You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
राजपूतों को आईना दिखाने वाले भैरों सिंह शेखावत
भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत राजस्थान की सियासत में ऐसे वटवृक्ष थे जिनकी छांव एक बड़ा दायरा बनाती थी.
उनके विरोधी तो थे, मगर शत्रु कोई नहीं. वो ख़ुद भी कहते थे, "मैं दोस्त बनाता हूँ...दुश्मन नहीं."
शेखावाटी के एक साधारण राजपूत परिवार से निकले भैरों सिंह ने वो आसाधारण काम किए जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता है. उस दौर में वे जनसंघ के नेता थे और जब जागीर प्रथा ख़त्म करने का मुद्दा आया तो राज्य में शेखावत सामंतशाही की प्रतीक जागीर प्रथा के सबसे मुखर विरोधी बन कर उभरे.
तब जनसंघ जैसे दलों पर राजाओं-महाराजाओं का अच्छा ख़ासा प्रभाव था और शेखावत ख़ुद भी उसी पृष्ठभूमि से आते थे. लेकिन उन्होंने अपनी पार्टी जनसंघ को जागीर प्रथा के ख़ात्में के लिए लामबंद किया और इस प्रथा को ख़त्म भी करवाया.
वो ऐसे नेता थे जो भीड़ के कहने से नहीं चलते थे, बल्कि भीड़ उनके मिज़ाज और हिदायतों पर चलती थी.
सती प्रथा का विरोध
जब रूप कंवर सती कांड सामने आया तो पूरा राजपूत समाज सती प्रथा की हिमायत में खड़ा हो गया था.
हज़ारों राजपूत तलवार भांजते जयपुर की सड़कों पर सती की जय-जयकार करते निकले तो उन्होंने अपना प्रगतिशील चेहरा और निर्भीक स्वभाव दिखाया.
उस समय के राजनीतिक नेताओं में से उनमें ही इतना दम था कि अपनी उद्वेलित बिरादरी के सामने खड़े हो गए और पुरज़ोर मुनादी की - 'हाँ सती प्रथा अनुचित है.'
इस पर राजपूत समाज का एक बड़ा हिस्सा उनके विरोध में खड़ा हो गया. लेकिन ये विरोध उनको विचलित नहीं कर सका. ऐसे समय जब कोई नेता अपनी जाती या खाप की पंचायत के आगे खड़े होने की हिम्मत नहीं करता, ये शेखावत ही थे जो डटकर अपनी बात पर अड़े रहे.
तभी जोधपुर में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक थी. स्थिति तनावपूर्ण थी और भाजपा ने इसी समय जोधपुर में एक आम सभा का आयोजन किया था. सलाह दी गई कि जनसभा ना की जाए, नहीं तो राजपूत युवक शेखावत का विरोध कर सभा ख़राब कर देंगे.
मगर शेखवत इसके लिए तैयार नहीं हुए. मैं भी इस जनसभा में मौजूद था. शेखावत बोलने के लिए खड़े हुए तो एक समूह गड़बड़ करने के लिए उठा...मगर शेखावत ने उन्हें अपने वचनों और साहस से शांत कर दिया.
बाद में शेखावत ने मुझे बताया, "पार्टी में कुछ लोग आशंकित थे और कह रहे थे कि आम सभा स्थगित कर देते हैं. मैंने कहा अगर आपको मुझे राजनीतिक रूप से ख़त्म करना हो तो रद्द कर दो...सती एक समाजिक बुराई है, मैं उसका विरोध करुँगा."
राममंदिर के निर्माण और बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लम्हों में कभी उन्हें वैसी उन्मादी बातें करते नहीं देखा जैसे उनकी पार्टी के लोग कर रहे थे.
मुसलमान उनको एक धर्मनिरपेक्ष नेता मानते थे...बल्कि जब उनके दो मंत्रियो ने अयोध्या में कार सेवा में शिरकत की ज़िद की तो शेखावत ने उन दोनों को अपने मंत्रिमंडल से मुक्ति दे दी.
मुख्यमंत्री के नाते उन्होंने अन्त्योदय जैसे कार्यक्रम शुरु किए और ग़रीब को गणेश मानने जैसे नारों को अपनी सरकार का ध्येय वाक्य बनाया.
दलगत राजनीतिक से ऊपर
गंभीर राजनीति हो या तनाव के लम्हे, शेखावत हास्य के क्षण ढूंढ लेते थे. ये उनकी जीवटता की खुराक थी. उनके दोस्त सभी दलों में थे, शायद सभी दिलो में भी.
शेखावत के सभी राजनीतिक दलों में मित्र थे
उनके मुख्यमंत्री रहते एक बुज़ुर्ग वामपंथी नेता जब अनशन पर बैठे और तीन दिन हो गए तो शेखावत ने अपने गृह मंत्री को भेजा और कहा कि उन्हें मनाकर अनशन से उठाओ. उन्होंने राजनीतिक मतभेदों को कभी अपने मानवीय दृष्टिकोण पर हावी नहीं होने दिया.
जब वे भारत के उपराष्ट्रपति बने तो उस वक़्त कांग्रेस के अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे. गहलोत ने उनके सम्मान में बड़ा भोज दिया.
संसदीय परंपराओं के हिसाब से वो एक ऐसी किताब थे जिसे सदन में नए चुनकर आने वाले विधायक बार-बार पढना चाहते थे. शेखावत की सदन में मौजूदगी ये निश्चित करती थी कि सदन में संसदीय मूल्यों का हनन नहीं होगा.
उन्हें विधानसभा की उस पुरानी इमारत से बेइंतहा लगाव था जहाँ उन्होंने संसदीय मूल्यों की तालीम ली थी. तभी जब विधानसभा की कार्रवाई एक नई इमारत चलने लगी तो उनका मन उदास था.....लेकिन शायद अब वो पुरे सूबे को उदास कर गए हैं.
(तब के बीबीसी संवाददाता नारायण बारेठ ने 2010 में इसे लिखा था. भैरो सिंह शेखावत अगर जीवित होते तो आज 94 साल के होते.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)