राजस्थान में राजघरानों की क़रीबी बीजेपी से क्यों है?

    • Author, त्रिभुवन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

स्वतंत्रता के बाद वक्ष खोले लोकतंत्र की अमराइयां हिलोरें लेने लगीं तो राजस्थान की सुनहरी सरज़मीं पर गर्व से आकाश थामे खड़ी सदियों पुरानी राजशाही के चेहरे ही एकबारगी पीले नहीं पड़े, उनके अस्तित्व के पाए भी चरमरा गए.

लेकिन वे हारे नहीं और प्रदेश में अंकुराती राजनीति के रथ में जुते अश्वों की वल्गा अपने हाथ में बड़ी कुशलता से रखने की भरसक कोशिशें कीं.

राजस्थान निर्माण के बाद प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री का नाम जयपुर महाराजा की प्रशंसा और अनुशंसा के बाद देश के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सिटी पैलेस में तय किया. यह नाम था हीरालाल शास्त्री.

प्रदेश में तीन साल बाद विधानसभा के चुनाव होने थे और उससे पहले लोकतंत्र की कोंपलें यहाँ किसी जनस्थल पर नहीं, एक ऐसे राजमहल में फूटीं, जो पिछले 217 साल से राजतंत्र के शक्ति केंद्र के लिए जाना जाता रहा था.

राजस्थान नाम का राज्य 30 मार्च, 1949 को सिटी पैलेस के दरबार हॉल में जन्म ले रहा था और उसमें मनोनीत मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री एक हैरानी भरे दृश्य के रचयिता बन रहे थे.

स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले योद्धा जयनारायण व्यास, माणिक्यलाल वर्मा और गोकुलभाई भट्‌ट सहित कितने ही नेताओं के लिए बैठने तक की व्यवस्था नहीं की गई थी.

समारोह की अग्रिम पंक्तियों में राजे-महाराजे, जागीरदार, ठिकानेदार और नवाबों के साथ-साथ बड़े नौकरशाहों और आभिजात्य वर्ग के लिए स्थान आरक्षित किए गए थे.

यह देखकर कांग्रेस के नेता और स्वतंत्रता लाने में अग्रणी रहे नेता समारोह का बहिष्कार करके चले गए. किसी ने आज़ादी के आंदोलन में भागीदार रहे इन नायकों को रोकने, मनाने और वापस लाने की भी कोशिश नहीं की.

हैरानी की बात है कि उस समय वहाँ देश के उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल मौजूद थे.

राजस्थान की राजनीति में राजघराने

पहले मुख्यमंत्री पद और बाद में मंत्रिमंडल गठन को लेकर 1949 में कांग्रेस के नेताओं में कटुता और विवाद का शुरू हुआ सिलसिला 2023 तक रुकने और थमने का नाम नहीं ले रहा है.

इस कलह ने हीरालाल शास्त्री को जाने पर विवश किया और 20 जनवरी, 1951 को जयनारायण व्यास नए मुख्यमंत्री तय हुए, जिन्होंने 26 अप्रैल, 1951 को शपथ ली.

इसी साल प्रदेश की 160 सीटों वाली विधानसभा के चुनाव तय हुए, जो 1952 में पूरे हुए.

लगातार अंतर्विरोधों और कलह से ग्रस्त कांग्रेस इस चुनाव में हारते-हारते बची और 82 सीटें ला सकी.

स्पष्ट बहुमत के लिए 81 सीटों की ज़रूरत थी. इस चुनाव में रजवाड़े भी लड़े. उनकी पसंद राम राज्य परिषद थी, जिसे 24 सीटें मिलीं.

इस चुनाव में सबसे दिलचस्प रहा मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास का दो रजवाड़ों के सामने बुरी तरह हारना. वे दो जगह लड़े और दोनों जगह पूर्व राजघरानों के प्रतिनिधियों से हारे.

जोधपुर में महाराजा हनुवंत सिंह से और जालोर-ए सीट पर एक माधोसिंह से. हनुवंतसिंह स्वतंत्र लड़े थे और माधोसिंह राम राज्य परिषद से.

प्रदेश की लोकतांत्रिक राजनीति को राजघरानों की यह शुरुआती चुनौती और चेतावनी थी.

