उसके प्रभारियों ने कभी इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया. वे प्रदेश के ताक़तवर नेता अशोक गहलोत और भविष्य की उम्मीद माने जा रहे सचिन पायलट के बीच खाइयां बढ़ने देते रहे.

अब जब चुनाव घोषित हो चुके हैं तो दोनों नेताओं के बीच की स्थिति क्या है? क्या दोनों के बीच सुलह हो गई है और दोनों एक हैं?

राजस्थान में विधानसभा चुनावों की उथल-पुथल शुरू होने के बाद भी राजनीतिक रणभूमि में यह सवाल अभी भी मुखर है कि क्या मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच चल रहा राजनीतिक विवाद अब थम गया है?

क्या दोनों अब साथ आ गए हैं और पार्टी को सत्ता में वापस लाने के लिए एकजुट हैं?

गहलोत और पायलट के बीच सुलह हो गई?

राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार अगर पांच साल के सियासी सफ़र का हिसाब देखें तो प्रदेशाध्यक्ष के रूप में काँग्रेस को सत्तासीन कराने वाले सचिन पायलट 2018 में उप मुख्यमंत्री बने.

इसके बाद सरकार से बाहर होते हुए एक ऐसी स्थति में आ गए, जहाँ उनके पास कोई पद नहीं था.

लेकिन आज वे सीडब्लूसी के सदस्य हैं और मुख्यमंत्री अशाेक गहलोत उन्हें हाईकमान बता रहे हैं.

यह भी सच है कि पायलट के पास सरकार में जुलाई 2020 से ही कोई पद नहीं है. लेकिन वे अपना कद यथावत रखने में कामयाब रहे हैं.

राज्य में जैसे ही विधानसभा चुनावों की घाेषणा हुई, पायलट ने कहा, "चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है. अब मिलकर चुनावी मैदान में उतरेंगे और चुनाव जीतेंगे. हमारे कार्यकर्ताओं से मेरी अपील है कि पूर्ण समर्पण, निष्ठा एवं एकजुटता के साथ तैयारियों में जुट जाएं."

उन्होंने अपील की, "हमें पांचों राज्यों में कांग्रेस का परचम फहराना है. मुझे विश्वास है कि कांग्रेस को जनता का प्यार और आशीर्वाद मिलेगा और राजस्थान सहित सभी पांच राज्यों में कांग्रेस की मज़बूत व जनकल्याणकारी सरकार बनेगी."

पायलट के इस उत्साहपूर्ण बयान के बावजूद उनके समर्थकों में आज भी यह मलाल है कि वे मुख्यमंत्री नहीं बन सके, जिसके लिए उनका अधिकार था.

इन समर्थकों के लिए अब चुनावों की शामें धुआं-धुआं और भविष्य के दिन उदास-उदास हैं; क्योंकि उन्हें पांच साल पहले की कहानियां रह-रहकर याद आ रही हैं.

पायलट और गहलोत के बीच सीज़फ़ायर?

लेकिन पायलट बिना विचलित हुए पार्टी की बैठकों में शामिल हो रहे हैं. वे भले गहलोत के सुर में सुर नहीं साधें, लेकिन यह तय है कि पार्टी संगठन के लिए वे पूरी ताकत से जुटे हैं.

इस बारे में पार्टी के नेताओं का आमतौर पर मानना है कि पायलट भले अभी सीएम नहीं बन सके हों, लेकिन उनके साथ उम्र है और वे भविष्य के नेता हैं.

दोनों नेताओं के बीच सुलह और सहयोग की मौजूदा नाज़ुक स्थिति को लेकर खुद पायलट कहते हैं, "राहुल जी और खड़गे जी से बातचीत के बाद मैं कदम से कदम मिलाकर चल रहा हूँ और मेरी कोशिश है कि पार्टी सत्ता में आए; क्योंकि राजस्थान में सत्ता आने पर ही केंद्र में भाजपा को अपदस्थ करना और काँग्रेस को सत्ता में लाना संभव होगा."

