दुबई की महत्वाकांक्षी परियोजना दि वर्ल्ड का क्या हुआ?

    • Author, जेरेमी हॉवेल
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

पिछले लगभग एक दशक या उससे भी ज़्यादा वक़्त से दुबई, अपनी बड़ी बड़ी परियोजनाओं से दुनिया को चौंकाता आया है.

फिर चाहे दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज ख़लीफ़ा हो, विश्व का सबसे स्मार्ट होटल बुर्ज अल अरब हो, या फिर दुबई के समुद्र तट के क़रीब विकसित किया गया बनावटी पाम आइलैंड हो.

हालांकि, अरबों डॉलर की एक योजना ऐसी भी है, जो ज़्यादातर ख़ाली और सुनसान पड़ी है.

ये परियोजना 260 छोटे छोटे द्वीपों का एक जाल है, जिन्हें दुनिया के सभी महाद्वीपों के आकार में विकसित किया गया है.

इस द्वीप समूह पर काम शुरू हुए, बीस बरस से भी ज़्यादा वक़्त बीत चुका है.

सवाल ये है कि दि वर्ल्ड आइलैंड्स के साथ हुआ क्या है? इस द्वीप समूह को क्यों विकसित किया जा रहा था?

दि वर्ल्ड नाम की इस परियोजना की परिकल्पना, 260 आर्टिफ़िशियल द्वीपों के तौर पर की गई थी.

इन्हें इस तरह बनाया जाना था, जिस तरह धरती पर सारे महाद्वीप यानी अफ्रीका, अंटार्कटिका, एशिया, यूरोप, उत्तरी अमरीका, दक्षिणी अमरीका और ओशानिया आबाद हैं.

दि वर्ल्ड परियोजना दुबई के समुद्र तट से लगभग चार किलोमीटर दूर बनाई जा रही थी.

हर द्वीप का नाम उस देश, इलाक़े या शहर के नाम पर रखा गया है, जिस महाद्वीप में वो स्थित है.

इस परियोजना के तहत निजी कंपनियों को इन द्वीपों पर तमाम सुविधाओं जैसे कि होटलों, रेस्टोरेंट, रिजॉर्ट या बंगलों-कोठियों ृका विकास करना था.

इससे यहां आने वाले को दुनिया की अलग अलग संस्कृतियों की एक झलक देखने को मिलती.

सरकार से मदद पाने वाली एक कंपनी नखील प्रॉपर्टीज़ ने पाम जुमेराह के नाम से एक बनावटी द्वीप विकसित किया था.

इसमें चार हज़ार लग्ज़री प्रॉपर्टी और दर्जनों होटल बनाए गए थे. दि वर्ल्ड को विकास की इससे भी ज़्यादा आलीशान मिसाल के तौर पर बनाया जाना था.

इन द्वीपों के बनने के बाद दुबई की समुद्री तट रेखा में 230 किलोमीटर का इज़ाफ़ा भी होना था.

उम्मीद ये लगाई गई थी कि इससे दुबई आने वाले सैलानियों की तादाद में भी बढ़ोतरी होगी.

दि वर्ल्ड दुबई परियोजना का एलान 2003 में दुबई के शासक शेख़ मुहम्मद अल मक्तूम ने किया था.

दि वर्ल्ड को कैसे बनाया गया?

नखील प्रॉपर्टीज़ ने दि वर्ल्ड पर 2003 में ही काम शुरू कर दिया था.

इन द्वीपों को फ़ारस की खाड़ी के समुद्र तल से 32.1 करोड़ घनफुट रेत निकालकर बनाया गया था.

पर्यावरणविद् कहते हैं कि समुद्र की तलहटी से रेत की खुदाई किए जाने से फ़ारस की खाड़ी में मूंगे की चट्टानों को काफ़ी नुक़सान पहुंचा है.

नखील प्रॉपर्टीज़ ने उन्हें फिर से बनाने और मूंगों को दोबारा आबाद करने के लिए समुद्री जीववैज्ञानिकों की सेवाएं ली थीं.

दि वर्ल्ड मुश्किल में कैसे फंस गया?

नखील प्रॉपर्टीज़ ने इन आर्टिफ़िशियल द्वीपों और आस-पास के समुद्री इलाक़े का निर्माण 2008 में पूरा कर लिया था.

और, कंपनी ने कहा कि वो इनमें से 70 फ़ीसद हिस्से को निजी कंपनियों को बेचने में कामयाब रही थी.

हालांकि, भयंकर वित्तीय संकट की वजह से इन द्वीपों पर सुविधाओं के निर्माण का काम रुक गया था. अमरीका से शुरू हुए इस वित्तीय संकट ने 2007 में दुबई को भी अपनी चपेट में ले लिया था और इसका असर 2010 तक रहा था.

इस दौरान दुबई में प्रॉपर्टी की क़ीमतों में काफ़ी गिरावट आ गई. इसकी वजह से बहुत सी निजी कंपनियों ने या तो इस योजना से अपने हाथ खींच लिए, या फिर उन्हें रोक दिया.