लोकतंत्र का राग राजस्थान की धमनियों में बजने लगा; रजवाड़े लगातार अपनी भृकुटियां ताने रहे. जागीरदारों ने सरकारी प्रशासन का कामकाज़ करना तक मुहाल कर दिया.

इन हालात को पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय समझा गया और न ही लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में.

इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने चार अहम क़ानूनों के माध्यम से बड़े बदलाव लाकर राजशाही के ऊंचे धोरों को पूरी तरह समतल कर दिया और वे आम आदमी के बराबर हो गए.

ये बदलाव थे : प्रीविपर्स क़ानून लाकर राजघरानों को मिलने वाला पैसा और विशेष सम्मान बंद करना, सीलिंग एक्ट के माध्यम से उनकी ज़मीनें भूमिहीनों को देना, वेपन एक्ट के माध्यम से राजघरानों के लोगों का हथियारों से सुसज्जित रहना बंद करना और आम लोगों में भय को समाप्त करना और गोल्ड एक्ट के माध्यम से उनकी परंपरागत संपन्नता पर रोक.

आजकल यह प्रश्न अहम है कि राजघरानों का मोह भाजपा के प्रति क्यों है? इसका सहज जवाब यह है कि इंदिरा गांधी नए बदलावों के माध्यम से राजस्थान के रजवाड़ों को धरातल पर ले आईं.

उनका वैभव धूमिल हो गया और ग्लोरी अतीत की एक लोरी बनकर रह गई. वे अब आम नागरिक के बराबर हो गए. रजवाड़ों को यह बात आज भी सालती है.

वो बात जो रजवाड़ों को आज भी सालती है

राजस्थान के राजघराने और भाजपा

इतिहासकार और रजवाड़ों की राजनीति के जानकार प्रो. राजेंद्र सिंह खंगारोत बताते हैं, "किसी के भी विशेषाधिकार छिनते हैं तो वह सत्ताविरोधी हो जाता है. यही बात राजस्थान के राजघरानों के साथ थी."

"कांग्रेस के कार्यकाल में उनके विशेषाधिकार छिने तो उन्होंने ऐसी पार्टी के साथ तालमेल बिठाने के लिए तलाश शुरू की, जो उनके अधिकारों की रक्षा तो नहीं तो कम से कम उन्हें छीने तो नहीं."

वे पहले रामराज्य परिषद और फिर स्वतंत्र पार्टी से जुड़े. स्वतंत्र पार्टी का विलय हुआ तो बाद में भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी से यह जुड़ाव सहज होता चला गया. कुछ राजघराने कांग्रेस में भी गए.

किसी भी राजघराने के बूढ़े व्यक्ति से राजस्थान में मिलें तो वे साफ़ कहेंगे कि कांग्रेस ने पहले उनका राज छीना, फिर जागीरें छीनीं, फिर प्रिवीपर्स ख़त्म किए, विशालकाय कृषि भूमियों से वंचित कर दिया, शस्त्रहीन कर दिया और वे इसके बाद भी नहीं रुके, उसने हमारे सोने, चांदी और हीरों वाले बहुमूल्य आभूषणों से भी हमें विहीन कर दिया.

कुछ लोग इसे समाजवाद की आंधी कहते हैं और कुछ लोग आज़ादी के बाद की समता.

लेकिन इन हालात के बाद राजस्थान की राजनीतिक सरज़मीं पर राजशाही के कुछ फूल कुम्हला गए, कुछ सूखकर झर गए और कुछ अपने होने के लिए खिले रहने की कोशिश करते रहे.

लेकिन इनके लिए फिर से खड़े होने का समय आया भैरोसिंह शेखावत और वसुंधरा राजे के कार्यकाल में.

शेखावत जनसंघ के शुरुआती नेताओं में अकेले ऐसे थे, जिन्होंने जागीरदारी प्रथा उन्मूलन में जागीरदारों का विरोध और लोकतांत्रिक अधिकारों का समर्थन किया था.

पहले चुनाव के बाद हनुवंत सिंह का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया और रजवाड़ों की सत्ता प्राप्ति का सपना टूट गया.

