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भारतीय महिला हॉकी टीम का ओलंपिक का टिकट क्यों हो गया है मुश्किल
- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
महिला हॉकी ओलंपिक क्वालिफ़ायर में पहले ही मैच में अमेरिका के हाथों से हारने के बाद भारतीय महिला हॉकी टीम ने अपने सेमीफ़ाइनल में स्थान बनाने की संभावनाओं को कमज़ोर कर लिया है.
पिछले साल एशियाई खेलों में भारतीय टीम पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में नहीं बदल पाने की कमज़ोरी की वजह से स्वर्ण पदक तक नहीं पहुंच सकी थी और इसकी वजह से ही उसे इस क्वालिफ़ायर में खेलना पड़ रहा है.
भारतीय टीम ने कुछ माह पहले एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी में इसी मैदान पर जो प्रदर्शन किया, उसकी झलक कभी दिखी ही नहीं.
पेनल्टी कॉर्नरों की कमज़ोरी बनी हार की प्रमुख वजह
पिछले काफी समय से पेनल्टी कॉनरों को गोल में नहीं बदल पाने की कमज़ोरी भारतीय टीम में साफ़तौर पर नज़र आई है. हम सभी जानते हैं कि मौजूदा हॉकी में पेनल्टी कॉर्नर मैचों में परिणाम निकालने में अहम भूमिका निभाते हैं. भारतीय टीम काफी समय से इस क्षेत्र में कमज़ोर दिख रही है.
भारतीय टीम इस टूर्नामेंट की जब साई के बेंगलुरू केंद्र पर तैयारी कर रही थी, उस समय इस क्षेत्र में सुधार करने के लिए भारत के जाने-माने ड्रेग फ्लिकर रहे रूपिंदर पाल का पांच दिनों का शिविर लगाया गया था.
उन्होंने अपने अनुभव से खिलाड़ियों को बहुत कुछ सिखाने का काम किया. पर टीम में इस मामले में कोई सुधार नज़र नहीं आया. रूपिंदर पाल ने एशियाई खेलों से पहले भी ऐसा ही शिविर लगाया था, पर उस समय भी टीम की यह प्रमुख कमज़ोरी रही थी.
इससे एक बात तो साफ है कि इस कमज़ोरी को दूर करने के लिए दीर्घकालीन प्रयास करने की ज़रूरत है. वैसे भी एक अच्छा ड्रेग फ्लिकर बनाने के लिए बहुत मेहनत करने की ज़रूरत है. इस बात को भारतीय पुरुष टीम के ड्रेग फ्लिकर हरमनप्रीत को देखकर समझा जा सकता है. इसलिए इस क्षेत्र में किसी विशेषज्ञ को स्थाई तौर पर लगाने की ज़रूरत है.
भारत ने इस मुक़ाबले में सात पेनल्टी कॉर्नरों को बर्बाद किया. इससे मैच में दबाव बनाने में वह कामयाब नहीं हो सकी.
इन सभी मौकों पर भारतीय खिलाड़ियों ने गोल पर सीधा निशाना साधने का प्रयास किया और अमेरिका की गोलकीपर बिन केलसे को वह कभी गच्चा देने में सफल नहीं हो सकीं. भारत को पेनल्टी कॉर्नरों पर बेहतर परिणाम पाने के लिए इससे लेने के और तरीके ईजाद करने होंगे.
मिले मौकों को भुनाने में टीम बेहद कमज़ोर
हम अगर अमेरिका के खिलाफ मैच को देखें तो यह बात साफ नज़र आती है कि इस मुक़ाबले में भारत को गोल जमाने के ज़्यादा मौके मिले पर इन मौकों का इस्तेमाल करने में असफल रहने की वजह से ही भारत को हार का सामना करना पड़ा.
मौकों को नहीं भुना पाने की वजह सर्किल में पहुंचने के बाद जिस चतुराई की ज़रूरत होती है, वह भारतीय खिलाड़ियों में नज़र नहीं आई. वे अच्छे हमले बना रही थीं और बार-बार अमेरिकी सर्किल में पहुंच रही थीं पर लक्ष्य पर सही निशाने साधने में सफल नहीं हो पा रही थीं.
इसकी वजह एक तो यह दिखी कि गेंद पर नियंत्रण रखने वाली खिलाड़ी ने यह देखने की ज़रूरत ही महसूस नहीं की कि कोई गोल जमाने के लिए उससे बेहतर स्थिति में कोई और खिलाड़ी तो नहीं है. इसके लिए खिलाड़ियों में निस्वार्थ भावना बनाने की ज़रूरत है. यह खूबी भारतीय पुरुष टीम में साफतौर पर देखी जा सकती है.