ख़ुद नखील प्रॉपर्टीज़ के ऊपर भी अरबों डॉलर का क़र्ज़ चढ़ गया था.

नखील को 2009 में जाकर उस वक़्त राहत मिली, जब दुबई की पड़ोसी अमीरात अबु धाबी ने दुबई में 10 अरब डॉलर का निवेश किया.

इसका मतलब था कि नखील को उसकी मालिकाना कंपनी दुबई वर्ल्ड के ज़रिए इस मुसीबत से ऊबारा जा सका.

दि वर्ल्ड में अब तक क्या क्या बन चुका है?

इस परियोजना की तरफ़ दुनिया का ध्यान खींचने के लिए नखील प्रॉपर्टीज़ ने लैपलैंड नाम के द्वीप पर एक मकान नुमाइश के लिए बनाया.

वहीं एक और द्वीप को फॉर्मूला वन के विश्व चैंपियन माइकल शूमाकर को उनकी कामयाबियों के सम्मान के तौर पर दान दे दिया गया. इस द्वीप पर भी एक शानदार इमारत बनी हुई है.

2012 में लेबनान नाम के द्वीप पर दि रॉयल आइलैंड बीच क्लब खुला. ये रेस्टोरेंट और बार की सुविधाओं से लैस एक रिजॉर्ट है.

2022 में अनातारा वर्ल्ड आइलैंड ने भी काम करना शुरू कर दिया. इस द्वीप पर भी होटल के कमरों, सुइट, विला और स्पा से लैस एक रिजॉर्ट बनाया गया है.

हालांकि, दि वर्ल्ड के बाक़ी के सारे द्वीप वैसे ही रेत के उजाड़ टीलों जैसे पड़े हैं.

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूकासल में भूगोल के प्रोफ़ेसर और ‘ए जर्नी इनटू दि एरा ऑफ आर्टिफिशियल आइलैंड्स’ के लेखक एलेस्टेयर बॉनेट कहते हैं कि, ‘दि वर्ल्ड के साथ एक बड़ी समस्या ये है कि दि पाम के उलट ये दुबई से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा है. ऐसा कोई पुल भी नहीं है, जिससे होकर कोई कार से इन द्वीपों पर जा सके. इन द्वीपों को आपस में जोड़ने वाली कोई सड़क भी नहीं बनाई गई है.’

इसका मतलब है कि यहां प्रॉपर्टी बनानेवालों के लिए बिल्डिंग मैटीरियल और मज़दूरों को लाना ले जाना एक बड़ी चुनौती बन गया है. फिर इन द्वीपों पर बिजली और पानी उपलब्ध कराना भी एक चुनौती है.

इन द्वीपों को दुबई से जोड़ने का एक ही ज़रिया है. पाम जुमेराह से चलने वाली एक फेरी सेवा ही लोगों को यहां लाती और वापस ले जाती है.

भविष्य में दि वर्ल्ड का क्या होगा?

पिछले एक दशक के दौरान दुबई स्थित क्लेनडिएंस्ट ग्रुप नाम की एक कंपनी दि हार्ट ऑफ यूरोप नाम की परियोजना पर काम कर रही है, जिसकी लागत पांच अरब डॉलर आने की उम्मीद है.

ये कंपनी ऑस्ट्रिया के उद्यमी जोसेफ क्लेनडिएंस्ट चलाते हैं. इस परियोजना के तहत कई लग्ज़री होट, निजी कोठियां और यूरोपियन स्टाइल में तैरते हुए विला बनाए जाने हैं.

इन सबको दि वर्ल्ड के जर्मनी, मोनाको, स्वीडन और वेनिस नाम के द्वीपों पर बनाया जाना है (हालांकि, इनमें से कोई भी देश या शहर असल में द्वीप नहीं है)

इस परियोजना के तहत एक ‘रेनिंग स्ट्रीट’ भी बनाई जानी है, जहां आने वालों को भयंकर गर्मी पड़ने पर बनावटी बारिश में भीगने का लुत्फ़ भी मिलेगा.

ये कॉम्प्लेक्स 2026 में बनकर तैयार होना है.

दि वर्ल्ड की बनावट पर बड़ा काम करने के लिए नखील प्रॉपर्टीज़ ठेकेदार तलाश रही है. इस परियोजना के तहत सभी 260 द्वीपों को ‘महाद्वीपों’ के तौर पर एक दूसरे से जोड़ा जाएगा.

मूल रूप से तो दि वर्ल्ड के हर द्वीप के लिए पानी और बिजली की अपनी अलग सुविधा होनी थी. लेकिन, ये बहुत महंगा और अव्यवहारिक विकल्प था.

जब इन बनावटी द्वीपों को महाद्वीपों के तौर पर एक दूसरे से जोड़ दिया जाएगा, तो उसके बाद ये द्वीप बिजली पानी जैसी सुविधाएं एक दूसरे से साझा करेंगे.

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