अलबत्ता, करौली से प्रिंस ब्रजेंद्रपाल, कुम्हेर से राजा मान सिंह, नवलढ़ से भीम सिंह, ठिकाना उनियारा से राव राजा सरदार सिंह, आमेर बी से महारावल संग्राम सिंह, जैसलमेर से हड़वंत सिंह, सिरोही से जवान सिंह, बाली से लक्ष्मण सिंह, जालोर ए से माधो सिंह, जोधपुर शहर बी से हनवंत सिंह, कुम्हेर से राजा मान सिंह, अटरू से राजा हिम्मत सिंह और बनेड़ा से राजा धीरज अमर सिंह जैसे लोग जीते.

राजस्थान में राजघरानों का प्रारंभिक परिदृश्य बताता है कि प्रदेश की राजनीति में आज सबसे चर्चित और बड़े नामों ने अपनी जगह लोकसभा में जाकर बनाई. भले वे जयपुर राजघराने के लोग रहे हों या अलवर-भरतपुर के.

जयपुर राजघराने का कोई सदस्य विधानसभा चुनाव में विद्याधरनगर सीट से पहली बार उतरा है.

वह हैं दीया कुमारी. यहाँ से भाजपा के संस्थापकों में प्रमुख रहे नेता और प्रदेश की राजनीति के शक्ति केंद्र रहे भैरो सिंह शेखावत के दामाद का टिकट काटा गया है.

एक और वाक़ाया टिकट घोषित होने के समय का है.

जयपुर के परकोटे में किताबों की एक दुकान पर मैं एक ज़हीन-शहीन कॉलेज शिक्षक से मिलता हूँ. बात चुनाव की चल निकलती है तो वे जयपुर की सियासी आबोहवा के बारे में बताने लगते हैं, इस बार टिकट दिया है दीया कुमारी को. वह राजघराने से हैं.

वे एक शेर सुनाते हैं, ''शहज़ादी तुझे कौन बताए तेरे चराग़-क़दे तक कितनी मेहराबें पड़ती हैं, कितने दर आते हैं.''

पुस्तक विक्रेता उन्हें टोकता है, ''साहब शेर तो आपका बहुत खू़बसूरत है; लेकिन दीया कुमारी के तो पीछे अभी से हुजूम है.''

जयपुर के पूर्व महाराजा ब्रिगेडियर भवानी सिंह और पद्मनी देवी की इकलौती बेटी दीया राजसमंद से लोकसभा सदस्य हैं. इससे पहले वे सवाई माधोपुर से भाजपा की विधायक रहीं.

महारानी गायत्री देवी ने दी थी इंदिरा गांधी को चुनौती

दीया कुमारी की दादी महारानी गायत्री देवी 1962, 1967 और 1971 में स्वतंत्र पार्टी से जयपुर से तीन बार सांसद रही हैं. गायत्री देवी का शुमार उन शख्सियतों में है, जिन्होंने इंदिरा गांधी से सीधी टक्कर ली थी.

गायत्री देवी के बेटे पृथ्वीराज सिंह 1962 में दौसा से स्वतंत्र पार्टी से लोकसभा के लिए चुने गए थे. यानी उस साल दोनों माँ-बेटे लोकसभा में थे.

गायत्री देवी ने 1967 में टोंक ज़िले की मालपुरा सीट से स्वतंत्र पार्टी की उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था और वे कांग्रेस के दामोदर लाल व्यास के सामने हार गई थीं.

राजस्थान की राजनीति के पुराने जानकारों का आकलन है कि गायत्री देवी वह चुनाव नहीं हारतीं तो राजस्थान की ग़ैर कांग्रेसी राजनीति की लगाम उसी महारानी के हाथ होती और संभवत: शेखावत के बजाय भाजपा का नेतृत्व 1977 में वे करतीं.

सौंदर्य और साहस की इस प्रतिमूर्ति ने अपने आख़िरी दिनों में आम लोगों की समस्याओं को लेकर भाजपा की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ख़िलाफ़ धरना तक दिया था.

वे इंदिरा गांधी से भी मुठभेड़ कर चुकी थीं. इंदिरा उन्हें इतना नापसंद करती थीं कि 1975 में उन्होंने टैक्स संबंधी कुछ मामलों को लेकर गायत्री देवी को कई महीनों तक जेल में डाल दिया था.

राजस्थान के राजपरिवार में माना जाता है कि इंदिरा के मन में गायत्री देवी के प्रति तभी से डाह थी, जब से अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की पत्नी जैक्लीन कैनेडी मार्च 1962 में कई दिन तक उनके यहाँ ठहरी थीं और उन्होंने जयपुर में हाथी की सवारी की, पोलो मैच देखे, बाज़ार घूमीं और उनकी निजी मेहमान बनकर रहीं.