पायलट ने नौ अक्टूबर को दिल्ली कांग्रेस मुख्यालय में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सीपीपी चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और सीडब्ल्यूसी सदस्यों के साथ भाग लिया तो वे 13 अक्टूबर को जयपुर में प्रत्याशियों के चयन संबंधी मुख्य समिति की बैठक में भाग ले रहे हैं.

यानी राजस्थान काँग्रेस के नेताओं में उनकी भूमिका काफी अहम दिख रही है.

राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि पायलट और गहलोत के बीच सीज़फ़ायर दिख रहा है, लेकिन है नहीं.

पायलट पहले की तुलना में अब बेहतर स्थिति में हैं और केंद्र उनकी उपेक्षा नहीं कर सकता. इसमें बेशक गहलोत की सुप्रीमेसी है, लेकिन अब ऐसा लगता है कि सचिन के लिए सचिन से ज्यादा केंद्र लड़ रहा है.

राजस्थान के प्रमुख समाजवादी नेता और प्रदेश की राजनीति के विश्लेषक अर्जुन देथा मानते हैं, "काँग्रेस हाईकमान सचिन पायलट को कभी खोना नहीं चाहेगा, क्योंकि उनका जिस समुदाय से जुड़ाव है, वह राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में बहुत निर्णायक है और पायलट को यह समुदाय बहुत अच्छी तरह सुनता है."

हाईकमान ने देरी की

लेकिन पायलट समर्थक मानते हैं कि उन्हें कांग्रेस में गहलोत खेमा अब भी रोकने की पूरी कोशिश कर रहा है. मसलन पहले माना जा रहा था कि उन्हें दोनों नेताओं में सुलह के बाद प्रदेश संगठन की कमान सौंपी जा सकती है.

यह नहीं हुआ तो यह माना गया कि चुनावों से पहले चुनाव अभियान समिति बनेगी तो उसकी कमान उनके पास रहेगी.

लेकिन कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनाया गया राज्य सरकार के मंत्री और अशोक गहलोत के विश्वसनीय गोविंद मेघवाल को. यह राज्य के राजनीतिक क्षेत्रों में काफी हैरानी भरा था, क्योंकि मेघवाल के कद और पायलट के कद में कोई तुलना नहीं है.

प्रदेश काँग्रेस के पूर्व सचिव और पायलट के नजदीक नेता सुशील आसोपा का कहना है कि पायलट का जादू प्रदेश के मतदाताओं पर सिर चढ़कर बोल रहा है और उनकी उपेक्षा का आप अर्थ लगा सकते हैं कि किसे नुकसान होता है.

वे अब भी अपना श्रेष्ठतम पार्टी को देने की कोशिश में हैं. वे कई बार उकसाए जाने के बावजूद अपना संयम बनाए रहते हैं.

पार्टी के महासचिव और इलेक्शन वाॅर रूम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे जसवंत गुर्जर कहते हैं, "पार्टी ने पायलट को सदा ही महत्व दिया है और कैंपेन कमेटी का चेयरमैन मेघवाल को इसलिए बनाया गया क्योंकि भाजपा की कमान अर्जुन मेघवाल के पास है और गोविंद मेघवाल ने अर्जुन मेघवाल को स्थानीय चुनावों में अच्छी पटखनी दी है."

वे ऐसे समुदाय से हैं, जो प्रदेश में अनुसूचित जाति का अहम हिस्सा है और चुनाव में उनका वोट निर्णायक भूमिका निभाता है.

प्रदेश में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे और राजस्थान की राजनीति के विश्लेषक प्रो. अरुण चतुर्वेदी मानते हैं, "दोनों नेताओं में सीज़फ़ायर दिखता है और पायलट मतदाताओं के उस वर्ग को सीधे तौर पर संबोधित करते हैं, जो युवा है."

"मैं कई दशकों की राजनीति को याद करूं तो आज की स्थिति में कांग्रेस ही नहीं, भाजपा और काँग्रेस दोनों दलों में ऐसा कोई नेता नहीं हैं, जो पायलट की तरह का सम्मोहन लोगों में रखता हो. राजस्थान में उनकी फॉलोइंग इरेस्पेक्टिव ऑफ़ एरिया है."