भारतीय टीम को दबाव में संतुलन बनाए रखना भी सीखना होगा. भारतीय टीम एक गोल से पिछड़ने के बाद बराबरी का गोल पाने के प्रयास करती तो दिखी पर इन प्रयासों को गोल में नहीं बदल पाने और समय निकलते जाने से उनके ऊपर हताशा हावी होने लगी. परिणामस्वरूप कई बार सलीमा टेटे और संगीता कुमारी जैसी खिलाड़ी व्यक्तिगत तौर पर हमले बनाकर समय बर्बाद करतीं दिखीं.
भारतीय खिलाड़ियों पर हताशा इस कदर हावी थी कि जब मुश्किल से डेढ़ मिनट का खेल बचा था, तब भारतीय डिफेंडर उदिता अमेरिकी हाफ में गेंद फेंकने के बजाय अपने गोल के पेरलल पास देकर अपने गोल पर ही अमेरिकी खिलाड़ियों को मंडराने का मौका देती नज़र आईं. कई बार सही ट्रेपिंग नहीं होने का भी भारत को खामियाज़ा भुगतना पड़ा.
भारतीय टीम को हड़बड़ाहट से बचने की ज़रूरत
भारतीय टीम पहले क्वार्टर में किसी तरह अमेरिका के गोल से तो बच गईं. पर अमेरिका ने जब दूसरे क्वार्टर की शुरुआत में ही टेमर अबेगेल के गोल से बढ़त बना ली तो भारतीय टीम पर हड़बड़ाहट हावी हो गई.
उसने पिछड़ने के बाद इस क्वार्टर में ताबड़तोड़ हमले तो बनाए पर ख़ुद पर काबू नहीं रख पाने की वजह से वह अपने हमलों को गोल में नहीं बदल सकी.
मौजूदा हॉकी में कौशल के साथ-साथ मानसिक मज़बूती भी बेहद ज़रूरी होती है. भारतीय कप्तान सविता पूनिया ने मैच से पहले मानसिक तौर पर तैयार रहने की बात ज़रूर कही. पर यह पहले हाफ में तो कतई नहीं दिखा.
भारतीय टीम को यह सीखने की ज़रूरत है कि विपक्षी सर्किल में पहुंचने के बाद चतुराई का इस्तेमाल बेहद ज़रूरी होता है पर इस मामले में टीम कमज़ोर नज़र आई.
फिनिश में भी सुधार की ज़रूरत
भारतीय टीम को अपने हमलों को बेहतर फिनिश करना सीखना होगा. इस मुकाबले में पहले हाफ में भारतीय टीम 0-1 से पिछड़ी हुई रही. पर टीम ने हमलों को बेहतर फिनिश किया होता तो उसकी 3-1 की बढ़त हो सकती थी.
भारत ने पहला गोल खाने के बाद हमलों पर पूरा ज़ोर लगाकर अमेरिका को पूरी तरह से बचाव करने को मजबूर कर दिया.
दूसरे क्वार्टर के आखिरी पांच मिनट में भारत के हमलों में पूरी जान लगा देने से भारत के अच्छे तालमेल के साथ हमले बनने लगे. लेकिन कम से कम तीन ऐसे मौके आए, जब अमेरिकी गोल को भेदा जा सकता था.
पर भारतीय हमलावर जल्दबाज़ी दिखाने की वजह से इन हमलों को गोल की शक्ल देने में कामयाब नहीं हो सके.
शोपमैन की किस्मत में नहीं हुआ सुधार
भारतीय मुख्य कोच यानिक शोपमैन चार साल पहले अमेरिकी कोच बनकर भारत आई थीं और उस समय अमेरिका को क्वालीफाई करने का प्रयास करना था.
उस समय भारत ने अमेरिका को फतह करके उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था. इस बार शोपमैन भारत की मुख्य कोच हैं तो उनकी टीम अभियान की शुरुआत ही हार के साथ हो गई है.
भारत को इस हार से झटका ज़रूर लगा है पर अगर अगले न्यूजीलैंड और इटली के ख़िलाफ़ मैचों को बड़े अंतर से जीत ले तो सेमीफाइनल की संभावनाएं बन सकती हैं.
इसके लिए उसे कुछ महीने पहले एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी में किए प्रदर्शन को दोहराना होगा.
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