वसुंधरा राजे के एक पुराने साक्षात्कार के अनुसार, राजमाता विजयराजे सिंधिया मानती थीं कि गायत्री देवी अपने समय में दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत महिलाओं में थीं.

गायत्री देवी के बेटे ब्रिगेडियर भवानी सिंह ने 1989 में लोकसभा का चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा था; लेकिन उन्हें भाजपा के एक साधारण कार्यकर्ता गिरधारीलाल भार्गव ने हरा दिया.

मेवाड़ के चुनावी मैदान में कितने राजघराने

जयपुर की तरह नाथद्वारा में देखें. वहाँ कांग्रेस के प्रखर नेता और राजनीतिक मनोविज्ञान के मर्मज्ञ प्रो सीपी जोशी का मुक़ाबला मेवाड़ के राजघराने के युवक विश्वराज सिंह मेवाड़ से है.

विधानसभा अध्यक्ष जोशी वर्षों से लोगों के बीच हैं और विश्वराज पहली बार क़दम रख रहे हैं. लेकिन मुक़ाबला कड़ा है.

राजस्थान के इस विधानसभा चुनाव में अनेक ऐसे क्षेत्रों में कमोबेश यही स्थिति है, जहाँ-जहाँ राजघरानों से जुड़े चेहरों को उतारा गया है.

भाजपा ने इस बार उदयपुर के पूर्व राजपरिवार से जुड़े लक्ष्यराज सिंह पर भी डोरे डाले थे; लेकिन वे राजनीति से दूर रहे. वे नहीं आए तो भाजपा विश्वराज सिंह को ले आई.

विश्वराज सिंह एक बार चित्तौड़गढ़ से सांसद रहे महाराणा महेंद्र सिंह के बेटे हैं, जबकि लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ महेंद्र सिंह के छोटे भाई अरविंद सिंह मेवाड़ के बेटे हैं. दोनों परिवारों में उत्तराधिकार और परिसंपत्तियों को लेकर दूरियां हैं. लेकिन सिटी पैलेस अरविंद सिंह के पास है.

राजस्थान के दो राजघराने जाट हैं. ये हैं भरतपुर और धौलपुर.

धौलपुर के जाट राजघराने की बहू वसुंधरा राजे झालावाड़ की झालरापटन से 2003 से लगातार चुनाव जीत रही हैं तो उनके बेटे दुष्यंत सिंह झालावाड़-बारां लोकसभा सीट से 2004 से सांसद हैं.

वसुंधरा राजे का सफ़र

वसुंधरा राजे नंबर एक पर हैं

राजे 1985 में पहली बार भाजपा के टिकट पर धौलपुर से विधायक चुनी गईं. राजे झालावाड़ से 1991, 1996, 1998, 1999 तक लोकसभा की सदस्य रहीं.

प्रदेश की राजनीति में सबसे अधिक प्रभावी और सक्रियता के मामले में भरतपुर के जाट राजघराने से सब पीछे हैं.

इस घराने के विश्वेंद्र सिंह डीग-कुम्हेर सीट से 2013 से लगातार काँग्रेस विधायक हैं और सरकार में मंत्री हैं. वे 1989 में जनता दल के सांसद बने और 1999 और 2004 में भाजपा से.

विश्वेंद्र सिंह 1993 में नदबई से विधायक चुने गए थे. उनकी पत्नी महारानी दिव्या सिंह एक बार विधायक और एक बार सांसद रही हैं.

विश्वेंद्र सिंह के पिता महाराजा ब्रिजेंद्र सिंह 1962 में लोकसभा और 1972 में विधानसभा के सदस्य रहे थे.

इसी राजघराने से संबंधित राजा मान सिंह डीग, कुम्हेर और वैर से अलग-अलग समय पर 1952 से 1980 तक सात बार विधायक रहे. वे 1985 के बहुचर्चित चुनाव के दौरान पुलिस गोलीकांड में मारे गए थे.

राजा मानसिंह की बेटी कृष्णेंद्र कौर दीपा 1985, 1990, 2003, 2008 और 2013 में विधायक रहीं. इस बार भाजपा ने उनका टिकट काट दिया है. वे 1991 में लोकसभा की सदस्य चुनी गईं.