"किसान हों, युवा हों या शहरी या ग्रामीण, सब में ऐसी लोकप्रियता रखने वाले युवा राजस्थान में कम रहे हैं और यह काँग्रेस के लिए फायदे की बात है कि उनके पास पायलट हैं."

प्रेक्षकों के अनुसार पायलट और गहलोत अगर वाकई में एक होकर समय रहते प्रदेश में चुनावी अभियान शुरू कर देते तो नतीजे नि:संदेह बेहतरीन होते, लेकिन दोनों के बीच सुलह में काफी देर हुई है.

इस मामले में पार्टी हाईकमान की चूकें भी कम नहीं हैं.

खासकर प्रदेश में भेजे गए प्रभारियों ने तटस्थ भूमिका नहीं निभाई और वे किसी एक खेमे के होकर प्रदेश में विभाजन और टकराव को हवाएं देते रहे.

युवा नेतृत्व को बागडोर

इस बारे में लंबे समय से काँग्रेस कवर करते रहे और वरिष्ठ पत्रकार निर्मल पाठक मानते हैं, "राहुल गांधी ने दोनों नेताओं से कहा है कि वे कम से कम चुनाव तक बयानबाजी नहीं करें. यह अब दिख भी रहा है. पायलट ने तो बिलकुल ही नहीं बोला और गहलोत ने भी कम बोला है."

"इतनी सारी कमेटियां बनीं और उनमें पायलट को नहीं रखा गया, तब भी पायलट नहीं बोले. यानी उन्होंने तय कर लिया है कि अब डूबना-उतरना यहीं है. दरअसल पायलट के पास ज्यादा विकल्प बचे नहीं हैं."

पाठक के अनुसार, "अगर दोनों नेताओं के बीच कटुता नहीं हो और दोनों मिलकर फिर से सरकार बना लें तो असल फायदा गहलोत को ही होगा."

राजनीतिक विश्लेषक और समाजशास्त्री राजीव गुप्ता कहते हैं, "गहलोत ने समाजों के हितों को पोषित करने वाली कितनी ही योजनाएं लागू की हैं और इनका फायदा बेशक चुनाव में होता है. ऐसे में कलह के बजाय सहयोग से काम करें तो चुनावी प्रक्रिया में काँग्रेस को लाभ होगा."

"काँग्रेस यह चुनाव जीत लेती है तो भाजपा के लिए संकट होगा."

गुप्ता यह भी बताते हैं, "काँग्रेस में शुरू से ही वाद-प्रतिवाद और संवाद की प्रक्रिया रही है और जिसे टकराव माना जा रहा है, दरअसल वह कुछ ऐसे मुद्दों की तरफ ध्यान दिलाने वाली प्रक्रिया भी है, जो बहुत जरूरी होते हैं."

"गांधी बनाम सुभाष, नेहरू बनाम पटेल आदि के बीच इसी तरह के हालात रहे हैं. अगर हम गहलोत और पायलट के विवाद को इसी जगह खड़े होकर देखें तो यह दोनों के बीच सहयोग की राह भी है."

प्रो. चतुर्वेदी कहते हैं, "काँग्रेस के पास एक अनुभवी पीढ़ी है, लेकिन अब आप युवाओं को और अधिक इंतजार नहीं करवा सकते. इस लिहाज़ से पायलट को सीडब्लूसी में लेना बड़ी बात है."

"पायलट के पक्ष में एक और बड़ी बात उनकी उम्र है. काँग्रेस के पास इस तरह के आर्टिकुलेट नेता कम हैं."

लेकिन अगर हम प्रतिपक्ष के नेताओं से भी बात करें तो यह धारणा आम है कि गहलोत और पायलट के बीच बेहतरीन समन्वय वाली तस्वीर काँग्रेस को कहीं और खड़ा कर देती है, बनिस्बत दोनों के टकराव वाली मुद्राओं के.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)