इसी राजपरिवार के अरुण सिंह 1991 से 2003 तक लगातार चार बार विधायक रहे.

भरतपुर राजपरिवार के गिर्राजशरण सिंह उर्फ बच्चूसिंह पहले लोकसभा चुनाव में सवाई माधोपुर से विजयी हुए थे.

बीकानेर से लंबे समय तक महाराजा करणी सिंह 1952 से 1972 तक के चुनावों में लगातार लोकसभा सदस्य चुने जाते रहे. अब उनकी पौत्री सिद्धि कुमारी बीकानेर पूर्व से विधायक हैं. वो इस बार भी चुनाव मैदान में हैं.

अलवर राजघराना भी प्रमुख रहा है. भंवर जितेंद्र सिंह अभी काँग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और राहुल गांधी के बेहद क़रीबी हैं. वे दो बार विधायक और एक बार सांसद रहे हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में केंद्र में मंत्री भी रहे. उनकी माँ युवरानी महेंद्रा कुमारी भाजपा की सांसद रह चुकी हैं.

जोधपुर राजघराना शुरू में बहुत प्रभावी था.

हनुवंत सिंह विधानसभा का चुनाव भी जीते और लोकसभा का भी. उनकी पत्नी राजमाता कृष्णा कुमारी 1972 से 1977 तक जोधपुर से लोकसभा की सदस्य रहीं. हनुवंतसिंह और कृष्णाकुमारी के बेटे गज सिंह भाजपा के समर्थन से 1990 के उप चुनाव में राज्यसभा भी पहुंचे.

कृष्णा कुमारी और हनुवंत सिंह की बेटी और हिमाचल प्रदेश की काँग्रेस नेता चंद्रेश कुमारी जोधपुर से सांसद भी चुनी गईं.

कोटा के पूर्व महाराजा बृजराज सिंह 1962 में काँग्रेस और 1967 और 1972 में झालावाड़ से भारतीय जनसंघ की टिकट पर लोकसभा के सदस्य रहे. वे 1977 और 1980 में काँग्रेस की टिकट पर लड़े; लेकिन हार गए.

बृजराज सिंह के बेटे इज्जेराज सिंह 2009 में कोटा लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुने गए; लेकिन 2014 में वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने हार गए. इसके बाद इज्जेराज और उनकी पत्नी कल्पना देवी भाजपा में शामिल हो गए. कल्पना देवी लाडपुरा से 2018 में विधायक बनीं और अब फिर भाजपा की उम्मीदवार हैं.

करौली राजघराना भी राजनीति में सक्रिय रहा है. ब्रजेंद्रपाल सिंह 1952 और 1957 तथा 1962, 1967 और 1972 में विधायक रहे.

वे शुरू और आख़िर में वे निर्दलीय थे; लेकिन बीच के दो चुनावों में वे कांग्रेस से चुने गए. इसी राजपरिवार की रोहिणी कुमारी 2008 में भाजपा से विधायक चुनी गईं.

गायत्री देवी और लक्ष्मण सिंही की रस्साकशी

इस दौरान 1958 से राजाधिराज सरदार सिंह खेतड़ी, महारावल लक्ष्मण सिंह, कुंवर जसवंत सिंह दाउदसर जैसे लोग राज्यसभा भी पहुंचे.

राजसी राजनीति का सबसे दिलचस्प मोड़ 1977 में उस समय आया, जब जनता पार्टी ने विजय प्राप्त की. उस समय महारावल लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में लगभग सारे राजघराने एक हुए. लेकिन जीत के बाद महारानी गायत्री देवी और लक्ष्मण सिंह के बीच रस्साकशी रही.

विवाद गहराता चला गया तो पहले से अवसर के लिए चौकन्ने भैरोसिंह शेखावत सक्रिय हुए. उन्होंने राजनीतिक सूझबूझ और अपनी कुशलता से ऐसे नेतृत्व हासिल किया और मुख्यमंत्री बन गए.

राजघरानों के ताक़तवर चेहरों के बीच एक साधारण राजपूत के रूप में शेखावत ने मुख्यमंत्री बनकर जता दिया कि लोकतंत्र का आकाश अब राजघरानों के बजाय लोकआकांक्षाओं की पलकों पर झुक आया है.

शेखावत ने बैठकों के लिए सिटी पैलेस में जाने से इनकार कर दिया और राजसी ठाठबाठ वाले राजघरानों के प्रतिनिधि हाशिए पर आ गए.

महारावल लक्ष्मण सिंह को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया तो गायत्री देवी के क़द के अनुसार आरटीडीसी का चेयरपर्सन बनाया गया. यह कार्पोरेशन उनके लिए ख़ास तौर पर गठित किया गया.

इसके बाद प्रदेश की राजनीति तेजी से बदली और राजघरानों के वैभव के बरक्स साधारण राजपूत नेताओं के नामों का एक प्रभावशाली एक्वेरियम तैयार हो गया.

इसमें जसवंत सिंह जसोल, कल्याण सिंह कालवी, तनसिंह, देवीसिंह भाटी, नरपत सिंह राजवी, सुरेंद्र सिंह राठौड़ और राजेंद्र सिंह राठौड़ जैसे कितने ही अनूठे नाम तैरने लगे.

इससे राजघरानों की राजनीति ने बेचैनी महसूस की.

राजस्थान की सियासत एक संकरी सुरंग से गुजरते हुए 1987 तक आई तो राजघरानों ने देखा कि देश के राजनीतिक परिदृश्य पर वीपी सिंह छाए जा रहे हैं.

बदलाव लाने वाले शेखावत

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को चुनौती दी तो बड़े राजघरानों ने उनके साथ अपना भविष्य देखा.

दरअसल, वीपी सिंह राजस्थान के देवगढ़ ठिकाने के दामाद थे. इस तरह 1993 के चुनाव में राजपूत राजघरानों और ठिकानेदारों के लोगों को काफ़ी टिकट दिए गए. पराक्रम सिंह बनेड़ा और वीपी सिंह बदनौर जैसे नेता उभरे.

शेखावत की सरकार बनी तो 1993 से 1998 के बीच गढ़ों-क़िलों और ठिकानों के दिन फिरे और नई पर्यटन नीति से नई बहार आई.

जिन सूने क़िलों की विशाल मेहराबों पर कबूतर बैठते थे, इस नीति के बाद वहाँ सरकारी सहायता और मार्गदर्शन से विदेशी पर्यटक आने लगे.

कभी धोरों की रेत में नहाए सूने क़िले अब चाँदनी में नहाने लगे और रेगिस्तान में संपन्नता की झीलें अठखेलियां करने लगीं.

चुनाव आए तो आरोप लगे कि शेखावत ने सारा ख़ज़ाना राजमहलों और राजघरानों पर लुटा दिया है. नतीजा यह निकला कि भाजपा 200 में से 33 सीटों पर जा टिकी और कांग्रेस ने 153 सीटें हासिल कीं.

1998 में कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार बनी और 2003 के चुनाव आए तो महारानी वसुंधरा राजे की आंधी चली और कांग्रेस 56 सीटों पर सिमट गई और भाजपा को 120 सीटें मिलीं.

भाजपा को पहली बार पूर्ण बहुमत मिला. वसुंधरा राजे परिवर्तन यात्रा पर निकलीं और प्रदेश का चप्पा-चप्पा छान मारा तो उन्हें जहाँ कहीं किसी राजघराने या राजपूत परिवार में राजनीति की संभावना दिखी, उन्होंने उसे आगे बढ़ाया.

अब उत्तर-वसुंधरा काल में भाजपा के नेतृत्व ने एक बार फिर राजघरानों के लिए कंधे चौड़े कर लिए हैं और सीना खोल दिया है.

प्रो. खंगारोत बताते हैं, "राजस्थान के सारे ही राजघराने उत्पीड़क नहीं थे. लेकिन यह सच है कि सत्ता का चरित्र कभी नहीं बदलता. राजों-नवाबों के लिए पहले जो लाल कालीन बिछता था, उस पर अब चुने हुए सत्ताधीश चलते हैं और वे मनमाने फ़ैसले करते हैं.''

और उनके इन्हीं फ़ैसलों की बदलौत पार्टियों के सामान्य कार्यकर्ता दरियां-बिछाते और नारे लगाते रह जाते हैं और राजमहलों में टिकट पहुँच जाते हैं.

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